बुधवार, 20 मार्च 2013

वर्ग करने के लिए एक आसान विधि


जिन संख्याओं के पीछे 5 आता है उन का वर्ग करने के लिए एक आसान विधि का यहाँ वर्णन है| 

जैसे 15 का वर्ग 15 x 15= 225

इकाई का अंक 1 और इकाई के अंक से 1 ज्यादा यानी 2 की गुणा 

1 x (1+1)= 1 x 2=2 लेकर और दायीं तरफ हर बार 25 ही होगा =225

अब 2-5 का वर्ग,

2 x (2+1)= 2 x 3=6 बाद में 25 यानी हो गया 625

अब 35 का वर्ग,

3 x (3+1)= 3 x 4=12 बाद में 25 यानी हो गया 1225  

अब 45 का वर्ग,

4 x (4+1)= 4 x 5=20 बाद में 25 यानी हो गया 2025

अब 55 का वर्ग,

5 x (5+1)= 5 x 6=30 बाद में 25 यानी हो गया 3025

अब 65 का वर्ग,

6 x (6+1)= 6 x 7=42 बाद में 25 यानी हो गया 4225  

(n5)2 = n x (n+1) बाद में 25 यानी हो गया = {n x (n+1)} व 25 
जहां n=1,2,3,4,5 ------------

पहाड़े किस प्रकार लिखते हैं।


हमारे देश में गणित को हम हमेशा कठिन विषय मानते हैं पर यह बात गलत है। गणित से सरल कोई विषय नहीं है। 

गणित के ही शब्द में उसका अर्थ छुपा है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि गणित में पहाड़े किस प्रकार लिखते हैं। 

छोटी क्लास के बच्चों को पहाड़े कठिन पड़ते हैं। पर उनको सरल बनाया जा सकता है। 

माना आपको 12 तक पहाड़े याद हैं। उसके बाद आपको 13 का पहाड़ा लिखना है तो आप 12 के पहाड़े के प्रत्येक अंक में 1 से 10 तक की गिनती जोड़ते जाओ तो आगे के पहाड़े बनते जाएंगे। 

जैसे -
12 13
24 26
36 39
48 52
60 65
72 78
84 91
96 104
108 117
120 130 

- श्रीराम श्रीकार

बुधवार, 9 जनवरी 2013

आचार्य चाणक्य



सिंहादेकं वकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्वायसात्पञ्च शेक्षेच्च षट् शुनस्वीणि गर्दभात्।।

          ‘‘मनुष्य को शेर से एक, बगुले से एक तथा मुर्गे से चार, कौऐ से पांच, कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण ग्रहण करना चाहिए।’

प्रभूतं कार्यमल्पं चन्नर, कर्तुमिच्छति।सर्वारम्भेण तत्कार्य सिंहादेकं प्रचक्षते

             ‘‘बड़ा हो या छोटा कार्य उसे संपन्न करने के लिये पूरी शक्ति लगाना शेर से सीखना चाहिए।’’

इंद्रियाणि च संयम्य वकवत् पण्डितो नरः।देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।।

             ‘‘बगुले की भांति अपनी इंद्रियों को वश मे कर देश काल अपने बल को जानकर ही अपने सारे कार्य करना चाहिए।’

‘‘प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बंधुषुस्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।।

      ‘‘ठीक समय पर जागना, सदैव युद्ध के लिये तैयार रहना, बंधुओं को अपना हिस्सा देना और आक्रामक होकर भोजन करना मुर्गे से सीखना चाहिए।

गूढमैथनचरित्वं च काले काले च संग्रहम।अप्रमत्तमविश्वासं पञ्च शेक्षेच्च वायसात्।।

               ‘‘छिपकर प्रेमालाप करना, ढीठता दिख्.ाना, नियम समय पर संग्रह करना सदा प्रमादरहित होकर जागरुक रहना तथा किसी पर विश्वास न करना ये पांच गुण कौऐ से सीखना चाहिए’’

बह्वाशी स्वल्पसंतुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनःस्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः।।

          ‘‘बहुत खाने की शक्ति रखना, न मिलने पर भी संतुष्ट हो जाना, खूब सोना पर तनिक आहट होने पर भी जाग जाना, स्वामीभक्ति और शूरता यह छह गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।

सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न च पश्यति।संतुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्।।

       ‘‘बहुत थक जाने पर भी भार उठाना, सर्दी गर्मी से बेपरवाह होन और सदा शांतिपूर्ण जीवन बिताना यह तीन गुण गधे से सीखना चाहिए।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

