गांधी के सिद्धांत
सत्य
गांधी जी ने अपना जीवन सत्य (truth), या सच्चाई (Satya)की व्यापक खोज में समर्पित कर दिया। उन्होंने इस लक्ष्य को प्राप्त करने करने के लिए अपनी स्वयं की गल्तियों और खुद पर प्रयोग करते हुए सीखने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आत्मकथा को द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ (The Story of My Experiments with Truth) का नाम दिया।
गांधी जी ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने के लिए अपने दुष्टात्माओं , भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। .गांधी जी ने अपने विचारों को सबसे पहले उस समय संक्षेप में व्यक्त किया जब उन्होंने कहा भगवान ही सत्य है "बाद में उन्होने अपने इस कथन को सत्य ही भगवान है में बदल दिया। इस प्रकार , सत्य ( सत्य ) में गांधी के दर्शन है " परमेश्वर " .
अहिंसा
हालांकि गांधी जी अहिंसा के सिद्धांत के प्रवर्तक बिल्कुल नहीं थे फिर भी इसे बड़े पैमाने [22]पर राजनैतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। अहिंसा (nonviolence), अहिंसा (ahimsa) और अप्रतिकार (nonresistance)का भारतीय धार्मिक विचारों में एक लंबा इतिहास है और इसके हिंदु, बौद्ध, जैन, यहूदी और ईसाई समुदायों में बहुत सी अवधारणाएं हैं। गांधी जी ने अपनी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ " (The Story of My Experiments with Truth)में दर्शन और अपने जीवन के मार्ग का वर्णन किया है। उन्हें कहते हुए बताया गया था:
जब मैं निराश होता हूं तब मैं याद करता हूं कि हालांकि इतिहास सत्य का मार्ग होता है किंतु प्रेम इसे सदैव जीत लेता है। यहां अत्याचारी और हतयारे भी हुए हैं और कुछ समय के लिए वे अपराजय लगते थे किंतु अंत में उनका पतन ही होता है -इसका सदैव विचार करें।
" मृतकों, अनाथ तथा बेघरों के लिए इससे क्या फर्क पड़ता है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पवित्र नाम के नीचे संपूर्णवाद का पागल विनाश छिपा है।
एक आंख के लिए दूसरी आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।
मरने के लिए मैरे पास बहुत से कारण है किंतु मेरे पास किसी को मारने का कोई भी कारण नहीं है।
इन सिद्धातों को लागू करने में गांधी जी ने इन्हें दुनिया को दिखाने के लिए सर्वाधिक तार्किक सीमा पर ले जाने से भी मुंह नहीं मोड़ा जहां सरकार, पुलिस और सेनाए भी अहिंसात्मक बन गईं थीं। " फॉर पसिफिस्ट्स."[23] नामक पुस्तक से उद्धरण लिए गए हैं।
विज्ञान का युद्ध किसी व्यक्ति को तानाशाही , शुद्ध और सरलता की ओर ले जाता है। अहिंसा का विज्ञान अकेले ही किसी व्यक्ति को शुद्ध लोकतंत्र के मार्ग की ओर ले जा सकता है।प्रेम पर आधारित शक्ति सजा के डर से उत्पन्न शक्ति से हजार गुणा अधिक और स्थायी होती है। यह कहना निन्दा करने जैसा होगा कि कि अहिंसा का अभ्यास केवल व्यक्तिगत तौर पर किया जा सकता है और व्यक्तिवादिता वाले देश इसका कभी भी अभ्यास नहीं कर सकते हैं। शुद्ध अराजकता का निकटतम दृष्टिकोण अहिंसा पर आधारित लोकतंत्र होगा;;;;;;संपूर्ण अहिंसा के आधार पर संगठित और चलने वाला कोई समाज शुद्ध अराजकता
वाला समाज होगा।
मैं ने भी स्वीकार किया कि एक अहिंसक राज्य में भी पुलिस बल की जरूरत अनिवार्य हो सकती है। पुलिस रैंकों का गठन अहिंसा में विश्वास रखने वालों से किया जाएगा। लोग उनकी हर संभव मदद करेंगे और आपसी सहयोग के माध्यम से वे किसी भी उपद्रव का आसानी से सामना कर लेंगे ...श्रम और पूंजी तथा हड़तालों के बीव हिंसक झगड़े बहुत कम होंगे और अहिंसक राज्यों में तो बहुत कम होंगे क्योंकि अहिंसक समाज की बाहुलता का प्रभाव समाज में प्रमुख तत्वों का सम्मान करने के लिए महान होगा। इसी प्रकार साम्प्रदायिक अव्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं होगी;;;;;;
। शांति एवं अव्यवस्था के समय सशस्त्र सैनिकों की तरह सेना का कोई
अहिंसात्मक कार्य उनका यह कर्तव्य होगा कि वे विजय दिलाने वाले समुदायों को एकजुट करें जिसमें शांति का प्रसार, तथा ऐसी गतिविधियों का समावेश हो जो किसी भी व्यक्ति को उसके चर्च अथवा खंड में संपर्क बनाए रखते हुए अपने साथ मिला लें। इस प्रकार की सैना को किसी भी आपात स्थिति से लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए तथा भीड़ के क्रोध को शांत करने के लिए उसके पास मरने के लिए सैनिकों की पर्याप्त नफरी भी होनी चाहिए;;;;;;सत्याग्रह (सत्यबल) के बिग्रेड को प्रत्येक गांव तथा शहर तक भवनों के प्रत्येक ब्लॉक में संगठित किया जा सकता हैयदि अहिंसात्मक समाज पर हमला किया जाता है तब अहिंसा के दो मार्ग खुलते हैं। अधिकार पाने के लिए हमलावर से सहयोग न करें बल्कि समर्पण करने की अपेक्षा मृत्यु को गले लगाना पसंद करें। दूसरा तरीका होगा ऐसी जनता द्वारा अहिंसक प्रतिरोध करना हो सकता है जिन्हें अहिंसक तरीके से प्रशिक्षित किया गया हो ...इस अप्रत्याशित प्रदर्शन की अनंत राहों पर आदमियों और महिलाओं को हमलावर की इच्छा लिए आत्मसमर्पण करने की बजाए आसानी से मरना अच्छा लगता है और अंतंत: उसे तथा उसकी सैनिक बहादुरी के समक्ष पिघलना जरूर पड़ता है;;;;। ऐसे किसी देश अथवा समूह जिसने अंहिंसा को अपनी अंतिम नीति बना लिया है उसे परमाणु बम भी अपना दास नहीं बना सकता है। उस देश में अहिंसा का स्तर खुशी-खुशी गुजरता है तब वह प्राकृतिक तौर पर इतना अधिक बढ़ जाता है कि उसे सार्वभोमिक आदर
मिलने लगता है।
इन विचारों के अनुरूप १९४० में जब नाजी जर्मनी द्वारा अंग्रेजों के द्वीपों पर किए गए हमले आसन्न दिखाई दिए तब गांधी जी ने अंग्रेजों को शांति और युद्ध [24]में अहिंसा की निम्नलिखित नीति का अनुसरण करने को कहा।
मैं आपसे हथियार रखने के लिए कहना पसंद करूंगा क्योंकि ये आपको अथवा मानवता को बचाने में बेकार हैं।आपको हेर हिटलर और सिगनोर मुसोलिनी को आमत्रित करना होगा कि उन्हें देशों से जो कुछ चाहिए आप उन्हें अपना अधिकार कहते हैं।यदि इन सज्जनों को अपने घर पर रहने का चयन करना है तब आपको उन्हें खाली करना होगा।यदि वे तुम्हें आसानी से रास्ता नहीं देते हैं तब आप अपने आपको , पुरूषों को महिलाओं को और बच्चों की बलि देने की अनुमति देंगे किंतु अपनी निष्ठा के प्रति झुकने से इंकार करेंगे।
१९४६ में युद्ध के बाद दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने इससे भी आगे एक विचार का प्रस्तुतीकरण किया।
यहूदियों को अपने लिए स्वयं कसाई का चाकू दे देना चाहिए था।उन्हें अपने आप को समुद्री चट्टानों से समुद्र के अंदर फैंक देना चाहिए था।
फिर भी गांधी जी को पता था कि इस प्रकार के अहिंसा के स्तर को अटूट विश्वास और साहस की जरूरत होगी और इसके लिए उसने महसूस कर लिया था कि यह हर किसी के पास नहीं होता है। इसलिए उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को परामर्श दिया कि उन्हें अहिंसा को अपने पास रखने की जरूरत नहीं है खास तौर पर उस समय जब इसे कायरता के संरक्षण के लिए उपयोग में किया गया हो।
गांधी जी ने अपने सत्याग्रह आंदोलन में ऐसे लोगों को दूर ही रखा जो हथियार उठाने से डरते थे अथवा प्रतिरोध करने में स्वयं की अक्षमता का अनुभव करते थे। उन्होंने लिखा कि मैं मानता हूं कि जहां डरपोक और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा के पक्ष में अपनी राय दूंगा।[25]
प्रत्येक सभा पर मैं तब तक चेतावनी दोहराता रहता था जब तक वन्हें यह अहसास नहीं हो जाता है कि वे एक ऐसे अंहिसात्मक बल के अधिकार में आ गए हैं जिसके अधिकार में वे पहले भी थे और वे उस प्रयोग के आदि हो चुके थे और उनका मानना था कि उन्हें अहिंसा से कुछ लेना देना नहीं हैं तथा फिर से हथियार उठा लिए थे। खुदाई खिदमतगार (Khudai Khidmatgar)के बारे में ऐसा कभी नहीं कहना चाहिए कि जो एक बार इतने बहादुर थे कि बादशाह खान (Badshah Khan)के प्रभाव में अब वे डरपोक बन गए। वीरता केवल अच्छे निशाने वालों में ही नहीं होती है बल्कि मृत्यु को हरा देने वालों में तथा अपनी छातियों को गोली [26]
खाने के लिए सदा तैयार रहने वालों में भी होती है।
शाकाहारी रवैया
बाल्यावस्था में गांधी को मांस खाने का अनुभव मिला। ऐसा उनकी उत्तराधिकारी जिज्ञासा के कारण ही था जिसमें उसके उत्साहवर्धक मित्र शेख मेहताब का भी योगदान था। वेजीटेरियनिज्म का विचार भारतकी हिंदु और जैन प्रथाओं में कूट-कूट कर भरा हुआ था तथा उनकी मातृभूमि गुजरात में ज्यादातर हिंदु शाकाहारी ही थे। इसी तरह जैन भी थे। गांधी का परिवार भी इससे अछूता नहीं था। पढाई के लिए लंदन आने से पूर्व गांधी जी ने अपनी माता पुतलीबाई और अपने चाचा बेचारजी स्वामी से एक वायदा किया था कि वे मांस खाने, शराब पीने से तथा संकीणता से दूर रहेंगे।उन्होने अपने वायदे रखने के लिए उपवास किए और ऐसा करने से सबूत कुछ ऐसा मिला जो भोजन करने से नहीं मिल सकता था, उन्होंने अपने जीवन पर्यन्त दर्शन के लिए आधार जो प्राप्त कर लिया था। जैसे जैसे गांधी जी व्यस्क होते गए वे पूर्णतया शाकाहारी (vegetarian)बन गए। उन्होंने द मोरल बेसिस ऑफ वेजीटेरियनिज्म तथा इस विषय पर बहुत सी लेख भी लिखें हैं जिनमें से कुछ लंदन वेजीटेरियन सोसायटी के प्रकाशन द वेजीटेरियन [27]में प्रकाशित भी हुए हैं। गांधी जी स्वयं इस अवधि में बहुत सी महान विभूतियों से प्रेरित हुए और लंदन वेजीटेरियन सोसायटी के चैयरमेन डॉ० जोसिया ओल्डफील्ड के मित्र बन गए।
हेनरी स्टीफन साल्ट (Henry Stephens Salt)की कृतियों को पढने और प्रशंषा करने के बाद युवा मोहनदास गांधी शाकाहारी प्रचारक से मिले और उनके साथ पत्राचार किया। गांधी जी ने लंदन में रहते समय और उसके बाद शाकाहारी भोजन की वकालत करने में काफी समय बिताया। गांधी जी का कहना था कि शाकाहारी भोजन न केवल शरीर की जरूरतों को पूरा करता है बल्कि यह आर्थिक प्रयोजन की भी पूर्ति करता है जो मांस से होती है और फिर भी मांस अनाज, सब्जियों और फलों से अधिक मंहगा होता है। इसके अलावा कई भारतीय जो आय कम होने की वजह से संघर्ष कर रहे थे, उस समय जो शाकाहारी के रूप में दिखाई दे रहे थे वह आध्यात्मिक परम्परा ही नहीं व्यावहारिकता के कारण भी था.वे बहुत देर तक खाने से परहेज रखते थे , और राजनैतिक विरोध के रूप में उपवास (fasting) रखते थे उन्होंने अपनी मृत्यु तक खाने से इनकार किया जब तक उनका मांग पुरा नही होता उनकी आत्मकथा में यह नोट किया गया है कि शाकाहारी होना ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) में गहरी प्रतिबद्धता होने की शुरूआती सीढ़ी है, बिना कुल नियंत्रण ब्रह्मचर्य में उनकी सफलता लगभग असफल है.
गाँधी जी शुरू से फलाहार (frutarian),[28] करते थे लेकिन अपने चिकित्सक की सलाह से बकरी का दूध पीना शुरू किया था.वे कभी भी दुग्ध -उत्पाद का सेवन नही करते थे क्योंकि पहले उनका मानना था की दूध मनुष्य का प्राकृतिक आहार नहीं होता और उन्हें गाय के चीत्कार सेघृणा (cow blowing),[29] थी और सबसे महत्वपूर्ण कारण था शपथ जो उन्होंने अपनी स्वर्गीय माँ से किया था
ब्रह्मचर्य
जब गाँधी जी सोलह साल के हुए तब उनके पिताश्री की तबियत बहुत ख़राब थी उनके पिता की बीमारी के दौरान वे हमेशा उपस्थित रहते थे क्योंकि वे अपने माता-पिता के प्रति अत्यंत समर्पित थे. यद्यपि, गाँधी जी को कुछ समय की राहत देने के लिए एक दिन उनके चाचा जी आए वे आराम के लिए शयनकक्ष पहुंचे जहाँ उनकी शारीरिक अभिलाषाएं जागृत हुई और उन्होंने अपनी पत्नी से प्रेम किया नौकर के जाने के पश्चात् थोडी ही देर में ख़बर आई की गाँधी के पिता का अभी अभी देहांत हो गया है.गाँधी जी को जबरदस्त अपराध महसूस हुआ और इसके लिए वे अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकते थे उन्होंने इस घटना का जिक्र दोहरी शर्म में किया इस घटना का गाँधी पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा और वे ३६ वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य (celibate) की और मुड़ने लगे, जबकि उनकी शादी हो चुकी थी.[30]
यह निर्णय ब्रह्मचर्य (Brahmacharya) के दर्शन से पुरी तरह प्रभावित था आध्यात्मिक और व्यवहारिक शुद्धता बड़े पैमाने पर ब्रह्मचर्य और वैराग्यवाद (asceticism) से जुदा होता है.गाँधी ने ब्रह्मचर्य को भगवान् के करीब आने और अपने को पहचानने का प्राथमिक आधार के रूप में देखा था अपनी आत्मकथा में वे अपनी बचपन की दुल्हन कस्तूरबा (Kasturba) के साथ अपनी कामेच्छा और इर्ष्या के संघर्षो को बतातें हैं उन्होंने महसूस किया कि यह उनका व्यक्तिगत दायित्व है की उन्हें ब्रह्मचर्य रहना है ताकि वे बजाय हवस के प्रेम को सिख पायें गाँधी के लिए, ब्रह्मचर्य का अर्थ था "इन्द्रियों के अंतर्गत विचारों, शब्द और कर्म पर नियंत्रण".[31]
सादगी
गाँधी जी का मानना था कि अगर एक व्यक्ति समाज सेवा में कार्यरत है तो उसे साधारण जीवन (simple life) की और ही बढ़ना चाहिए जिसे वे ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक मानते थे. उनकी सादगी (simplicity) ने पश्चमी जीवन शैली को त्यागने पर मजबूर करने लगा और वे दक्षिण अफ्रीका में फैलने लगे थे इसे वे "ख़ुद को शुन्य के स्थिति में लाना" कहते हैं जिसमे अनावश्यक खर्च, साधारण जीवन शैली को अपनाना और अपने वस्त्र स्वयं धोना आवश्यक है.[32]एक अवसर पर जन्मदार की और से सम्मुदय के लिए उनकी अनवरत सेवा के लिए प्रदान किए गए उपहार को भी वापस कर देते हैं.[33]
गाँधी सप्ताह में एक दिन मौन धारण करते थे.उनका मानना था कि बोलने के परहेज से उन्हें आतंरिक शान्ति (inner peace) मिलाती है. उनपर यह प्रभाव हिंदू मौन सिद्धांत का है, (संस्कृत: - मौन) और शान्ति (संस्कृत: -शान्ति)वैसे दिनों में वे कागज पर लिखकर दूसरों के साथ संपर्क करते थे 37 वर्ष की आयु से साढ़े तीन वर्षों तक गांधी जी ने अख़बारों को पढ़ने से इंकार कर दिया जिसके जवाब में उनका कहना था कि जगत की आज जो स्थिर अवस्था है उसने उसे अपनी स्वयं की आंतरिक अशांति की तुलना में अधिक भ्रमित किया है।
जॉन रस्किन (John Ruskin) की अन्टू दिस लास्ट (Unto This Last), पढने के बाद उन्होंने अपने जीवन शैली में परिवर्तन करने का फैसला किया तथा एक समुदाय बनाया जिसे अमरपक्षी अवस्थापन कहा जाता था.
दक्षिण अफ्रीका, जहाँ से उन्होंने वकालत पूरी की थी तथा धन और सफलता के साथ जुड़े थे वहां से लौटने के पश्चात् उन्होंने पश्चमी शैली के वस्त्रों का त्याग किया.उन्होंने भारत के सबसे गरीब इंसान के द्वारा जो वस्त्र पहने जाते हैं उसे स्वीकार किया, तथा घर में बने हुए कपड़े (खादी) पहनने की वकालत भी की.गाँधी और उनके अनुयायियों ने अपने कपड़े सूत के द्वारा ख़ुद बुनने के अभ्यास को अपनाया और दूसरो को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया हालाँकि भारतीय श्रमिक बेरोज़गारी के कारण बहुधा आलसी थे, वे अक्सर अपने कपड़े उन औद्योगिक निर्माताओं से खरीदते थे जिसका उद्देश्य ब्रिटिश हितों को पुरा करना था. गाँधी का मत था कि अगर भारतीय अपने कपड़े ख़ुद बनाने लगे, तो यह भारत में बसे ब्रिटिशों को आर्थिक झटका लगेगा. फलस्वरूप, बाद में चरखा (spinning wheel) को भारतीय राष्ट्रीय झंडा में शामिल किया गया. अपने साधारण जीवन को दर्शाने के लिए उन्होंने बाद में अपनी बाकी जीवन में धोती पहनी
विश्वास
गाँधी का जन्म हिंदू धर्म में हुआ, उनके पुरे जीवन में अधिकतर सिधान्तों की उत्पति हिंदुत्व से हुआ. साधारण हिंदू कि तरह वे सारे धर्मों को समान रूप से मानते थे, और सारे प्रयासों जो उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए कोशिश किए जा रहे थे उसे अस्वीकार किया. वे ब्रह्मज्ञान के जानकार थे और सभी प्रमुख धर्मो को विस्तार से पढ़तें थे. उन्होंने हिंदू धर्म के बारे में निम्नलिखित कहा है.
हिंदू धर्म के बारें में जितना मैं जानता हूँ यह मेरी आत्मा को संतुष्ट करती है, और सारी कमियों को पूरा करती है जब मुझे संदेह घेर लेती है, जब निराशा मुझे घूरने लगती है, और जब मुझे आशा की कोई किरण नजर नही आती है, तब मैं भगवद् गीता को पढ़ लेता हूँ और तब मेरे मन को असीम शान्ति मिलती है और तुंरत ही मेरे चेहरे से निराशा के बादल छंट जातें हैं और मैं खुश हो जाता हूँ.मेरा पुरा जीवन त्रासदियों से भरा है और यदि वो दृश्यात्मक और अमिट प्रभाव मुझ पर नही छोड़ता, मैं इसके लिए भगवत गीता के उपदेशों का ऋणी हूँ.
