सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

बुढ़ापे का सहारा

ममता रानी वर्मा मां का इकलौता बेटा बुढ़ापे का सहारा अमरीका में जा बैठा था। नाम था उसका सोनू। यों तो उसका रहन-सहन ठाठ-बाट कम न थे। बड़े ऊंचे ओहदे पर जो था वो। पर माँ को अपने साथ रखने में हिचकिचाता था। पर बूढ़ी माँ क्या करे। किसके सहारे जिए। बुढ़ापे में किसके दरवाजे पर जा पड़े, यह सोच-सोचकर वह परेशान थी। रिश्तेदारों ने बेटे को समझाया कि बुढ़ापे में अपनी माँ को अपने साथ रखो। बेटा बोला मैं हिन्दुस्तान नहीं आऊंगा और माँ तो है ठेठ गंवार वह अमेरिका में कैसे रहेगी। मेरे दोस्त मेरी मजाक बनाएंगे। पर बाद में बहुत समझाने के बाद वह माँ को अपने पास अमेरिका ले जाने को तैयार हो गया। माँ अमेरिका अपने बेटे और बहू को पास चली गई। रिश्तेदारों ने भी चैन की सांस ली।अब वहां माँ का हाल बेहाल हो गया। बहू को घर की नौकरानी मिल गई। पर माँ तो माँ है। वह अपने घर का काम करने में ही संतोष का अनुभव करती। कुशल होने के कारण माँ का निभाव हो रहा था। बेटे ने एक दिन अपने बॉस को पार्टी दी। बॉस ने सोनू के प्रमोशन का वादा जो किया था। अब क्या घर की साज सजावट होने लगी। घर का सारा खराब समान इधर-उधर पलंग के नीचे छिपाया जाने लगा। अब वह घड़ी आने वाली थी, शाम के पांच बजे बॉस को आना था। तभी सोनू की पत्नी रेखा की नार माँ पर पड़ी। वह चौक कर बोली, अरे माँ का क्या करें। माँ उस समय कहां रहेगी जब तुम्हारे बॉस आएंगे? माँ को कहां छिपाएं? सोनू ने कहा, पहले खाने की तैयारी माँ के साथ मिलकर कर लो, फिर माँ को छिपाने का भी प्रबंध करते हैं। सारा खाना तैयार करवाकर डाइनिंग टेबल पर लगा दिया गया। पांच बजने वाले थे। माँ को कहां छिपाया जाए? इसी बात को लेकर सब परेशान थे। अंत में एक स्टोर रूम में माँ को छिपा दिया और हिदायत दी कि कुछ भी हो बाहर मत आना। ठीक पांच बजे श्रीमान मुकुन्द सोनू के बॉस आ गए। गपशप के बाद खाना खाकर तो मुकुन्द जी ऊंगली चाटते रह गए। उन्होंने इतना स्वादिष्ट खाना कभी न खाया था। सोनू के बॉस खाना खाकर रेखा की तारीफ के पुल बांधने लगे, पर सोनू के बेटे निखिल ने सारी पोल खोल दी कि अंकल ये सारा खाना तो दादी माँ ने बनाया है। बॉस सोनू की माँ से मिलने के लिए उत्सुक हुए, बोले हमें भी उनसे मिलवाओ। निखिल तपाक से बोला, ''मम्मी डैडी ने उन्हें स्टोर रूम में बंद कर रखा है।'' कारण पूछने पर सोनू ने बॉस को बताया कि माँ गांव की रहने वाली है, इसलिए मैं माँ को तुम्हारे सामने नहीं लाना चाहता था।सोनू के बॉस ने सोनू को समझाया, माँ ने तुमको नौ महीने पेट में पाला, अपने खून से सींचा। माँ तुम्हें दुनिया के सामने लाने में नहीं शर्माई और तुम माँ को मेरे सामने लाने से शरमा रहे थे। बॉस ने माँ से मिलकर मां के पैर छुए। सोनू और रेखा शरम से गड़े जा रहे थे। प्राथमिक शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय, ओ.एन.जी.सी., सूरत

