संसार का नियम है कि
खुद को बदलो अन्यथा टूट जाओगे। लेकिन जो पहले से टूटा हुआ हो, उसे बदलने से क्या
फायदा। मेरे साथ भी इसी तरह की बातें लागू होती है। मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों
पर जीता हूं। मजा आता है मुझे। यदि कोई बदलने के लिए कहता है, तो उनके कहने से
नहीं बदलता, लेकिन हां, उससे दूर अवश्य हो जाता हूं। इसे आप घमंडी स्वभाव कह
सकते हैं। एक दिन की बात है। कॉलेज में पढाई कर रहा था। पढने में औसत था। एक लडकी
के प्रति अनायास ही आकर्षित हो गया। उसे पाने के लिए अपना सबकुछ बदल दिया, लेकिन
सफलता नहीं मिली। उसी दिन से कसम खयया कि मैं अब लोगों को खुश रखने के लिए नहीं
बदलूंगा। नए दोस्त बनाने के लिए नहीं बदलूंगा अपने आपको। खुद की एक पहचान
बनाउंगा, जो हमारी पहचान होगी। इसे पालन करने में अनेक तरह की समस्याएं भी आई। जब
मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, तो हालत यह थी कि मेरे साथ कोई भी रूम पार्टनर नहीं रहना
चाहता था। इसका प्रमुख कारण यह था कि मैं शारीरिक रूप से अक्षम था। लोग हमें जानते
नहीं थे।मेरा वहां कोई नहीं था। आर्थिक कंडीशन ऐसी नहीं थी कि अकेले रह सकूं। अंत
में मैंने खुद को मजबूत बनाने के लिए बदला और कम से कम 18 घंटे की पढाई दो महीने
तक की। हालात ऐसे हो गए कि आसपास मेरा नाम हो गया कि यह लडका काफी पढता है। इतनी
पढाई कोई नहीं कर सकता। आप यकीन न मानिए लेकिन हकीकत यह है कि मेरे कई अच्छे दोस्त
हो गए और मेरा रूम पार्टनर भी मिल गया। इससे आत्मविश्वास काफी बढ गया और उसके बाद
से पीछे मुडकर नहीं देखा। आज तक यह जारी है::::::::::
सोमवार, 8 अक्टूबर 2012
शनिवार, 29 सितंबर 2012
क्या
भूलूँ क्या याद करूँ मैं!
याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
जिंदगी इम्तहान लेती है। जब दो क्लास में था, तभी ये शब्द
मेरे कानों में गुंजे थे, लेकिन उसका अर्थ अब समझ में आ रहा है। नौकरी करते हुए दस
वर्ष बीत गए हैं। इध से न जाने अतीत की बातें खूब याद आ रही है। कभी कभी तो ऐसा
होता है कि रात भर सोचते सोचते सुबह हो जाती है। अगणित अवसादों के क्षण हैं। दुख
की दिल भारी कर जाती है। वैसे तो हर व्यक्ति संघर्ष करता है
और संघर्ष करके जीवन को सुवासित बनाता है, लेकिन मुझे अन्य लोगों से अधिक ही
संघर्ष करना पड रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि शारीरिक रूप से अक्षम होने के
कारण लाख कोशिशों के बावजूद खुद को संभाल नहीं पाता हूं मैं। इसका परिणाम यह हो
रहा है कि मैं अपने से कई लोगों से दूर होता जा रहा हूं। कल पटना से सुपर थर्टी के
संस्थापक आनंद आए थे। वे अच्छे दोस्त हैं और जरूरत के समय हमेशा सहयोग करते
हैं। मैं उन्हें देखा हूं, क्योंकि वे पब्लिक फीगर हैं, लेकिन वे मुझे सिर्फ
नाम से जानते हैं। कानपुर आने से पहले और जाने के बाद भी वे लगभग दस बार फोन किए
होंगे, मुझसे मिलने के लिए, लेकिन मैं उनसे जानकर भी इस कारण नहीं मिला कि मुझे डर
था कि यदि वे मुझे देख लेंगे, तो बाद मेरे संबंध पहले की तरह नहीं रह पाएंगे। आप
कह सकते हैं कि आपको जाना चाहिए, क्योकि वे शक्ल देखकर नहीं अपितु आपके विचारों
का दोस्त है। लेकिन न जाने हमें इतना डर लगता है कि मैं चाहकर भी नहीं जाता हूं।
भविष्य में कई अनहोनी घटना घटी है, जिसे यदि याद करूं, तो समय ही बर्बाद हो जाए।
अंत में हारकर बचचन जी की पंक्ति ही सहारा देती है
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को
किन-किन से आबाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को
किन-किन से आबाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