गाँधी स्मृति ( जिस घर में गाँधी ने अपने अन्तिम ४ महीने बिताएं वह आज एक स्मारक बन गया है ,नई दिल्ली)
गाँधी ने भगवद गीता की व्याख्या गुजराती में भी की है.महादेव देसाई ने गुजराती पाण्डुलिपि का अतिरिक्त भूमिका तथा विवरण के साथ अंग्रेजी में अनुवाद किया है गाँधी के द्वारा लिखे गए प्राक्कथन के साथ इसका प्रकाशन १९४६ में हुआ था .[34][35]
गाँधी का मानना था कि प्रत्येक धर्म के मूल में सत्य और प्रेम होता है ( संवेदना, अहिंसा और स्वर्ण नियम (the Golden Rule)) ढोंग, कुप्रथा आदि पर भी उन्होंने सभी धर्मो के सिधान्तों से सवाल किए और वे एक अथक समाज सुधारक थे.उनकी कुछ टिप्पणियां विभिन्न धर्मो पर है ;
यदि मैं ईसाई धर्म को आदर्श के रूप में या महानतम रूप में स्वीकार नहीं कर सकता तो कभी भी मैं हिन्दुत्व के प्रति इस प्रकार दृड़ निश्चयी नहीं बन पाता. हिंदू दोष दुराग्रह्पुर्वक मुझे दिखाई देती थी यदि अस्पृश्यता हिंदुत्व का हिस्सा होता तो वह इसका सबसे सडा अंग होता.सम्प्रदायों की अनेक जातियों और उनके अस्तित्व को मैं कभी समझ नहीं सकता इसका क्या अर्थ है कि वेद परमेश्वर के शब्द से प्रेरित है?यदि वें प्रेरित थे तो क्यों नहीं बाइबल और कुरान ?ईसाई दोस्त मुझे परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं तो मुस्लिम दोस्त क्या करेंगे अब्दुल्लाह शेठ मुझे हमेशा इस्लाम का अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते थे और निश्चित रूप से हमेशा इस्लाम की सुन्दरता का ही बखान करते थे ( स्रोत : उनकी आत्मकथा (his autobiography))
जितना जल्दी हम नैतिक आधार से हारेंगे उतना ही जल्दी हममे धार्मिक युद्ध समाप्त हो जायेगी ऐसी कोई बात नहीं है की धर्म नैतिकता के उपर हो उदाहरण के तौर पर कोई मनुष्य असत्यवादी, क्रूर या असंयमी हो और वह यह दावा करे की परमेश्वर उसके साथ हैं कभी हो ही नहीं सकता
मुहम्मद की बातें ज्ञान का खजाना है सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के लिए
बाद में उनके जीवन में जब पूछा गया कि क्या तुम हिंदू हो, उन्होंने कहा:
"हाँ मैं हूँ.मैं भी एक ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध और यहूदी हूँ."
एक दूसरे के प्रति गहरा आदर भाव होने के बावजूद गाँधी और रबिन्द्रनाथ टैगोर एक से अधिक बार लम्बी बहस में लगे रहे. ये वाद विवाद दोनों के दार्शनिक मतभेद को दर्शाती है और ये दोनों ही उस समय के प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक थे १५ जनवरी १९३४ में बिहार में एक भूकंप आया और जिसके कारण व्यापक नुकसान हुआ और कई जानें गईं गाँधी जी ने अपने आप को संभाला क्योंकि यह पाप हिंदू धर्म के उच्च जाती वर्गों के द्वारा किया गया था जो अपने मंदिरों में अछूतों को अंदर जाने से मना करते थे ( गाँधी के कारण ही छुआछुत में वृद्धि हुई थी क्योंकि उन्होंने उन्हें हरिजन (Harijan), कृष्ण के लोग कहा था, गाँधी के विचारों का टगोर (Tagore) ने जोरदार विरोध किया और कहा कि भूकंप नैतिक कारणों से नही प्राकृतिक शक्तियों से होती हैं, चाहे वह अस्पृश्यता की प्रथा के कितने ही विरुद्ध हो.[
रविवार, 10 जुलाई 2011
ढ़ेर-सा है जल, तो तड़पन भी बहुत है
ढ़ेर-सा है जल, तो तड़पन भी बहुत हैमछलियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
ढ़ेर-सा है जल, तो तड़पन भी बहुत है
शाप है या कोई वरदान है
यह समझ पाना कहाँ आसान है
एक पल ढेरों ख़ुशी ले आएगा
एक पल में ज़िन्दगी वीरान है
लड़कियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
पर हैं उड़ने को, तो बंधन भी बहुत हैं…
भोली-भाली मुस्कुराहट अब कहाँ
वे रुपहली-सी सजावट अब कहाँ
साँकलें दरवाज़ों से कहने लगीं
जानी-पहचानी वो आहट अब कहाँ
चूड़ियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं ख़नकते सुख, तो टूटन भी बहुत हैं…
दिन तो पहले भी थे कुछ प्रतिकूल से
शूल पहले भी थे लिपटे फूल से
किसलिये फिर दूरियाँ बढ़ने लगीं
क्यूँ नहीं आतीं इधर अब भूल से
तितलियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं महकते पल, तो अड़चन भी बहुत हैं…
रास्ता रोका घने विश्वास ने
अपनेपन की चाह ने, अहसास ने
किसलिये फिर बरसे बिन जाने लगी
बदलियों से जब ये पूछा प्यास ने
बदलियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं अगर सावन तो भटकन भी बहुत हैं…
भावना के अर्थ तक बदले गए
वेदना के अर्थ तक बदले गए
कितना कुछ बदला गया इस शोर में
प्रार्थना के अर्थ तक बदले गए
चुप्पियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
कहने का है मन, तो उलझन भी बहुत हैं…
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़माने वाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहाने वाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठाने वाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आने वाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपाने वाले
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास का विख्यात नाटक है। इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय विरह तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है । इसके आरंभ खुद कालिदास के नाटक के मंचन होने की बात कही गई है ।
इसकी नाटकीयता, इसके सुन्दर कथोपकथन, इसकी काव्य-सौंदर्य से भरी उपमाएँ और स्थान-स्थान पर प्रयुक्त हुई समयोचित सूक्तियाँ; और इन सबसे बढ़कर विविध प्रसंगों की ध्वन्यात्मकता इतनी अद्भुत है कि इन दृष्टियों से देखने पर संस्कृत के भी अन्य नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल से टक्कर नहीं ले सकते; फिर अन्य भाषाओं का तो कहना ही क्या !
मौलिक न होने पर भी मौलिक
कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल की कथावस्तु मौलिक नहीं चुनी। यह कथा महाभारत के आदिपर्व से ली गई है। यों पद्मपुराण में भी शकुंतला की कथा मिलती है और वह महाभारत की अपेक्षा शकुन्तला की कथा के अधिक निकट है। इस कारण विन्टरनिट्ज ने यह माना है कि शकुन्तला की कथा पद्मपुराण से ली गई है। परन्तु विद्वानों का कथन है कि पद्मपुराण का यह भाग शकुन्तला की रचना के बाद लिखा और बाद में प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। महाभारत की कथा में दुर्वासा के शाप का उल्लेख नहीं है। महाभारत का दुष्यन्त से यदि ठीक उलटा नहीं, तो भी बहुत अधिक भिन्न है।
महाभारत की शकुन्तला भी कालिदास की भांति सलज्ज नहीं है। वह दुष्यन्त को विश्वामित्र और मेनका के सम्बन्ध के फलस्वरुप हुए अपने जन्म की कथा अपने मुंह से ही सुनाती है। महाभारत में दुष्यन्त शकुन्तला के रूप पर मुग्ध होकर शकुन्तला से गांधर्व विवाह की प्रार्थना करता है; जिस पर शकुन्तला कहती है कि मैं विवाह इस शर्त पर कर सकती हूं कि राजसिंहासन मेरे पुत्र को ही मिले। दुष्यन्त उस समय तो स्वीकार कर लेता है और बाद में अपनी राजधानी में लौटकर जान-बूझकर लज्जावश शकुन्तला को ग्रहण नहीं करता। कालिदास ने इस प्रकार अपरिष्कृत रूप में प्राप्त हुई कथा को अपनी कल्पना से अद्भुत रूप में निखार दिया है। दुर्वासा के शाप की कल्पना करके उन्होंने दुष्यन्त के चरित्र को ऊंचा उठाया है। कालिदास की शकुन्तला भी आभिजात्य, सौंदर्य और करुणा की मूर्ति है। इसके अतिरिक्त कालिदास ने सारी कथा का निर्वाह, भावों का चित्रण इत्यादि जिस ढंग से किया है, वह मौलिक और अपूर्व है।
कथा
शकुन्तला का जन्म स्वर्गीय अप्सरा मेनका के गर्भ से उन ऋषि विश्वामित्र से हुआ जिनके तप से इन्द्र तक डर गये थे और उन्होंने ऋषि को लुभाने के लिए और उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका को मृत्युलोक में भेजा। कन्या के उत्पन्न होते ही मेनका उसको वन में छोड़कर स्वर्ग को लौट गई थी। वन के पशु-पक्षियों ने कन्या का पोषण किया और कण्व की दृष्टि पड़ने पर वे उसको अपने आश्रम में ले आए। पक्षियों द्वारा पालित-पोषित होने से कण्व ने उसका नाम ‘शकुन्तला’ रख दिया था।
शकुन्तला के प्रति महर्षि कण्व का अपनी औरस पुत्री जैसा स्नेह था। वे उसकी प्रसन्नता का सब सामान अपने आश्रम में जुटाते रहे।
‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में इसी शकुन्तला के जीवन को संक्षेप में चित्रित किया गया है। इसमें अनेक मार्मिक प्रसंगों को उल्लेख किया गया है। एक उस समय, जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रथम मिलन होता है। दूसरा उस समय, जब कण्व शकुन्तला को अपने आश्रम से पतिगृह के लिए विदा करते हैं। उस समय तो स्वयं ऋषि कहते हैं कि मेरे जैसे ऋषि को अपनी पालिता कन्या में यह मोह है तो जिनकी औरस पुत्रियां पतिगृह के लिए विदा होती हैं उस समय उनकी क्या स्थिति होती होगी।
तीसरा प्रसंग है, शकुन्तला का दुष्यन्त की सभा में उपस्थित होना और दुष्यन्त को उसको पहचानने से इनकार करना। चौथा प्रसंग है उस समय का, जब मछुआरे को प्राप्त दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी उसको दिखाई जाती है। और पांचवां प्रसंग मारीचि महर्षि के आश्रम में दुष्यन्त-शकुन्तला के मिलन का।
ध्वन्यात्मक संकेत
शकुन्तला में कालिदास का सबसे बड़ा चमत्कार उसके ध्वन्यात्मक संकेतों में है। इसमें कवि को विलक्षण सफलता यह मिली है कि उसने कहीं भी कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं कही। कोई भी पात्र, कोई भी कथोप-कथन, कोई भी घटना, कोई भी प्राकृतिक दृश्य निष्प्रयोजन नहीं है। सभी घटनाएं यह दृश्य आगे आने वाली घटनाओं का संकेत चमत्कारिक रीति से पहले ही दे देते हैं। नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है। इसी प्रकार नाटक के प्रारम्भिक गीत में भ्रमरों द्वारा शिरीष के फूलों को ज़रा-ज़रा-सा चूमने से यह संकेत मिलता है कि दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन अल्पस्थायी होगा। जब राजा धनुष पर बाण चढ़ाए हरिण के पीछे दौड़े जा रहे हैं, तभी कुछ तपस्वी आकर रोकते हैं। कहते हैं-‘महाराज’ यह आश्रम का हरिण है, इस पर तीर न चलाना।’ यहां हरिण के अतिरिक्त शकुन्तला की ओर भी संकेत है, जो हरिण के समान ही भोलीभाली और असहाय है। ‘कहां तो हरिणों का अत्यन्त चंचल जीवन और कहां तुम्हारे वज्ज्र के समान कठोर बाण !’ इससे भी शकुन्तला की असहायता और सरलता तथा राजा की निष्ठुरता का मर्मस्पर्शी संकेत किया गया है। जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रेम कुछ और बढ़ने लगता है, तभी नेपथ्य से पुकार सुनाई पड़ती है कि ‘तपस्वियो, आश्रम के प्राणियों की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ। शिकारी राजा दुष्यन्त यहां आया हुआ है।’ इसमें भी दुष्यन्त के हाथों से शकुन्तला की रक्षा की ओर संकेत किया गया प्रतीत होता है, परन्तु यह संकेत किसी के भी कान में सुनाई नहीं दिया; शकुन्तला को किसी ने नहीं बचाया। इससे स्थिति की करुणाजनकता और भी अधिक बढ़ जाती है। चौथे अंक के प्रारम्भिक भाग में कण्व के शिष्य ने प्रभात का वर्णन करते हुए सुख और दुःख के निरन्तर साथ लगे रहने का तथा प्रिय के वियोग में स्त्रियों के असह्य दुःख का जो उल्लेख किया है, वह दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला का परित्याग किए जाने के लिए पहले से ही पृष्ठभूमि-सी बना देता है। पांचवें अंक में रानी हंसपदिका एक गीत गाती हैं, जिसमें राजा को उनकी मधुर-वृत्ति के लिए उलाहना दिया गया है। दुष्यन्त भी यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हंसपदिका से एक ही बार प्रेम किया है। इससे कवि यह गम्भीर संकेत देता है कि भले ही शकुन्तला को दु्ष्यन्त ने दुर्वासा के शाप के कारण भूलकर छोड़ा, परन्तु एक बार प्यार करने के बाद रानियों की उपेक्षा करना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। अन्य रानियां भी उसकी इस मधुकर-वृत्ति का शिकार थीं। हंसपादिका के इस गीत की पृष्ठभूमि में शकुन्तला के परित्याग की घटना और भी क्रूर और कठोर जान पड़ती है। इसी प्रकार के ध्वन्यात्मक संकेतों से कालिदास ने सातवें अंक में दुष्यन्त, शकुन्तला और उसके पुत्र के मिलने के लिए सुखद पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। इन्द्र राजा दुष्यन्त को अपूर्व सम्मान प्रदान करते हैं। उसके बाद हेमकूट पर्वत पर प्रजापति के आश्रम में पहुंचते ही राजा को अनुभव होने लगता है कि जैसे वह अमृत के सरोवर में स्नान कर रहे हों। इस प्रकार के संकेतों के बाद दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन और भी अधिक मनोहर हो उठता है।
काव्य-सौंदर्य
जर्मन कवि गेटे ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् के बारे में कहा था-
‘‘यदि तुम युवावस्था के फूल प्रौढ़ावस्था के फल और अन्य ऐसी सामग्रियां एक ही स्थान पर खोजना चाहो जिनसे आत्मा प्रभावित होता हो, तृप्त होता हो और शान्ति पाता हो, अर्थात् यदि तुम स्वर्ग और मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना चाहते हो तो मेरे मुख से सहसा एक ही नाम निकल पड़ता है - शाकुन्तलम् , महान् कवि कालिदास की एक अमर रचना !’’
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों में यह श्लोक प्रसिद्ध है-
काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।।
इसका अर्थ है - काव्य के जितने भी प्रकार हैं उनमें नाटक विशेष सुन्दर होता है। नाटकों में भी काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से अभिज्ञान शाकुन्तलम् का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में भी उसका चतुर्थ अंक और इस अंक में भी चौथा श्लोक तो बहुत ही रमणीय है।
अभिज्ञान शाकुन्तल में नाटकीयता के साथ-साथ काव्य का अंश भी यथेष्ट मात्रा में है। इसमें श्रृंगार मुख्य रस है; और उसके संयोग तथा वियोग दोनों ही पक्षों का परिपाक सुन्दर रूप में हुआ है। इसके अतिरिक्त हास्य, वीर तथा करुण रस की भी जहां-तहां अच्छी अभिव्यक्ति हुई है। स्थान-स्थान पर सुन्दर और मनोहरिणी उतप्रेक्षाएं न केवल पाठक को चमत्कृत कर देती हैं, किन्तु अभीष्ट भाव की तीव्रता को बढ़ाने में ही सहायक होती हैं। सारे नाटक में कालिदास ने अपनी उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं का उपयोग कहीं भी केवल अलंकार-प्रदर्शन के लिए नहीं किया। प्रत्येक स्थान पर उनकी उपमा या उत्प्रेक्षा अर्थ की अभिव्यक्ति को रसपूर्ण बनाने में सहायक हुई है। कालिदास अपनी उपमाओं के लिए संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध हैं। शाकुन्तल में भी उनकी उपयुक्त उपमा चुनने की शक्ति भली-भांति प्रकट हुई। शकुन्तला के विषय में एक जगह राजा दुष्यन्त कहते हैं कि ‘वह ऐसा फूल है, जिसे किसी ने सूंघा नहीं है; ऐसा नवपल्लव है, जिस पर किसी के नखों की खरोंच नहीं लगी; ऐसा रत्न है, जिसमें छेद नहीं किया गया और ऐसा मधु है, जिसका स्वाद किसी ने चखा नहीं है।’ इन उपमाओं के द्वारा शकुन्तला के सौंदर्य की एक अनोखी झलक हमारी आंखों के सामने आ जाती है। इसी प्रकार पांचवें अंक में दुश्यन्त शकुन्तला का परित्याग करते हुए कहते हैं कि ‘हे तपस्विनी, क्या तुम वैसे ही अपने कुल को कलंकित करना और मुझे पतित करना चाहती हो, जैसे तट को तोड़कर बहने वाली नदी तट के वृक्ष को तो गिराती ही है और अपने जल को भी मलिन कर लेती है।’ यहां शकुन्तला की चट को तोड़कर बहने वाली नदी से दी गई उपमा राजा के मनोभाव को व्यक्त करने में विशेष रूप से सहायक होती है। इसी प्रकार जब कण्व के शिष्य शकुन्तला को साथ लेकर दुष्यन्त के पास पहुंचते हैं तो दुष्यन्त की दृष्टि उन तपस्वियों के बीच में शकुन्तला के ऊपर जाकर पड़ती है। वहां शकुन्तला के सौंदर्य का विस्तृत वर्णन न करके कवि ने उनके मुख से केवल इतना कहलवा दिया है कि ‘इन तपस्वियों के बीच में वह घूंघट वाली सुन्दरी कौन है, जो पीले पत्तों के बीच में नई कोंपल के समान दिखाई पड़ रही है।’ इस छोटी-सी उपमा ने पीले पत्ते और कोंपल की सदृश्यता के द्वारा शकुन्तला के सौन्दर्य का पूरा ही चित्रांकन कर दिया है। इसी प्रकार सर्वदमन को देखकर दुष्यन्त कहते हैं कि ‘यह प्रतापी बालक उस अग्नि के स्फुलिंग की भांति प्रतीत होता है, जो धधकती आग बनने के लिए ईधन की राह देखता है।’ इस उपमा से कालिदास ने न केवल बालक की तेजस्विता प्रकट कर दी, बल्कि यह भी स्पष्ट रूप से सूचित कर दिया है कि यह बालक बड़ा होकर महाप्रतापी चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। इस प्रकार की मनोहर उपमाओं के अनेक उदाहरण शाकुन्तल में से दिये जा सकते हैं क्योंकि शाकुन्तल में 180 उपमाएं प्रयुक्त हुईं हैं। और उनमें से सभी एक से एक बढ़कर हैं।
यह ठीक है उपमा के चुनाव में कालिदास को विशेष कुशलता प्राप्त थी और यह भी ठीक है कि उनकी-सी सुन्दर उपमाएँ अन्य कवियों की रचनाओं में दुर्लभ हैं, फिर भी कालिदास की सबसे बड़ी विशेषता उपमा-कौशल नहीं है। उपमा-कौशल तो उनके काव्य-कौशल का एक सामान्य-सा अंग है। अपने मनोभाव को व्यक्त करने अथवा किसी रस का परिपाक करने अथवा किसी भाव की तीव्र अनुभूति को जगाने की कालिदास अनेक विधियां जानते हैं। शब्दों का प्रसंगोचित चयन, अभीष्ट भाव के उपयुक्त छंद का चुनाव और व्यंजना-शक्ति का प्रयोग करके कालिदास ने अपनी शैली को विशेष रूप से रमणीय बना दिया है। जहां कालिदास शकुन्तला के सौन्दर्य-वर्णन पर उतरे हैं, वहां उन्होंने केवल उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं द्वारा शकुन्तला का रूप चित्रण करके ही सन्तोष नहीं कर लिया है। पहले-पहले तो उन्होंने केवल इतना कहलवाया कि ‘यदि तपोवन के निवासियों में इतना रूप है, तो समझो कि वन-लताओं ने उद्यान की लताओं को मात कर दिया।’ फिर दुष्यन्त के मुख से उन्होंने कहलवाया कि ‘इतनी सुन्दर कन्या को आश्रम के नियम-पालन में लगाना ऐसा ही है जैसे नील कमल की पंखुरी से बबूल का पेड़ काटना।’ उसके बाद कालिदास कहते हैं कि ‘शकुन्तला का रूप ऐसा मनोहर है कि भले ही उसने मोटा वल्कल वस्त्र पहना हुआ है, फिर उससे भी उसका सौंदर्य कुछ घटा नहीं, बल्कि बढ़ा ही है। क्योंकि सुन्दर व्यक्ति को जो भी कुछ पहना दिया जाए वही उसका आभूषण हो जाता है।’ उसके बाद राजा शकुन्तला की सुकुमार देह की तुलना हरी-भरी फूलों से लदी लता के साथ करते हैं, जिससे उस विलक्षण सौदर्य का स्वरूप पाठक की आंखों के सामने चित्रित-सा हो उठता है। इसके बाद उस सौंदर्य की अनुभूति को चरम सीमा पर पहुंचाने के लिए कालिदास एक भ्रमर को ले आए हैं; जो शकुन्तला के मुख को एक सुन्दर खिला हुआ फूल समझकर उसका रसपान करने के लिए उसके ऊपर मंडराने लगता है। इस प्रकार कालिदास ने शकुन्तला के सौंदर्य को चित्रित करने के लिए अंलकारों का सहारा उतना नहीं लिया, जितना कि व्यंजनाशक्ति का; और यह व्यजना-शक्ति ही काव्य की जान मानी जाती है।
हमारे भाग्य में
ढ़ेर-सा है जल, तो तड़पन भी बहुत है
शाप है या कोई वरदान है
यह समझ पाना कहाँ आसान है
एक पल ढेरों ख़ुशी ले आएगा
एक पल में ज़िन्दगी वीरान है
लड़कियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
पर हैं उड़ने को, तो बंधन भी बहुत हैं…
भोली-भाली मुस्कुराहट अब कहाँ
वे रुपहली-सी सजावट अब कहाँ
साँकलें दरवाज़ों से कहने लगीं
जानी-पहचानी वो आहट अब कहाँ
चूड़ियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं ख़नकते सुख, तो टूटन भी बहुत हैं…
दिन तो पहले भी थे कुछ प्रतिकूल से
शूल पहले भी थे लिपटे फूल से
किसलिये फिर दूरियाँ बढ़ने लगीं
क्यूँ नहीं आतीं इधर अब भूल से
तितलियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं महकते पल, तो अड़चन भी बहुत हैं…
रास्ता रोका घने विश्वास ने
अपनेपन की चाह ने, अहसास ने
किसलिये फिर बरसे बिन जाने लगी
बदलियों से जब ये पूछा प्यास ने
बदलियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
हैं अगर सावन तो भटकन भी बहुत हैं…
भावना के अर्थ तक बदले गए
वेदना के अर्थ तक बदले गए
कितना कुछ बदला गया इस शोर में
प्रार्थना के अर्थ तक बदले गए
चुप्पियाँ बोलीं-
हमारे भाग्य में
कहने का है मन, तो उलझन भी बहुत हैं…
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
हमने देखे हैं कई साथ निभाने वाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़माने वाले
बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहाने वाले
धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठाने वाले
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ाने वाले
रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आने वाले
अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपाने वाले
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास का विख्यात नाटक है। इसमें राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय विरह तथा पुनर्मिलन की एक सुन्दर कहानी है । इसके आरंभ खुद कालिदास के नाटक के मंचन होने की बात कही गई है ।
इसकी नाटकीयता, इसके सुन्दर कथोपकथन, इसकी काव्य-सौंदर्य से भरी उपमाएँ और स्थान-स्थान पर प्रयुक्त हुई समयोचित सूक्तियाँ; और इन सबसे बढ़कर विविध प्रसंगों की ध्वन्यात्मकता इतनी अद्भुत है कि इन दृष्टियों से देखने पर संस्कृत के भी अन्य नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल से टक्कर नहीं ले सकते; फिर अन्य भाषाओं का तो कहना ही क्या !
