एक नवयुवक था. छोटे से क़स्बे का. अच्छे खाते-पीते घर का लेकिन सीधा-सादा और सरल सा. बहुत ही मिलनसार.
एक दिन उसकी मुलाक़ात अपनी ही उम्र के एक नवयुवक से हुई. बात-बात में दोनों दोस्त हो गए. दोनों एक ही तरह के थे. सिर्फ़ दो अंतर थे, दोनों में. एक तो यह था कि दूसरा नवयुवक बहुत ही ग़रीब परिवार से था और अक्सर दोनों वक़्त की रोटी का इंतज़ाम भी मुश्किल से हो पाता था. दूसरा अंतर यह कि दूसरा जन्म से ही नेत्रहीन था. उसने कभी रोशनी देखी ही नहीं थी. वह दुनिया को अपनी तरह से टटोलता-पहचानता था.
लेकिन दोस्ती धीरे-धीरे गाढ़ी होती गई. अक्सर मेल मुलाक़ात होने लगी.
एक दिन नवयुवक ने अपने नेत्रहीन मित्र को अपने घर खाने का न्यौता दिया. दूसरे ने उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार किया.
दोस्त पहली बार खाना खाने आ रहा था. अच्छे मेज़बान की तरह उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. तरह-तरह के व्यंजन और पकवान बनाए.
दोनों ने मिलकर खाना खाया. नेत्रहीन दोस्त को बहुत आनंद आ रहा था. एक तो वह अपने जीवन में पहली बार इतने स्वादिष्ट भोजन का स्वाद ले रहा था. दूसरा कई ऐसी चीज़ें थीं जो उसने अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं खाईं थीं.
इसमें खीर भी शामिल थी. खीर खाते-खाते उसने पूछा, "मित्र, यह कौन सा व्यंजन है, बड़ा स्वादिष्ट लगता है."
मित्र ख़ुश हुआ. उसने उत्साह से बताया कि यह खीर है.
सवाल हुआ, "तो यह खीर कैसा दिखता है?"
"बिलकुल दूध की तरह ही. सफ़ेद."
जिसने कभी रोशनी न देखी हो वह सफ़ेद क्या जाने और काला क्या जाने. सो उसने पूछा, "सफ़ेद? वह कैसा होता है."
मित्र दुविधा में फँस गया. कैसे समझाया जाए कि सफ़ेद कैसा होता है. उसने तरह-तरह से समझाने का प्रयास किया लेकिन बात बनी नहीं.
आख़िर उसने कहा, "मित्र सफ़ेद बिलकुल वैसा ही होता है जैसा कि बगुला."
"और बगुला कैसा होता है."
यह एक और मुसीबत थी कि अब बगुला कैसा होता है यह किस तरह समझाया जाए. कई तरह की कोशिशों के बाद उसे तरक़ीब सूझी. उसने अपना हाथ आगे किया, उँगलियाँ को जोड़कर चोंच जैसा आकार बनाया और कलाई से हाथ को मोड़ लिया. फिर कोहनी से मोड़कर कहा, "लो छूकर देखो कैसा दिखता है बगुला."
दृष्टिहीन मित्र ने उत्सुकता में दोनों हाथ आगे बढ़ाए और अपने मित्र का हाथ छू-छूकर देखने लगा. हालांकि वह इस समय समझने की कोशिश कर रहा था कि बगुला कैसा होता है लेकिन मन में उत्सुकता यह थी कि खीर कैसी होती है.
जब हाथ अच्छी तरह टटोल लिया तो उसने थोड़ा चकित होते हुए कहा, "अरे बाबा, ये खीर तो बड़ी टेढ़ी चीज़ होती है."
वह फिर खीर का आनंद लेने लगा. लेकिन तब तक खीर ढेढ़ी हो चुकी थी. यानी किसी भी जटिल काम के लिए मुहावरा बन चुका था "टेढ़ी खीर."
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
एक मुहावरे की कथा
एक नगर सेठ थे. अपनी पदवी के अनुरुप वे अथाह दौलत के स्वामी थे. घर, बंगला, नौकर-चाकर थे. एक चतुर मुनीम भी थे जो सारा कारोबार संभाले रहते थे.
किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाक़ात नगर-वधु से हो गई. नगर-वधु यानी शहर की सबसे ख़ूबसूरत वेश्या. अपने पेश की ज़रुरत के मुताबिक़ नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया. फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया.
सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे. नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी. खूब आवभगत की और यक़ीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करती है.
अब नगर-सेठ जब तब नगर-वधु के ठौर पर नज़र आने लगे. शामें अक्सर वहीं गुज़रने लगीं. नगर भर में ख़बर फैल गई. काम-धंधे पर असर होने लगा. मुनीम की नज़रे इस पर टेढ़ी होने लगीं.
एक दिन सेठ को बुखार आ गया. तबियत कुछ ज़्यादा बिगड़ गई. कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके. इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया. सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिए कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए. निर्देश हुए कि मुनीम ख़ुद उपहार लेकर जाएँ.