बुधवार, 4 अगस्त 2010

कुंवारी और शादी-शुदा मर्द

आज नेट पर सर्च कर रहा था, तो एक लेख पर अनायास ही नजर टिक गई। हैडिंग देखकर मन ठनका, तो सोचकर दिल धड़कने लगा। लेख का सार यह था कि एक कुंवारी शादी-शुदा लड़के को दिल क्यों दे रही है। यह आजकल फैशन हो चला है, क्योंकि फिल्मी हीरोइनें आजकल यही कर रही है। यही मुख्य कारण बताया गया। क्या इस तरह के संबंध को बढ़ावा देना चाहिए? मेरी राय में इस तरह की बातें भारतीय समाज में गंदगी ही फैलाएगी। आज पाश्चात्य संस्कृति के लोग हमारी सभ्यता इसलिए अपना रहे हैं कि इसमें स्थायित्व है। स्थायित्व इसलिए है कि हमारी शादी पहले होती है, उसके बाद प्यार होता है। उनके बीच रिश्ते का जो बंधन है, वह जाति, खानदान, रीति रिवाज, हैसियत, कुंडली, खूबसूरती आदि कितने ही आधार पर खड़ा है। पाश्चात्य संस्कृति में पहले प्यार होता है। प्यार शारीरिक आकर्षण पर अवलंबित होता है। जब तक दोनों सुंदर हैं। शारीरिक बनावट बेहतर है, संबंध बने रहते हैं, लेकिन शरीर गिरते ही आत्मीयता तार-तार हो जाती है और वे लोग आसपास नजर दौड़ाने लगते हैं। क्योंकि लव मैरिज में भी दो व्यक्ति एक-दूसरे को इसलिए नहीं अपनाते कि दोनों दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्त्री-पुरुष हैं। दोनों एक-दूसरे को इसलिए चुनते हैं, क्योंकि जीवन के किसी मोड़ पर दोनों ने एक-दूसरे को अपने अनुकूल पाया। ऐसा बिल्कुल मुमकिन है कि आज कोई लड़की आपको बहुत अच्छी लगी और आपने उससे शादी कर ली लेकिन साल-दो साल बाद कोई और लड़की मिली, जिसमें कुछ और खासियतें हैं, जो आपकी खुद की चुनी प्रेमिका में नहीं और आपको वह भी अच्छी लगने लगे। यही हाल किसी लड़की का भी हो सकता है। भारतीय संस्कृति में यह बात नहीं है। यहां ना-ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे वाली बात है। यदि आप धड़कन सिनेमा देखेंगे, तो इसमें यही बताया गया है कि प्यार से बढ़कर शादी है अन्यथा न ही यह गाना हिट होता और न ही सिनेमा। हमें इस तरह की बातें दबानी चाहिए। तभी हमारी सभ्यता और देश का कल्याण होगा। यह मन का वहम होता है। यदि आत्मीय भाव से प्रेम किया जाए तो एक-दूसरे के बिना एक पल का जीना दूभर हो सकता है।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

सही बात पर तलाक

आधुनिक शिक्षा मिली थी। इस कारण आधुनिक विचार थे मोहित के। वह सभी को यही बताता था कि संबंध विश्वास पर आधारित होते हैं। एक-दूसरे बीच विश्वास तभी बन सकती है, जब कोई भी बात एक-दूसरे से छिपी न हो। सभी उसके विचार से प्रभावित थे। मैं उससे काफी प्रभावित था। उसका विचार मुझे इतना अच्छा लगा कि आज हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए हैं। लगभग 6 महीनों से बात नहीं हुई थी। इस बार जब मिला, तो वह रोने लगा। मैं उसे देखकर अपसेट हो गया। उसे किसी भी चीज की कमी नहीं है। सरकारी नौकरी भी कर रहा है और एक वर्ष पहले शादी भी हुई है। फिर किस तरह की परेशानी हुई इसे? सुलझा हुआ व्यक्ति था वह। दूसरे की उलझन सुलझाने में उसका कोई जवाब नहीं था। हुआ यूं कि शादी से पहले वह किसी लड़की से प्यार करता था। किसी कारणवश दोनों की शादी नहीं हो पाई। उसके बाद लगभग चार वर्षो तक अकेला रहा। अंत में माता-पिता के दबाव में आकर शादी के लिए तैयार हुआ। शादी के एक वर्ष बाद ही अब तलाक की नौबत आ गई। यार, घरवाले मना किए थे कि प्यार के बारे में कुछ भी नहीं बताना। लेकिन मुझे लगा कि सब कुछ उसे बता देना चाहिए, क्योंकि यदि बाद में पता चलेगा, तो विश्वास टूट जाएगा। यह सोचकर मैने उसे सब कुछ बता दिया। अब हालात यह है कि वह अपनी मर्जी से घर चलाना चाहती है। कहता हूं, तो रोने लगती है और उलाहना देती है कि आप अभी भी उसी लड़की से प्यार करते हैं। इस कारण मेरी बात नहीं सुनते, जबकि वास्तविकता यह है कि हम दोनों एक-दूसरे के बारे में 6 वर्षो से कुछ भी नहीं जानते। अब मेरी स्थिति कहीं की नहीं रही। मोहित के ये शब्द सुनकर कलेजा मुंह को आ गया और सोचने लगा कि सही कौन है? उसके घरवाले जो उन्हें पिछली बात नहीं बताने के लिए कह रहे थे या मोहित के आधुनिक विचार? लेकिन इसका हश्र तो बुरा हुआ। यदि नहीं बताया जाता और बाद में उसे पता चलता तो और भी अनर्थ हो सकता था। आप क्या सोच रहे हैं? आप ही बताइये न?