दोनों करके पछताता हूँ,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे
अपने को आज़ाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
सोच नहीं, पर मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे
अपने को आज़ाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
सोमवार, 27 अगस्त 2012
होके मायूस न आंगन से उखाड़ो पौधे, धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।
मिल ही जाएगी ढूंढने वाले को बहार,
हर गुलिस्तां में खिजां हो यह जरूरी नहीं।
-'इकबाल'
हर गुलिस्तां में खिजां हो यह जरूरी नहीं।
-'इकबाल'
1. खिजां - पतझड़ की ऋतु 'इकबाल'
*****
मेरे दिले-मायूस में क्यों कर न हो उम्मीद,
मुरझाए हुए फूलों में क्या बू नहीं होती।
-'अख्तर' अंसारी
*****
मेरे दोस्तों की दिलआजारियों में,
मेरी बेहतरी की कोई बात होगी।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
मेरी बेहतरी की कोई बात होगी।
-अब्दुल हमीद 'अदम'
1.दिलआजारी- कोई ऐसी बात कहना या करना, जिससे किसी का दिल दुखे, सताना, कष्ट देना
हजार बर्क गिरें, लाख आंधियां उठें,
वह फूल खिल के रहेंगे, जो खिलने वाले हैं।-'साहिर' लुधियानवी
वह फूल खिल के रहेंगे, जो खिलने वाले हैं।-'साहिर' लुधियानवी
1.बर्क - बिजली
होके मायूस न आंगन से उखाड़ो पौधे,
धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।
धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।
उसके दामन में अगर शब हैं, सितारे भी तो हैं,
अदा परियों की, सूरत हूर की, आंखें गिजालों की,
गरज माँगे कि हर इक चीज हैं इन हुस्न वालों की।
-हाफिज जौनपुरी
1.हूर - स्वर्ग में रहने वाली सुन्दर स्त्री, स्वर्गांगन 2. गिजाल - हिरण का बच्चा, मृगशावक
गरज माँगे कि हर इक चीज हैं इन हुस्न वालों की।
-हाफिज जौनपुरी
1.हूर - स्वर्ग में रहने वाली सुन्दर स्त्री, स्वर्गांगन 2. गिजाल - हिरण का बच्चा, मृगशावक
*****
अदा निगाहों से होता है फर्जे-गोयाई,
जुबां की हद से जब शौके-बयां गुजरता है।
1 फर्जे-गोयाई- बात कहने का फ़रज़्
जुबां की हद से जब शौके-बयां गुजरता है।
1 फर्जे-गोयाई- बात कहने का फ़रज़्
*****
अश्क बनकर आई हैं वह इल्तिजाएं चश्म तक,
जिनको कहने के लिए होठों पै गोयाई नहीं।
-आनन्द नारायण मुल्ला
जिनको कहने के लिए होठों पै गोयाई नहीं।
-आनन्द नारायण मुल्ला
1.इल्तिजाएं - प्रार्थनाएं, दरखास्त
2.चश्म - आँख, नेत्र 3.गोयाई - बोलने की ताकत
*****
असर न पूछिए साकी की मस्त आंखों का,
यह देखिये कि कोई होशमंद बाकी है।
-हफीज जौनपुरी
उम्मीद वक्त का सबसे बड़ा सहारा है,
गर हौसला है तो हर मौज में किनारा है।
-'साहिर' लुधियानवी
गर हौसला है तो हर मौज में किनारा है।
-'साहिर' लुधियानवी
इक नई बुनियाद डालेंगे तजस्सुम की 'शफा'
हर गुबारे-कारवां में कारवाँ ढूढ़ेंगे हम।-'शफा' ग्वालियरी
1. तजस्सुम - खोज, तलाश।
*****
1.गर्दिशे-अफलाक - दैवी प्रकोप, आसमान से आने वाली मुसीबत
1.यास - निराशा, नाउम्मेदी
1.खिजां - पतझड़ की ऋतु 2. नज्म - प्रबन्ध, व्यवस्था
1.तारीक - अंधेरी
हर गुबारे-कारवां में कारवाँ ढूढ़ेंगे हम।-'शफा' ग्वालियरी
1. तजस्सुम - खोज, तलाश।
*****
उसके दामन में अगर शब हैं, सितारे भी तो हैं,
गर्दिशे-अफलाक से मायूस होना छोड़ दे।
गर्दिशे-अफलाक से मायूस होना छोड़ दे।
1.गर्दिशे-अफलाक - दैवी प्रकोप, आसमान से आने वाली मुसीबत
*****
एक हैं दोनों, यास हो कि उम्मीद,
एक तड़पाए, एक बहलाए।-तमकीन सरमस्
एक तड़पाए, एक बहलाए।-तमकीन सरमस्
1.यास - निराशा, नाउम्मेदी
कांटों पर अगर चलना ही पड़े,
मायूस न हो जाना राही,