मौलिक न होने पर भी मौलिक
कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल की कथावस्तु मौलिक नहीं चुनी। यह कथा महाभारत के आदिपर्व से ली गई है। यों पद्मपुराण में भी शकुंतला की कथा मिलती है और वह महाभारत की अपेक्षा शकुन्तला की कथा के अधिक निकट है। इस कारण विन्टरनिट्ज ने यह माना है कि शकुन्तला की कथा पद्मपुराण से ली गई है। परन्तु विद्वानों का कथन है कि पद्मपुराण का यह भाग शकुन्तला की रचना के बाद लिखा और बाद में प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। महाभारत की कथा में दुर्वासा के शाप का उल्लेख नहीं है। महाभारत का दुष्यन्त से यदि ठीक उलटा नहीं, तो भी बहुत अधिक भिन्न है।
महाभारत की शकुन्तला भी कालिदास की भांति सलज्ज नहीं है। वह दुष्यन्त को विश्वामित्र और मेनका के सम्बन्ध के फलस्वरुप हुए अपने जन्म की कथा अपने मुंह से ही सुनाती है। महाभारत में दुष्यन्त शकुन्तला के रूप पर मुग्ध होकर शकुन्तला से गांधर्व विवाह की प्रार्थना करता है; जिस पर शकुन्तला कहती है कि मैं विवाह इस शर्त पर कर सकती हूं कि राजसिंहासन मेरे पुत्र को ही मिले। दुष्यन्त उस समय तो स्वीकार कर लेता है और बाद में अपनी राजधानी में लौटकर जान-बूझकर लज्जावश शकुन्तला को ग्रहण नहीं करता। कालिदास ने इस प्रकार अपरिष्कृत रूप में प्राप्त हुई कथा को अपनी कल्पना से अद्भुत रूप में निखार दिया है। दुर्वासा के शाप की कल्पना करके उन्होंने दुष्यन्त के चरित्र को ऊंचा उठाया है। कालिदास की शकुन्तला भी आभिजात्य, सौंदर्य और करुणा की मूर्ति है। इसके अतिरिक्त कालिदास ने सारी कथा का निर्वाह, भावों का चित्रण इत्यादि जिस ढंग से किया है, वह मौलिक और अपूर्व है।
कथा
शकुन्तला का जन्म स्वर्गीय अप्सरा मेनका के गर्भ से उन ऋषि विश्वामित्र से हुआ जिनके तप से इन्द्र तक डर गये थे और उन्होंने ऋषि को लुभाने के लिए और उनकी तपस्या भंग करने के लिए मेनका को मृत्युलोक में भेजा। कन्या के उत्पन्न होते ही मेनका उसको वन में छोड़कर स्वर्ग को लौट गई थी। वन के पशु-पक्षियों ने कन्या का पोषण किया और कण्व की दृष्टि पड़ने पर वे उसको अपने आश्रम में ले आए। पक्षियों द्वारा पालित-पोषित होने से कण्व ने उसका नाम ‘शकुन्तला’ रख दिया था।
शकुन्तला के प्रति महर्षि कण्व का अपनी औरस पुत्री जैसा स्नेह था। वे उसकी प्रसन्नता का सब सामान अपने आश्रम में जुटाते रहे।
‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में इसी शकुन्तला के जीवन को संक्षेप में चित्रित किया गया है। इसमें अनेक मार्मिक प्रसंगों को उल्लेख किया गया है। एक उस समय, जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रथम मिलन होता है। दूसरा उस समय, जब कण्व शकुन्तला को अपने आश्रम से पतिगृह के लिए विदा करते हैं। उस समय तो स्वयं ऋषि कहते हैं कि मेरे जैसे ऋषि को अपनी पालिता कन्या में यह मोह है तो जिनकी औरस पुत्रियां पतिगृह के लिए विदा होती हैं उस समय उनकी क्या स्थिति होती होगी।
तीसरा प्रसंग है, शकुन्तला का दुष्यन्त की सभा में उपस्थित होना और दुष्यन्त को उसको पहचानने से इनकार करना। चौथा प्रसंग है उस समय का, जब मछुआरे को प्राप्त दुष्यन्त के नाम वाली अंगूठी उसको दिखाई जाती है। और पांचवां प्रसंग मारीचि महर्षि के आश्रम में दुष्यन्त-शकुन्तला के मिलन का।
ध्वन्यात्मक संकेत
शकुन्तला में कालिदास का सबसे बड़ा चमत्कार उसके ध्वन्यात्मक संकेतों में है। इसमें कवि को विलक्षण सफलता यह मिली है कि उसने कहीं भी कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं कही। कोई भी पात्र, कोई भी कथोप-कथन, कोई भी घटना, कोई भी प्राकृतिक दृश्य निष्प्रयोजन नहीं है। सभी घटनाएं यह दृश्य आगे आने वाली घटनाओं का संकेत चमत्कारिक रीति से पहले ही दे देते हैं। नाटक के प्रारम्भ में ही ग्रीष्म-वर्णन करते हुए वन-वायु के पाटल की सुगंधि से मिलकर सुगंधित हो उठने और छाया में लेटते ही नींद आने लगने और दिवस का अन्त रमणीय होने के द्वारा नाटक की कथा-वस्तु की मोटे तौर पर सूचना दे दी गई है, जो क्रमशः पहले शकुन्तला और दुष्यन्त के मिलन, उसके बाद नींद-प्रभाव से शकुन्तला को भूल जाने और नाटक का अन्त सुखद होने की सूचक है। इसी प्रकार नाटक के प्रारम्भिक गीत में भ्रमरों द्वारा शिरीष के फूलों को ज़रा-ज़रा-सा चूमने से यह संकेत मिलता है कि दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन अल्पस्थायी होगा। जब राजा धनुष पर बाण चढ़ाए हरिण के पीछे दौड़े जा रहे हैं, तभी कुछ तपस्वी आकर रोकते हैं। कहते हैं-‘महाराज’ यह आश्रम का हरिण है, इस पर तीर न चलाना।’ यहां हरिण के अतिरिक्त शकुन्तला की ओर भी संकेत है, जो हरिण के समान ही भोलीभाली और असहाय है। ‘कहां तो हरिणों का अत्यन्त चंचल जीवन और कहां तुम्हारे वज्ज्र के समान कठोर बाण !’ इससे भी शकुन्तला की असहायता और सरलता तथा राजा की निष्ठुरता का मर्मस्पर्शी संकेत किया गया है। जब दुष्यन्त और शकुन्तला का प्रेम कुछ और बढ़ने लगता है, तभी नेपथ्य से पुकार सुनाई पड़ती है कि ‘तपस्वियो, आश्रम के प्राणियों की रक्षा के लिए तैयार हो जाओ। शिकारी राजा दुष्यन्त यहां आया हुआ है।’ इसमें भी दुष्यन्त के हाथों से शकुन्तला की रक्षा की ओर संकेत किया गया प्रतीत होता है, परन्तु यह संकेत किसी के भी कान में सुनाई नहीं दिया; शकुन्तला को किसी ने नहीं बचाया। इससे स्थिति की करुणाजनकता और भी अधिक बढ़ जाती है। चौथे अंक के प्रारम्भिक भाग में कण्व के शिष्य ने प्रभात का वर्णन करते हुए सुख और दुःख के निरन्तर साथ लगे रहने का तथा प्रिय के वियोग में स्त्रियों के असह्य दुःख का जो उल्लेख किया है, वह दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला का परित्याग किए जाने के लिए पहले से ही पृष्ठभूमि-सी बना देता है। पांचवें अंक में रानी हंसपदिका एक गीत गाती हैं, जिसमें राजा को उनकी मधुर-वृत्ति के लिए उलाहना दिया गया है। दुष्यन्त भी यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने हंसपदिका से एक ही बार प्रेम किया है। इससे कवि यह गम्भीर संकेत देता है कि भले ही शकुन्तला को दु्ष्यन्त ने दुर्वासा के शाप के कारण भूलकर छोड़ा, परन्तु एक बार प्यार करने के बाद रानियों की उपेक्षा करना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी। अन्य रानियां भी उसकी इस मधुकर-वृत्ति का शिकार थीं। हंसपादिका के इस गीत की पृष्ठभूमि में शकुन्तला के परित्याग की घटना और भी क्रूर और कठोर जान पड़ती है। इसी प्रकार के ध्वन्यात्मक संकेतों से कालिदास ने सातवें अंक में दुष्यन्त, शकुन्तला और उसके पुत्र के मिलने के लिए सुखद पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। इन्द्र राजा दुष्यन्त को अपूर्व सम्मान प्रदान करते हैं। उसके बाद हेमकूट पर्वत पर प्रजापति के आश्रम में पहुंचते ही राजा को अनुभव होने लगता है कि जैसे वह अमृत के सरोवर में स्नान कर रहे हों। इस प्रकार के संकेतों के बाद दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन और भी अधिक मनोहर हो उठता है।
काव्य-सौंदर्य
जर्मन कवि गेटे ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् के बारे में कहा था-
‘‘यदि तुम युवावस्था के फूल प्रौढ़ावस्था के फल और अन्य ऐसी सामग्रियां एक ही स्थान पर खोजना चाहो जिनसे आत्मा प्रभावित होता हो, तृप्त होता हो और शान्ति पाता हो, अर्थात् यदि तुम स्वर्ग और मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना चाहते हो तो मेरे मुख से सहसा एक ही नाम निकल पड़ता है - शाकुन्तलम् , महान् कवि कालिदास की एक अमर रचना !’’
इसी प्रकार संस्कृत के विद्वानों में यह श्लोक प्रसिद्ध है-
काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।।
इसका अर्थ है - काव्य के जितने भी प्रकार हैं उनमें नाटक विशेष सुन्दर होता है। नाटकों में भी काव्य-सौन्दर्य की दृष्टि से अभिज्ञान शाकुन्तलम् का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् का नाम सबसे ऊपर है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में भी उसका चतुर्थ अंक और इस अंक में भी चौथा श्लोक तो बहुत ही रमणीय है।
अभिज्ञान शाकुन्तल में नाटकीयता के साथ-साथ काव्य का अंश भी यथेष्ट मात्रा में है। इसमें श्रृंगार मुख्य रस है; और उसके संयोग तथा वियोग दोनों ही पक्षों का परिपाक सुन्दर रूप में हुआ है। इसके अतिरिक्त हास्य, वीर तथा करुण रस की भी जहां-तहां अच्छी अभिव्यक्ति हुई है। स्थान-स्थान पर सुन्दर और मनोहरिणी उतप्रेक्षाएं न केवल पाठक को चमत्कृत कर देती हैं, किन्तु अभीष्ट भाव की तीव्रता को बढ़ाने में ही सहायक होती हैं। सारे नाटक में कालिदास ने अपनी उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं का उपयोग कहीं भी केवल अलंकार-प्रदर्शन के लिए नहीं किया। प्रत्येक स्थान पर उनकी उपमा या उत्प्रेक्षा अर्थ की अभिव्यक्ति को रसपूर्ण बनाने में सहायक हुई है। कालिदास अपनी उपमाओं के लिए संस्कृत-साहित्य में प्रसिद्ध हैं। शाकुन्तल में भी उनकी उपयुक्त उपमा चुनने की शक्ति भली-भांति प्रकट हुई। शकुन्तला के विषय में एक जगह राजा दुष्यन्त कहते हैं कि ‘वह ऐसा फूल है, जिसे किसी ने सूंघा नहीं है; ऐसा नवपल्लव है, जिस पर किसी के नखों की खरोंच नहीं लगी; ऐसा रत्न है, जिसमें छेद नहीं किया गया और ऐसा मधु है, जिसका स्वाद किसी ने चखा नहीं है।’ इन उपमाओं के द्वारा शकुन्तला के सौंदर्य की एक अनोखी झलक हमारी आंखों के सामने आ जाती है। इसी प्रकार पांचवें अंक में दुश्यन्त शकुन्तला का परित्याग करते हुए कहते हैं कि ‘हे तपस्विनी, क्या तुम वैसे ही अपने कुल को कलंकित करना और मुझे पतित करना चाहती हो, जैसे तट को तोड़कर बहने वाली नदी तट के वृक्ष को तो गिराती ही है और अपने जल को भी मलिन कर लेती है।’ यहां शकुन्तला की चट को तोड़कर बहने वाली नदी से दी गई उपमा राजा के मनोभाव को व्यक्त करने में विशेष रूप से सहायक होती है। इसी प्रकार जब कण्व के शिष्य शकुन्तला को साथ लेकर दुष्यन्त के पास पहुंचते हैं तो दुष्यन्त की दृष्टि उन तपस्वियों के बीच में शकुन्तला के ऊपर जाकर पड़ती है। वहां शकुन्तला के सौंदर्य का विस्तृत वर्णन न करके कवि ने उनके मुख से केवल इतना कहलवा दिया है कि ‘इन तपस्वियों के बीच में वह घूंघट वाली सुन्दरी कौन है, जो पीले पत्तों के बीच में नई कोंपल के समान दिखाई पड़ रही है।’ इस छोटी-सी उपमा ने पीले पत्ते और कोंपल की सदृश्यता के द्वारा शकुन्तला के सौन्दर्य का पूरा ही चित्रांकन कर दिया है। इसी प्रकार सर्वदमन को देखकर दुष्यन्त कहते हैं कि ‘यह प्रतापी बालक उस अग्नि के स्फुलिंग की भांति प्रतीत होता है, जो धधकती आग बनने के लिए ईधन की राह देखता है।’ इस उपमा से कालिदास ने न केवल बालक की तेजस्विता प्रकट कर दी, बल्कि यह भी स्पष्ट रूप से सूचित कर दिया है कि यह बालक बड़ा होकर महाप्रतापी चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। इस प्रकार की मनोहर उपमाओं के अनेक उदाहरण शाकुन्तल में से दिये जा सकते हैं क्योंकि शाकुन्तल में 180 उपमाएं प्रयुक्त हुईं हैं। और उनमें से सभी एक से एक बढ़कर हैं।
यह ठीक है उपमा के चुनाव में कालिदास को विशेष कुशलता प्राप्त थी और यह भी ठीक है कि उनकी-सी सुन्दर उपमाएँ अन्य कवियों की रचनाओं में दुर्लभ हैं, फिर भी कालिदास की सबसे बड़ी विशेषता उपमा-कौशल नहीं है। उपमा-कौशल तो उनके काव्य-कौशल का एक सामान्य-सा अंग है। अपने मनोभाव को व्यक्त करने अथवा किसी रस का परिपाक करने अथवा किसी भाव की तीव्र अनुभूति को जगाने की कालिदास अनेक विधियां जानते हैं। शब्दों का प्रसंगोचित चयन, अभीष्ट भाव के उपयुक्त छंद का चुनाव और व्यंजना-शक्ति का प्रयोग करके कालिदास ने अपनी शैली को विशेष रूप से रमणीय बना दिया है। जहां कालिदास शकुन्तला के सौन्दर्य-वर्णन पर उतरे हैं, वहां उन्होंने केवल उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं द्वारा शकुन्तला का रूप चित्रण करके ही सन्तोष नहीं कर लिया है। पहले-पहले तो उन्होंने केवल इतना कहलवाया कि ‘यदि तपोवन के निवासियों में इतना रूप है, तो समझो कि वन-लताओं ने उद्यान की लताओं को मात कर दिया।’ फिर दुष्यन्त के मुख से उन्होंने कहलवाया कि ‘इतनी सुन्दर कन्या को आश्रम के नियम-पालन में लगाना ऐसा ही है जैसे नील कमल की पंखुरी से बबूल का पेड़ काटना।’ उसके बाद कालिदास कहते हैं कि ‘शकुन्तला का रूप ऐसा मनोहर है कि भले ही उसने मोटा वल्कल वस्त्र पहना हुआ है, फिर उससे भी उसका सौंदर्य कुछ घटा नहीं, बल्कि बढ़ा ही है। क्योंकि सुन्दर व्यक्ति को जो भी कुछ पहना दिया जाए वही उसका आभूषण हो जाता है।’ उसके बाद राजा शकुन्तला की सुकुमार देह की तुलना हरी-भरी फूलों से लदी लता के साथ करते हैं, जिससे उस विलक्षण सौदर्य का स्वरूप पाठक की आंखों के सामने चित्रित-सा हो उठता है। इसके बाद उस सौंदर्य की अनुभूति को चरम सीमा पर पहुंचाने के लिए कालिदास एक भ्रमर को ले आए हैं; जो शकुन्तला के मुख को एक सुन्दर खिला हुआ फूल समझकर उसका रसपान करने के लिए उसके ऊपर मंडराने लगता है। इस प्रकार कालिदास ने शकुन्तला के सौंदर्य को चित्रित करने के लिए अंलकारों का सहारा उतना नहीं लिया, जितना कि व्यंजनाशक्ति का; और यह व्यजना-शक्ति ही काव्य की जान मानी जाती है।
शुक्रवार, 10 जून 2011
थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ
थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ
थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ युवा भारतीय लेखक चेतन भगत का तीसरा बेस्टसेलर अंग्रेजी उपन्यास है। यह उपन्यास भारतीय युवा वर्ग की वर्तमान मन: स्थितियों को बारीकी से प्रस्तुत करता है। उपन्यास के केन्द्र में व्यवसाय प्रधान राज्य गुजरात का एक व्यवसायोन्मुख युवक गोविन्द है। आत्महत्या की कोशिशों के बाद बच जाने वाला यह युवक चेतन भगत को अपनी त्रासद कथा सुनाता है, जिसमें तीन घटनाओं में अपनी भागीदारी को वह तीन गलतियों के रूप में चिन्हित करता है। पहली गलती के रूप में धीरे-धीरे जम रहे व्यवसाय को ऊँचे मकाम पर ले जाने के लिए लगाई गई छलाँग को रेखांकित किया जाता है? तो दूसरी गलती के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी से पैदा मुश्किलातों को देखा गया है तीसरी गलती में समय पर एक जरूरी फैसला ना ले पाने से हुई जीवन की हानि को दिखाया जाता है।
युवा मनोविज्ञान की अच्छी समझ है चेतन को, जो संवादों में अपनी बारीकी के साथ अभिव्यक्त होता है। 21वीं सदी का निम्न मध्यवर्गीय युवा किन कठिनाइयों से रोज दो-चार होता है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी हिकमतें आजमाता है और जब उसकी गाडी जरा-सी लाइन पर आती दिखती है कि व्यवस्थाजन्य उत्पात कैसे उसे मरनांतक पीड़ा पहुँचाते हुए नष्ट कर देते हैं। इसका उदाहरण है ओमी-ईशान-गोविन्द की तिकड़ी और विद्या एक चौथा कोण है,जीवन की जिदों के प्रतीक-सी वह जिन्दा रंग भरती है उपन्यास के वीरान सफों में और सबसे ऊपर है क्रिकेटर अली।
भारतीय मानस के हिसाब से चेतन ने सही नाम दिया है उपन्यास को, थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ। पर इसका नाम क्रिकेटर अली भी रखा जा सकता था। बारह साल के इस बच्चे की नीली आँखें जहाँ से इस उपन्यास में चमकनी शुरू होती हैं वहाँ से सारी कथा पीछे छूट जाती है ओर कहानी का एकमात्रा लक्ष्य रह जाता है,इस नन्हे अली को महान् क्रिकेटर बनाने की कथा नायकों की समवेत इच्छा और उनकी अविराम कोशिशें जिसे दंगे की घृणित आग भी जला नहीं पाती। हो क्यों नहीं, अली तो अली है,एक निर्णयक मकाम पर जब अली से अस्ट्रेलिया की नागरिकता स्वीकारने की बाबत पूछा जाता है तो वह साफ इनकार करता हुआ कहता है कि सौ जन्म बाद भी वह एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में ही जीवित रहना पसन्द करेगा।
अली चेतन का आदर्श चरित्रा है? इस चरित्रा के अंकन में चेतन उस अंधता तक जाते हैं जिस तक कोई भी आदर्शवादी लेखक अपनी सच्ची जिद में जा पहुँचता है,इसीलिए यह सम्भव हो पाता है कि अली सा मात्र बारह-तेरह साल का लड़का देशभक्ति का जज्बा जिस तरह दर्शाता है वह सामान्य नहीं लगता। इस तरह का जज्बा उपन्यास के अन्य चरित्रों पर फबता। पर देशभक्ति के आदर्श की यही सीमा भी होती है कि अक्सर वह कच्चे दिमागों में अपनी जडें जमाता है और देश को जनसमूह के रूप में देखने की बजाय एक ईकाई के रूप में देखने लगता है,जैसे एक व्यक्ति के महान् क्रिकेटर बनने में ही जैसे मुल्क का भविष्य छिपा हो। इस तरह देखें तो इस उपन्यास का सबसे प्रभावी हिस्सा छोटी उम्र की कोरी भावुकता को ही तरजीह देता है,जैसे कि बाकी तीन समस्याग्रस्त युवकों का भविष्य यह कोरी भावुक जिद ही तय कर देगी? क्योंकि असली भारत चेतन के ये तीन युवा ही बनाते हैं,और अली चाहे जितने छक्के लगा ले वह इस युवा वर्ग को उनके संकटों के पार नहीं ले जा सकता। इस तरह यह उपन्यास उसी मानसिकता को विज्ञाप्ति करता है जिसे रोज ब रोज के हमारे समाचार पत्रा व चैनल करते हैं जो क्रिकेट को दो देशों की बीच एक जंग के रूप में प्रचारित करते हैंµऔर इस तरह एक नकली जंग में पूरे मुल्क को मुिब्तला रखकर युवा वर्ग को उसके अपने संकटों को दूर करने के सही प्रयासों से भटकाता है।
इन तथ्यों के आलोक में देखें तो लगता है जैसे चेतन एक उपन्यास को बेस्टसेलर बनाने के तमाम गुरों का इस्तेमाल एक ही उपन्यास में कर जाते हैं, व्यवसायी वर्ग,दंगा-क्रिकेट-राष्ट्रवादी और सेकुलर पार्टियों के झगडे,प्रेम व सेक्स के अंतरंग दृश्य, कुल मिलाकर चेतन भारतीय बेस्ट सेलर्स गुलशन नंदा से लेकर धर्मवीर भारती तक ऐसे लेखकों को काफी पीछे छोड़ देते हैं? हिन्दी के उपन्यासों के बरक्स देखा जाए तो वे गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए के मध्य जगह बनाते दिखते हैं। हालाँकि विवरण की बारीकियां चेतन को इन दोनों से अलग पहचान देती हैं पर जहां तक जीवन दृष्टि का सवाल है वह मुझे चांद चाहिए में ज्यादा समर्थ ढंग से अभिव्यक्त होती है।
चेतन के इस उपन्यास पर फिल्म बनने जा रही है। उपन्यास का अन्तिम हिस्सा एक फिल्म की तरह तेजी से घटता है। उसमें कल्पना का प्रयोग अविश्वसनीयता की हद तक किया जाता है। दंगाई भीड़ से जिस तरह तीनों युवा निपटते हैं वह विश्वसनीय नहीं बन पाया है। पर फिल्मों में कुछ भी संभव होता है। इस तरह चेतन उपन्यास के अंत में पटकथा लिखने लगते है। शायद व्यवसायी दिमाग की उपज है यह। अन्त में अली के शाट्स से जिस तरह मुख्य दंगाई मारा जाता है वह उपन्यासकार की व्यवसाय की प्रतिभा का प्रमाण है। चेतन के उपन्यास इस तरह हिन्दी को एक नया पाठक वर्ग भी देंगे। जैसा कि सभी लोकप्रिय रचनाकार देते हैं। उनकी तीनों पुस्तकों के हिन्दी में अनुवाद हो भी चुके हैं? यूँ हिन्दी के युवा रचनाकार चेतन से बहुत-सी बातें सीख सकते हैं,खासकर अपने परिवेश को व अन्तर्मन की बुनावट को अभिव्यक्त करने की उनकी कला?
उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा अली हाईपर-रिपलैक्स नामक एक मनोरोग से ग्रस्त है और चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की वजह से ही अली एक ओवर की शुरू की चार गेंदों पर लगातार छक्के मारने का करतब दिखा पाता है। मनोरोग के साथ जीवन में आगे बढ़ाने की कला भी अली से सीखी जा सकती है। रिपलैक्स एक्शन में दिमाग सोचने की शक्ति और क्रिया को खत्म कर देता है। वह केवल बचाव कर सकता है...इसलिए प्रतिउत्तर का समय बहुत तेज होता है। इस क्षमता का प्रयोग कर अली बॉल की तेजी की पहचान कर उतनी ही तेजी से जवाब दे पाता है?
अपनी कमजोरियों को सकारात्मक तरीके से जानकर उनका सही उपयोग करने की कला ही जीवन की कला है। अली के चरित्रा के द्वारा चेतन इसी बात को सामने रखते हैं। उपन्यास के अन्त में अली की इसी क्षमता का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग कराकर उपन्यासकार अपनी कहानी को एक सुखद अन्त की ओर ले जा पाता है।
प्यार के निहिताथों को भी चेतन सही ढंग से पहचानते हैं। कि प्यार साधारण जीवन स्थितियों को भी अपने सहज स्पर्श से असाधारण बना देता है। विद्या और गोविन्द के प्रेम प्रसंग इसे उचित ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। गोविन्द जब आस्ट्रेलिया जाता है तो वहाँ फोन कर पूछता है कि उसे गिफ्ट के रूप में क्या चाहिए,गोविन्द की गरीबी का ध्यान है विद्या को, सो वह कहती है कि वह समुन्दर किनारे की रेत लेता आए थोड़ी-सी। गोविन्द माचिस में रेत डालकर भारत लाता है तो उसे प्रेम से उटकेरती विद्या देखती है कि रेत में सीपी है एक। फिर वह कहती है,यह ठीक है क्योंकि जीवन के सबसे बेहतरीन तोहफे मुफ्त हैं।
यहाँ महत्त्वपूर्ण बस यह है कि एक ओर जहाँ चेतन प्रेम जैसे बहुआयामी ध्वनि वाले शब्द को उसकी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर बाजारवाद से जूझते दिखते हैं वहीं विद्या,गोविन्द के प्रणय के अतिरिक्त दृश्य यह साबित करते हैं कि वे सतर्कता से बाजार के नुस्खों का ध्यान रखते हैं? क्योंकि पढ़ाई के वक्त प्रेमी शिक्षक और छात्रा जिस कदर यौन क्रिया में मशगूल दिखाए जाते हैं वह सहज नहीं है। और इसके परिणाम भी सही नहीं आते इसे चेतन दूसरी गलती के रूप देखते भी हैं। पर मुझे लगता है यह उपन्यासकार की एकमात्रा गलती है कि वह उपन्यास को फामूर्लाबाजी की हदों में जाने से नहीं बचा पाते। उपन्यास के अन्त में दंगे के दृश्यों को फिल्मी बनाते से चेतन यह गलती दुहराते हैं।
थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ युवा भारतीय लेखक चेतन भगत का तीसरा बेस्टसेलर अंग्रेजी उपन्यास है। यह उपन्यास भारतीय युवा वर्ग की वर्तमान मन: स्थितियों को बारीकी से प्रस्तुत करता है। उपन्यास के केन्द्र में व्यवसाय प्रधान राज्य गुजरात का एक व्यवसायोन्मुख युवक गोविन्द है। आत्महत्या की कोशिशों के बाद बच जाने वाला यह युवक चेतन भगत को अपनी त्रासद कथा सुनाता है, जिसमें तीन घटनाओं में अपनी भागीदारी को वह तीन गलतियों के रूप में चिन्हित करता है। पहली गलती के रूप में धीरे-धीरे जम रहे व्यवसाय को ऊँचे मकाम पर ले जाने के लिए लगाई गई छलाँग को रेखांकित किया जाता है? तो दूसरी गलती के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी के रूप में युवा प्रेमियों में सेक्स के लिए बेताबी से पैदा मुश्किलातों को देखा गया है तीसरी गलती में समय पर एक जरूरी फैसला ना ले पाने से हुई जीवन की हानि को दिखाया जाता है।
युवा मनोविज्ञान की अच्छी समझ है चेतन को, जो संवादों में अपनी बारीकी के साथ अभिव्यक्त होता है। 21वीं सदी का निम्न मध्यवर्गीय युवा किन कठिनाइयों से रोज दो-चार होता है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कैसी-कैसी हिकमतें आजमाता है और जब उसकी गाडी जरा-सी लाइन पर आती दिखती है कि व्यवस्थाजन्य उत्पात कैसे उसे मरनांतक पीड़ा पहुँचाते हुए नष्ट कर देते हैं। इसका उदाहरण है ओमी-ईशान-गोविन्द की तिकड़ी और विद्या एक चौथा कोण है,जीवन की जिदों के प्रतीक-सी वह जिन्दा रंग भरती है उपन्यास के वीरान सफों में और सबसे ऊपर है क्रिकेटर अली।
भारतीय मानस के हिसाब से चेतन ने सही नाम दिया है उपन्यास को, थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाइफ। पर इसका नाम क्रिकेटर अली भी रखा जा सकता था। बारह साल के इस बच्चे की नीली आँखें जहाँ से इस उपन्यास में चमकनी शुरू होती हैं वहाँ से सारी कथा पीछे छूट जाती है ओर कहानी का एकमात्रा लक्ष्य रह जाता है,इस नन्हे अली को महान् क्रिकेटर बनाने की कथा नायकों की समवेत इच्छा और उनकी अविराम कोशिशें जिसे दंगे की घृणित आग भी जला नहीं पाती। हो क्यों नहीं, अली तो अली है,एक निर्णयक मकाम पर जब अली से अस्ट्रेलिया की नागरिकता स्वीकारने की बाबत पूछा जाता है तो वह साफ इनकार करता हुआ कहता है कि सौ जन्म बाद भी वह एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में ही जीवित रहना पसन्द करेगा।
अली चेतन का आदर्श चरित्रा है? इस चरित्रा के अंकन में चेतन उस अंधता तक जाते हैं जिस तक कोई भी आदर्शवादी लेखक अपनी सच्ची जिद में जा पहुँचता है,इसीलिए यह सम्भव हो पाता है कि अली सा मात्र बारह-तेरह साल का लड़का देशभक्ति का जज्बा जिस तरह दर्शाता है वह सामान्य नहीं लगता। इस तरह का जज्बा उपन्यास के अन्य चरित्रों पर फबता। पर देशभक्ति के आदर्श की यही सीमा भी होती है कि अक्सर वह कच्चे दिमागों में अपनी जडें जमाता है और देश को जनसमूह के रूप में देखने की बजाय एक ईकाई के रूप में देखने लगता है,जैसे एक व्यक्ति के महान् क्रिकेटर बनने में ही जैसे मुल्क का भविष्य छिपा हो। इस तरह देखें तो इस उपन्यास का सबसे प्रभावी हिस्सा छोटी उम्र की कोरी भावुकता को ही तरजीह देता है,जैसे कि बाकी तीन समस्याग्रस्त युवकों का भविष्य यह कोरी भावुक जिद ही तय कर देगी? क्योंकि असली भारत चेतन के ये तीन युवा ही बनाते हैं,और अली चाहे जितने छक्के लगा ले वह इस युवा वर्ग को उनके संकटों के पार नहीं ले जा सकता। इस तरह यह उपन्यास उसी मानसिकता को विज्ञाप्ति करता है जिसे रोज ब रोज के हमारे समाचार पत्रा व चैनल करते हैं जो क्रिकेट को दो देशों की बीच एक जंग के रूप में प्रचारित करते हैंµऔर इस तरह एक नकली जंग में पूरे मुल्क को मुिब्तला रखकर युवा वर्ग को उसके अपने संकटों को दूर करने के सही प्रयासों से भटकाता है।
इन तथ्यों के आलोक में देखें तो लगता है जैसे चेतन एक उपन्यास को बेस्टसेलर बनाने के तमाम गुरों का इस्तेमाल एक ही उपन्यास में कर जाते हैं, व्यवसायी वर्ग,दंगा-क्रिकेट-राष्ट्रवादी और सेकुलर पार्टियों के झगडे,प्रेम व सेक्स के अंतरंग दृश्य, कुल मिलाकर चेतन भारतीय बेस्ट सेलर्स गुलशन नंदा से लेकर धर्मवीर भारती तक ऐसे लेखकों को काफी पीछे छोड़ देते हैं? हिन्दी के उपन्यासों के बरक्स देखा जाए तो वे गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए के मध्य जगह बनाते दिखते हैं। हालाँकि विवरण की बारीकियां चेतन को इन दोनों से अलग पहचान देती हैं पर जहां तक जीवन दृष्टि का सवाल है वह मुझे चांद चाहिए में ज्यादा समर्थ ढंग से अभिव्यक्त होती है।
चेतन के इस उपन्यास पर फिल्म बनने जा रही है। उपन्यास का अन्तिम हिस्सा एक फिल्म की तरह तेजी से घटता है। उसमें कल्पना का प्रयोग अविश्वसनीयता की हद तक किया जाता है। दंगाई भीड़ से जिस तरह तीनों युवा निपटते हैं वह विश्वसनीय नहीं बन पाया है। पर फिल्मों में कुछ भी संभव होता है। इस तरह चेतन उपन्यास के अंत में पटकथा लिखने लगते है। शायद व्यवसायी दिमाग की उपज है यह। अन्त में अली के शाट्स से जिस तरह मुख्य दंगाई मारा जाता है वह उपन्यासकार की व्यवसाय की प्रतिभा का प्रमाण है। चेतन के उपन्यास इस तरह हिन्दी को एक नया पाठक वर्ग भी देंगे। जैसा कि सभी लोकप्रिय रचनाकार देते हैं। उनकी तीनों पुस्तकों के हिन्दी में अनुवाद हो भी चुके हैं? यूँ हिन्दी के युवा रचनाकार चेतन से बहुत-सी बातें सीख सकते हैं,खासकर अपने परिवेश को व अन्तर्मन की बुनावट को अभिव्यक्त करने की उनकी कला?
उपन्यास का केन्द्रीय पात्रा अली हाईपर-रिपलैक्स नामक एक मनोरोग से ग्रस्त है और चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी की वजह से ही अली एक ओवर की शुरू की चार गेंदों पर लगातार छक्के मारने का करतब दिखा पाता है। मनोरोग के साथ जीवन में आगे बढ़ाने की कला भी अली से सीखी जा सकती है। रिपलैक्स एक्शन में दिमाग सोचने की शक्ति और क्रिया को खत्म कर देता है। वह केवल बचाव कर सकता है...इसलिए प्रतिउत्तर का समय बहुत तेज होता है। इस क्षमता का प्रयोग कर अली बॉल की तेजी की पहचान कर उतनी ही तेजी से जवाब दे पाता है?
अपनी कमजोरियों को सकारात्मक तरीके से जानकर उनका सही उपयोग करने की कला ही जीवन की कला है। अली के चरित्रा के द्वारा चेतन इसी बात को सामने रखते हैं। उपन्यास के अन्त में अली की इसी क्षमता का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग कराकर उपन्यासकार अपनी कहानी को एक सुखद अन्त की ओर ले जा पाता है।
प्यार के निहिताथों को भी चेतन सही ढंग से पहचानते हैं। कि प्यार साधारण जीवन स्थितियों को भी अपने सहज स्पर्श से असाधारण बना देता है। विद्या और गोविन्द के प्रेम प्रसंग इसे उचित ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। गोविन्द जब आस्ट्रेलिया जाता है तो वहाँ फोन कर पूछता है कि उसे गिफ्ट के रूप में क्या चाहिए,गोविन्द की गरीबी का ध्यान है विद्या को, सो वह कहती है कि वह समुन्दर किनारे की रेत लेता आए थोड़ी-सी। गोविन्द माचिस में रेत डालकर भारत लाता है तो उसे प्रेम से उटकेरती विद्या देखती है कि रेत में सीपी है एक। फिर वह कहती है,यह ठीक है क्योंकि जीवन के सबसे बेहतरीन तोहफे मुफ्त हैं।
यहाँ महत्त्वपूर्ण बस यह है कि एक ओर जहाँ चेतन प्रेम जैसे बहुआयामी ध्वनि वाले शब्द को उसकी ताकत के साथ अभिव्यक्त कर बाजारवाद से जूझते दिखते हैं वहीं विद्या,गोविन्द के प्रणय के अतिरिक्त दृश्य यह साबित करते हैं कि वे सतर्कता से बाजार के नुस्खों का ध्यान रखते हैं? क्योंकि पढ़ाई के वक्त प्रेमी शिक्षक और छात्रा जिस कदर यौन क्रिया में मशगूल दिखाए जाते हैं वह सहज नहीं है। और इसके परिणाम भी सही नहीं आते इसे चेतन दूसरी गलती के रूप देखते भी हैं। पर मुझे लगता है यह उपन्यासकार की एकमात्रा गलती है कि वह उपन्यास को फामूर्लाबाजी की हदों में जाने से नहीं बचा पाते। उपन्यास के अन्त में दंगे के दृश्यों को फिल्मी बनाते से चेतन यह गलती दुहराते हैं।
हुक्म मेरे आका
कायनात कहेगी, हुक्म मेरे आका
संजय खाती
जिंदगी में जोश भरने वाली किताबों का जैसा चलन हाल के बरसों में दिखा है, वह लाजवाब है। पुराने जमाने में हमारी मदद के लिए सिर्फ धर्म होता था। हालांकि डेल कार्नेगी, स्वेट मार्डेन और विन्सेंट पील की किताबों से लोगों ने अपनी जिंदगी को पॉजिटिव मोड़ देने की कोशिश शुरू कर दी थी, लेकिन इस ट्रेंड ने जोर तब पकड़ा, जब वेस्टर्न स्टाइल यहां भी आम होने लगी। यंग प्रफेशनल्स के लिए धार्मिक प्रवचन उतने आसान और नजदीक नहीं थे। वे मॉडर्न स्टाइल में जो प्रेरणाएं चाहते थे, वे उन्हें इन किताबों में मिलीं। आज चिकन सूप फॉर सोल जैसी किताबों का बिजनेस करोड़ों डॉलर का है। बहरहाल, इस कैटिगरी की सबसे पॉपुलर या फिर विवादित किताब अलकेमिस्ट रही। ओम शांति ओम फिल्म में शाहरुख के डायलॉग के बाद हमारे यहां कई लोगों का ध्यान इसकी ओर गया, लेकिन तब तक यह पूरी दुनिया में फेमस हो चुकी थी। अलकेमिस्ट की थीम या मेसेज है - अगर आप किसी चीज को पूरी शिद्दत से चाहते हैं, तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने की तैयारी में जुट जाती है। अलकेमिस्ट के कुछ बरस बाद एक और किताब आई - द सीक्रेट। इसमें बताया गया है कि दुनिया में एक ऐसा रहस्य है, जिसे सदियों से दबाया जाता रहा, लेकिन हर महान शख्स को इसका पता था। द सीक्रेट इस सबसे बड़े राज को हम सबके लिए खोलने का दावा करती है और वह राज है : आप अपनी दुनिया खुद बनाते हैं। सब कुछ वैसे ही होगा, जैसा आप चाहेंगे, इसलिए वह सब कुदरत से मांगिए, जिसकी आपको चाहत है - पैसा, शोहरत और प्यार, कुछ भी।
अलकेमिस्ट और द सीक्रेट की थीम एक ही है - कायनात आपके हुक्म का पालन करती है, बस आपको हुक्म देना आना चाहिए। अलकेमिस्ट में यह बात वैसे भड़काऊ तरीके से नहीं कही गई, जैसे द सीक्रेट में, लेकिन ये दोनों किताबें मोटिवेशन और सेल्फ हेल्प की तमाम बिरादरी से अलग हो जाती हैं, क्योंकि ये सीधे-सीधे खुशी की गारंटी देने लगती हैं।
मैंने अलकेमिस्ट पढ़ी और द सीक्रेट पर बनी एक फिल्म देखी। सोचने की बीमारी वाले तमाम लोगों की तरह मेरे मन में भी यह खयाल आया - क्या ऐसा मुमकिन है? क्या महज सोचने भर से कोई भी ख्वाहिश पूरी हो सकती है? क्या दुनियावी तौर पर कामयाब हो जाना इतना आसान है? क्या हमारे हाथ अलादीन का चिराग लग गया है?
क्या ये किताबें महज शोशेबाजी हैं या फिर इनके लेखकों को सचमुच में खुदा का पैगाम सुनने का मौका मिला है? मैंने इन किताबों के कट्टर प्रशंसकों की बातें सुनी हैं। मैंने कई कॉरपोरेट लीडर्स को इन्हें अपनी रीडिंग लिस्ट में गिनाते पाया है। क्या इन किताबों ने अपनी लफ्फाजी से उन लोगों को बेवकूफ बना लिया है?