गलती किसकी?

विकलांग था वह। अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ था। उस समय वह यही सोचता था कि उसे प्यार करने वाला कोई नहीं है, सिवा परिवार के। यह उन दिनों की बात है, जब वह पांचवीं क्लास में पढ़ता था। धीरे-धीरे बड़ा हुआ और नकारात्मक सोच भी उसी के हिसाब से बढ़ता गया। अब उसका हृदय शॉक प्रूव हो चुका था। अब उसे किसी बात का दुख नहीं होता था। मन में हमेशा यही इच्छा होती थी कि उसे भी अच्छे दोस्त मिले, लेकिन विकलांगता के कारण उससे सभी दूर रहते थे। यदि कोई चाहता भी था, तो अंदर से इतना टूट चुका था कि उसे अपमानित होने का डर सताता रहता था। इस भय से वह किसी के पास नहीं जाता था। इसी तरह दिन कटते गए और वह इंटरमीडिएट में पढ़ने लगा। जवान हो चुका था, इस कारण सपने भी देखने लगा। फिर अपने को संभालता कि यदि तुम्हें लड़का दोस्त नहीं बना रहा है, तो लड़की क्या पूछेगी? मन ही मन स्वयं को कोसता रहता था। काफी दुखी था वह। एक दिन वह अपने रिलैटिव के यहां गया और वहां एक खूबसूरत लड़की मिली। उसे देखते ही हर कुंवारे की तरह उसका भी मन डोलने लगा। फिर स्वयं को हीन समझकर नियंत्रित किया और चुपचाप बैठ गया। मजाक के लहजे में किसी ने कहा कि यह तुम्हें पूछेगी? अपनी विकलांगता तो देखो। वह कुछ नहीं बोला लेकिन मन ही मन रोने लगा अपनी विकलांगता को लेकर। उसे यह पता नहीं था कि अच्छे लड़के को भी लड़कियां भाव नहीं देती हैं। वह सभी का कारण विकलांगता को मानता था और मन ही मन कोसता रहता था। फिर एकाएक न जाने कहां से ऊर्जा आ गई और वह उस लड़की को पाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अंत में लड़के की जीत और वह लड़की उसकी प्रेमिका बन गई। आत्मविश्वास एकाएक काफी बढ़ गया और जो उसका उपहास उड़ाया था, उसके लिए करारा जवाब भी दिया वह। काफी कॉन्फिडेंस में था वह उस समय। खुश इस कारण नहीं था कि अब उसे प्रेमिका मिल गई है। खुश इस कारण था कि आज भी कद्रदानों की कद्र है। उसे समझ में आ गया कि मॉडर्न लड़की आज भी प्रतिभा और व्यक्तित्व को शारीरिक सुंदरता पर वरीयता देती है। उस समय तक सेक्स भावना नहीं थी। सिर्फ वह आगे बढ़ने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहता था। पहले से वह आईएएस बनने के लिए कृतसंकल्प था और अपनी तैयारी में जी जान से जुट गया। उस लड़की से उसे नया जीवन दिया और आगे बढ़ने का प्रेरणास्रोत भी बनी। यह प्रेम लगभग 6 वर्षो तक चला। अभी तक किसी तरह की गलत हरकत नहीं हुई। लड़का इतना ईमानदार था कि कभी लड़की पर दबाव नहीं डाला। सिर्फ साल में एक बार तीन से चार घंटे के लिए मिलता था और बहुत सारी बातें करता रहता था। दोस्तों के बीच उसका काफी क्रेज था। उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। उसे लगने लगा कि अब वह भी इस धरती पर खास है। एक दिन लड़की बताई कि यदि तुम 6 महीने में नौकरी नहीं पकड़ते हो, तो हमारी शादी कहीं और हो जाएगी। इससे पहले लड़का खोने के डर से इस तरह की बात लड़की से नहीं कर पाया था। वह काफी खुश हुआ। उस दिन लड़की को न जाने क्या हो गया, उसके सामने सब कुछ देने को तैयार थी। लड़का इस कारण अपनी भावना को कंट्रोल में रखा कि इस तरह के समर्पित लड़की के साथ शादी के बाद ही कुछ होना चाहिए। इस कारण उसे कुछ नहीं कहा और आईएएस की परीक्षा छोड़कर कोई डिप्लोमा कोर्स कर लिया और संयोग से उसे नौकरी भी मिल गई। अपने घरवाले को भी तैयार कर लिया। लेकिन लड़की शादी से इस कारण इनकार कर दी कि वह विकलांग है। उस लड़के को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसकी दुखती रग पर वह हाथ रख चुकी थी। लड़का कुछ नहीं कहा और अभी तक मौन है। आप ही बताइये न कि इसमें गलती किसकी है? लड़की यदि गलत होती तो 6 वर्षो तक उस बेरोजगार विकलांग से नि:स्वार्थ प्यार क्यों करती? यदि लड़का गलत होता तो वह लड़की को कुछ कह सकता था। ठीक ही कहा गया है कि त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम, देवो न जानाति, कुतो मनुष्यम।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