जब फूल हों दिल के दामन में,
जब फूल हों दिल के दामन में,
फिर क्या है जो इन्सां कर न सके।
खिजां अब आयेगी तो आयेगी ढलकर बहारों में,
कुछ इस अन्दाज से नज्मे-गुलिस्तां कर रहा हूँ मैं।
-'शफक' टौंकी
कुछ इस अन्दाज से नज्मे-गुलिस्तां कर रहा हूँ मैं।
-'शफक' टौंकी
1.खिजां - पतझड़ की ऋतु 2. नज्म - प्रबन्ध, व्यवस्था
जो गम हद से जियादा हो, खुशी नजदीक होती है,
चमकते हैं सितारे रात जब तारीक होती है।
-'अपसर' मेरठी
चमकते हैं सितारे रात जब तारीक होती है।
-'अपसर' मेरठी
1.तारीक - अंधेरी
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।-फैज अहमद 'फैज'
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।-फैज अहमद 'फैज'
नई सुबह पर नजर है मगर आह यह भी डर है,
यह सहर भी रफ्ता-रफ्त कहीं शाम तक न पहुंचे।
-शकील बंदायुनी
1.सहर - सुबह, प्रातः 2.रफ्ता-रफ्त - अहिस्ता-अहिस्ता, धीरे -धीरे
यह सहर भी रफ्ता-रफ्त कहीं शाम तक न पहुंचे।
-शकील बंदायुनी
1.सहर - सुबह, प्रातः 2.रफ्ता-रफ्त - अहिस्ता-अहिस्ता, धीरे -धीरे
मंगलवार, 31 जुलाई 2012
तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम।
तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम।
गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम।
कुछ दिनों पहले दिल्ली गया था। वहां अपने परिवार के साथ ही दोस्तों से मिला। एक दोस्त कई वर्षों से घर नहीं गया है। पूछा तो बताया कि सभी संबंध स्वार्थ पर अवलंबित हैं। माता पिता सभी तभी तक प्यारे होते हैं, जब तक उन्हें कुछ देते रहो। मैं यहां दिल्ली में 25 लाख का एक फ़लैट भी नहीं ले पा रहा हूं और वे वहां पर रहने के लिए हमसे पैसे की डिमांड करते हैं। मैंने कहा कि ठीक ही तो है। तुम इकलौता बेटा हो, तुम्हें मदद करनी चाहिए। वह तिलमिला उठा और मेरे हाथ से कप की प्याली छिनने लगा। फिर रूक गया यह सोचकर कि मैं उसी के घर में चाय पी रहा था। खैर मैं भी बात को बढ1ाने के चक्क्र में उससे कहा कि जननी और जन्म भूमि स्वर्ग के समान होता है। वहां की खूशबू ही लोगों का मन मो ह लेती है। इस कारण वहां अवश्य जाना चाहिए। इस पर उन्होंने तुलसीदास की उपर वाली पंक्ति सुनाई और अर्थ समझाते हुए कहा कि गांव वाले को पता ही नहीं कि मैं कितना कमाता हूं और हमारी हैसियत दिल्ली में क्या है। गांव वाले सरकारी नौकरी को ही वरीयता देते हैं और मुझे कहते हैं कि तुम कुछ नहीं कमाते हो। कमाते तो घर पक्क्ी इंट का होता और मां बाप को भी काफी पैसे होते। तुमसे तो अच्छा गांव का दिनेशवा है, जो रोज मजदूरी करता है और अपने फादर का खयाल रखता है। बताओ कहां दिनेशवा चमार और कहां हम। है कहीं तुलना। इसी कारण तुलसीदास कहते हैं कि तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम। गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम। मैं इसी कारण सभी को छोड दिया। मैं सोच में पड गया कि है तो तुलसीदास का कथन, लेकिन संदर्भ कुछ और था। वे उन दो साथियों को समझा रहे थे, जो उन्हें अभी तक बच्चा और अनपढ ही समझ रहे थे। धन्य हो ऐसी पढाई का, जो अपनी सुविधा के अनुरूप शब्दों के अर्थ गढ लेते हैं।
गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम।