क्या कुदरत को हु्क्म देने के इस फॉर्म्युले की साइंटिफिक जांच मुमकिन है? इन किताबों का यह दावा मुझे सही लगता है कि सारी कायनात एक सिस्टम में बंधी हुई है। हम और सब कुछ दरअसल एक हैं, इसलिए हमारे विचार कुदरत से रिएक्शन कर सकते हैं और काफी हद तक उस पर असर भी डाल सकते हैं। लेकिन यह असर हमारी बड़ी-से-बड़ी कल्पना को सच में बदलने के लिए घटनाओं को मोड़ने की ताकत रखता है, यह बड़ा सवाल है।
क्या कुदरत की चेतना होने के नाते हमें यह पावर हासिल है, इस सवाल का जवाब मुझे नहीं मिलता। और जब मैं यह देखता हूं कि किसी चमत्कारिक ईश्वर को बीच में न लाते हुए भी इन किताबों ने तमाम संदेहों से परे चले जाने की जो शर्त रखी है, वह इन्हें धर्म के बराबर पहुंचा देती है -जरा भी संदेह रखा तो कुछ हासिल नहीं होगा, यानी अगर आपकी ख्वाहिश पूरी नहीं हुई तो हमारे फॉर्म्युले में नहीं, आपकी निष्ठा में ही कोई खोट रहा होगा।
यह एक ट्रिकी बात है, जो इन किताबों के दावों को साइंटिफिक जांच से परे कर देती है। लेकिन जब मैं यह सोच रहा था, तभी अचानक मुझे हकीकत की झलक मिल गई।
अलकेमिस्ट और द सीक्रेट महज इसलिए हिट नहीं हैं कि वे आपकी ख्वाहिश पूरी करने की गारंटी देती हैं, वे इसलिए इतनी पॉपुलर हैं कि वे आपको इसका सपना देखने की ताकत देती हैं। वे हमें जिंदगी में पॉजिटिव को अपनाना सिखाती हैं। उजाले को देखो, यह तमाम लोग कहते हैं, लेकिन ये किताबें इस उजाले को हमारे स्वार्थ का हिस्सा बनाकर उसे देखने और लंबे अरसे तक देखते रहने की आदत डाल देती हैं।
संजय खाती
जिंदगी में जोश भरने वाली किताबों का जैसा चलन हाल के बरसों में दिखा है, वह लाजवाब है। पुराने जमाने में हमारी मदद के लिए सिर्फ धर्म होता था। हालांकि डेल कार्नेगी, स्वेट मार्डेन और विन्सेंट पील की किताबों से लोगों ने अपनी जिंदगी को पॉजिटिव मोड़ देने की कोशिश शुरू कर दी थी, लेकिन इस ट्रेंड ने जोर तब पकड़ा, जब वेस्टर्न स्टाइल यहां भी आम होने लगी। यंग प्रफेशनल्स के लिए धार्मिक प्रवचन उतने आसान और नजदीक नहीं थे। वे मॉडर्न स्टाइल में जो प्रेरणाएं चाहते थे, वे उन्हें इन किताबों में मिलीं। आज चिकन सूप फॉर सोल जैसी किताबों का बिजनेस करोड़ों डॉलर का है। बहरहाल, इस कैटिगरी की सबसे पॉपुलर या फिर विवादित किताब अलकेमिस्ट रही। ओम शांति ओम फिल्म में शाहरुख के डायलॉग के बाद हमारे यहां कई लोगों का ध्यान इसकी ओर गया, लेकिन तब तक यह पूरी दुनिया में फेमस हो चुकी थी। अलकेमिस्ट की थीम या मेसेज है - अगर आप किसी चीज को पूरी शिद्दत से चाहते हैं, तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलाने की तैयारी में जुट जाती है। अलकेमिस्ट के कुछ बरस बाद एक और किताब आई - द सीक्रेट। इसमें बताया गया है कि दुनिया में एक ऐसा रहस्य है, जिसे सदियों से दबाया जाता रहा, लेकिन हर महान शख्स को इसका पता था। द सीक्रेट इस सबसे बड़े राज को हम सबके लिए खोलने का दावा करती है और वह राज है : आप अपनी दुनिया खुद बनाते हैं। सब कुछ वैसे ही होगा, जैसा आप चाहेंगे, इसलिए वह सब कुदरत से मांगिए, जिसकी आपको चाहत है - पैसा, शोहरत और प्यार, कुछ भी।
अलकेमिस्ट और द सीक्रेट की थीम एक ही है - कायनात आपके हुक्म का पालन करती है, बस आपको हुक्म देना आना चाहिए। अलकेमिस्ट में यह बात वैसे भड़काऊ तरीके से नहीं कही गई, जैसे द सीक्रेट में, लेकिन ये दोनों किताबें मोटिवेशन और सेल्फ हेल्प की तमाम बिरादरी से अलग हो जाती हैं, क्योंकि ये सीधे-सीधे खुशी की गारंटी देने लगती हैं।
मैंने अलकेमिस्ट पढ़ी और द सीक्रेट पर बनी एक फिल्म देखी। सोचने की बीमारी वाले तमाम लोगों की तरह मेरे मन में भी यह खयाल आया - क्या ऐसा मुमकिन है? क्या महज सोचने भर से कोई भी ख्वाहिश पूरी हो सकती है? क्या दुनियावी तौर पर कामयाब हो जाना इतना आसान है? क्या हमारे हाथ अलादीन का चिराग लग गया है?
क्या ये किताबें महज शोशेबाजी हैं या फिर इनके लेखकों को सचमुच में खुदा का पैगाम सुनने का मौका मिला है? मैंने इन किताबों के कट्टर प्रशंसकों की बातें सुनी हैं। मैंने कई कॉरपोरेट लीडर्स को इन्हें अपनी रीडिंग लिस्ट में गिनाते पाया है। क्या इन किताबों ने अपनी लफ्फाजी से उन लोगों को बेवकूफ बना लिया है?
क्या कुदरत को हु्क्म देने के इस फॉर्म्युले की साइंटिफिक जांच मुमकिन है? इन किताबों का यह दावा मुझे सही लगता है कि सारी कायनात एक सिस्टम में बंधी हुई है। हम और सब कुछ दरअसल एक हैं, इसलिए हमारे विचार कुदरत से रिएक्शन कर सकते हैं और काफी हद तक उस पर असर भी डाल सकते हैं। लेकिन यह असर हमारी बड़ी-से-बड़ी कल्पना को सच में बदलने के लिए घटनाओं को मोड़ने की ताकत रखता है, यह बड़ा सवाल है।
क्या कुदरत की चेतना होने के नाते हमें यह पावर हासिल है, इस सवाल का जवाब मुझे नहीं मिलता। और जब मैं यह देखता हूं कि किसी चमत्कारिक ईश्वर को बीच में न लाते हुए भी इन किताबों ने तमाम संदेहों से परे चले जाने की जो शर्त रखी है, वह इन्हें धर्म के बराबर पहुंचा देती है -जरा भी संदेह रखा तो कुछ हासिल नहीं होगा, यानी अगर आपकी ख्वाहिश पूरी नहीं हुई तो हमारे फॉर्म्युले में नहीं, आपकी निष्ठा में ही कोई खोट रहा होगा।
यह एक ट्रिकी बात है, जो इन किताबों के दावों को साइंटिफिक जांच से परे कर देती है। लेकिन जब मैं यह सोच रहा था, तभी अचानक मुझे हकीकत की झलक मिल गई।
अलकेमिस्ट और द सीक्रेट महज इसलिए हिट नहीं हैं कि वे आपकी ख्वाहिश पूरी करने की गारंटी देती हैं, वे इसलिए इतनी पॉपुलर हैं कि वे आपको इसका सपना देखने की ताकत देती हैं। वे हमें जिंदगी में पॉजिटिव को अपनाना सिखाती हैं। उजाले को देखो, यह तमाम लोग कहते हैं, लेकिन ये किताबें इस उजाले को हमारे स्वार्थ का हिस्सा बनाकर उसे देखने और लंबे अरसे तक देखते रहने की आदत डाल देती हैं।
रविवार, 24 अप्रैल 2011
प्रेस वाले की बच्ची ….
प्रेस वाले की बच्ची ….
बहुत अच्छी कहानी है। इसे मैंने जागरण जंक्शन से लिया है। इस कहानी में बताया गया है कि जो वस्तु हमें प्राप्य होती है, उस की महत्ता हमारे पास कम होती है, लेकिन वह दूसरों के लिए अनमोल होती है। इस कारण यदि कोई वस्तु आपको अच्छी नहीं लग रही है, तो कोई कारण नहीं कि वह दूसरों के लिए प्रिय न हो।
अभी कुछ दिनों पहले हम अपने पुराने घर से नए घर में आये है ……….जब तक अपना घर न ले लो तब तक किराए के घर में रहने की वजह से ये उठा-पटक तो करनी ही पड़ती है ……….खैर मुझे कोई ख़ास ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि शादी के पहले डैडी के स्थानान्तरण की वजह से घर बदलने की आदत हो चुकी है ………और दिल्ली जसी बड़े महानगर में तो हर किसी को इसकी आदत है क्योंकि यहाँ हर कोई हमारी तरह अपना फ्लैट बुक कर देता है और फिर उसके मिलने के इंतज़ार में किराये के घर का किराया भी देता है और बुक किये हुए घर की इ.ऍम. आई. भी भरता रहता है ……….और जब तक अपना घर ना मिले एक घर से दुसरे घरो के मज़े लेता रहता है ……फिर वो किराये के ही क्यों ना हो ……. पर इस घर की सबसे ख़ास बात ये है की इस घर के सामने हरा भर पार्क है ……शाम को इस पार्क में ढेर सारे बच्चे अपनी माँ या दादी दादा के साथ खेलने आते है …….मै भी अपने नन्हे-मुन्ने को लेकर यहाँ चली जाती हूँ………इस बहाने थोड़ी देर वो मुझे परेशान नहीं करता है क्योंकि जबसे चलने लगा है तबसे तो पूछिए मत की क्या क्या करता है ये ब्लॉग भी छोटा पड़ जाएगा लेकिन उसकी बदमाशियों की लिस्ट नहीं ख़त्म होगी …….पार्क में जब सारे बच्चे उछल कूद मचाना शुरू करते है तो वो नज़ारा देखने लायक होता है, सारे बच्चो को अपने खिलोनो से नहीं दुसरे बच्चे के खिलोनो से ही खेलना है ……… इसी पार्क के सामने एक प्रेस वाला प्रेस करता है और वही अपने परिवार के साथ रहता भी है ……….उसकी ७-८ साल की एक लड़की है जो मुझे पूरे समय पार्क में ही नज़र आती है ………. जैसे ही वो किसी भी छोटे बच्चे को देखती है , मेरा प्यारा बाबु कहते हुए उसे गोद में उठा लेती है और फिर उसके साथ खेलने लगती है , वो बच्चा अपने साथ कोई न कोई खिलोना लिया ही होता है जैसे बेट बाल या कोई और ……….. और वो प्रेस वाले की बच्ची दौड़ दौड़ कर उसके साथ बेट बाल खेलने लग जाती है और फिर जैसे ही कोई और बच्चा दूसरी नयी बड़ी बाल लेके आता है वो दौड़ कर उसके पास भाग कर चली जाती है ……और अगर वो बच्चा उसे बाल नहीं देता है तो बैठे बैठे बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे बाल के साथ खेलते हुए देखने लगती है कोई जिद नहीं कोई गुस्सा नहीं ……………. गरीबो के बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते है लेकिन दबे छुपे उनमे कहीं कहीं उनका बचपना छुपा ही रहता है जो कभी कभी नज़र आ जाता है,………लेकिन अक्सर बच्चो की माये उसे खिलोनो के साथ खेलने देती है क्योंकि खिलोनो के खेलने के साथ साथ वो उनके बच्चो को भी देखती रहती है और माँ लोग आराम से पार्क में बैठ कर थोडा बतिया लेती है…. छोटे बच्चो को खिलाने के बहाने वो भी उनके साथ खिलोनो को खेलने का शौक पूरा कर लेती है, वो खिलोने जो उसे उसके माँ बाप नहीं दिला पाते है….इए तरह वो खिलोने उसके लिए किराए के खिलोने ही हो जाते है ………………कैसी विडम्बना है जिसके पास जो चीज़ होती है उसे उसकी अहमियत नहीं होती है, मेरे बच्चे के पास खिलोने है तो वो पार्क में जाते ही उन्हें छुता तक नहीं है वो पेड़ पौधो मिटटी घास के साथ खेलना चाहता है और बेट बाल से वो प्रेस वाले की बच्ची खेलती है …….इस तरह वो थोड़ी देर के लिए अपने बचपन को जी लेती है नहीं तो आधे समय तो वो अपने छोटे भाई को संभालती है और आधे समय लोगो के घर प्रेस किये हुए कपडे या तो पहुंचाने जाती है या प्रेस के लिए कपडे लेने जाती है ………….लेकिन पार्क में बच्चो के आते ही दौड़ कर आ जाती है और थोड़ी देर के लिए उन्हें बेट बाल के साथ खिलाते हुए अपना बचपन भी जी लेती है ……..उसे और उस जैसे कई बच्चो को देखते ही मन में पीड़ा के साथ साथ टीस भी उठती है , टीस कुछ न कर पाने की …………हमारी ज़िन्दगी में ऐसे कई काम है जिन्हें हम करना चाहते है पर कर नहीं पाते है कभी कोई मजबूरी होती है और कभी ये की आखिर वो काम कैसे किया जाए …………….. लेकिन कुछ पल ही सही उन किराये के खिलोनो से खेल कर वो बच्ची खुश हो लेती है ……………ठीक उसी तरह जिस तरह हम किराए के घरो में रह कर अपने घर का सुख पा लेते है ……………….
बहुत अच्छी कहानी है। इसे मैंने जागरण जंक्शन से लिया है। इस कहानी में बताया गया है कि जो वस्तु हमें प्राप्य होती है, उस की महत्ता हमारे पास कम होती है, लेकिन वह दूसरों के लिए अनमोल होती है। इस कारण यदि कोई वस्तु आपको अच्छी नहीं लग रही है, तो कोई कारण नहीं कि वह दूसरों के लिए प्रिय न हो।
अभी कुछ दिनों पहले हम अपने पुराने घर से नए घर में आये है ……….जब तक अपना घर न ले लो तब तक किराए के घर में रहने की वजह से ये उठा-पटक तो करनी ही पड़ती है ……….खैर मुझे कोई ख़ास ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि शादी के पहले डैडी के स्थानान्तरण की वजह से घर बदलने की आदत हो चुकी है ………और दिल्ली जसी बड़े महानगर में तो हर किसी को इसकी आदत है क्योंकि यहाँ हर कोई हमारी तरह अपना फ्लैट बुक कर देता है और फिर उसके मिलने के इंतज़ार में किराये के घर का किराया भी देता है और बुक किये हुए घर की इ.ऍम. आई. भी भरता रहता है ……….और जब तक अपना घर ना मिले एक घर से दुसरे घरो के मज़े लेता रहता है ……फिर वो किराये के ही क्यों ना हो ……. पर इस घर की सबसे ख़ास बात ये है की इस घर के सामने हरा भर पार्क है ……शाम को इस पार्क में ढेर सारे बच्चे अपनी माँ या दादी दादा के साथ खेलने आते है …….मै भी अपने नन्हे-मुन्ने को लेकर यहाँ चली जाती हूँ………इस बहाने थोड़ी देर वो मुझे परेशान नहीं करता है क्योंकि जबसे चलने लगा है तबसे तो पूछिए मत की क्या क्या करता है ये ब्लॉग भी छोटा पड़ जाएगा लेकिन उसकी बदमाशियों की लिस्ट नहीं ख़त्म होगी …….पार्क में जब सारे बच्चे उछल कूद मचाना शुरू करते है तो वो नज़ारा देखने लायक होता है, सारे बच्चो को अपने खिलोनो से नहीं दुसरे बच्चे के खिलोनो से ही खेलना है ……… इसी पार्क के सामने एक प्रेस वाला प्रेस करता है और वही अपने परिवार के साथ रहता भी है ……….उसकी ७-८ साल की एक लड़की है जो मुझे पूरे समय पार्क में ही नज़र आती है ………. जैसे ही वो किसी भी छोटे बच्चे को देखती है , मेरा प्यारा बाबु कहते हुए उसे गोद में उठा लेती है और फिर उसके साथ खेलने लगती है , वो बच्चा अपने साथ कोई न कोई खिलोना लिया ही होता है जैसे बेट बाल या कोई और ……….. और वो प्रेस वाले की बच्ची दौड़ दौड़ कर उसके साथ बेट बाल खेलने लग जाती है और फिर जैसे ही कोई और बच्चा दूसरी नयी बड़ी बाल लेके आता है वो दौड़ कर उसके पास भाग कर चली जाती है ……और अगर वो बच्चा उसे बाल नहीं देता है तो बैठे बैठे बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे बाल के साथ खेलते हुए देखने लगती है कोई जिद नहीं कोई गुस्सा नहीं ……………. गरीबो के बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते है लेकिन दबे छुपे उनमे कहीं कहीं उनका बचपना छुपा ही रहता है जो कभी कभी नज़र आ जाता है,………लेकिन अक्सर बच्चो की माये उसे खिलोनो के साथ खेलने देती है क्योंकि खिलोनो के खेलने के साथ साथ वो उनके बच्चो को भी देखती रहती है और माँ लोग आराम से पार्क में बैठ कर थोडा बतिया लेती है…. छोटे बच्चो को खिलाने के बहाने वो भी उनके साथ खिलोनो को खेलने का शौक पूरा कर लेती है, वो खिलोने जो उसे उसके माँ बाप नहीं दिला पाते है….इए तरह वो खिलोने उसके लिए किराए के खिलोने ही हो जाते है ………………कैसी विडम्बना है जिसके पास जो चीज़ होती है उसे उसकी अहमियत नहीं होती है, मेरे बच्चे के पास खिलोने है तो वो पार्क में जाते ही उन्हें छुता तक नहीं है वो पेड़ पौधो मिटटी घास के साथ खेलना चाहता है और बेट बाल से वो प्रेस वाले की बच्ची खेलती है …….इस तरह वो थोड़ी देर के लिए अपने बचपन को जी लेती है नहीं तो आधे समय तो वो अपने छोटे भाई को संभालती है और आधे समय लोगो के घर प्रेस किये हुए कपडे या तो पहुंचाने जाती है या प्रेस के लिए कपडे लेने जाती है ………….लेकिन पार्क में बच्चो के आते ही दौड़ कर आ जाती है और थोड़ी देर के लिए उन्हें बेट बाल के साथ खिलाते हुए अपना बचपन भी जी लेती है ……..उसे और उस जैसे कई बच्चो को देखते ही मन में पीड़ा के साथ साथ टीस भी उठती है , टीस कुछ न कर पाने की …………हमारी ज़िन्दगी में ऐसे कई काम है जिन्हें हम करना चाहते है पर कर नहीं पाते है कभी कोई मजबूरी होती है और कभी ये की आखिर वो काम कैसे किया जाए …………….. लेकिन कुछ पल ही सही उन किराये के खिलोनो से खेल कर वो बच्ची खुश हो लेती है ……………ठीक उसी तरह जिस तरह हम किराए के घरो में रह कर अपने घर का सुख पा लेते है ……………….
दिल को देखो, चेहरा न देखो
दिल को देखो, चेहरा न देखो
आजकल सभी चेहरे पर फिदा हैं, सुंदर चेहरा मिलने पर भी कुछ दिनों के बाद दुखी हो जाते हैं और तालाक भी हो जाते हैं। मैने इस तरह की घटनाएं काफी पढी है। आखिर क्या कारण है कि सुंदर चेहरे भी बेनकाब हो जाते हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी यदि सुंदर चेहरे की जगह गुण को देखा जाए तो वही महिला बेहतर जीवन संगिनी हो सकती है। यह बात हम नहीं हमारे पूर्वज भी कहते आए हैं। प्रेमचंद की कहानी भी तो यही कह रही है। इस कहानी में इन्होंने बताया है कि वासना की भूख थोडी देर के लिए होती है, लेकिन उसका पछतावा जिंदगी भर होता है। शारीरिक सुंदरता की भी सीमाएं हैं। जब तक रूप यौवन है, हो सकता है कि लोग आपको पूछे, लेकिन इससे जीवन नहीं चल सकता। जीवन तभी सफल हो सकता है, जब आप उसकी गुणों के आधार पर उसके साथ न्याय करेंगे। वैसे भी एक बात कहुं, तो सुंदरता भी बला क्या बुरी चीज है, जिसने भी नजर डाली, बुरी नजर डाली
विपिन बाबू के लिए स्त्री ही संसार की सुन्दर वस्तु थी। वह कवि थे और उनकी कविता के लिए स्त्रियों के रुप और यौवन की प्रशंसा ही सबसे चित्ताकर्षक विषय था। उनकी दृष्टि में स्त्री जगत में व्याप्त कोमलता, माधुर्य और अलंकारों की सजीव प्रतिमा थी। जबान पर स्त्री का नाम आते ही उनकी आंखे जगमगा उठती थीं, कान खड़े हो जाते थे, मानो किसी रसिक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला, तभी से उन्होंने उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरु की जो उसके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की चमक, बसंत की छवि, कोयल की ध्वनि—वह कवि वर्णित सभी उपमाओं से विभूषित होगी। वह उस कल्पित मूत्रि के उपासक थे, कविताओं में उसका गुण गाते, वह दिन भी समीप आ गया था, जब उनकी आशाएं हरे-हरे पत्तों से लहरायेंगी, उनकी मुरादें पूरी हो होगी। कालेज की अंतिम परीक्षा समाप्त हो गयी थी और विवाह के संदेशे आने लगे थे।
२
विवाह तय हो गया। बिपिन बाबू ने कन्या को देखने का बहुत आग्रह किया, लेकिन जब उनके मांमू ने विश्वास दिलाया कि लड़की बहुत ही रुपवती है, मैंने अपनी आंखों से देखा है, तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात निकली और विवाह का मुहूर्त आया। वधू आभूषणों से सजी हुई मंडप में आयी तो विपिन को उसके हाथ-पांव नजर आये। कितनी सुंदर उंगलिया थीं, मानों दीप-शिखाएं हो, अंगो की शोभा कितनी मनोहारिणी थी। विपिन फूले न समाये। दूसरे दिन वधू विदा हुई तो वह उसके दर्शनों के लिए इतने अधीर हुए कि ज्यों ही रास्ते में कहारों ने पालकी रखकर मुंह-हाथ धोना शुरु किया, आप चुपके से वधू के पास जा पहुंचे। वह घूंघट हटाये, पालकी से सिर निकाले बाहर झांक रही थी। विपिन की निगाह उस पर पड़ गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी जिसकी उन्होने कल्पना की थी, जिसकी वह बरसों से कल्पना कर रहे थे—यह एक चौड़े मुंह, चिपटी नाक, और फुले हुए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी। रंग गोरा था, पर उसमें लाली के बदले सफेदी थी; और फिर रंग कैसा ही सुंदर हो, रुप की कमी नहीं पूरी कर सकता। विपिन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया—हां! इसे मेरे ही गले पड़ना था। क्या इसके लिए समस्त संसार में और कोई न मिलता था? उन्हें अपने मांमू पर क्रोध आया जिसने वधू की तारीफों के पुल बांध दिये थे। अगर इस वक्त वह मिल जाते तो विपिन उनकी ऐसी खबर लेता कि वह भी याद करते।
जब कहारों ने फिर पालकियां उठायीं तो विपिन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के साथ कैसे मैं बोलूगा, कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरुपा स्त्रियां भी संसार में हैं, इसका मुझे अब तक पता न था। क्या मुंह ईश्वर ने बनाया है, क्या आंखे है! मैं और सारे ऐबों की ओर से आंखे बंद कर लेता, लेकिन वह चौड़ा-सा मुंह! भगवान्! क्या तुम्हें मुझी पर यह वज्रपात करना था?३
विपिन को अपना जीवन नरक-सा जान पड़ता था। वह अपने मांमू से लड़ा। ससुर को लंबा ख़त लिखकर फटकारा, मां-बाप से हुज्जत की और जब इससे शांति न हुई तो कहीं भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवश्य आती थी। वह अपने का समझाता कि इसमें उस बेचारी का क्या दोष है, उसने जबरदस्ती तो मुझसे विवाह किया नहीं। लेकिन यह दया और यह विचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके रोम-रोम में व्याप्त हो जाती थी। आशा अपने अच्छे-से-अच्छे कपड़े पहनती; तरह-तरह से बाल संवारती, घंटों आइने के सामने खड़ी होकर अपना श्रृंगार करती, लेकन विपिन को यह शुतुरगमज-से मालूम होते। वह दिल से चाहती थी कि उन्हें प्रसन्न करुं, उनकी सेवा करने के लिए अवसर खोजा करती थी; लेकिन विपिन उससे भागा-भागा फिरता था। अगर कभी भेंट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बातें करने लगता कि आशा रोती हुई वहां से चली जाती।
सबसे बुरी बात यह थी कि उसका चरित्र भ्रष्ट होने लगा। वह यह भूल जाने की चेष्टा करने लगा कि मेरा विवाह हो गया है। कई-कई दिनों तक आशा को उसके दर्शन भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजें बाहर से आती हुई सुनती, झरोखे से देखती कि वह दोस्तों के गले में हाथ डालें सैर करने जा रहे है और तड़प कर रह जाती।एक दिन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दर्शन ही नहीं होतें। मेरे कारण घर छोड़ दीजिएगा क्या ?