मुनीम तो मुनीम था. ख़ानदानी मुनीम. उसकी निष्ठा सेठ के प्रति भर नहीं थी. उसके पूरे परिवार और काम धंधे के प्रति भी थी. उसने सेठ को समझाया कि वे भूल कर रहे हैं. बताने की कोशिश की, वेश्या किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करती, पैसों से करती है. मुनीम ने उदाहरण देकर समझाया कि नगर-सेठ जैसे कई लोग प्रेम के भ्रम में वहाँ मंडराते रहते हैं. लेकिन सेठ को न समझ में आना था, न आया. उनको सख़्ती से कहा कि मुनीम नगर-वधु के पास तोहफ़ा पहुँचा आएँ.
मुनीम क्या करते. एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा और नगर-वधु के घर की ओर चल पड़े. लेकिन रास्ते भर वे इस समस्या को निपटाने का उपाय सोचते रहे.
चित्रांकनः हरीश परगनिहा
नगर-वधु के घर पहुँचे तो नौलखा हार का डब्बा खोलते हुए कहा, “यह तोहफ़ा उसकी ओर से जिससे तुम सबसे अधिक प्रेम करती हो.”
नगर-वधु ने फटाफट तीन नाम गिना दिए. मुनीम को आश्चर्य नहीं हुआ कि उन तीन नामों में सेठ का नाम नहीं था. निर्विकार भाव से उन्होंने कहा, “देवी, इन तीन में तो उन महानुभाव का नाम नहीं है जिन्होंने यह उपहार भिजवाया है.”
नगर-वधु की मुस्कान ग़ायब हो गई. सामने चमचमाता नौलखा हार था और उससे भारी भूल हो गई थी. उसे उपहार हाथ से जाता हुआ दिखा. उसने फ़ौरन तेरह नाम गिनवा दिए.
तेरह नाम में भी सेठ का नाम नहीं था. लेकिन इस बार मुनीम का चेहरा तमतमा गया. ग़ुस्से से उन्होंने नौलखा हार का डब्बा उठाया और खट से उसे बंद करके उठ गए. नगर-वधु गिड़गिड़ाने लगी. उसने कहा कि उससे भूल हो गई है. लेकिन मुनीम चल पड़े.
बीमार सेठ सिरहाने से टिके मुनीम के आने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे. नगर-वधु के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे.
मुनीम पहुचे और हार का डब्बा सेठ के सामने पटकते हुए कहा, “लो, अपना नौलखा हार, न तुम तीन में न तेरह में. यूँ ही प्रेम का भ्रम पाले बैठे हो.”
सेठ की आँखें खुल गई थीं. इसके बाद वे कभी नगर-वधु के दर पर नहीं दिखाई पड़े.
किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाक़ात नगर-वधु से हो गई. नगर-वधु यानी शहर की सबसे ख़ूबसूरत वेश्या. अपने पेश की ज़रुरत के मुताबिक़ नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया. फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया.
सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे. नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी. खूब आवभगत की और यक़ीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करती है.
अब नगर-सेठ जब तब नगर-वधु के ठौर पर नज़र आने लगे. शामें अक्सर वहीं गुज़रने लगीं. नगर भर में ख़बर फैल गई. काम-धंधे पर असर होने लगा. मुनीम की नज़रे इस पर टेढ़ी होने लगीं.
एक दिन सेठ को बुखार आ गया. तबियत कुछ ज़्यादा बिगड़ गई. कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके. इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया. सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिए कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए. निर्देश हुए कि मुनीम ख़ुद उपहार लेकर जाएँ.
मुनीम तो मुनीम था. ख़ानदानी मुनीम. उसकी निष्ठा सेठ के प्रति भर नहीं थी. उसके पूरे परिवार और काम धंधे के प्रति भी थी. उसने सेठ को समझाया कि वे भूल कर रहे हैं. बताने की कोशिश की, वेश्या किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करती, पैसों से करती है. मुनीम ने उदाहरण देकर समझाया कि नगर-सेठ जैसे कई लोग प्रेम के भ्रम में वहाँ मंडराते रहते हैं. लेकिन सेठ को न समझ में आना था, न आया. उनको सख़्ती से कहा कि मुनीम नगर-वधु के पास तोहफ़ा पहुँचा आएँ.
मुनीम क्या करते. एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा और नगर-वधु के घर की ओर चल पड़े. लेकिन रास्ते भर वे इस समस्या को निपटाने का उपाय सोचते रहे.
चित्रांकनः हरीश परगनिहा
नगर-वधु के घर पहुँचे तो नौलखा हार का डब्बा खोलते हुए कहा, “यह तोहफ़ा उसकी ओर से जिससे तुम सबसे अधिक प्रेम करती हो.”
नगर-वधु ने फटाफट तीन नाम गिना दिए. मुनीम को आश्चर्य नहीं हुआ कि उन तीन नामों में सेठ का नाम नहीं था. निर्विकार भाव से उन्होंने कहा, “देवी, इन तीन में तो उन महानुभाव का नाम नहीं है जिन्होंने यह उपहार भिजवाया है.”
नगर-वधु की मुस्कान ग़ायब हो गई. सामने चमचमाता नौलखा हार था और उससे भारी भूल हो गई थी. उसे उपहार हाथ से जाता हुआ दिखा. उसने फ़ौरन तेरह नाम गिनवा दिए.