कुछ दिनों पहले दिल्ली गया था। वहां अपने परिवार के साथ ही दोस्तों से मिला। एक दोस्त कई वर्षों से घर नहीं गया है। पूछा तो बताया कि सभी संबंध स्वार्थ पर अवलंबित हैं। माता पिता सभी तभी तक प्यारे होते हैं, जब तक उन्हें कुछ देते रहो। मैं यहां दिल्ली में 25 लाख का एक फ़लैट भी नहीं ले पा रहा हूं और वे वहां पर रहने के लिए हमसे पैसे की डिमांड करते हैं। मैंने कहा कि ठीक ही तो है। तुम इकलौता बेटा हो, तुम्हें मदद करनी चाहिए। वह तिलमिला उठा और मेरे हाथ से कप की प्याली छिनने लगा। फिर रूक गया यह सोचकर कि मैं उसी के घर में चाय पी रहा था। खैर मैं भी बात को बढ1ाने के चक्क्र में उससे कहा कि जननी और जन्म भूमि स्वर्ग के समान होता है। वहां की खूशबू ही लोगों का मन मो ह लेती है। इस कारण वहां अवश्य जाना चाहिए। इस पर उन्होंने तुलसीदास की उपर वाली पंक्ति सुनाई और अर्थ समझाते हुए कहा कि गांव वाले को पता ही नहीं कि मैं कितना कमाता हूं और हमारी हैसियत दिल्ली में क्या है। गांव वाले सरकारी नौकरी को ही वरीयता देते हैं और मुझे कहते हैं कि तुम कुछ नहीं कमाते हो। कमाते तो घर पक्क्ी इंट का होता और मां बाप को भी काफी पैसे होते। तुमसे तो अच्छा गांव का दिनेशवा है, जो रोज मजदूरी करता है और अपने फादर का खयाल रखता है। बताओ कहां दिनेशवा चमार और कहां हम। है कहीं तुलना। इसी कारण तुलसीदास कहते हैं कि तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम। गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम। मैं इसी कारण सभी को छोड दिया। मैं सोच में पड गया कि है तो तुलसीदास का कथन, लेकिन संदर्भ कुछ और था। वे उन दो साथियों को समझा रहे थे, जो उन्हें अभी तक बच्चा और अनपढ ही समझ रहे थे। धन्य हो ऐसी पढाई का, जो अपनी सुविधा के अनुरूप शब्दों के अर्थ गढ लेते हैं।
शनिवार, 21 जुलाई 2012
3 इडियट्स पर फनी निबंध
स्कूल में एक बच्चे को जीके के पेपर में फिल्म 3 इडियट्स से मिलने वाली प्रेरणा पर संक्षिप्त निबंध लिखने को कहा गया। बच्चे ने फिल्म 3 इडियट्स पर निंबध लिखा जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं।1. 3 इडियट्स से हमें यह पता चलता है कि इंजीनियरिंग करते हुए भी मेडिकल कॉलेज की लड़की पटाई जा सकती है।
2. इस मूवी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कॉलेज के पहले दिन अंडरवियर जरूर पहनना चाहिए।
3. इस फिल्म से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि कॉलेज के प्राचार्य की लड़की को भी सेट कर सकते हैं।
4. 3 इडियट्स से हमें यह पता चलता है कि सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, इंजीनियर भी महिला की डिलीवरी करवा सकता है।
5. 3 इडियट्स से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किस करते वक्त नाक बीच में नहीं आती।
6. इस फिल्म से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हिन्दी का अधूरा ज्ञान खतरनाक हो सकता है। चमत्कार कभी भी 'बलात्कार' में बदल सकते हैं।
7. इस फिल्म से हम सीखते हैं कि अगर एक्ज़ीमा क्रीम खत्म हो जाए तो खुजाने के लिए घर के बेलन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
8. इस फिल्म से हमें दोस्त की गर्लफ्रेंड पर लाइन नहीं मारने की भी प्रेरणा मिलती है।
9. अंत में हमें बड़ी शिक्षा ये मिलती है कि फिल्म के ये सभी आइडियाज अपना लो, लोग कहेंगे जहांपनाह तुसी ग्रेट हो, तोहफा कबूल करो।
शुक्रवार, 2 मार्च 2012
सात वचनों से बंधी है डोर
शास्त्रानुसार
''यावत्कन्या
ना वामांगी तावत्कन्या कुमारिका" अर्थात् जब तक कन्या वर के वाम भाग यानी
बाएं भाग की अधिकारिणी नहीं होती.तब तक वह कुमारी ही है. अग्नि की परीक्रमा तथा
सप्तपदी के पश्चात वर जब कन्या को अपनी बायीं ओर आसन ग्रहण करने को कहता है, तो कन्या वर से सात वचन लेती है, जो इस प्रकार हैं :
हे
स्वामी,
1. यदि तीर्थ, व्रत उद्दापन, यज्ञ, दान आदि कार्यों में मुझे साथ रखें या इन कार्यो के लिए मेरी सहमति लें,तो मैं आप के वामांग में आऊं.