विपिन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हूं। आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसलिए दौड़-धूप ज्यादा करनी पड़ती है।
आशा—किसी डाक्टर से मेरी सूरत क्यों नहीं बनवा देते ? सुनती हूं, आजकल सूरत बनाने वाले डाक्टर पैदा हुए है।
विपिन— क्यों नाहक चिढ़ती हो, यहां तुम्हे किसने बुलाया था ?
आशा— आखिर इस मर्ज की दवा कौन करेंगा ?
विपिन— इस मर्ज की दवा नहीं है। जो काम ईश्वर से न करते बना उसे आदमी क्या बना सकता है ?
आशा – यह तो तुम्ही सोचो कि ईश्वर की भूल के लिए मुझे क्यों दंड दे रहे हो। संसार में कौन ऐसा आदमी है जिसे अच्छी सूरत बुरी लगती हो,क्या तुमने किसी मर्द को केवल रुपहीन होने के कारण क्वांरा रहते देखा है, रुपहीन लड़कियां भी मां-बाप के घर नहीं बैठी रहतीं। किसी-न-किसी तरह उनका निर्वाह हो ही जाता है; उसका पति उन पर प्राण भले न देता हो, लेकिन दूध की मक्खी नहीं समझता।
विपिन ने झुंझला कर कहा—क्यों नाहक सिर खाती हो, मै तुमसे बहस तो नहीं कर रहा हूं। दिल पर जब्र नहीं किया जा सकता और न दलीलों का उस पर कोई असर पड़ सकता है। मैं तुम्हे कुछ कहता तो नहीं हूं, फिर तुम क्यों मुझसे हुज्जत करती हो ?
आशा यह झिड़की सुन कर चली गयी। उसे मालूम हो गया कि इन्होने मेरी ओर से सदा के लिए ह्रदय कठोर कर लिया है।
४
विपिन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब रहते। इधर आशा चिंता और नैराश्य से घुलते-घुलते बीमार पड़ गयी। लेकिन विपिन भूल कर भी उसे देखने न आता, सेवा करना तो दूर रहा। इतना ही नहीं, वह दिल में मानता था कि वह मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का विवाह करता।
अब वह और भी खुल गया। पहले आशा से कुछ दबता था, कम-से-कम उसे यह धड़का लगा रहता था कि कोई मेरी चाल-ढाल पर निगाह रखने वाला भी है। अब वह धड़का छुट गया। कुवासनाओं में ऐसा लिप्त हो गया कि मरदाने कमरे में ही जमघटे होने लगे। लेकिन विषय-भोग में केवल धन ही का सर्वनाश नहीं होता, इससे कहीं अधिक बुद्धि और बल का सर्वनाश होता है। विपिन का चेहरा पीला पड़ने लगा, देह भी क्षीण होने लगी, पसलियों की हड्डियां निकल आयीं आंखों के इर्द-गिर्द गड्ढे पड़ गये। अब वह पहले से कहीं ज्यादा शोक करता, नित्य तेल लगाता, बाल बनवाता, कपड़े बदलता, किन्तु मुख पर कांति न थी, रंग-रोगन से क्या हो सकता था?
एक दिन आशा बरामदे में चारपाई पर लेटी हुई थी। इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था। उन्हे देखने की इच्छा हुई। उसे भय था कि वह न आयेंगे, फिर भी वह मन को न रोक सकी। विपिन को बुला भेजा। विपिन को भी उस पर कुछ दया आ गयी। आकर सामने खड़े हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर देखा तो चौक पड़ी। वह इतने दुर्बल हो गये थे कि पहचानना मुश्किल था। बोली—तुम भी बीमार हो क्या? तुम तो मुझसे भी ज्यादा घुल गये हो।
विपिन—उंह, जिंदगी में रखा ही क्या है जिसके लिए जीने की फिक्र करुं !
आशा—जीने की फिक्र न करने से कोई इतना दुबला नहीं हो जाता। तुम अपनी कोई दवा क्यों नहीं कराते?
यह कह कर उसने विपिन का दाहिन हाथ पकड़ कर अपनी चारपाई पर बैठा लिया। विपिन ने भी हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की। उनके स्वाभाव में इस समय एक विचित्र नम्रता थी, जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातों से भी निराशा टपकती थी। अक्खड़पन या क्रोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हुआ कि उनकी आंखो में आंसू भरे हुए है।
विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुम्हें जलाने के लिए नहीं कहता। ईश्वर जानता है, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। मै अब ज्यादा दिनों तक न जिऊंगा। मुझे किसी भयंकर रोग के लक्षण दिखाई दे रहे है। डाक्टर नें भी वही कहा है। मुझे इसका खेद है कि मेरे हाथों तुम्हे कष्ट पहुंचा पर क्षमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा दिल डूब दिल डूब जाता है, मूर्छा-सी आ जाती है।
यह कहतें-कहते एकाएक वह कांप उठे। सारी देह में सनसनी सी दौड़ गयी। मूर्छित हो कर चारपाई पर गिर पड़े और हाथ-पैर पटकने लगे।
मुंह से फिचकुर(झाग) निकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो गयी।
आशा का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनों से बिस्तर न छोड़ सकी थी। पर इस समय उसके शिथिल अंगो में विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। उसने तेजी से उठ कर विपिन को अच्छी तरह लिटा दिया और उनके मुख पर पानी के छींटे देने लगी। महरी भी दौड़ी आयी और पंखा झलने लगी। पर भी विपिन ने आंखें न खोलीं। संध्या होते-होते उनका मुंह टेढ़ा हो गया और बायां अंग शुन्य पड़ गया। हिलाना तो दूर रहा,मुंह से बात निकालना भी मुश्किल हो गया। यह मूर्छा न थी, फालिज था।
५
फालिज के भयंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम नहीं है। उस पर आशा महीनों से बीमार थी। लेकिन उस रोग के सामने वह अपना रोग भूल गई। 15 दिनों तक विपिन की हालत बहुत नाजुक रही। आशा दिन-के-दिन और रात-की-रात उनके पास बैठी रहती। उनके लिए पथ्य बनाना, उन्हें गोद में सम्भाल कर दवा पिलाना, उनके जरा-जरा से इशारों को समझाना उसी जैसी धैयशाली स्त्री का काम था। अपना सिर दर्द से फटा करता, ज्वर से देह तपा करती, पर इसकी उसे जरा भी परवा न थी।
१५ दिनों बाद विपिन की हालत कुछ सम्भली। उनका दाहिना पैर तो लुंज पड़ गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे। सबसे बुरी गत उनके सुन्दर मुख की हुई थी। वह इतना टेढ़ा हो गया था जैसे कोई रबर के खिलौने को खींच कर बढ़ा दें। बैटरी की मदद से जरा देर के लिए बैठे या खड़े तो हो जाते थे; लेकिन चलने−फिरने की ताकत न थी।
एक दिनों लेटे−लेटे उन्हे क्या ख्याल आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरुप आदमी उन्होने कभी न देखा था। आहिस्ता से बोले−−आशा, ईश्वर ने मुझे गरुर की सजा दे दी। वास्तव में मुझे यह उसी बुराई का बदला मिला है, जो मैने तुम्हारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा से मुंह फेर लो तो मुझसे उस दुर्व्यवहार का बदला लो, जो मैने, तुम्हारे साथ किए है।
आशा ने पति की ओर कोमल भाव से देखकर कहा−−मै तो आपको अब भी उसी निगाह से देखती हुं। मुझे तो आप में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता।
६
विपिन−−वाह, बन्दर का−सा मुंह हो गया है, तुम कहती हो कि कोई अन्तर ही नहीं। मैं तो अब कभी बाहर न निकलूंगा। ईश्वर ने मुझे सचमुच दंड दिया।
बहुत यत्न किए गए पर विपिन का मुंह सीधा न हुआ। मुख का बायां भाग इतना टेढ़ा हो गया था कि चेहरा देखकर डर मालूम होता था। हां, पैरों में इतनी शक्ति आ गई कि अब वह चलने−फिरने लगे।
आशा ने पति की बीमारी में देवी की मनौती की थी। आज उसी की पूजा का उत्सव था। मुहल्ले की स्त्रियां बनाव−सिंगार किये जमा थीं। गाना−बजाना हो रहा था।
एक सेहली ने पुछा−−क्यों आशा, अब तो तुम्हें उनका मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा।
आशा ने गम्भीर होकर कहा−−मुझे तो उनका मुख पहले से कही ज्यादा अच्छा लगता है।
‘चलों, बातें बनाती हो।’
‘नही बहन, सच कहती हूँ; रुप के बदले मुझे उनकी आत्मा मिल गई जो रुप से कहीं बढ़कर है।’
विपिन कमरे में बैठे हुए थे। कई मित्र जमा थे। ताश हो रहा था।
कमरे में एक खिड़की थी जो आंगन में खुलती थी। इस वक्त वह बन्द थी। एक मित्र ने उसे चुपके से खोल दिया। एक मित्र ने उसे चुपके दिया और शीशे से झांक कर विपिन से कहा−− आज तो तुम्हारे यहां पारियों का अच्छा जमघट है।
विपिन−−बन्द कर दो।
‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरतें है ! तुम्हे इन सबों में कौन सबसे अच्छी मालूम होती है ?
विपिन ने उड़ती हुई नजरों से देखकर कहा−−मुझे तो वहीं सबसे अच्छी मालूम होती है जो थाल में फूल रख रही है।
‘वाह री आपकी निगाह ! क्या सूरत के साथ तुम्हारी निगाह भी बिगड़ गई? मुझे तो वह सबसे बदसूरत मालूम होती है।’
‘इसलिए कि तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आत्मा देखता हूं।’
‘अच्छा, यही मिसेज विपिन हैं?’
‘जी हां, यह वही देवी है।
आजकल सभी चेहरे पर फिदा हैं, सुंदर चेहरा मिलने पर भी कुछ दिनों के बाद दुखी हो जाते हैं और तालाक भी हो जाते हैं। मैने इस तरह की घटनाएं काफी पढी है। आखिर क्या कारण है कि सुंदर चेहरे भी बेनकाब हो जाते हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी यदि सुंदर चेहरे की जगह गुण को देखा जाए तो वही महिला बेहतर जीवन संगिनी हो सकती है। यह बात हम नहीं हमारे पूर्वज भी कहते आए हैं। प्रेमचंद की कहानी भी तो यही कह रही है। इस कहानी में इन्होंने बताया है कि वासना की भूख थोडी देर के लिए होती है, लेकिन उसका पछतावा जिंदगी भर होता है। शारीरिक सुंदरता की भी सीमाएं हैं। जब तक रूप यौवन है, हो सकता है कि लोग आपको पूछे, लेकिन इससे जीवन नहीं चल सकता। जीवन तभी सफल हो सकता है, जब आप उसकी गुणों के आधार पर उसके साथ न्याय करेंगे। वैसे भी एक बात कहुं, तो सुंदरता भी बला क्या बुरी चीज है, जिसने भी नजर डाली, बुरी नजर डाली
विपिन बाबू के लिए स्त्री ही संसार की सुन्दर वस्तु थी। वह कवि थे और उनकी कविता के लिए स्त्रियों के रुप और यौवन की प्रशंसा ही सबसे चित्ताकर्षक विषय था। उनकी दृष्टि में स्त्री जगत में व्याप्त कोमलता, माधुर्य और अलंकारों की सजीव प्रतिमा थी। जबान पर स्त्री का नाम आते ही उनकी आंखे जगमगा उठती थीं, कान खड़े हो जाते थे, मानो किसी रसिक ने गाने की आवाज सुन ली हो। जब से होश संभाला, तभी से उन्होंने उस सुंदरी की कल्पना करनी शुरु की जो उसके हृदय की रानी होगी; उसमें ऊषा की प्रफुल्लता होगी, पुष्प की कोमलता, कुंदन की चमक, बसंत की छवि, कोयल की ध्वनि—वह कवि वर्णित सभी उपमाओं से विभूषित होगी। वह उस कल्पित मूत्रि के उपासक थे, कविताओं में उसका गुण गाते, वह दिन भी समीप आ गया था, जब उनकी आशाएं हरे-हरे पत्तों से लहरायेंगी, उनकी मुरादें पूरी हो होगी। कालेज की अंतिम परीक्षा समाप्त हो गयी थी और विवाह के संदेशे आने लगे थे।
२
विवाह तय हो गया। बिपिन बाबू ने कन्या को देखने का बहुत आग्रह किया, लेकिन जब उनके मांमू ने विश्वास दिलाया कि लड़की बहुत ही रुपवती है, मैंने अपनी आंखों से देखा है, तब वह राजी हो गये। धूमधाम से बारात निकली और विवाह का मुहूर्त आया। वधू आभूषणों से सजी हुई मंडप में आयी तो विपिन को उसके हाथ-पांव नजर आये। कितनी सुंदर उंगलिया थीं, मानों दीप-शिखाएं हो, अंगो की शोभा कितनी मनोहारिणी थी। विपिन फूले न समाये। दूसरे दिन वधू विदा हुई तो वह उसके दर्शनों के लिए इतने अधीर हुए कि ज्यों ही रास्ते में कहारों ने पालकी रखकर मुंह-हाथ धोना शुरु किया, आप चुपके से वधू के पास जा पहुंचे। वह घूंघट हटाये, पालकी से सिर निकाले बाहर झांक रही थी। विपिन की निगाह उस पर पड़ गयी। यह वह परम सुंदर रमणी न थी जिसकी उन्होने कल्पना की थी, जिसकी वह बरसों से कल्पना कर रहे थे—यह एक चौड़े मुंह, चिपटी नाक, और फुले हुए गालों वाली कुरुपा स्त्री थी। रंग गोरा था, पर उसमें लाली के बदले सफेदी थी; और फिर रंग कैसा ही सुंदर हो, रुप की कमी नहीं पूरी कर सकता। विपिन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया—हां! इसे मेरे ही गले पड़ना था। क्या इसके लिए समस्त संसार में और कोई न मिलता था? उन्हें अपने मांमू पर क्रोध आया जिसने वधू की तारीफों के पुल बांध दिये थे। अगर इस वक्त वह मिल जाते तो विपिन उनकी ऐसी खबर लेता कि वह भी याद करते।
जब कहारों ने फिर पालकियां उठायीं तो विपिन मन में सोचने लगा, इस स्त्री के साथ कैसे मैं बोलूगा, कैसे इसके साथ जीवन काटंगा। इसकी ओर तो ताकने ही से घृणा होती है। ऐसी कुरुपा स्त्रियां भी संसार में हैं, इसका मुझे अब तक पता न था। क्या मुंह ईश्वर ने बनाया है, क्या आंखे है! मैं और सारे ऐबों की ओर से आंखे बंद कर लेता, लेकिन वह चौड़ा-सा मुंह! भगवान्! क्या तुम्हें मुझी पर यह वज्रपात करना था?३
विपिन को अपना जीवन नरक-सा जान पड़ता था। वह अपने मांमू से लड़ा। ससुर को लंबा ख़त लिखकर फटकारा, मां-बाप से हुज्जत की और जब इससे शांति न हुई तो कहीं भाग जाने की बात सोचने लगा। आशा पर उसे दया अवश्य आती थी। वह अपने का समझाता कि इसमें उस बेचारी का क्या दोष है, उसने जबरदस्ती तो मुझसे विवाह किया नहीं। लेकिन यह दया और यह विचार उस घृणा को न जीत सकता था जो आशा को देखते ही उसके रोम-रोम में व्याप्त हो जाती थी। आशा अपने अच्छे-से-अच्छे कपड़े पहनती; तरह-तरह से बाल संवारती, घंटों आइने के सामने खड़ी होकर अपना श्रृंगार करती, लेकन विपिन को यह शुतुरगमज-से मालूम होते। वह दिल से चाहती थी कि उन्हें प्रसन्न करुं, उनकी सेवा करने के लिए अवसर खोजा करती थी; लेकिन विपिन उससे भागा-भागा फिरता था। अगर कभी भेंट हो जाती तो कुछ ऐसी जली-कटी बातें करने लगता कि आशा रोती हुई वहां से चली जाती।
सबसे बुरी बात यह थी कि उसका चरित्र भ्रष्ट होने लगा। वह यह भूल जाने की चेष्टा करने लगा कि मेरा विवाह हो गया है। कई-कई दिनों तक आशा को उसके दर्शन भी न होते। वह उसके कहकहे की आवाजें बाहर से आती हुई सुनती, झरोखे से देखती कि वह दोस्तों के गले में हाथ डालें सैर करने जा रहे है और तड़प कर रह जाती।एक दिन खाना खाते समय उसने कहा—अब तो आपके दर्शन ही नहीं होतें। मेरे कारण घर छोड़ दीजिएगा क्या ?
विपिन ने मुंह फेर कर कहा—घर ही पर तो रहता हूं। आजकल जरा नौकरी की तलाश है इसलिए दौड़-धूप ज्यादा करनी पड़ती है।
आशा—किसी डाक्टर से मेरी सूरत क्यों नहीं बनवा देते ? सुनती हूं, आजकल सूरत बनाने वाले डाक्टर पैदा हुए है।
विपिन— क्यों नाहक चिढ़ती हो, यहां तुम्हे किसने बुलाया था ?
आशा— आखिर इस मर्ज की दवा कौन करेंगा ?
विपिन— इस मर्ज की दवा नहीं है। जो काम ईश्वर से न करते बना उसे आदमी क्या बना सकता है ?
आशा – यह तो तुम्ही सोचो कि ईश्वर की भूल के लिए मुझे क्यों दंड दे रहे हो। संसार में कौन ऐसा आदमी है जिसे अच्छी सूरत बुरी लगती हो,क्या तुमने किसी मर्द को केवल रुपहीन होने के कारण क्वांरा रहते देखा है, रुपहीन लड़कियां भी मां-बाप के घर नहीं बैठी रहतीं। किसी-न-किसी तरह उनका निर्वाह हो ही जाता है; उसका पति उन पर प्राण भले न देता हो, लेकिन दूध की मक्खी नहीं समझता।
विपिन ने झुंझला कर कहा—क्यों नाहक सिर खाती हो, मै तुमसे बहस तो नहीं कर रहा हूं। दिल पर जब्र नहीं किया जा सकता और न दलीलों का उस पर कोई असर पड़ सकता है। मैं तुम्हे कुछ कहता तो नहीं हूं, फिर तुम क्यों मुझसे हुज्जत करती हो ?