बुजूर्ग बोझ नहीं है



जब मैं बच्‍चा था
दिल का सच्‍चा था
खेला करता था
अपने दरवाजे पर ।
किसी तरह का कोई गम नहीं था
भविष्‍य की कोई योजना नहीं थी
पढाई का कोई टेंशन नहीं था ।
पैरेंट़स और दोस्‍त ही अपने थे
जो पढाई करने के लिए कहते थे
वे हमें दुश्‍मन लगते थे।
काफी कष्‍ट होता था हमें
सोचता कि वे हमसे बात न करें
हमें पढने के लिए न कहें
हमसे संबंध विच्‍छेद कर लें
लेकिन वे हमें पढने के लिए फिर से कहते
क्‍योंकि वे कहते कि हम अपने हैं।
उनकी बातों में हमें आत्‍मीयता नहीं लगती
मुझे लगता कि वे झूठ बोल रहे हैं।
लेकिन उनकी कमी महसूस हो रही है
तब जब वे नहीं हैं।
ऐसा क्‍यों होता है अक्‍सर कि
न रहने पर उनकी सभी बातें याद आती हैं
उनके साथ रहने को जी करता है।
उनके साथ खाने की इच्‍छा होती है
बातें करने की इच्‍छा होती है
लेकिन जब साथ रहते हैं तो
शहद की मक्‍खियों की भांति 
उन्‍हें घर से बाहर इसलिए निकाल देते हैं
क्‍योंकि वे बुजूर्ग हैं
काम करने लायक नहीं हैं
उनकी दिनचर्या अलग है
आधुनिक तिकडम नहीं है उनके पास
सिर्फ सच्‍ची श्रद़धा है अपने बच्‍चों के प्रति
जबकि उन्‍हीं की मार और वचन के बदौलत
आज हम अपने पैरों पर खडे होते हैं।
आखिर हम कब तक भूलते रहेंगे अपनों को
कब तक उन्‍हें बुजूर्ग होने पर बोझ समझेंगे
कब हम उसे परिवार का हिस्‍सा समझेंगे
कब उनसे प्‍यार करेंगे, जो उन्‍होंने हमसे किया था।


शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

नौकरी से पहले नौकरी के बाद


जब मैं पढाई कर रहा था
पापा पढा रहे थे
दोस्‍त क्रिकेट खेल रहे थे
मुझे भी खेलने की इच्‍छा हो रही थी
पापा बोले कि पढाई कर लो
फिर खूब खेलना नौकरी के बाद।
बाल मन सहसा ही यह कह उठा
क्‍या होता है नौकरी के बाद
कैसे मिलती है ये नौकरी
क्‍यों करते हैं लोग नौकरी।
मां बताई कि नौकरी जीवन की सच्‍चाई है
आगे बढने की सीढी है
अच्‍छी शादी की निशानी है।
नहीं करनी है हमें शादी
वो हमें कर देगी बर्बादी
मां से कर देगी अलग
हो जाउंगा लोगों से विलग।
मां गंभीर बन गई मेरी बातों से
पापा परेशान हो गए मां को देखकर
इन परिस्‍थितियों का फायदा उठाकर
चला गया मैं क्रिकेट खेलने
उन दोनों में लंबी बातचीत चली
क्‍या हुई हमें पता नहीं।
 सोते वक्‍त मां ने पूछी
किसने बताया तुम्‍हें ये सब
चाची और चाचा बात कर रहे थे ये सब
मां को जान में जान में जान आई
बोली कि पापा भी तो नौकरी करते हैं
दादी और दादा भी तो साथ रहते हैं।
 कहां हैं किसी से अलग
नौकरी के बाद खेती भी करते हैं अलग
खानपान भी है औरों से अलग
बातों में गहराई है अलग
भीड में दिखते हैं सबसे अलग।
उसके बाद नौकरी करने की इच्‍छा होने लगी
भीड से अलग दिखने की लालसा होने लगी
  पढाई करने में मन लगने लगा
बाद में नौकरी भी मिल गई।
नौकरी के बाद
नहीं रहा पहले की तरह नजारा
मैं नहीं रह सका सबका प्‍यारा
लोगों की उम्‍मीदे मुझसे बढ गई
मैं उम्‍मीदों के नीचे दब गया।
पत्‍नी कहती है कि क्‍या कमाते हो
बॉस कहते हैं कि तुम क्‍या करते हो
बेटा कहता है कि कम पैसे में कैसे मैं पढूंगा
चिंटू पढाई में आगे निकल जाएगा
मैं आपकी तरह पीछे ही रह जाउंगा।
शारीरिक स्‍थिति ऐसी है कि कुछ अतिरिक्‍त नहीं कमा सकता
पैसे इतने कम हैं कि एक बच्‍चे नहीं पढा सकता
लोगों के साथ दोडना तो दूर साथ नहीं चल सकता।  
बीबी कहती है कि इस नौकरी से तो बेगार भला
इतने कम पैसे में किसका होगा उपकार भला।
नौकरी के बाद अब इस कदर मुहाल हो चुकी है जिंदगी
जी तो रहा हूं लेकिन जीने की लालसा नहीं
रो तो रहा हूं लेकिन रोने की इच्‍छा नहीं
चल तो रहा हूं लेकिन चलने की इच्‍छा नहीं
नौकरी तो कर रहा हूं लेकिन नौकरी करने की इच्‍छा नहीं।
खुद को वक्‍त के हवाले छोडकर
सुख के सारे सपने भूलकर
मां बाप और बंधु बांधव को छोडकर
अपनी गांव की मिटटी को भूलाकर
नौकरी इसलिए कर रहा हूं
कि कहते हैं नौकरी करते ही प्राण चल जाए
तो बेटे को नौकरी मिल जाती है।
बीवी को पेंशन मिल जाती है
घर में काफी धन आ जाते हैं
पडोसी भी कुछ दिन रोने के बाद
प्रशंसा करने लगते हैं और कहते हैं कि
अच्‍छा था वह बंदा
मरने के बाद भी घर में सबकुछ दे गया।  
एक मेरा है रिटायर्ड बुढा
नौकरी के समय और नौकरी के बाद भी कंगाली लेकर आया है
खुद को पेंशन से खाता है बच्‍चों से मजदूरी करवाता है।
हैकडी अलग दिखाता है और खेती भी खुद करता है।
कोई चिंता नहीं है उन्‍हें अपने बच्‍चे की
काश वे भी नौकरी करते हुए मर जाते तो
नहीं देखने पडते ये दिन।
कहीं लौटा दे मुझे ससुर के नौकरी वाले दिन।