पागल बुढि़या कुछ भी बोलती रहती है

जून में कुछ दिनों के लिए घर गया था। काफी खुश था घर जाकर। पड़ोसी में एक बूढ़ी है। उम्र होगी करीब सत्तर वर्ष। वह काफी परेशान थी। कसम खाई थी कि अब किसी बच्चे को नहीं पढ़ने देगी। इस कारण उसे कुछ लोग पागल भी कह रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ यह सुनकर कि आजकल सभी शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं और यह दादी शिक्षा की कब्र खोद रही है, जबकि वह पेशे से खुद टीचर थी। एक समय उनकी खूब चलती थी। मुझे याद है कि संस्कृत के श्लोक रटाने के लिए वह बहुत मारी थी। उसका बेटा महेश भी मेरे साथ पढ़ता था। उसे भी खूब मार पड़ी थी। अंत में मैं यह श्लोक सुना दिया और उसे याद नहीं हुआ। उसे इस कारण छोड़ दिया गया कि वह संस्कृत में कमजोर था, लेकिन मैथ में तेज था। उसकी मां गर्व से कहती थी कि संस्कृत में क्या रखा है। मैथ पढ़कर बेटा इंजीनियर बनेगा। हुआ वही, बेटा इंजीनियर बन गया, लेकिन अपनी मां को यहीं छोड़ गया है। मां इसलिए परेशान थी। मैं उन्हें मजाक के लहजे में कहा कि आप मुझे संस्कृत के श्लोक के लिए बहुत पीटी थीं आपको याद है? वह बोली कि मुझे वह घटना भी याद है और श्लोक भी। काश, उस समय मैं इसका महत्व समझती और उसे भी तुम्हारी तरह रटा देती तो आज यह दिन नहीं देखने पड़ते। मुझे हंसी आ गई और वह रोने लगी। अब आप सोच रहे होंगे कि श्लोक क्या था। साधारण है, आप सभी जानते हैं। उस समय तो मैं उसे रट लिया था और व्यावहारिक जीवन में कभी जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन उसके बाद मैं भी सोचने के लिए मजबूर हो गया। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि एक श्लोक का इतना महत्व हो सकता है। अंत में मैं लाचार होकर उनसे पूछा कि विद्या तो उसके पास है ही, फिर श्लोक का क्या महत्व? वह गंभीर होकर बोली कि जब हनुमान के दिल में ही सीता और राम थे, तो फिर राम-राम की रट क्यों लगाते थे। श्लोक है : विद्या ददाति विनयम, विनया ददाति पात्रत्रामपात्रत्वधनआप्नोति धनात धर्म: तत: सुखम। आधुनिक शिक्षा तो वह ग्रहण कर लिया लेकिन बुनियादी शिक्षा ही वह भूल गया। कुछ दिन पहले उसके पास गया तो मुझे वहां से इस कारण भेज दिया कि तुम यहां एडजस्ट नहीं कर सकती। बताओ, यदि सही विद्या होती, तो इस तरह की बातें वह करता? मैं निरुत्तर था और वह बार-बार यही प्रश्न कर रही थी। इसी बीच भतीजा आया और बोला कि चलिए यह पागल बुढि़या कुछ भी बोलती रहती है।