आशा यह झिड़की सुन कर चली गयी। उसे मालूम हो गया कि इन्होने मेरी ओर से सदा के लिए ह्रदय कठोर कर लिया है।
४
विपिन तो रोज सैर-सपाटे करते, कभी-कभी रात को गायब रहते। इधर आशा चिंता और नैराश्य से घुलते-घुलते बीमार पड़ गयी। लेकिन विपिन भूल कर भी उसे देखने न आता, सेवा करना तो दूर रहा। इतना ही नहीं, वह दिल में मानता था कि वह मर जाती तो गला छुटता, अबकी खुब देखभाल कर अपनी पसंद का विवाह करता।
अब वह और भी खुल गया। पहले आशा से कुछ दबता था, कम-से-कम उसे यह धड़का लगा रहता था कि कोई मेरी चाल-ढाल पर निगाह रखने वाला भी है। अब वह धड़का छुट गया। कुवासनाओं में ऐसा लिप्त हो गया कि मरदाने कमरे में ही जमघटे होने लगे। लेकिन विषय-भोग में केवल धन ही का सर्वनाश नहीं होता, इससे कहीं अधिक बुद्धि और बल का सर्वनाश होता है। विपिन का चेहरा पीला पड़ने लगा, देह भी क्षीण होने लगी, पसलियों की हड्डियां निकल आयीं आंखों के इर्द-गिर्द गड्ढे पड़ गये। अब वह पहले से कहीं ज्यादा शोक करता, नित्य तेल लगाता, बाल बनवाता, कपड़े बदलता, किन्तु मुख पर कांति न थी, रंग-रोगन से क्या हो सकता था?
एक दिन आशा बरामदे में चारपाई पर लेटी हुई थी। इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था। उन्हे देखने की इच्छा हुई। उसे भय था कि वह न आयेंगे, फिर भी वह मन को न रोक सकी। विपिन को बुला भेजा। विपिन को भी उस पर कुछ दया आ गयी। आकर सामने खड़े हो गये। आशा ने उनके मुंह की ओर देखा तो चौक पड़ी। वह इतने दुर्बल हो गये थे कि पहचानना मुश्किल था। बोली—तुम भी बीमार हो क्या? तुम तो मुझसे भी ज्यादा घुल गये हो।
विपिन—उंह, जिंदगी में रखा ही क्या है जिसके लिए जीने की फिक्र करुं !
आशा—जीने की फिक्र न करने से कोई इतना दुबला नहीं हो जाता। तुम अपनी कोई दवा क्यों नहीं कराते?
यह कह कर उसने विपिन का दाहिन हाथ पकड़ कर अपनी चारपाई पर बैठा लिया। विपिन ने भी हाथ छुड़ाने की चेष्टा न की। उनके स्वाभाव में इस समय एक विचित्र नम्रता थी, जो आशा ने कभी ने देखी थी। बातों से भी निराशा टपकती थी। अक्खड़पन या क्रोध की गंध भी न थी। आशा का ऐसा मालुम हुआ कि उनकी आंखो में आंसू भरे हुए है।
विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले—मेरी दवा अब मौत करेगी। मै तुम्हें जलाने के लिए नहीं कहता। ईश्वर जानता है, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचाना चाहता। मै अब ज्यादा दिनों तक न जिऊंगा। मुझे किसी भयंकर रोग के लक्षण दिखाई दे रहे है। डाक्टर नें भी वही कहा है। मुझे इसका खेद है कि मेरे हाथों तुम्हे कष्ट पहुंचा पर क्षमा करना। कभी-कभी बैठे-बैठे मेरा दिल डूब दिल डूब जाता है, मूर्छा-सी आ जाती है।
यह कहतें-कहते एकाएक वह कांप उठे। सारी देह में सनसनी सी दौड़ गयी। मूर्छित हो कर चारपाई पर गिर पड़े और हाथ-पैर पटकने लगे।
मुंह से फिचकुर(झाग) निकलने लगा। सारी देह पसीने से तर हो गयी।
आशा का सारा रोग हवा हो गया। वह महीनों से बिस्तर न छोड़ सकी थी। पर इस समय उसके शिथिल अंगो में विचित्र स्फुर्ति दौड़ गयी। उसने तेजी से उठ कर विपिन को अच्छी तरह लिटा दिया और उनके मुख पर पानी के छींटे देने लगी। महरी भी दौड़ी आयी और पंखा झलने लगी। पर भी विपिन ने आंखें न खोलीं। संध्या होते-होते उनका मुंह टेढ़ा हो गया और बायां अंग शुन्य पड़ गया। हिलाना तो दूर रहा,मुंह से बात निकालना भी मुश्किल हो गया। यह मूर्छा न थी, फालिज था।
५
फालिज के भयंकर रोग में रोगी की सेवा करना आसान काम नहीं है। उस पर आशा महीनों से बीमार थी। लेकिन उस रोग के सामने वह अपना रोग भूल गई। 15 दिनों तक विपिन की हालत बहुत नाजुक रही। आशा दिन-के-दिन और रात-की-रात उनके पास बैठी रहती। उनके लिए पथ्य बनाना, उन्हें गोद में सम्भाल कर दवा पिलाना, उनके जरा-जरा से इशारों को समझाना उसी जैसी धैयशाली स्त्री का काम था। अपना सिर दर्द से फटा करता, ज्वर से देह तपा करती, पर इसकी उसे जरा भी परवा न थी।
१५ दिनों बाद विपिन की हालत कुछ सम्भली। उनका दाहिना पैर तो लुंज पड़ गया था, पर तोतली भाषा में कुछ बोलने लगे थे। सबसे बुरी गत उनके सुन्दर मुख की हुई थी। वह इतना टेढ़ा हो गया था जैसे कोई रबर के खिलौने को खींच कर बढ़ा दें। बैटरी की मदद से जरा देर के लिए बैठे या खड़े तो हो जाते थे; लेकिन चलने−फिरने की ताकत न थी।
एक दिनों लेटे−लेटे उन्हे क्या ख्याल आया। आईना उठा कर अपना मुंह देखने लगे। ऐसा कुरुप आदमी उन्होने कभी न देखा था। आहिस्ता से बोले−−आशा, ईश्वर ने मुझे गरुर की सजा दे दी। वास्तव में मुझे यह उसी बुराई का बदला मिला है, जो मैने तुम्हारे साथ की। अब तुम अगर मेरा मुंह देखकर घृणा से मुंह फेर लो तो मुझसे उस दुर्व्यवहार का बदला लो, जो मैने, तुम्हारे साथ किए है।
आशा ने पति की ओर कोमल भाव से देखकर कहा−−मै तो आपको अब भी उसी निगाह से देखती हुं। मुझे तो आप में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता।
६
विपिन−−वाह, बन्दर का−सा मुंह हो गया है, तुम कहती हो कि कोई अन्तर ही नहीं। मैं तो अब कभी बाहर न निकलूंगा। ईश्वर ने मुझे सचमुच दंड दिया।
बहुत यत्न किए गए पर विपिन का मुंह सीधा न हुआ। मुख का बायां भाग इतना टेढ़ा हो गया था कि चेहरा देखकर डर मालूम होता था। हां, पैरों में इतनी शक्ति आ गई कि अब वह चलने−फिरने लगे।
आशा ने पति की बीमारी में देवी की मनौती की थी। आज उसी की पूजा का उत्सव था। मुहल्ले की स्त्रियां बनाव−सिंगार किये जमा थीं। गाना−बजाना हो रहा था।
एक सेहली ने पुछा−−क्यों आशा, अब तो तुम्हें उनका मुंह जरा भी अच्छा न लगता होगा।
आशा ने गम्भीर होकर कहा−−मुझे तो उनका मुख पहले से कही ज्यादा अच्छा लगता है।
‘चलों, बातें बनाती हो।’
‘नही बहन, सच कहती हूँ; रुप के बदले मुझे उनकी आत्मा मिल गई जो रुप से कहीं बढ़कर है।’
विपिन कमरे में बैठे हुए थे। कई मित्र जमा थे। ताश हो रहा था।
कमरे में एक खिड़की थी जो आंगन में खुलती थी। इस वक्त वह बन्द थी। एक मित्र ने उसे चुपके से खोल दिया। एक मित्र ने उसे चुपके दिया और शीशे से झांक कर विपिन से कहा−− आज तो तुम्हारे यहां पारियों का अच्छा जमघट है।
विपिन−−बन्द कर दो।
‘अजी जरा देखो तो: कैसी−कैसी सूरतें है ! तुम्हे इन सबों में कौन सबसे अच्छी मालूम होती है ?
विपिन ने उड़ती हुई नजरों से देखकर कहा−−मुझे तो वहीं सबसे अच्छी मालूम होती है जो थाल में फूल रख रही है।
‘वाह री आपकी निगाह ! क्या सूरत के साथ तुम्हारी निगाह भी बिगड़ गई? मुझे तो वह सबसे बदसूरत मालूम होती है।’
‘इसलिए कि तुम उसकी सूरत देखते हो और मै उसकी आत्मा देखता हूं।’
‘अच्छा, यही मिसेज विपिन हैं?’
‘जी हां, यह वही देवी है।
काश ये 20 बातें पता होतीं
मैं लगभग 35 साल का हो गया हूँ और उतनी गलतियाँ कर चुका हूँ जितनी मुझे अब तक कर लेनी चाहिए थीं। पछतावे में मेरा यकीन नहीं है… और अपनी हर गलती से मैंने बड़ी सीख ली है… और मेरी ज़िंदगी बहुत बेहतर है। लेकिन मुझे यह लगता है कि ऐसी बहुत सारी बातें हैं जो मैं यदि उस समय जानता जब मैं युवावस्था में कदम रख रहा था तो मेरी ज़िंदगी कुछ और होती।
वाकई? मैं यकीन से कुछ नहीं कह सकता। मैं क़र्ज़ के पहाड़ के नीचे नहीं दबा होता लेकिन इसके बिना मुझे इससे बाहर निकलने के रास्ते की जानकारी भी न हुई होती। मैंने बेहतर कैरियर अपनाया होता लेकिन मुझे वह अनुभव नहीं मिला होता जिसने मुझे ब्लौगर और लेखक बनाया।
मैंने शादी नहीं की होती, ताकि मेरा तलाक भी न होता… लेकिन यह न होता तो मुझे पहली शादी से हुए दो प्यारे-प्यारे बच्चे भी नहीं मिले होते।
मुझे नहीं लगता कि मैं अपने साथ हुई ये सारी चीज़ें बदल सकता था। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैंने ऐसे सबक सीखे हैं जो मैं ख़ुद को तब बताना चाहता जब मैं 18 साल का था। क्या अब वो सबक दुहराकर मैं थोड़ा सा पछता लूँ? नहीं। मैं उन्हें यहाँ इसलिए बाँट रहा हूँ ताकि हाल ही में अपना होश संभालनेवाले युवा लड़के और लड़कियां मेरी गलतियों से कुछ सबक ले सकें।
ये मेरी गलतियों की कोई परिपूर्ण सूची नहीं है लेकिन मैं यह उम्मीद करता हूँ कि कुछ लोगों को इससे ज़रूर थोड़ी मदद मिलेगी।
1. खर्च करने पर नियंत्रण - यूँ ही पैसा उड़ा देने की आदत ने मुझे बड़े आर्थिक संकट में डाला। मैं ऐसे कपड़े खरीदता था जिनकी मुझे ज़रूरत नहीं थी। ऐसे गैजेट खरीद लेता था जिन्हें सिर्फ़ अपने पास रखना चाहता था। ऑनलाइन खरीददारी करता था क्योंकि ये बहुत आसान है। अपनी बड़ी स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेहिकल मैंने सिर्फ़ औरतों को आकर्षित और प्रभावित करने के चक्कर में खरीद ली। मुझे अब ऐसे किसी भी चीज़ पर गर्व नहीं होता। मैंने आदतन पैसा खर्च करने के स्वभाव पर काबू पा लिया है। अब कुछ भी खरीदने से पहले मैं थोड़ा समय लगाता हूँ। मैं यह देखता हूँ कि क्या मेरे पास उसे खरीदने के लिए पैसे हैं, या मुझे उसकी वाकई ज़रूरत है या नहीं। 15 साल पहले मुझे इसका बहुत लाभ मिला होता।
2. सक्रिय-गतिमान जीवन – जब मैं हाईस्कूल में था तब भागदौड़ और बास्केटबाल में भाग लेता था। कॉलेज पहुँचने के बाद मेरा खेलकूद धीरे-धीरे कम होने लगा। यूँ तो मैं चलते-फिरते बास्केटबाल हाईस्कूल के बाद भी खेलता रहा पर वह भी एक दिन बंद हो गया और ज़िंदगी से सारी गतिशीलता चली गयी। बच्चों के साथ बहार खेलने में ही मेरी साँस फूलने लगी। मैं मोटा होने लगा। अब मैंने बहुत दौड़भाग शुरू कर दी है पर बैठे-बैठे सालों में जमा की हुई चर्बी को हटाने में थोड़ा वक़्त लगेगा।
3. आर्थिक नियोजन करना – मैं हमेशा से यह जानता था कि हमें अपने बजट और खर्चों पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके बावजूद मैंने इस मामले में हमेशा आलस किया। मुझे यह ठीक से पता भी नहीं था कि इसे कैसे करते हैं। अब मैंने इसे सीख लिया है और इसपर कायम रहता हूँ। हां, कभी-कभी मैं रास्ते से थोड़ा भटक भी जाता हूँ पर दोबारा रास्ते पर आना भी मैंने सीख लिया है। ये सब आप किसी किताब से पढ़कर नहीं सीख सकते। इसे व्यवहार से ही जाना जा सकता है। अब मैं यह उम्मीद करता हूँ कि अपने बच्चों को मैं यह सब सिखा पाऊँगा।
4. जंकफ़ूड पेट पर भारी पड़ेगा – सिर्फ़ ठहरी हुई लाइफस्टाइल के कारण ही मैं मोटा नहीं हुआ। बाहर के तले हुए भोजन ने भी इसमें काफी योगदान दिया। हर कभी मैं बाहर पिज्जा, बर्गर, और इसी तरह की दूसरी चर्बीदार तली हुई चीज़ें खा लिया करता था। मैंने यह कभी नहीं सोचा कि इन चीज़ों से कोई समस्या हो सकती है। अपने स्वास्थ्य के बारे में तो हम तभी सोचना शुरू करते हैं जब हम कुछ प्रौढ़ होने लगते हैं। एक समय मेरी जींस बहुत टाइट होने लगी और कमर का नाप कई इंच बढ़ गया। उस दौरान पेट पर चढी चर्बी अभी भी पूरी तरह से नहीं निकली है। काश किसी ने मुझे उस समय ‘आज’ की तस्वीर दिखाई होती जब मैं जवाँ था और एक साँस में सोडे की बोतल ख़त्म कर दिया करता था।
5. धूम्रपान सिर्फ़ बेवकूफी है – धूम्रपान की शुरुआत मैंने कुछ बड़े होने के बाद ही की। क्यों की, यह बताना ज़रूरी नहीं है लेकिन मुझे हमेशा यह लगता था कि मैं इसे जब चाहे तब छोड़ सकता हूँ। ऐसा मुझे कई सालों तक लगता रहा जब एक दिन मैंने छोड़ने की कोशिश की लेकिन छोड़ नहीं पाया। पाँच असफल कोशिशों के बाद मुझे यह लगने लगा कि मेरी लत वाकई बहुत ताकतवर थी। आखिरकार 18 नवम्बर 2005 को मैंने धूम्रपान करना पूरी तरह बंद कर दिया लेकिन इसने मेरा कितना कुछ मुझसे छीन लिया।
6. रिटायरमेंट की तैयारी – यह बात और इससे पहले बताई गयी बातें बहुत आम प्रतीत होती हैं। आप यह न सोचें कि मुझे इस बात का पता उस समय नहीं था जब मैं 18 साल का था। मैं इसे बखूबी जानता था लेकिन मैंने इसके बारे में कभी नहीं सोचा। जब तक मैं 30 की उम्र पार नहीं कर गया तब तक मैंने रिटायर्मेंट प्लानिंग के बारे में कोई चिंता नहीं की। अब मेरा मन करता है कि उस 18 वर्षीय लियो को इस बात के लिए एक चांटा जड़ दिया जाए। खैर। अब तक तो मैं काफी पैसा जमा कर चुका होता! मैंने भी रिटायर्मेंट प्लान बनाया था लेकिन मैंने तीन बार जॉब्स बदले और अपना जमा किया पैसा यूँही उड़ा दिया।
7. जो कुछ भी आपको कठिन लगता है वह आपके काम का होता है – यह ऐसी बात है जो ज्यादा काम की नहीं लगती। एक समय था जब मुझे काम मुश्किल लगता था। मैंने काम किया ज़रूर, लेकिन बेमन किया। अगर काम न करने की छूट होती तो मैं नहीं करता। परिश्रम ने मुझे बहुत तनाव में डाला। मैं कभी भी परिश्रम नहीं करना चाहता था। लेकिन मुझे मिलने वाला सबक यह है कि जितना भी परिश्रम मैंने अनजाने में किया उसने मुझे सदैव दूर तक लाभ पहुँचाया। आज भी मैं उन तनाव के दिनों में कठोर परिश्रम करते समय सीखे हुए हुनर और आदतों की कमाई खा रहा हूँ। उनके कारण मैं आज वह बन पाया हूँ जो मैं आज हूँ। इसके लिए मैं युवक लियो का हमेशा अहसानमंद रहूँगा।
8. बिना जांचे-परखे कोई पुराना सामान नहीं खरीदें – मैंने एक पुरानी वैन खरीदी थी। मुझे यह लग रहा था की मैं बहुत स्मार्ट था और मैंने उसे ठीक से जांचा-परखा नहीं। उस खटारा वैन के इंजन में अपार समस्याएँ थीं। उसका एक दरवाजा तो चलते समय ही गिर गया। खींचते समय दरवाजे का हैंडल टूट गया। कांच भी कहीं टपक गया। टायर बिगड़ते गए, खिड़कियाँ जाम पडी थीं, और एक दिन रेडियेटर भी फट गया। अभी भी मैं ढेरों समस्याएँ गिना सकता हूँ। वह मेरे द्वारा ख़रीदी गयी सबसे घटिया चीज़ थी। यह तो मैं अभी भी मानता हूँ की पुरानी चीज़ों को खरीदने में समझदारी है लेकिन उन्हें देख-परख के ही खरीदना चाहिए।
9. बेचने से पहले ही सारी बातें तय कर लेने में ही भलाई है – अपने दोस्त के दोस्त को मैंने अपनी एक कार बेची। मुझे यकीन था कि बगैर लिखा-पढी के ही वह मुझे मेरी माँगी हुई उचित कीमत अदा कर देगा। यह मेरी बेवकूफी थी। अभी भी मुझे वह आदमी कभी-कभी सड़क पर दिख जाता है लेकिन अब मुझमें इतनी ताक़त नहीं है कि मैं अपना पैसा निकलवाने के लिए उसका पीछा करूँ।
10. कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, अपना शौक पूरा करो – मैं हमेशा से ही लेखक बनना चाहता था। मैं चाहता था कि एक दिन लोग मेरी लिखी किताबें पढ़ें लेकिन मेरे पास लिखने का समय ही नहीं था। पूर्ण-कालिक नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियां होने के कारण मुझे लिखने का वक़्त नहीं मिल पाता था। अब मैं यह जान गया हूँ कि वक़्त तो निकालना पड़ता है। दूसरी चीज़ों से ख़ुद को थोड़ा सा काटकर इतना समय तो निकला ही जा सकता है जिसमें हम वो कर सकें जो हमारा दिल करना चाहता है। मैंने अपनी ख्वाहिश के आड़े में बहुत सी चीज़ों को आने दिया। यह बात मैंने 15 साल पहले जान ली होती तो आजतक मैं 15 किताबें लिख चुका होता। सारी किताबें तो शानदार नहीं होतीं लेकिन कुछेक तो होतीं!
11. जिसकी खातिर इतना तनाव उठा रहे हैं वो बात हमेशा नहीं रहेगी – जब हमारा बुरा वक़्त चल रहा होता है तब हमें पूरी दुनिया बुरी लगती है। मुझे समयसीमा में काम करने होते थे, कई प्रोजेक्ट एक साथ चल रहे थे, लोग मेरे सर पर सवार रहते थे और मेरे तनाव का स्तर खतरे के निशान के पार जा चुका था। मुझे मेहनत करने का कोई पछतावा नहीं है (जैसा मैंने ऊपर कहा) लेकिन यदि मुझे इस बात का पता होता कि इतनी जद्दोजहद और माथापच्ची 15 साल तो क्या अगले 5 साल बाद बेमानी हो जायेगी तो मैं अपने को उसमें नहीं खपाता। परिप्रेक्ष्य हमें बहुत कुछ सिखा देता है।
12. काम के दौरान बनने वाले दोस्त काम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं – मैंने कई जगहों में काम किया और बहुत सारी चीज़ें खरीदीं और इसी प्रक्रिया में बहुत सारे दोस्त भी बनाये। काश मैं यहाँ-वहां की बातों में समय लगाने के बजाय अपने दोस्तों और परिजनों के साथ बेहतर वक़्त गुज़र पाता!