तेरह नाम में भी सेठ का नाम नहीं था. लेकिन इस बार मुनीम का चेहरा तमतमा गया. ग़ुस्से से उन्होंने नौलखा हार का डब्बा उठाया और खट से उसे बंद करके उठ गए. नगर-वधु गिड़गिड़ाने लगी. उसने कहा कि उससे भूल हो गई है. लेकिन मुनीम चल पड़े.
बीमार सेठ सिरहाने से टिके मुनीम के आने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे. नगर-वधु के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे.
मुनीम पहुचे और हार का डब्बा सेठ के सामने पटकते हुए कहा, “लो, अपना नौलखा हार, न तुम तीन में न तेरह में. यूँ ही प्रेम का भ्रम पाले बैठे हो.”
सेठ की आँखें खुल गई थीं. इसके बाद वे कभी नगर-वधु के दर पर नहीं दिखाई पड़े.
लघु कथाएँ
लघु कथाएँ
नींद में चोर
चोर सोचता रहा, आख़िर वह चोर कैसे बन गया? वह चोर तो बनना नहीं चाहता था. वह चाहता था कि वह भी पढ़-लिखकर बाबू बने. उनके माता-पिता कह सकें कि मेरे बेटे ने ख़ानदान का नाम रोशन किया है. चोर दिनभर सोचता रहा और समझ नहीं पाया कि आख़िर वह चोर कैसे बन गया.
सोचते-सोचते उसे नींद आ गई. नींद में उसने देखा कि एक लड़का उसके घर से रोटी चुरा रहा है. उसने नींद में उसे फ़ौरन पकड़ लिया.
उसने ज़ोरों से चिल्लाकर कहा,‘‘चोरी करते तुम्हें शर्म नहीं आती.’’ जब नींद टूटी तो उसने देखा कि वह अपना ही हाथ पकड़े हुए है.
**********
चोर की सुहागरात
चोर की एक दिन शादी हो गई, पर लड़की वालों को पता नहीं था कि दूल्हा चोर है. दरअसल चोर के घरवालों को भी मालूम नहीं था कि उनका बेटा चोर है.
सुहागरात के दिन चोर जब अपनी पत्नी से मिला तो उसने यह नहीं बताया कि वह चोर है. रात में जब वह सोने लगा तो उसके मन में यह द्वंद्व उठने लगा कि क्या वह अपनी पत्नी को यह राज़ बताए कि वह चोर है? अगर आज वह यह राज़ नहीं बताता है तो एक दिन पत्नी को जब यह राज़ पता चलेगा तो उसे गहरा धक्का लगेगा. चोर इसी उधेड़बुन में था. वह करवटें बदलता रहा. पत्नी समझ नहीं पाई कि आख़िर चोर वह सब क्यों नहीं कर रहा है जो सुहागरात में उसे करना चाहिए. वह सकुचा रही थी. उसने पति से पूछा,‘‘लगता है आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं. कहिए ना क्या बात है? अब तो हमें ज़िंदगी भर साथ निभाना है, इसलिए एक-दूसरे पर विश्वास करना चाहिए और मन की बातें बतानी चाहिए.’’
तब चोर ने हिम्मत जुटाई. वह बोला,‘‘जानती हो मैं क्या काम करता हूँ. मैं एक चोर हूँ. चोरी कर घर-बार चलाता हूँ.’’ यह सुनकर उसकी पत्नी रोने लगी. चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसके रोने की आवाज़ जब कमरे के बाहर सुनाई पड़ी तो घरवालों के कान खड़े हो गए. वे सोचने लगे कि आख़िर बात क्या है? क्या कुछ ऐसी-वैसी बात हो गई या दुल्हन को अपने घर की याद आ रही है? चोर अपनी पत्नी को बहुत देर तक मनाता रहा. उसने कहा,‘‘आख़िर तुमने ही कहा था कि मन में कोई बात नहीं छिपानी चाहिए. इसलिए मैंने तुम्हें सच-सच बता दिया.’’
चोर की पत्नी को चोर पर प्यार आ गया. उसने मन ही मन कहा,‘‘पति चोर है तो क्या हुआ, सच तो बोलता है. मुझ पर विश्वास तो करता है.’’ इसके बाद पत्नी ने चोर को चूम लिया. चोर को आज तक याद है अपनी सुहागरात. वह भूला नहीं है. जब भी उसे उसकी पत्नी चूमती है, उसे अपनी सुहागरात की याद आ जाती है.
**********
चोर का इंटरव्यू
एक दिन अख़बार में चोर का इंटरव्यू छपा. बहुत धमाकेदार इंटरव्यू. उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक चैनल वाले भी इसका इंटरव्यू लेने आए. चोर ने बड़ी निर्भीकता से अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट से कही. अगले दिन उसके शहर के एसपी का फ़ोन आया,‘‘तुमको चोरी करनी है तो चोरी करो. इस तरह का इंटरव्यू मत दो, नहीं तो तुम्हें थाने के अंदर कर दिया जाएगा.’’
चोर यह समझ नहीं पाया. यह कैसा लोकतंत्र है! क्या मीडिया को इंटरव्यू देने के लिए किसी को धमकी दी जा सकती है, गिरफ़्तारी भी हो सकती है! उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा. आयोग का जवाब आया,‘‘हमने राज्य सरकार को नोटिस भेजा है. एक महीने के भीतर उसका जवाब मांगा है.’’
चित्रांकन-हरीश परगनिहा
एक महीने के बाद आयोग का जवाब आया-राज्य सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया. आप चाहें तो उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं. चोर के पास न इतने पैसे थे और न ही इतना समय कि वह कोर्ट के चक्कर लगाए. उसने नेताओं की तरह एक प्रेस बयान जारी किया कि मीडिया ने मेरी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है.
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चोर का भाग्य
एक चोर आस्तिक था तो एक चोर अनीश्वरवादी. जो चोर आस्तिक था, वह भाग्यवादी था. इसलिए वह मानता था कि यह चोरी करना उसके भाग्य में लिखा है. यही कारण है वह चोरी करता है. पर जो अनीश्वरवादी था, वह जानता था कि चोरी करना उसका भाग्य नहीं है. इसलिए वह अपने भाग्य को बदलने की फ़िराक़ में रहता था. आस्तिक चोर छोटा चोर ही बना रह गया. नास्तिक चोर बहुत बड़ा चोर बन गया.
बड़ा चोर बनते ही उसका भाग्य भी बदल गया.
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चोर की धर्मनिरपेक्षता
एक चोर मंदिर जाता था.एक चोर मस्जिद जाता था.एक चोर गिरजाघर जाता था.पर वे आपस में लड़ते नहीं थे, झगड़ते नहीं थे.वे आपस में मिलकर रहते थे.
पर जो लोग ख़ुद को शरीफ़ और ईमानदार कहते थेवे मंदिर-मस्जिद की बात पर बहुत झगड़ा करते थे.
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अमीर चोर
चोर अमीर होते हैं, ग़रीब होते हैं. सफल होते हैं, असफल होते हैं. कई चोर ज़िंदगी भर कपड़े, बर्तन, साइकिल आदि चुराते रहते हैं. उनमें महत्वाकांक्षा कम होती है. अमीर चोर महत्वाकांक्षी होते हैं. वे नई-नई योजनाएँ बनाते रहते हैं. वे विश्च बैंक से मिलकर देश को लूटने के ख़ाके तैयार करते हैं. उनकी चोरी ‘क्लास’ ही अलग है. वे चोर दिखते भी नहीं. वे बहुत संभ्रांत होते हैं. उन्हें चोर कहकर उनकी तौहीन नहीं की जा सकती. वे सभा-सोसाइटियों के लोग हैं. यही कारण है कि अमीर चोर ग़रीब चोरों को हेय दृष्टि से देखते हैं. वे उसे अपना मौसेरा भाई तो क्या, दूर के रिश्ते का भी कोई भाई नहीं मानते. इसलिए कई बार ग़रीब चोर भी अमीर चोरों के घर इतनी सफ़ाई से सेंध लगाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता और माल साफ़ हो जाता है. ग़रीब चोर इतना ज़रूर जता देते हैं कि वे सत्ता विमर्श में भले ही पीछे हों, पर उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का कोई जवाब नहीं है.
**********पुस्तक अंशचोर पुराणलेखक-विमल कुमारपेंगुइन बुक्स11, पंचशील पार्क, नई दिल्ली 17.
नींद में चोर
चोर सोचता रहा, आख़िर वह चोर कैसे बन गया? वह चोर तो बनना नहीं चाहता था. वह चाहता था कि वह भी पढ़-लिखकर बाबू बने. उनके माता-पिता कह सकें कि मेरे बेटे ने ख़ानदान का नाम रोशन किया है. चोर दिनभर सोचता रहा और समझ नहीं पाया कि आख़िर वह चोर कैसे बन गया.
सोचते-सोचते उसे नींद आ गई. नींद में उसने देखा कि एक लड़का उसके घर से रोटी चुरा रहा है. उसने नींद में उसे फ़ौरन पकड़ लिया.
उसने ज़ोरों से चिल्लाकर कहा,‘‘चोरी करते तुम्हें शर्म नहीं आती.’’ जब नींद टूटी तो उसने देखा कि वह अपना ही हाथ पकड़े हुए है.
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चोर की सुहागरात
चोर की एक दिन शादी हो गई, पर लड़की वालों को पता नहीं था कि दूल्हा चोर है. दरअसल चोर के घरवालों को भी मालूम नहीं था कि उनका बेटा चोर है.
सुहागरात के दिन चोर जब अपनी पत्नी से मिला तो उसने यह नहीं बताया कि वह चोर है. रात में जब वह सोने लगा तो उसके मन में यह द्वंद्व उठने लगा कि क्या वह अपनी पत्नी को यह राज़ बताए कि वह चोर है? अगर आज वह यह राज़ नहीं बताता है तो एक दिन पत्नी को जब यह राज़ पता चलेगा तो उसे गहरा धक्का लगेगा. चोर इसी उधेड़बुन में था. वह करवटें बदलता रहा. पत्नी समझ नहीं पाई कि आख़िर चोर वह सब क्यों नहीं कर रहा है जो सुहागरात में उसे करना चाहिए. वह सकुचा रही थी. उसने पति से पूछा,‘‘लगता है आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं. कहिए ना क्या बात है? अब तो हमें ज़िंदगी भर साथ निभाना है, इसलिए एक-दूसरे पर विश्वास करना चाहिए और मन की बातें बतानी चाहिए.’’
तब चोर ने हिम्मत जुटाई. वह बोला,‘‘जानती हो मैं क्या काम करता हूँ. मैं एक चोर हूँ. चोरी कर घर-बार चलाता हूँ.’’ यह सुनकर उसकी पत्नी रोने लगी. चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी. उसके रोने की आवाज़ जब कमरे के बाहर सुनाई पड़ी तो घरवालों के कान खड़े हो गए. वे सोचने लगे कि आख़िर बात क्या है? क्या कुछ ऐसी-वैसी बात हो गई या दुल्हन को अपने घर की याद आ रही है? चोर अपनी पत्नी को बहुत देर तक मनाता रहा. उसने कहा,‘‘आख़िर तुमने ही कहा था कि मन में कोई बात नहीं छिपानी चाहिए. इसलिए मैंने तुम्हें सच-सच बता दिया.’’
चोर की पत्नी को चोर पर प्यार आ गया. उसने मन ही मन कहा,‘‘पति चोर है तो क्या हुआ, सच तो बोलता है. मुझ पर विश्वास तो करता है.’’ इसके बाद पत्नी ने चोर को चूम लिया. चोर को आज तक याद है अपनी सुहागरात. वह भूला नहीं है. जब भी उसे उसकी पत्नी चूमती है, उसे अपनी सुहागरात की याद आ जाती है.
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चोर का इंटरव्यू
एक दिन अख़बार में चोर का इंटरव्यू छपा. बहुत धमाकेदार इंटरव्यू. उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक चैनल वाले भी इसका इंटरव्यू लेने आए. चोर ने बड़ी निर्भीकता से अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट से कही. अगले दिन उसके शहर के एसपी का फ़ोन आया,‘‘तुमको चोरी करनी है तो चोरी करो. इस तरह का इंटरव्यू मत दो, नहीं तो तुम्हें थाने के अंदर कर दिया जाएगा.’’
चोर यह समझ नहीं पाया. यह कैसा लोकतंत्र है! क्या मीडिया को इंटरव्यू देने के लिए किसी को धमकी दी जा सकती है, गिरफ़्तारी भी हो सकती है! उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखा. आयोग का जवाब आया,‘‘हमने राज्य सरकार को नोटिस भेजा है. एक महीने के भीतर उसका जवाब मांगा है.’’
चित्रांकन-हरीश परगनिहा
एक महीने के बाद आयोग का जवाब आया-राज्य सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया. आप चाहें तो उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं. चोर के पास न इतने पैसे थे और न ही इतना समय कि वह कोर्ट के चक्कर लगाए. उसने नेताओं की तरह एक प्रेस बयान जारी किया कि मीडिया ने मेरी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है.
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चोर का भाग्य
एक चोर आस्तिक था तो एक चोर अनीश्वरवादी. जो चोर आस्तिक था, वह भाग्यवादी था. इसलिए वह मानता था कि यह चोरी करना उसके भाग्य में लिखा है. यही कारण है वह चोरी करता है. पर जो अनीश्वरवादी था, वह जानता था कि चोरी करना उसका भाग्य नहीं है. इसलिए वह अपने भाग्य को बदलने की फ़िराक़ में रहता था. आस्तिक चोर छोटा चोर ही बना रह गया. नास्तिक चोर बहुत बड़ा चोर बन गया.
बड़ा चोर बनते ही उसका भाग्य भी बदल गया.
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चोर की धर्मनिरपेक्षता
एक चोर मंदिर जाता था.एक चोर मस्जिद जाता था.एक चोर गिरजाघर जाता था.पर वे आपस में लड़ते नहीं थे, झगड़ते नहीं थे.वे आपस में मिलकर रहते थे.
पर जो लोग ख़ुद को शरीफ़ और ईमानदार कहते थेवे मंदिर-मस्जिद की बात पर बहुत झगड़ा करते थे.
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अमीर चोर
चोर अमीर होते हैं, ग़रीब होते हैं. सफल होते हैं, असफल होते हैं. कई चोर ज़िंदगी भर कपड़े, बर्तन, साइकिल आदि चुराते रहते हैं. उनमें महत्वाकांक्षा कम होती है. अमीर चोर महत्वाकांक्षी होते हैं. वे नई-नई योजनाएँ बनाते रहते हैं. वे विश्च बैंक से मिलकर देश को लूटने के ख़ाके तैयार करते हैं. उनकी चोरी ‘क्लास’ ही अलग है. वे चोर दिखते भी नहीं. वे बहुत संभ्रांत होते हैं. उन्हें चोर कहकर उनकी तौहीन नहीं की जा सकती. वे सभा-सोसाइटियों के लोग हैं. यही कारण है कि अमीर चोर ग़रीब चोरों को हेय दृष्टि से देखते हैं. वे उसे अपना मौसेरा भाई तो क्या, दूर के रिश्ते का भी कोई भाई नहीं मानते. इसलिए कई बार ग़रीब चोर भी अमीर चोरों के घर इतनी सफ़ाई से सेंध लगाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता और माल साफ़ हो जाता है. ग़रीब चोर इतना ज़रूर जता देते हैं कि वे सत्ता विमर्श में भले ही पीछे हों, पर उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का कोई जवाब नहीं है.