   
  


  


  

दादी कहां गई मेरे सोने के बाद


मां के जाने के बाद, सूर्य उदय होने के बाद
स्‍टेशन से आने के बाद
एक ही प्रश्‍न था कि
दादी कहां गई मेरे सोने के बाद।

वाइफ कल ही कह रही थी
कि कल वैभव पूछेगा दादी कहां गई मेरे सोने के बाद।   
 उसे कह दिया कि कुछ भी जवाब दे देना
लेकिन पता नहीं था कि यह प्रश्न मुझसे ही पूछ बैठेगा
 कहां गई और क्‍यों गई मेरे सोने के बाद।

छोटा बच्‍चा का सरल चेहरा देखकर
दादी के प्रति असीम प्रेम को देखकर
रोते हुए अपने बेटे को देखकर
कलेजा मुंह को आ गया
कुछ समझ नहीं पा रहा था मां के जाने के बाद। 

कहा कि चलो घूमकर आते हैं, खूब मस्‍ती करते हैं
रसगुल्‍ला खाते हैं, साइकल चलाते हैं
वह खुश होकर बोला कि दादी को भी साथ लेकर चलते हैं
फिर सहसा प्रश्न किया कि दादी कहां गई मेरे सोने के बाद।
लाख कोशिशों के बावजूद उसे समझा नहीं पा रहा था

 सारी उर्जा लगाकर भी सही उत्‍तर नहीं सूझ रहा था
कभी मां पर गुस्‍सा करता कि क्‍यों आई वह यहां 
तो कभी वैभव पर गुस्‍सा करता कि क्‍या रखा है दादी में।

लेकिन मैंने ही इन्‍हें दादी के प्रति प्‍यार सिखाया
वह नादान तो जानता भी नहीं था अपनी दादी को
सिर्फ अपनी मां और पिता उसे अपना लगते थे।
एक दिन गुस्‍सा में उसे स्‍वार्थी भी कहे थे 
 देखो लाख बताने के बावजूद दादी को नहीं जानता। 

वाइफ बोली कि चेहरा देखने के बाद पहचानेगा दादी को 
बच्‍चा अक्‍ल नहीं जानता लेकिन चेहरा पहचानता है
फिर हमें अपनी बचपन की यादें ताजा हो गई 
एक दिन चाची मां की साडी पहनकर बाहर गई 
मैं रो रोकर लोगों को परेशान कर दिया
मुझे लगा कि मेरी मां जा रही है
मैं चुप तभी हो पाया जब खुद मेरी मां आई।
      
वह बोली कि कुछ लाकर देगी तभी पहचानेगा दादी को 
अपनी गोद में बैठाकर टहलाएगी तभी जानेगा दादी को 
रात में सोते वक्‍त कहानी सुनाएगी तभी चाहेगा दादी को 
बच्‍चे तो बच्‍चे हैं, वे उन्‍हें ही जानते हैं, जो उन्‍हें कुछ देता है
प्‍यार से उसे पुचकारता है और टॉफी व मीठाई देता है।

बगल वाले मामा को भी मैं इसलिए चाहता था कि 
वह बिस्‍कुट लाते थे और हमें चॉकलेट देते थे
मां कहती थी कि यह स्‍वार्थी हो गया है 
मामा के सामने मां को भी नहीं पहचानता है
फिर मामा बोलते कि यह बाप पर गया है 
यह सुनकर पापा खुश हो जाते तो 
मेरी दादी रूष्‍ठ होकर बोलती कि 
नहीं बाबु सहाब यह नाना पर गया है 
इस बीच मैं चॉकलेट चट कर जाता 
फिर मां के गोद में बैठ जाता
मामा के बुलाने पर भी नहीं आता।

मां के आने से कुछ दिन पहले ही तो दादी के बारे में बताया था
उसे दादी से प्रेम करने के लिए सिखाया था
बडी मेहनत लगी थी उसे दादी के लिए प्रेम बढाने में
अब जब दादी के प्रति प्रेम का अंकुरन हो ही रहा था
कि दादी उससे अलग होकर गांव चली गई
वह अब भी बिलख बिलखकर रो रहा है
 सभी से यही प्रश्न कर रहा है कि
दादी कहां गई मेरे सोने के बाद   
आ भी जाओ दादी मेरे बुलाने के बाद। 
  








  

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

कुछ दिन पहले ही घर में मां आई थी


कुछ दिन पहले ही घर में मां आई थी
वैभव खुश था अपनी दादी को पाकर
वाइफ खुश थी अपनी सास से मिलकर
मां भी खुश थी नए वातावरण और नए लोगों से मिलकर
मैं खुश था सभी को देखकर।
सोच रहा था कि काश यह उत्‍सव हमेशा बनी रहे
सभी में खुशियों की चमक इसी तरह चमकती रहे।
लेकिन कुछ दिनों के बाद ही मैं परेशान हो गया मां से
मां भी परेशान होगी मेरे व्‍यवहार से
पत्‍़नी परेशान हो रही थी हम दोनों के व़यवहार से।
आपने क्‍यों बताया अपनी मां को
वह नारज होकर रो रही है।
मैं निरुत्‍तर था वाइफ के सामने
चाहकर भी कुछ नहीं कह पा रहा था
वो मौन को मेरा पाखंड समझ रही थी
मैं अपनी भावनाओं को काबू में रखकर कुछ बोलना चाहता था
लेकिन वह लगातार बोलती जा रही थी।
सफाई में कहा उनसे जाने का समय पूछ लिया।
कौन सा बडा अपराध किया।
अगर नहीं पूछता तो वह समय पर घर नहीं जा सकती
क्‍योकि बिहार जाने के लिए चार महीने पहले ही रिजर्वेशन बनाना पडता है।
वह नाराज इसलिए हो गई थी कि तुम घर जाने से दो दिन पहले रिजर्वेशन बनाते
मैं उन्‍हें यह समझा नहीं पाया कि रिजर्वेशन चार महीने पहले बनते हैं।
इसी बात पर तकरार थी।  
हम दोनों एक ही जगह रहना चाहते थे
लेकिन परिस्‍थितियां और वक्‍त हमें अलग करने पर तुली हुई थी।
मां को अपने गांव जाना था और मुझे बच्‍चे को पालने के लिए नौकरी करनी थी।
अंत में दुखी मन से मैं भी उसे विदा कर दिया और वह भी बुझी मन से गांव चली गई
कल फोन किया तो बोल रही थी कि पोते की याद आ रही है
उसे जल्‍द यहां लेते आना, मन नहीं लग रहा है उसके बिना
मैं सोचा कि उसके जाने के बाद भी तुम्‍हें मन नहीं लगेगा
इसलिए क्‍यों बुलाती हो तुम इन्‍हें।
लेकिन फिर सोचा कि मिलना बिछडना तो संसार का नियम है
तात्‍कालिक कष्‍ट के बाद सभी एक दूसरे को भूल जाते हैं
जैसे पिताजी के मरने के बाद अब हम उसे भूल गए हैं।