13. टीवी देखना समय की बहुत बड़ी बर्बादी है – मुझे लगता है कि साल भर में हम कई महीने टी वी देख चुके होते हैं। रियालिटी टी वी देखने में क्या तुक है जब रियालिटी हाथ से फिसली जा रही हो? खोया हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता – इसे टी वी देखने में बरबाद न करें।
14. बच्चे समय से पहले बड़े हो जायेंगे। समय नष्ट न करें – बच्चे देखते-देखते बड़े हो जाते हैं। मेरी बड़ी बेटी क्लो कुछ ही दिनों में 15 साल की हो जायेगी। तीन साल बाद वह वयस्क हो जायेगी और फ़िर मुझसे दूर चली जायेगी। तीन साल! ऐसा लगता है कि यह वक़्त तो पलक झपकते गुज़र जाएगा। मेरा मन करता हूँ कि 15 साल पहले जाकर ख़ुद को झिड़क दूँ – दफ्तर में रात-दिन लगे रहना छोडो! टी वी देखना छोडो! अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करो! – पिछले 15 साल कितनी तेजी से गुज़र गए, पता ही न चला।
15. दुनिया के दर्द बिसराकर अपनी खुशी पर ध्यान दो – मेरे काम में और निजी ज़िंदगी में मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ जब मुझे लगने लगा कि मेरी दुनिया बस ख़त्म हो गयी। जब समस्याएँ सर पे सवार हो जाती थीं तो अच्छा खासा तमाशा बन जाता था। इस सबके कारण मैं कई बार अवसाद का शिकार हुआ। वह बहुत बुरा वक़्त था। सच तो यह था कि हर समस्या मेरे भीतर थी और मैं सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर खुश रह सकता था। मैं यह सोचकर खुश हो सकता था कि मेरे पास कितना कुछ है जो औरों के पास नहीं है। अपने सारे दुःख-दर्द मैं ताक पर रख सकता था।
16. ब्लॉग्स केवल निजी पसंद-नापसंद का रोजनामचा नहीं हैं – पहली बार मैंने ब्लॉग्स 7-8 साल पहले पढ़े। पहली नज़र में मुझे उनमें कुछ ख़ास रूचि का नहीं लगा – बस कुछ लोगों के निजी विचार और उनकी पसंद-नापसंद! उनको पढ़के मुझे भला क्या मिलता!? मुझे अपनी बातों को दुनिया के साथ बांटकर क्या मिलेगा? मैं इन्टरनेट पर बहुत समय बिताता था और एक वेबसाईट से दूसरी वेबसाईट पर जाता रहता था लेकिन ब्लॉग्स से हमेशा कन्नी काट जाता था। पिछले 3-4 सालों के भीतर ही मुझे लगने लगा कि ब्लॉग्स बेहतर पढने-लिखने और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और जानकारी बांटने का बेहतरीन माध्यम हैं। 7-8 साल पहले ही यदि मैंने ब्लॉगिंग शुरू कर दी होती तो अब तक मैं काफी लाभ उठा चुका होता।
17. याददाश्त बहुत धोखा देती है – मेरी याददाश्त बहुत कमज़ोर है। मैं न सिर्फ़ हाल की बल्कि पुरानी बातें भी भूल जाता हूँ। अपने बच्चों से जुडी बहुत सारी बातें मुझे याद नहीं हैं क्योंकि मैंने उन्हें कहीं लिखकर नहीं रखा। मुझे ख़ुद से जुडी बहुत सारी बातें याद नहीं रहतीं। ऐसा लगता है जैसे स्मृतिपटल पर एक गहरी धुंध सी छाई हुई है। यदि मैंने ज़रूरी बातों को नोट कर लेने की आदत डाली होती तो मुझे इसका बहुत लाभ मिलता।
18. शराब बुरी चीज़ है – मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊँगा। बस इतना कहना ही काफी होगा कि मुझे कई बुरे अनुभव हुए हैं। शराब और ऐसी ही कई दूसरी चीज़ों ने मुझे बस एक बात का ज्ञान करवाया है – शराब सिर्फ़ शैतान के काम की चीज़ है।
19. आप मैराथन दौड़ने का निश्चय कभी भी कर सकते हैं – इसे अपना लक्ष्य बना लीजिये – यह बहुत बड़ा पारितोषक है। स्कूल के समय से ही मैं मैराथन दौड़ना चाहता था। यह एक बहुत बड़ा सपना था जिसे साकार करने में मैंने सालों लगा दिए। मैराथन दौड़ने पर मुझे पता चला कि यह न सिर्फ़ सम्भव था बल्कि बहुत बड़ा पारितोषक भी था। काश मैंने दौड़ने की ट्रेनिंग उस समय शुरू कर दी होती जब मैं हल्का और तंदरुस्त था, मैं तब इसे काफी कम समय में पूरा कर लेता!
20. इतना पढने के बाद भी मेरी गलतियाँ दुहराएंगे तो पछतायेंगे – 18 वर्षीय लियो ने इस पोस्ट को पढ़के यही कहा होता – “अच्छी सलाह है।” और इसके बाद वह न चाहते हुए भी वही गलतियाँ दुहराता। मैं बुरा लड़का नहीं था लेकिन मैंने किसी की सलाह कभी नहीं मानी। मैं गलतियाँ करता गया और अपने मुताबिक ज़िंदगी जीता गया। मुझे इसका अफ़सोस नहीं है। मेरा हर अनुभव (शराब का भी) मुझे मेरी ज़िंदगी की उस राह पर ले आया है जिसपर आज मैं चल रहा हूँ। मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार है और मैं इसे किसी के भी साथ हरगिज नहीं बदलूँगा। दर्द, तनाव, तमाशा, मेहनत, परेशानियाँ, अवसाद, हैंगओवर, क़र्ज़, मोटापा – सलाह न मानने के इन नतीजों का पात्र था मैं।
वाकई? मैं यकीन से कुछ नहीं कह सकता। मैं क़र्ज़ के पहाड़ के नीचे नहीं दबा होता लेकिन इसके बिना मुझे इससे बाहर निकलने के रास्ते की जानकारी भी न हुई होती। मैंने बेहतर कैरियर अपनाया होता लेकिन मुझे वह अनुभव नहीं मिला होता जिसने मुझे ब्लौगर और लेखक बनाया।
मैंने शादी नहीं की होती, ताकि मेरा तलाक भी न होता… लेकिन यह न होता तो मुझे पहली शादी से हुए दो प्यारे-प्यारे बच्चे भी नहीं मिले होते।
मुझे नहीं लगता कि मैं अपने साथ हुई ये सारी चीज़ें बदल सकता था। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैंने ऐसे सबक सीखे हैं जो मैं ख़ुद को तब बताना चाहता जब मैं 18 साल का था। क्या अब वो सबक दुहराकर मैं थोड़ा सा पछता लूँ? नहीं। मैं उन्हें यहाँ इसलिए बाँट रहा हूँ ताकि हाल ही में अपना होश संभालनेवाले युवा लड़के और लड़कियां मेरी गलतियों से कुछ सबक ले सकें।
ये मेरी गलतियों की कोई परिपूर्ण सूची नहीं है लेकिन मैं यह उम्मीद करता हूँ कि कुछ लोगों को इससे ज़रूर थोड़ी मदद मिलेगी।
1. खर्च करने पर नियंत्रण - यूँ ही पैसा उड़ा देने की आदत ने मुझे बड़े आर्थिक संकट में डाला। मैं ऐसे कपड़े खरीदता था जिनकी मुझे ज़रूरत नहीं थी। ऐसे गैजेट खरीद लेता था जिन्हें सिर्फ़ अपने पास रखना चाहता था। ऑनलाइन खरीददारी करता था क्योंकि ये बहुत आसान है। अपनी बड़ी स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेहिकल मैंने सिर्फ़ औरतों को आकर्षित और प्रभावित करने के चक्कर में खरीद ली। मुझे अब ऐसे किसी भी चीज़ पर गर्व नहीं होता। मैंने आदतन पैसा खर्च करने के स्वभाव पर काबू पा लिया है। अब कुछ भी खरीदने से पहले मैं थोड़ा समय लगाता हूँ। मैं यह देखता हूँ कि क्या मेरे पास उसे खरीदने के लिए पैसे हैं, या मुझे उसकी वाकई ज़रूरत है या नहीं। 15 साल पहले मुझे इसका बहुत लाभ मिला होता।
2. सक्रिय-गतिमान जीवन – जब मैं हाईस्कूल में था तब भागदौड़ और बास्केटबाल में भाग लेता था। कॉलेज पहुँचने के बाद मेरा खेलकूद धीरे-धीरे कम होने लगा। यूँ तो मैं चलते-फिरते बास्केटबाल हाईस्कूल के बाद भी खेलता रहा पर वह भी एक दिन बंद हो गया और ज़िंदगी से सारी गतिशीलता चली गयी। बच्चों के साथ बहार खेलने में ही मेरी साँस फूलने लगी। मैं मोटा होने लगा। अब मैंने बहुत दौड़भाग शुरू कर दी है पर बैठे-बैठे सालों में जमा की हुई चर्बी को हटाने में थोड़ा वक़्त लगेगा।
3. आर्थिक नियोजन करना – मैं हमेशा से यह जानता था कि हमें अपने बजट और खर्चों पर नियंत्रण रखना चाहिए। इसके बावजूद मैंने इस मामले में हमेशा आलस किया। मुझे यह ठीक से पता भी नहीं था कि इसे कैसे करते हैं। अब मैंने इसे सीख लिया है और इसपर कायम रहता हूँ। हां, कभी-कभी मैं रास्ते से थोड़ा भटक भी जाता हूँ पर दोबारा रास्ते पर आना भी मैंने सीख लिया है। ये सब आप किसी किताब से पढ़कर नहीं सीख सकते। इसे व्यवहार से ही जाना जा सकता है। अब मैं यह उम्मीद करता हूँ कि अपने बच्चों को मैं यह सब सिखा पाऊँगा।
4. जंकफ़ूड पेट पर भारी पड़ेगा – सिर्फ़ ठहरी हुई लाइफस्टाइल के कारण ही मैं मोटा नहीं हुआ। बाहर के तले हुए भोजन ने भी इसमें काफी योगदान दिया। हर कभी मैं बाहर पिज्जा, बर्गर, और इसी तरह की दूसरी चर्बीदार तली हुई चीज़ें खा लिया करता था। मैंने यह कभी नहीं सोचा कि इन चीज़ों से कोई समस्या हो सकती है। अपने स्वास्थ्य के बारे में तो हम तभी सोचना शुरू करते हैं जब हम कुछ प्रौढ़ होने लगते हैं। एक समय मेरी जींस बहुत टाइट होने लगी और कमर का नाप कई इंच बढ़ गया। उस दौरान पेट पर चढी चर्बी अभी भी पूरी तरह से नहीं निकली है। काश किसी ने मुझे उस समय ‘आज’ की तस्वीर दिखाई होती जब मैं जवाँ था और एक साँस में सोडे की बोतल ख़त्म कर दिया करता था।
5. धूम्रपान सिर्फ़ बेवकूफी है – धूम्रपान की शुरुआत मैंने कुछ बड़े होने के बाद ही की। क्यों की, यह बताना ज़रूरी नहीं है लेकिन मुझे हमेशा यह लगता था कि मैं इसे जब चाहे तब छोड़ सकता हूँ। ऐसा मुझे कई सालों तक लगता रहा जब एक दिन मैंने छोड़ने की कोशिश की लेकिन छोड़ नहीं पाया। पाँच असफल कोशिशों के बाद मुझे यह लगने लगा कि मेरी लत वाकई बहुत ताकतवर थी। आखिरकार 18 नवम्बर 2005 को मैंने धूम्रपान करना पूरी तरह बंद कर दिया लेकिन इसने मेरा कितना कुछ मुझसे छीन लिया।
6. रिटायरमेंट की तैयारी – यह बात और इससे पहले बताई गयी बातें बहुत आम प्रतीत होती हैं। आप यह न सोचें कि मुझे इस बात का पता उस समय नहीं था जब मैं 18 साल का था। मैं इसे बखूबी जानता था लेकिन मैंने इसके बारे में कभी नहीं सोचा। जब तक मैं 30 की उम्र पार नहीं कर गया तब तक मैंने रिटायर्मेंट प्लानिंग के बारे में कोई चिंता नहीं की। अब मेरा मन करता है कि उस 18 वर्षीय लियो को इस बात के लिए एक चांटा जड़ दिया जाए। खैर। अब तक तो मैं काफी पैसा जमा कर चुका होता! मैंने भी रिटायर्मेंट प्लान बनाया था लेकिन मैंने तीन बार जॉब्स बदले और अपना जमा किया पैसा यूँही उड़ा दिया।
7. जो कुछ भी आपको कठिन लगता है वह आपके काम का होता है – यह ऐसी बात है जो ज्यादा काम की नहीं लगती। एक समय था जब मुझे काम मुश्किल लगता था। मैंने काम किया ज़रूर, लेकिन बेमन किया। अगर काम न करने की छूट होती तो मैं नहीं करता। परिश्रम ने मुझे बहुत तनाव में डाला। मैं कभी भी परिश्रम नहीं करना चाहता था। लेकिन मुझे मिलने वाला सबक यह है कि जितना भी परिश्रम मैंने अनजाने में किया उसने मुझे सदैव दूर तक लाभ पहुँचाया। आज भी मैं उन तनाव के दिनों में कठोर परिश्रम करते समय सीखे हुए हुनर और आदतों की कमाई खा रहा हूँ। उनके कारण मैं आज वह बन पाया हूँ जो मैं आज हूँ। इसके लिए मैं युवक लियो का हमेशा अहसानमंद रहूँगा।
8. बिना जांचे-परखे कोई पुराना सामान नहीं खरीदें – मैंने एक पुरानी वैन खरीदी थी। मुझे यह लग रहा था की मैं बहुत स्मार्ट था और मैंने उसे ठीक से जांचा-परखा नहीं। उस खटारा वैन के इंजन में अपार समस्याएँ थीं। उसका एक दरवाजा तो चलते समय ही गिर गया। खींचते समय दरवाजे का हैंडल टूट गया। कांच भी कहीं टपक गया। टायर बिगड़ते गए, खिड़कियाँ जाम पडी थीं, और एक दिन रेडियेटर भी फट गया। अभी भी मैं ढेरों समस्याएँ गिना सकता हूँ। वह मेरे द्वारा ख़रीदी गयी सबसे घटिया चीज़ थी। यह तो मैं अभी भी मानता हूँ की पुरानी चीज़ों को खरीदने में समझदारी है लेकिन उन्हें देख-परख के ही खरीदना चाहिए।
9. बेचने से पहले ही सारी बातें तय कर लेने में ही भलाई है – अपने दोस्त के दोस्त को मैंने अपनी एक कार बेची। मुझे यकीन था कि बगैर लिखा-पढी के ही वह मुझे मेरी माँगी हुई उचित कीमत अदा कर देगा। यह मेरी बेवकूफी थी। अभी भी मुझे वह आदमी कभी-कभी सड़क पर दिख जाता है लेकिन अब मुझमें इतनी ताक़त नहीं है कि मैं अपना पैसा निकलवाने के लिए उसका पीछा करूँ।
10. कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, अपना शौक पूरा करो – मैं हमेशा से ही लेखक बनना चाहता था। मैं चाहता था कि एक दिन लोग मेरी लिखी किताबें पढ़ें लेकिन मेरे पास लिखने का समय ही नहीं था। पूर्ण-कालिक नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियां होने के कारण मुझे लिखने का वक़्त नहीं मिल पाता था। अब मैं यह जान गया हूँ कि वक़्त तो निकालना पड़ता है। दूसरी चीज़ों से ख़ुद को थोड़ा सा काटकर इतना समय तो निकला ही जा सकता है जिसमें हम वो कर सकें जो हमारा दिल करना चाहता है। मैंने अपनी ख्वाहिश के आड़े में बहुत सी चीज़ों को आने दिया। यह बात मैंने 15 साल पहले जान ली होती तो आजतक मैं 15 किताबें लिख चुका होता। सारी किताबें तो शानदार नहीं होतीं लेकिन कुछेक तो होतीं!
11. जिसकी खातिर इतना तनाव उठा रहे हैं वो बात हमेशा नहीं रहेगी – जब हमारा बुरा वक़्त चल रहा होता है तब हमें पूरी दुनिया बुरी लगती है। मुझे समयसीमा में काम करने होते थे, कई प्रोजेक्ट एक साथ चल रहे थे, लोग मेरे सर पर सवार रहते थे और मेरे तनाव का स्तर खतरे के निशान के पार जा चुका था। मुझे मेहनत करने का कोई पछतावा नहीं है (जैसा मैंने ऊपर कहा) लेकिन यदि मुझे इस बात का पता होता कि इतनी जद्दोजहद और माथापच्ची 15 साल तो क्या अगले 5 साल बाद बेमानी हो जायेगी तो मैं अपने को उसमें नहीं खपाता। परिप्रेक्ष्य हमें बहुत कुछ सिखा देता है।
12. काम के दौरान बनने वाले दोस्त काम से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं – मैंने कई जगहों में काम किया और बहुत सारी चीज़ें खरीदीं और इसी प्रक्रिया में बहुत सारे दोस्त भी बनाये। काश मैं यहाँ-वहां की बातों में समय लगाने के बजाय अपने दोस्तों और परिजनों के साथ बेहतर वक़्त गुज़र पाता!
13. टीवी देखना समय की बहुत बड़ी बर्बादी है – मुझे लगता है कि साल भर में हम कई महीने टी वी देख चुके होते हैं। रियालिटी टी वी देखने में क्या तुक है जब रियालिटी हाथ से फिसली जा रही हो? खोया हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता – इसे टी वी देखने में बरबाद न करें।
14. बच्चे समय से पहले बड़े हो जायेंगे। समय नष्ट न करें – बच्चे देखते-देखते बड़े हो जाते हैं। मेरी बड़ी बेटी क्लो कुछ ही दिनों में 15 साल की हो जायेगी। तीन साल बाद वह वयस्क हो जायेगी और फ़िर मुझसे दूर चली जायेगी। तीन साल! ऐसा लगता है कि यह वक़्त तो पलक झपकते गुज़र जाएगा। मेरा मन करता हूँ कि 15 साल पहले जाकर ख़ुद को झिड़क दूँ – दफ्तर में रात-दिन लगे रहना छोडो! टी वी देखना छोडो! अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करो! – पिछले 15 साल कितनी तेजी से गुज़र गए, पता ही न चला।
15. दुनिया के दर्द बिसराकर अपनी खुशी पर ध्यान दो – मेरे काम में और निजी ज़िंदगी में मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ जब मुझे लगने लगा कि मेरी दुनिया बस ख़त्म हो गयी। जब समस्याएँ सर पे सवार हो जाती थीं तो अच्छा खासा तमाशा बन जाता था। इस सबके कारण मैं कई बार अवसाद का शिकार हुआ। वह बहुत बुरा वक़्त था। सच तो यह था कि हर समस्या मेरे भीतर थी और मैं सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर खुश रह सकता था। मैं यह सोचकर खुश हो सकता था कि मेरे पास कितना कुछ है जो औरों के पास नहीं है। अपने सारे दुःख-दर्द मैं ताक पर रख सकता था।
16. ब्लॉग्स केवल निजी पसंद-नापसंद का रोजनामचा नहीं हैं – पहली बार मैंने ब्लॉग्स 7-8 साल पहले पढ़े। पहली नज़र में मुझे उनमें कुछ ख़ास रूचि का नहीं लगा – बस कुछ लोगों के निजी विचार और उनकी पसंद-नापसंद! उनको पढ़के मुझे भला क्या मिलता!? मुझे अपनी बातों को दुनिया के साथ बांटकर क्या मिलेगा? मैं इन्टरनेट पर बहुत समय बिताता था और एक वेबसाईट से दूसरी वेबसाईट पर जाता रहता था लेकिन ब्लॉग्स से हमेशा कन्नी काट जाता था। पिछले 3-4 सालों के भीतर ही मुझे लगने लगा कि ब्लॉग्स बेहतर पढने-लिखने और लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और जानकारी बांटने का बेहतरीन माध्यम हैं। 7-8 साल पहले ही यदि मैंने ब्लॉगिंग शुरू कर दी होती तो अब तक मैं काफी लाभ उठा चुका होता।
17. याददाश्त बहुत धोखा देती है – मेरी याददाश्त बहुत कमज़ोर है। मैं न सिर्फ़ हाल की बल्कि पुरानी बातें भी भूल जाता हूँ। अपने बच्चों से जुडी बहुत सारी बातें मुझे याद नहीं हैं क्योंकि मैंने उन्हें कहीं लिखकर नहीं रखा। मुझे ख़ुद से जुडी बहुत सारी बातें याद नहीं रहतीं। ऐसा लगता है जैसे स्मृतिपटल पर एक गहरी धुंध सी छाई हुई है। यदि मैंने ज़रूरी बातों को नोट कर लेने की आदत डाली होती तो मुझे इसका बहुत लाभ मिलता।
18. शराब बुरी चीज़ है – मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊँगा। बस इतना कहना ही काफी होगा कि मुझे कई बुरे अनुभव हुए हैं। शराब और ऐसी ही कई दूसरी चीज़ों ने मुझे बस एक बात का ज्ञान करवाया है – शराब सिर्फ़ शैतान के काम की चीज़ है।
19. आप मैराथन दौड़ने का निश्चय कभी भी कर सकते हैं – इसे अपना लक्ष्य बना लीजिये – यह बहुत बड़ा पारितोषक है। स्कूल के समय से ही मैं मैराथन दौड़ना चाहता था। यह एक बहुत बड़ा सपना था जिसे साकार करने में मैंने सालों लगा दिए। मैराथन दौड़ने पर मुझे पता चला कि यह न सिर्फ़ सम्भव था बल्कि बहुत बड़ा पारितोषक भी था। काश मैंने दौड़ने की ट्रेनिंग उस समय शुरू कर दी होती जब मैं हल्का और तंदरुस्त था, मैं तब इसे काफी कम समय में पूरा कर लेता!
20. इतना पढने के बाद भी मेरी गलतियाँ दुहराएंगे तो पछतायेंगे – 18 वर्षीय लियो ने इस पोस्ट को पढ़के यही कहा होता – “अच्छी सलाह है।” और इसके बाद वह न चाहते हुए भी वही गलतियाँ दुहराता। मैं बुरा लड़का नहीं था लेकिन मैंने किसी की सलाह कभी नहीं मानी। मैं गलतियाँ करता गया और अपने मुताबिक ज़िंदगी जीता गया। मुझे इसका अफ़सोस नहीं है। मेरा हर अनुभव (शराब का भी) मुझे मेरी ज़िंदगी की उस राह पर ले आया है जिसपर आज मैं चल रहा हूँ। मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार है और मैं इसे किसी के भी साथ हरगिज नहीं बदलूँगा। दर्द, तनाव, तमाशा, मेहनत, परेशानियाँ, अवसाद, हैंगओवर, क़र्ज़, मोटापा – सलाह न मानने के इन नतीजों का पात्र था मैं।
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