2. यदि आप देवताओं को हव्य तथा पितरों को कव्य देकर संतुष्ट करते रहें, तो मै आपके वामांग बैठूं.
3. यदि आप परिवार की रक्षा एवं पशुओं का परिपालन करते रहें, तो मैं आपके वामांग आऊं.
4. यदि आप आय,व्यय, धन-धान्य आदि से सम्बन्धित कार्यो को मुझसे पूछकर करें तथा मुझे घर में रखें, तो मैं आपके वामांग बैठूं.
5. यदि देवालय, तालाब, कुआं, बावड़ी आदिका निर्माण कराते तथा उनका पूजन करते समय आप मेरी सहमति लें तो मैं आप के वामांग आऊं.
6. यदि देश अथवा विदेश में आप जो क्रय-विक्रय करें, उससे प्राप्त धन मुझे दें तो मैं आपके वामांग आऊं.
7. यदि आप किसी परस्त्री से प्रेम और उसका सेवन ना करें, तो मैं आपके वामांग आऊं.
कन्या के इन सप्त वचनों के प्रत्युत्तर में वर भी कन्या से सात वचन लेता है. जो क्रमश: निम्न हैं.
1. यदि तीर्थ, व्रत उद्दापन, यज्ञ, दान आदि कार्यों में मुझे साथ रखें या इन कार्यो के लिए मेरी सहमति लें,तो मैं आप के वामांग में आऊं.
2. यदि आप देवताओं को हव्य तथा पितरों को कव्य देकर संतुष्ट करते रहें, तो मै आपके वामांग बैठूं.
3. यदि आप परिवार की रक्षा एवं पशुओं का परिपालन करते रहें, तो मैं आपके वामांग आऊं.
4. यदि आप आय,व्यय, धन-धान्य आदि से सम्बन्धित कार्यो को मुझसे पूछकर करें तथा मुझे घर में रखें, तो मैं आपके वामांग बैठूं.
5. यदि देवालय, तालाब, कुआं, बावड़ी आदिका निर्माण कराते तथा उनका पूजन करते समय आप मेरी सहमति लें तो मैं आप के वामांग आऊं.
6. यदि देश अथवा विदेश में आप जो क्रय-विक्रय करें, उससे प्राप्त धन मुझे दें तो मैं आपके वामांग आऊं.
7. यदि आप किसी परस्त्री से प्रेम और उसका सेवन ना करें, तो मैं आपके वामांग आऊं.
कन्या के इन सप्त वचनों के प्रत्युत्तर में वर भी कन्या से सात वचन लेता है. जो क्रमश: निम्न हैं.
हे
प्रिये,
1. यदि तुम हमारे कुलधर्म को धारण करोगी .
2. हमारे कुटुम्ब से मीठी वाणी में वार्तालाप करोगी.
3. क्रोध तथा आलस्य का निवारण करोगी.
4. सबको सुख दोगी.
5. शास्त्रों के पठन- पाठन में रुचि लोगी.
6. वृध्दजनों के अनुशासन को स्वीकार करती हुई सदैव धर्म का पालन करोगी.
7. यदि तुम मेरे मनके अनुसार चलोगी तथा सदैव मेरी आज्ञा का पालन करती हुई पतिव्रत धर्म का पालन करोगी, तो मैं तुम्हारी सब बातें स्वीकार करता हूं.
1. यदि तुम हमारे कुलधर्म को धारण करोगी .
2. हमारे कुटुम्ब से मीठी वाणी में वार्तालाप करोगी.
3. क्रोध तथा आलस्य का निवारण करोगी.
4. सबको सुख दोगी.
5. शास्त्रों के पठन- पाठन में रुचि लोगी.
6. वृध्दजनों के अनुशासन को स्वीकार करती हुई सदैव धर्म का पालन करोगी.
7. यदि तुम मेरे मनके अनुसार चलोगी तथा सदैव मेरी आज्ञा का पालन करती हुई पतिव्रत धर्म का पालन करोगी, तो मैं तुम्हारी सब बातें स्वीकार करता हूं.
इन वचनों
के पश्चात ही वर-कन्या पति-पत्नी हो जाते हैं. पति-पत्नी की एक-दूसरे के प्रति यह
वचनबध्दता ही उनके सुखी एवं समृध्द जीवन का आधार बनती है.
सुखी विवाह का विज्ञान
क्या वजह है कि कुछ दंपत्तियों का वैवाहिक जीवन विवाह के
वर्षों बाद भी पहले जैसा ही बना रहता है. कुछ दंपत्ति विवाह के कुछ समय बाद ही अलग
हो जाते हैं परंतु कुछ दंपत्तियों के लिए वह जन्मों का बंधन बन जाता है.
विवाह नामक प्रथा "विश्वास' और "वचनबद्धता' पर आधारित होती है.
विपरित लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षित होना हमारे जीन में है, परंतु अपनी भावनाओं पर काबू पाना जिनेटिक्स तथा अन्य कारकों
पर निर्भर करता है और यही सफल विवाह का विज्ञान भी है.
कुछ पुरूष और महिलाएँ अपने साथी को धोखा दे सकती हैं परंतु
कुछ दम्पत्ति "विपरित लिंग के शारीरिक आकर्षण' को सीमित रख पाने में
सफल रहते हैं. ऐसा किसलिए होता है? इस सवाल का जवाब पाने
के लिए कई शोधकर्ता अपने अपने तरीके से शोध कर रहे हैं. इस सवाल का जवाब जिनेटिक्स
और बायोलोजी से मनोविज्ञान तक जुड़ा हुआ है और इस पर गहन अध्ययन करने की आवश्यकता
है.
अब तक हुई शोधों के नतीजे बताते हैं कि कुछ लोग प्राकृतिक रूप
से 'आकर्षण" के प्रति सचेत होते हैं. परंतु इसके साथ ही
दिमाग को इसके लिए प्रशिक्षित भी किया जा सकता है.
न्यूयार्क टाइम्स की खबर के अनुसार मैकगिल विश्वविद्यालय के
जॉन लिडोन ने इस विषय पर एक सर्वे किया. सर्वे के माध्यम से यह जाना गया कि आदर्श
दम्पत्तियों के जीवन पर 'क्षणिक विपरित आकर्षण" का कितना प्रभाव पड़ता है.
इस सर्वे के लिए कुछ
वचनबद्ध विवाहित पुरूषों और महिलाओं का चयन किया गया और उन्हें उनसे विपरित लिंग
के लोगों की तस्वीरें दिखाई गई,
और कहा गया कि वे इनमें से सुंदर
व्यक्तियों के पहचान करें. इन लोगों ने जाहिर तौर पर सुंदर माने जा सकने वाले
लोगों को चुना. इसके कुछ दिन बाद इन लोगों को फिर से वही तस्वीरें दिखाई गई और वही
सवाल पूछा गया परंतु इस बार कहा गया कि तस्वीरों में से चुने गए लोग आपसे मिलना भी
चाहेंगे. इस बार इन लोगों ने उन तस्वीरों को कम अंक दिए जिनको पहले अधिक अंक दिए
थे.
यानी कि इन लोगों का दिमाग इस तरह से प्रशिक्षित होता है कि
वह विपरित लिंग के आकर्षक व्यक्ति की तरफ आकर्षित तो होता है परंतु जैसे ही उसे
लगता है कि उस व्यक्ति की वजह से उनका वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ सकता है तो
"वह इतनी भी सुंदर नहीं" का अलार्म बज जाता है.
डॉ. लिडोन के अनुसार - आप जितने वचनबद्ध और अपने रिश्ते के
प्रति इमानदार होते हैं, आप उतना ही उन लोगों से दूर होते रहते हैं जिनकी वजह से आपका
वैवाहिक जीवन खतरे में पड़े.
हमारा दिमाग इसके लिए प्रोग्राम किया हुआ होता है. यह
अनुवांशिक रूप से भी हो सकता है और इसके लिए दिमाग को प्रशिक्षित भी किया जा सकता
है
Nowhere in the whole
world, nowhere in any religion, a nobler, a more beautiful, a more perfect
ideal of marriage than you can find in the early writings of Hindus- Annie
Besant
सदस्यता लें
संदेश (Atom)