गृहस्थ या सन्यास

पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की। पति के बेवफाई से तंग आकर पत्नी ने तलाक ली। इस तरह की खबरें आजकल आम हो गए हैं। पहले ये खास लोगों में थी, तो खास खबर बनती थी। अब आम हो गई है। बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। उसमें यह था कि एक युवक गृहस्थ और सन्यास को लेकर दुविधा में था। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि कौन बेहतर है? काफी परेशान होने के बाद वह कबीर दास के पास पहुंचा और अपनी परेशानी बताई। कबीर उन्हें जंगल घास काटने के लिए ले गए। दो घंटे के बाद नब्बे वर्ष के बूढ़े संत के पास ले गए। कबीर ने उनसे पूछा कि बाबा आपका नाम क्या है और कितनी उम्र हो रही है? संत न बताया कि बेटा नाम आत्मा राम है और उम्र 90 वर्ष है। कबीर फिर उसी को दोहराए और संत उसी भाव से उत्तर दिए। इस तरह एक ही प्रश्न कबीर ने उस संत से लगभग पचास बार पूछा, लेकिन संत उसी भाव से सहज उत्तर देते रहे। युवक भी इस बात को सुन रहा था। वह पछता रहा था कि किस पागल के पास मैं आ गया हूं। बाद में कबीर दास ने युवक को अपना घर लाया। उस समय दिन के दो बज रहे थे। बीच आंगन में घास रखकर कबीर ने पत्नी से एक दीया जलाकर लाने को कहा। युवक अब अच्छी तरह समझ गया कि कबीर पागल है, क्योंकि उस समय धूप काफी खिली हुई थी। पत्नी कबीर के आदेशानुसार दीया जलाकर ले आई। अब कबीर ने युवक को बताया कि यदि तुम संत की तरह क्रोध मिटा सकते हो, तो संत बनो। इसके विपरीत यदि विश्वास है, तो गृहस्थ बनो। क्योंकि गृहस्थ जीवन विश्वास पर अवलंबित है। यदि अविश्वास होता तो पत्नी धूप में दीया लाने का प्रयोजन पूछ सकती थी, लेकिन नहीं पूछी। कारण साफ है। यह तो एक कहानी थी, लेकिन आजकल दोनों चीज गायब हैं। आजकल के हाइटेक बाबा काम और क्रोध में लिप्त हैं और अखबार की सुखियरें में रहते हैं, तो अविश्वास के कारण परिवार टूट रहे हैं। शक के कारण एक दूसरे की हत्या की जा रही है। अब मैं खुद परेशान हूं कि कबीर सही थे या हमलोग सही हैं। आखिर हमें भी तो जमाने के साथ कदम बढ़ाकर चलना है। नहीं चलेंगे, तो पीछे रह जाएंगे। चलेंगे तो कहीं के नहीं रहेंगे।

मन का सुख

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजीसे पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कमपड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आतीहै ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंनेछात्रों से कहा कि वेआज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबलटेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समानेकी जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरुकिये h धीरे- धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समागये , फ़िरसे प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालनाशुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी परहँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अबतो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ॥ अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे सेचाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थितथोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान ,परिवार , बच्चे , मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं ,छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , औररेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस कीगेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहींभर पाते , रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछेपडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातोंके लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है येतुम्हें तय करना है । अपनेबच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अपकरवाओ ... टेबल टेनिसगेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है ..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यहनहीं बतायाकि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच हीरहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिनअपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनीचाहिये ।