बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

औरत पुरानी नहीं

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

अपनी पहचान खुद बनो

संसार का नियम है कि खुद को बदलो अन्‍यथा टूट जाओगे। लेकिन जो पहले से टूटा हुआ हो, उसे बदलने से क्‍या फायदा। मेरे साथ भी इसी तरह की बातें लागू होती है। मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीता हूं। मजा आता है मुझे। यदि कोई बदलने के लिए कहता है, तो उनके कहने से नहीं बदलता, लेकिन हां, उससे दूर अवश्‍य हो जाता हूं। इसे आप घमंडी स्‍वभाव कह सकते हैं। एक दिन की बात है। कॉलेज में पढाई कर रहा था। पढने में औसत था। एक लडकी के प्रति अनायास ही आकर्षित हो गया। उसे पाने के लिए अपना सबकुछ बदल दिया, लेकिन सफलता नहीं मिली। उसी दिन से कसम खयया कि मैं अब लोगों को खुश रखने के लिए नहीं बदलूंगा। नए दोस्‍त बनाने के लिए नहीं बदलूंगा अपने आपको। खुद की एक पहचान बनाउंगा, जो हमारी पहचान होगी। इसे पालन करने में अनेक तरह की समस्‍याएं भी आई। जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, तो हालत यह थी कि मेरे साथ कोई भी रूम पार्टनर नहीं रहना चाहता था। इसका प्रमुख कारण यह था कि मैं शारीरिक रूप से अक्षम था। लोग हमें जानते नहीं थे।मेरा वहां कोई नहीं था। आर्थिक कंडीशन ऐसी नहीं थी कि अकेले रह सकूं। अंत में मैंने खुद को मजबूत बनाने के लिए बदला और कम से कम 18 घंटे की पढाई दो महीने तक की। हालात ऐसे हो गए कि आसपास मेरा नाम हो गया कि यह लडका काफी पढता है। इतनी पढाई कोई नहीं कर सकता। आप यकीन न मानिए लेकिन हकीकत यह है कि मेरे कई अच्‍छे दोस्‍त हो गए और मेरा रूम पार्टनर भी मिल गया। इससे आत्‍मविश्‍वास काफी बढ गया और उसके बाद से पीछे मुडकर नहीं देखा। आज तक यह जारी है::::::::::       

शनिवार, 29 सितंबर 2012


क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं!
याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से 
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
जिंदगी इम्‍तहान लेती है। जब दो क्‍लास में था, तभी ये शब्‍द मेरे कानों में गुंजे थे, लेकिन उसका अर्थ अब समझ में आ रहा है। नौकरी करते हुए दस वर्ष बीत गए हैं। इध से न जाने अतीत की बातें खूब याद आ रही है। कभी कभी तो ऐसा होता है कि रात भर सोचते सोचते सुबह हो जाती है। अगणित अवसादों के क्षण हैं। दुख की दिल भारी कर जाती है। वैसे तो हर व्‍यक्‍ति संघर्ष करता है और संघर्ष करके जीवन को सुवासित बनाता है, लेकिन मुझे अन्‍य लोगों से अधिक ही संघर्ष करना पड रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण लाख कोशिशों के बावजूद खुद को संभाल नहीं पाता हूं मैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मैं अपने से कई लोगों से दूर होता जा रहा हूं। कल पटना से सुपर थर्टी के संस्‍थापक आनंद आए थे। वे अच्‍छे दोस्‍त हैं और जरूरत के समय हमेशा सहयोग करते हैं। मैं उन्‍हें देखा हूं, क्‍योंकि वे पब्‍लिक फीगर हैं, लेकिन वे मुझे सिर्फ नाम से जानते हैं। कानपुर आने से पहले और जाने के बाद भी वे लगभग दस बार फोन किए होंगे, मुझसे मिलने के लिए, लेकिन मैं उनसे जानकर भी इस कारण नहीं मिला कि मुझे डर था कि यदि वे मुझे देख लेंगे, तो बाद मेरे संबंध पहले की तरह नहीं रह पाएंगे। आप कह सकते हैं कि आपको जाना चाहिए, क्‍योकि वे शक्‍ल देखकर नहीं अपितु आपके विचारों का दोस्‍त है। लेकिन न जाने हमें इतना डर लगता है कि मैं चाहकर भी नहीं जाता हूं। भविष्‍य में कई अनहोनी घटना घटी है, जिसे यदि याद करूं, तो समय ही बर्बाद हो जाए। अंत में हारकर बचचन जी की पंक्‍ति ही सहारा देती है
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को 
किन-किन से आबाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
याद सुखों की आँसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूँ जब अपने से 
अपने दिन बर्बाद करूँ मैं!
क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!
दोनों करके पछताता हूँ,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूँ,
सुधियों के बंधन से कैसे 
अपने को आज़ाद करूँ मैं!

क्या भूलूँ, क्या याद करूँ मैं!

सोमवार, 27 अगस्त 2012

होके मायूस न आंगन से उखाड़ो पौधे, धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।


मिल ही जाएगी ढूंढने वाले को बहार,
हर गुलिस्तां में खिजां हो यह जरूरी नहीं।

-'इकबाल'

1. खिजां - पतझड़ की ऋतु 'इकबाल' 

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मेरे दिले-मायूस में क्यों कर न हो उम्मीद,
मुरझाए हुए फूलों में क्या बू नहीं होती।

-'अख्तर' अंसारी

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मेरे दोस्तों की दिलआजारियों में,
मेरी बेहतरी की कोई बात होगी।

-अब्दुल हमीद 'अदम'

1.दिलआजारी- कोई ऐसी बात कहना या करना, जिससे किसी का दिल दुखे, सताना, कष्ट देना 
हजार बर्क गिरें, लाख आंधियां उठें,
वह फूल खिल के रहेंगे, जो खिलने वाले हैं।
-'साहिर' लुधियानवी

1.बर्क - बिजली
होके मायूस न आंगन से उखाड़ो पौधे,
धूप बरसी है तो बारिश भी यहीं पर होगी।

उसके दामन में अगर शब हैं, सितारे भी तो हैं,


अदा परियों की, सूरत हूर की, आंखें गिजालों की,
गरज माँगे कि हर इक चीज हैं इन हुस्न वालों की।

-हाफिज जौनपुरी

1.हूर - स्वर्ग में रहने वाली सुन्दर स्त्री, स्वर्गांगन 2. गिजाल - हिरण का बच्चा, मृगशावक

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अदा निगाहों से होता है फर्जे-गोयाई,
जुबां की हद से जब शौके-बयां गुजरता है।

1 फर्जे-गोयाई- बात कहने का फ़र
ज़

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अश्क बनकर आई हैं वह इल्तिजाएं चश्म तक,
जिनको कहने के लिए होठों पै गोयाई नहीं।

-आनन्द नारायण मुल्ला
 
1.इल्तिजाएं - प्रार्थनाएं, दरखास्त
2.चश्म - आँख, नेत्र 3.गोयाई - बोलने की ताकत

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असर न पूछिए साकी की मस्त आंखों का,
यह देखिये कि कोई होशमंद बाकी है।
-हफीज जौनपुरी

उम्मीद वक्त का सबसे बड़ा सहारा है,
गर हौसला है तो हर मौज में किनारा है।

-'साहिर' लुधियानवी
इक नई बुनियाद डालेंगे तजस्सुम की 'शफा'
हर गुबारे-कारवां में कारवाँ ढूढ़ेंगे हम।
-'शफा' ग्वालियरी 

1. तजस्सुम - खोज, तलाश।



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उसके दामन में अगर शब हैं, सितारे भी तो हैं,
गर्दिशे-अफलाक से मायूस होना छोड़ दे।

1.गर्दिशे-अफलाक - दैवी प्रकोप, आसमान से आने वाली मुसीबत

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एक हैं दोनों, यास हो कि उम्मीद,
एक तड़पाए, एक बहलाए।
-तमकीन सरमस्

1.यास - निराशा, नाउम्मेदी

कांटों पर अगर चलना ही पड़े,
मायूस न हो जाना राही,
जब फूल हों दिल के दामन में,
फिर क्या है जो इन्सां कर न सके।

खिजां अब आयेगी तो आयेगी ढलकर बहारों में,
कुछ इस अन्दाज से नज्मे-गुलिस्तां कर रहा हूँ मैं।
-'शफक' टौंकी

1.खिजां - पतझड़ की ऋतु 2. नज्म - प्रबन्ध, व्यवस्था 

जो गम हद से जियादा हो, खुशी नजदीक होती है,
चमकते हैं सितारे रात जब तारीक होती है।

-'अपसर' मेरठी

1.तारीक - अंधेरी
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।
-फैज अहमद 'फैज'
नई सुबह पर नजर है मगर आह यह भी डर है,
यह सहर भी रफ्ता-रफ्त कहीं शाम तक न पहुंचे।

-शकील बंदायुनी
1.सहर - सुबह, प्रातः 2.रफ्ता-रफ्त - अहिस्ता-अहिस्ता, धीरे -धीरे 

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम।

तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम। 
गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम
कुछ दिनों पहले दिल्‍ली गया था। वहां अपने परिवार के साथ ही दोस्‍तों से मिला। एक दोस्‍त कई वर्षों से घर नहीं गया है। पूछा तो बताया कि सभी संबंध स्‍वार्थ पर अवलंबित हैं। माता पिता सभी तभी तक प्‍यारे होते हैं, जब तक उन्‍हें कुछ देते रहो। मैं यहां दिल्‍ली में 25 लाख का एक फ़लैट भी नहीं ले पा रहा हूं और वे वहां पर रहने के लिए हमसे पैसे की डिमांड करते हैं। मैंने कहा कि ठीक ही तो है। तुम इकलौता बेटा हो, तुम्‍हें मदद करनी चाहिए। वह तिलमिला उठा और मेरे हाथ से कप की प्‍याली छिनने लगा। फिर रूक गया यह सोचकर कि मैं उसी के घर में चाय पी रहा था। खैर मैं भी बात को बढ1ाने के चक्‍क्‍र में उससे कहा कि जननी और जन्‍म भूमि स्‍वर्ग के समान होता है। वहां की खूशबू ही लोगों का मन मो ह लेती है। इस कारण वहां अवश्‍य जाना चाहिए। इस पर उन्‍होंने तुलसीदास की उपर वाली पंक्‍ति सुनाई और अर्थ समझाते हुए कहा कि गांव वाले को पता ही नहीं कि मैं कितना कमाता हूं और हमारी हैसियत दिल्‍ली में क्‍या है। गांव वाले सरकारी नौकरी को ही वरीयता देते हैं और मुझे कहते हैं कि तुम कुछ नहीं कमाते हो। कमाते तो घर पक्‍क्‍ी इंट का होता और मां बाप को भी काफी पैसे होते। तुमसे तो अच्‍छा गांव का दिनेशवा है, जो रोज मजदूरी करता है और अपने फादर का खयाल रखता है। बताओ कहां दिनेशवा चमार और कहां हम। है कहीं तुलना। इसी कारण तुलसीदास कहते हैं कि तुलसी वहां न जाइए, जन्मभूमि के ठाम। गुण-अवगुण चीह्ने नहीं, लेत पुरानो नाम। मैं इसी कारण सभी को छोड दिया। मैं सोच में पड गया कि है तो तुलसीदास का कथन, लेकिन संदर्भ कुछ और था। वे उन दो साथियों को समझा रहे थे, जो उन्‍हें अभी तक बच्‍चा और अनपढ ही समझ रहे थे। धन्‍य हो ऐसी पढाई का, जो अपनी सुविधा के अनुरूप शब्‍दों के अर्थ गढ लेते हैं।  

शनिवार, 21 जुलाई 2012

3 इडियट्स पर फनी निबंध

स्कूल में एक बच्चे को जीके के पेपर में फिल्‍म 3 इडियट्स से मिलने वाली प्रेरणा पर संक्षिप्त निबंध लिखने को कहा गया। बच्चे ने फिल्‍म 3 इडियट्स पर निंबध लिखा जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं। 

1. 3 इडियट्स से हमें यह पता चलता है कि इंजीनियरिंग करते हुए भी मेडिकल कॉलेज की लड़की पटाई जा सकती है। 

2. इस मूवी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कॉलेज के पहले दिन अंडरवियर जरूर पहनना चाहिए। 

3. इस फिल्‍म से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि कॉलेज के प्राचार्य की लड़की को भी सेट कर सकते हैं। 

4. 3 इडियट्स से हमें यह पता चलता है कि सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, इंजीनियर भी महिला की डिलीवरी करवा सकता है। 

5. 3 इडियट्स से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किस करते वक्त नाक बीच में नहीं आती। 

6. इस फिल्म से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हिन्दी का अधूरा ज्ञान खतरनाक हो सकता है। चमत्कार कभी भी 'बलात्कार' में बदल सकते हैं। 

7. इस फिल्म से हम सीखते हैं कि अगर एक्ज़ीमा क्रीम खत्म हो जाए तो खुजाने के लिए घर के बेलन का इस्तेमाल किया जा सकता है। 

8. इस फिल्म से हमें दोस्त की गर्लफ्रेंड पर लाइन नहीं मारने की भी प्रेरणा मिलती है। 

9. अंत में हमें बड़ी शिक्षा ये मिलती है कि फिल्‍म के ये सभी आइडियाज अपना लो, लोग कहेंगे जहांपनाह तुसी ग्रेट हो, तोहफा कबूल करो।