**********पुस्तक अंशचोर पुराणलेखक-विमल कुमारपेंगुइन बुक्स11, पंचशील पार्क, नई दिल्ली 17.
बुढ़ापे का सहारा
ममता रानी वर्मा मां का इकलौता बेटा बुढ़ापे का सहारा अमरीका में जा बैठा था। नाम था उसका सोनू। यों तो उसका रहन-सहन ठाठ-बाट कम न थे। बड़े ऊंचे ओहदे पर जो था वो। पर माँ को अपने साथ रखने में हिचकिचाता था। पर बूढ़ी माँ क्या करे। किसके सहारे जिए। बुढ़ापे में किसके दरवाजे पर जा पड़े, यह सोच-सोचकर वह परेशान थी। रिश्तेदारों ने बेटे को समझाया कि बुढ़ापे में अपनी माँ को अपने साथ रखो। बेटा बोला मैं हिन्दुस्तान नहीं आऊंगा और माँ तो है ठेठ गंवार वह अमेरिका में कैसे रहेगी। मेरे दोस्त मेरी मजाक बनाएंगे। पर बाद में बहुत समझाने के बाद वह माँ को अपने पास अमेरिका ले जाने को तैयार हो गया। माँ अमेरिका अपने बेटे और बहू को पास चली गई। रिश्तेदारों ने भी चैन की सांस ली।अब वहां माँ का हाल बेहाल हो गया। बहू को घर की नौकरानी मिल गई। पर माँ तो माँ है। वह अपने घर का काम करने में ही संतोष का अनुभव करती। कुशल होने के कारण माँ का निभाव हो रहा था। बेटे ने एक दिन अपने बॉस को पार्टी दी। बॉस ने सोनू के प्रमोशन का वादा जो किया था। अब क्या घर की साज सजावट होने लगी। घर का सारा खराब समान इधर-उधर पलंग के नीचे छिपाया जाने लगा। अब वह घड़ी आने वाली थी, शाम के पांच बजे बॉस को आना था। तभी सोनू की पत्नी रेखा की नार माँ पर पड़ी। वह चौक कर बोली, अरे माँ का क्या करें। माँ उस समय कहां रहेगी जब तुम्हारे बॉस आएंगे? माँ को कहां छिपाएं? सोनू ने कहा, पहले खाने की तैयारी माँ के साथ मिलकर कर लो, फिर माँ को छिपाने का भी प्रबंध करते हैं। सारा खाना तैयार करवाकर डाइनिंग टेबल पर लगा दिया गया। पांच बजने वाले थे। माँ को कहां छिपाया जाए? इसी बात को लेकर सब परेशान थे। अंत में एक स्टोर रूम में माँ को छिपा दिया और हिदायत दी कि कुछ भी हो बाहर मत आना। ठीक पांच बजे श्रीमान मुकुन्द सोनू के बॉस आ गए। गपशप के बाद खाना खाकर तो मुकुन्द जी ऊंगली चाटते रह गए। उन्होंने इतना स्वादिष्ट खाना कभी न खाया था। सोनू के बॉस खाना खाकर रेखा की तारीफ के पुल बांधने लगे, पर सोनू के बेटे निखिल ने सारी पोल खोल दी कि अंकल ये सारा खाना तो दादी माँ ने बनाया है। बॉस सोनू की माँ से मिलने के लिए उत्सुक हुए, बोले हमें भी उनसे मिलवाओ। निखिल तपाक से बोला, ''मम्मी डैडी ने उन्हें स्टोर रूम में बंद कर रखा है।'' कारण पूछने पर सोनू ने बॉस को बताया कि माँ गांव की रहने वाली है, इसलिए मैं माँ को तुम्हारे सामने नहीं लाना चाहता था।सोनू के बॉस ने सोनू को समझाया, माँ ने तुमको नौ महीने पेट में पाला, अपने खून से सींचा। माँ तुम्हें दुनिया के सामने लाने में नहीं शर्माई और तुम माँ को मेरे सामने लाने से शरमा रहे थे। बॉस ने माँ से मिलकर मां के पैर छुए। सोनू और रेखा शरम से गड़े जा रहे थे। प्राथमिक शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय, ओ.एन.जी.सी., सूरत
बुधवार, 4 अगस्त 2010
कुंवारी और शादी-शुदा मर्द
आज नेट पर सर्च कर रहा था, तो एक लेख पर अनायास ही नजर टिक गई। हैडिंग देखकर मन ठनका, तो सोचकर दिल धड़कने लगा। लेख का सार यह था कि एक कुंवारी शादी-शुदा लड़के को दिल क्यों दे रही है। यह आजकल फैशन हो चला है, क्योंकि फिल्मी हीरोइनें आजकल यही कर रही है। यही मुख्य कारण बताया गया। क्या इस तरह के संबंध को बढ़ावा देना चाहिए? मेरी राय में इस तरह की बातें भारतीय समाज में गंदगी ही फैलाएगी। आज पाश्चात्य संस्कृति के लोग हमारी सभ्यता इसलिए अपना रहे हैं कि इसमें स्थायित्व है। स्थायित्व इसलिए है कि हमारी शादी पहले होती है, उसके बाद प्यार होता है। उनके बीच रिश्ते का जो बंधन है, वह जाति, खानदान, रीति रिवाज, हैसियत, कुंडली, खूबसूरती आदि कितने ही आधार पर खड़ा है। पाश्चात्य संस्कृति में पहले प्यार होता है। प्यार शारीरिक आकर्षण पर अवलंबित होता है। जब तक दोनों सुंदर हैं। शारीरिक बनावट बेहतर है, संबंध बने रहते हैं, लेकिन शरीर गिरते ही आत्मीयता तार-तार हो जाती है और वे लोग आसपास नजर दौड़ाने लगते हैं। क्योंकि लव मैरिज में भी दो व्यक्ति एक-दूसरे को इसलिए नहीं अपनाते कि दोनों दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्त्री-पुरुष हैं। दोनों एक-दूसरे को इसलिए चुनते हैं, क्योंकि जीवन के किसी मोड़ पर दोनों ने एक-दूसरे को अपने अनुकूल पाया। ऐसा बिल्कुल मुमकिन है कि आज कोई लड़की आपको बहुत अच्छी लगी और आपने उससे शादी कर ली लेकिन साल-दो साल बाद कोई और लड़की मिली, जिसमें कुछ और खासियतें हैं, जो आपकी खुद की चुनी प्रेमिका में नहीं और आपको वह भी अच्छी लगने लगे। यही हाल किसी लड़की का भी हो सकता है। भारतीय संस्कृति में यह बात नहीं है। यहां ना-ना करते प्यार तुम्ही से कर बैठे वाली बात है। यदि आप धड़कन सिनेमा देखेंगे, तो इसमें यही बताया गया है कि प्यार से बढ़कर शादी है अन्यथा न ही यह गाना हिट होता और न ही सिनेमा। हमें इस तरह की बातें दबानी चाहिए। तभी हमारी सभ्यता और देश का कल्याण होगा। यह मन का वहम होता है। यदि आत्मीय भाव से प्रेम किया जाए तो एक-दूसरे के बिना एक पल का जीना दूभर हो सकता है।
सोमवार, 2 अगस्त 2010
सही बात पर तलाक
आधुनिक शिक्षा मिली थी। इस कारण आधुनिक विचार थे मोहित के। वह सभी को यही बताता था कि संबंध विश्वास पर आधारित होते हैं। एक-दूसरे बीच विश्वास तभी बन सकती है, जब कोई भी बात एक-दूसरे से छिपी न हो। सभी उसके विचार से प्रभावित थे। मैं उससे काफी प्रभावित था। उसका विचार मुझे इतना अच्छा लगा कि आज हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए हैं। लगभग 6 महीनों से बात नहीं हुई थी। इस बार जब मिला, तो वह रोने लगा। मैं उसे देखकर अपसेट हो गया। उसे किसी भी चीज की कमी नहीं है। सरकारी नौकरी भी कर रहा है और एक वर्ष पहले शादी भी हुई है। फिर किस तरह की परेशानी हुई इसे? सुलझा हुआ व्यक्ति था वह। दूसरे की उलझन सुलझाने में उसका कोई जवाब नहीं था। हुआ यूं कि शादी से पहले वह किसी लड़की से प्यार करता था। किसी कारणवश दोनों की शादी नहीं हो पाई। उसके बाद लगभग चार वर्षो तक अकेला रहा। अंत में माता-पिता के दबाव में आकर शादी के लिए तैयार हुआ। शादी के एक वर्ष बाद ही अब तलाक की नौबत आ गई। यार, घरवाले मना किए थे कि प्यार के बारे में कुछ भी नहीं बताना। लेकिन मुझे लगा कि सब कुछ उसे बता देना चाहिए, क्योंकि यदि बाद में पता चलेगा, तो विश्वास टूट जाएगा। यह सोचकर मैने उसे सब कुछ बता दिया। अब हालात यह है कि वह अपनी मर्जी से घर चलाना चाहती है। कहता हूं, तो रोने लगती है और उलाहना देती है कि आप अभी भी उसी लड़की से प्यार करते हैं। इस कारण मेरी बात नहीं सुनते, जबकि वास्तविकता यह है कि हम दोनों एक-दूसरे के बारे में 6 वर्षो से कुछ भी नहीं जानते। अब मेरी स्थिति कहीं की नहीं रही। मोहित के ये शब्द सुनकर कलेजा मुंह को आ गया और सोचने लगा कि सही कौन है? उसके घरवाले जो उन्हें पिछली बात नहीं बताने के लिए कह रहे थे या मोहित के आधुनिक विचार? लेकिन इसका हश्र तो बुरा हुआ। यदि नहीं बताया जाता और बाद में उसे पता चलता तो और भी अनर्थ हो सकता था। आप क्या सोच रहे हैं? आप ही बताइये न?
गलती किसकी?
विकलांग था वह। अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ था। उस समय वह यही सोचता था कि उसे प्यार करने वाला कोई नहीं है, सिवा परिवार के। यह उन दिनों की बात है, जब वह पांचवीं क्लास में पढ़ता था। धीरे-धीरे बड़ा हुआ और नकारात्मक सोच भी उसी के हिसाब से बढ़ता गया। अब उसका हृदय शॉक प्रूव हो चुका था। अब उसे किसी बात का दुख नहीं होता था। मन में हमेशा यही इच्छा होती थी कि उसे भी अच्छे दोस्त मिले, लेकिन विकलांगता के कारण उससे सभी दूर रहते थे। यदि कोई चाहता भी था, तो अंदर से इतना टूट चुका था कि उसे अपमानित होने का डर सताता रहता था। इस भय से वह किसी के पास नहीं जाता था। इसी तरह दिन कटते गए और वह इंटरमीडिएट में पढ़ने लगा। जवान हो चुका था, इस कारण सपने भी देखने लगा। फिर अपने को संभालता कि यदि तुम्हें लड़का दोस्त नहीं बना रहा है, तो लड़की क्या पूछेगी? मन ही मन स्वयं को कोसता रहता था। काफी दुखी था वह। एक दिन वह अपने रिलैटिव के यहां गया और वहां एक खूबसूरत लड़की मिली। उसे देखते ही हर कुंवारे की तरह उसका भी मन डोलने लगा। फिर स्वयं को हीन समझकर नियंत्रित किया और चुपचाप बैठ गया। मजाक के लहजे में किसी ने कहा कि यह तुम्हें पूछेगी? अपनी विकलांगता तो देखो। वह कुछ नहीं बोला लेकिन मन ही मन रोने लगा अपनी विकलांगता को लेकर। उसे यह पता नहीं था कि अच्छे लड़के को भी लड़कियां भाव नहीं देती हैं। वह सभी का कारण विकलांगता को मानता था और मन ही मन कोसता रहता था। फिर एकाएक न जाने कहां से ऊर्जा आ गई और वह उस लड़की को पाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अंत में लड़के की जीत और वह लड़की उसकी प्रेमिका बन गई। आत्मविश्वास एकाएक काफी बढ़ गया और जो उसका उपहास उड़ाया था, उसके लिए करारा जवाब भी दिया वह। काफी कॉन्फिडेंस में था वह उस समय। खुश इस कारण नहीं था कि अब उसे प्रेमिका मिल गई है। खुश इस कारण था कि आज भी कद्रदानों की कद्र है। उसे समझ में आ गया कि मॉडर्न लड़की आज भी प्रतिभा और व्यक्तित्व को शारीरिक सुंदरता पर वरीयता देती है। उस समय तक सेक्स भावना नहीं थी। सिर्फ वह आगे बढ़ने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहता था। पहले से वह आईएएस बनने के लिए कृतसंकल्प था और अपनी तैयारी में जी जान से जुट गया। उस लड़की से उसे नया जीवन दिया और आगे बढ़ने का प्रेरणास्रोत भी बनी। यह प्रेम लगभग 6 वर्षो तक चला। अभी तक किसी तरह की गलत हरकत नहीं हुई। लड़का इतना ईमानदार था कि कभी लड़की पर दबाव नहीं डाला। सिर्फ साल में एक बार तीन से चार घंटे के लिए मिलता था और बहुत सारी बातें करता रहता था। दोस्तों के बीच उसका काफी क्रेज था। उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। उसे लगने लगा कि अब वह भी इस धरती पर खास है। एक दिन लड़की बताई कि यदि तुम 6 महीने में नौकरी नहीं पकड़ते हो, तो हमारी शादी कहीं और हो जाएगी। इससे पहले लड़का खोने के डर से इस तरह की बात लड़की से नहीं कर पाया था। वह काफी खुश हुआ। उस दिन लड़की को न जाने क्या हो गया, उसके सामने सब कुछ देने को तैयार थी। लड़का इस कारण अपनी भावना को कंट्रोल में रखा कि इस तरह के समर्पित लड़की के साथ शादी के बाद ही कुछ होना चाहिए। इस कारण उसे कुछ नहीं कहा और आईएएस की परीक्षा छोड़कर कोई डिप्लोमा कोर्स कर लिया और संयोग से उसे नौकरी भी मिल गई। अपने घरवाले को भी तैयार कर लिया। लेकिन लड़की शादी से इस कारण इनकार कर दी कि वह विकलांग है। उस लड़के को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसकी दुखती रग पर वह हाथ रख चुकी थी। लड़का कुछ नहीं कहा और अभी तक मौन है। आप ही बताइये न कि इसमें गलती किसकी है? लड़की यदि गलत होती तो 6 वर्षो तक उस बेरोजगार विकलांग से नि:स्वार्थ प्यार क्यों करती? यदि लड़का गलत होता तो वह लड़की को कुछ कह सकता था। ठीक ही कहा गया है कि त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम, देवो न जानाति, कुतो मनुष्यम।
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