इन दिनों भूगोल की पढ़ाई नेता लोग बहुते अधिक कर रहे हैं. यदि नेता लोग इस तरह बतियाते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं, जब देश के सभी नेताओं को राजनीतिशास्त्र के बदले भूगोल पढ़ना अनिवार्य कर दिया जायेगा. आजकल जहां भी देखिये, नेता लोग भूगोल की ही बातें करते रहते हैं. वैसे भी राजनीतिशास्त्र में रखा ही क्या है कि नेता लोग इसे पढ़ें. आजकल भ्रष्टाचार नेताओं और जनता के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है, लेकिन इसका कोई समाधान इन किताबों में नहीं है. इसमें वही सब ज्ञान है, जो आज के नेता को मतलब नहीं है. जिन नेताओं को राजनीतिशास्त्र का थोड़ा बहुत भी ज्ञान है, वे सिर्फ नेतागिरी कर रहे हैं. इससे न तो वे अपने परिवार की भलाई कर पा रहे हैं और न ही देश की. हालात तो इतनी खराब हो गयी है कि इस तरह के नेताओं के आने से टीवी चैनल्स की टीआरपी भी नहीं बढ़ रही है. एक समय अन्ना आंदोलन के समय ईमानदार लोगों की किल्लत भी इसी तरह की हो गयी थी. उस समय ईमानदार न होने बावजूद जो भ्रष्टाचार और ईमानदारी के बारे में अच्छी स्पीच दे सकते थे, उन्हें हर टीवी चैनल्स बुलाते थे. अपनी वाकपटुता से आज वे राजनीति के अर्श पर हैं. वही हालात इस समय भूगोल विशेषज्ञ के बनते जा रहे हैं. इन दिनों उन नेताओं और एक्सपर्ट की बल्ले-बल्ले हो रही है, जिसे भूगोल का थोड़ा बहुत भी ज्ञान है. यदि भूगोल का ज्ञान नहीं भी है, लेकिन रट कर आ रहे हैं, उन्हें भी टीवी पर फोटू सहित दिखाया जा रहा है. चूंकि भूगोल नेताओं का कभी भी पसंदीदा विषय नहीं रहा था, इस कारण कुछ प्रधानमंत्री मैटेरियल्स वाले नेता ही भूगोल के बारे में जानते हैं और वे भूगोल को अपने हिसाब से बदलने की क्षमता भी रखते हैं. लोकसभा चुनाव नजदीक है और जिस तरह के चुनावी सर्वे आ रहे हैं, उससे हर एक पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री बनने का सपना आ रहा है. इस कारण सभी नेता न केवल भूगोल पढ़ रहे हैं, बल्कि भूगोल पढ़ कर टीवी पर एक्सपर्ट कमेंट भी दे रहे हैं, ताकि जनता को ये न लगे कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की क्वालिटी नहीं है. नेताओं के भूगोल पढ़ने का ही कमाल है कि सिर्फ भूगोल पढ़े ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि भूगोल बदले भी जा रहे हैं. जिसे भूगोल का जितना अधिक ज्ञान है, वे उसी तरह उनकी व्याख्या कर रहे हैं. वैसे भी आदर्श नेता वही होते हैं, जो भूगोल बदलने की क्षमता रखते हैं. पुराने जमाने में उन्हें बेहतर नेता माना जाता था, जो इतिहास बदलने की क्षमता रखते थे. बेचारा भूगोल सोशल साइंस का फेवरेट सब्जेक्ट होने के बावजूद दलित की तरह उपेक्षित ही बना रहा. वे सोशल साइंस का फेवरेट हिस्सेदार होने के बावजूद हमेशा इतिहास और राजनीतिशास्त्र से पिछड़ जाते थे. लेकिन देर ही सही, भूगोल ने अपनी एंट्री रितिक रोशन की कहो न प्यार है फिल्म की तरह जबरदस्त की है. कहो न प्यार है के बाद रितिक एकाएक तीनों खान का विकल्प बन गये थे और उनके बारे में बहुत सारे फिल्मी विशेषज्ञ उभर आये थे. एकाएक सभी टीवी चैनल्स के साथ ही नेताओं और इससे जुड़े लोगों के लिए हॉट विषय बन गया है भूगोल. खुद को इतनी महत्ता पा कर वह फूला नहीं समा रहा है. खुशी में वह अपना स्थान ही भूल गया है, जिसका लाभ आज के नेता लोग उठा रहे हैं. भूगोल को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि उसका स्थान कहां है. वे दल-बदलू की तरह अपनी सीट लगातार बदल रहे हैं और नेता लोग आपस में लड़ रहे हैं कि उन्होंने भूगोल बदला है. आप ही बताइये कि जब उन्हें पढ़ने तक का टाइम नहीं है, तो वह भूगोल कैसे बदल सकता है? वैसे भी कहा गया है कि जब तक आप नहीं बदलेंगे, आपको कोई नहीं बदल सकता है. भूगोल भी अपवाद नहीं है.
शनिवार, 30 नवंबर 2013
भूगोल पढ़िये, प्रधानमंत्री बनिये
इन दिनों भूगोल की पढ़ाई नेता लोग बहुते अधिक कर रहे हैं. यदि नेता लोग इस तरह बतियाते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं, जब देश के सभी नेताओं को राजनीतिशास्त्र के बदले भूगोल पढ़ना अनिवार्य कर दिया जायेगा. आजकल जहां भी देखिये, नेता लोग भूगोल की ही बातें करते रहते हैं. वैसे भी राजनीतिशास्त्र में रखा ही क्या है कि नेता लोग इसे पढ़ें. आजकल भ्रष्टाचार नेताओं और जनता के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है, लेकिन इसका कोई समाधान इन किताबों में नहीं है. इसमें वही सब ज्ञान है, जो आज के नेता को मतलब नहीं है. जिन नेताओं को राजनीतिशास्त्र का थोड़ा बहुत भी ज्ञान है, वे सिर्फ नेतागिरी कर रहे हैं. इससे न तो वे अपने परिवार की भलाई कर पा रहे हैं और न ही देश की. हालात तो इतनी खराब हो गयी है कि इस तरह के नेताओं के आने से टीवी चैनल्स की टीआरपी भी नहीं बढ़ रही है. एक समय अन्ना आंदोलन के समय ईमानदार लोगों की किल्लत भी इसी तरह की हो गयी थी. उस समय ईमानदार न होने बावजूद जो भ्रष्टाचार और ईमानदारी के बारे में अच्छी स्पीच दे सकते थे, उन्हें हर टीवी चैनल्स बुलाते थे. अपनी वाकपटुता से आज वे राजनीति के अर्श पर हैं. वही हालात इस समय भूगोल विशेषज्ञ के बनते जा रहे हैं. इन दिनों उन नेताओं और एक्सपर्ट की बल्ले-बल्ले हो रही है, जिसे भूगोल का थोड़ा बहुत भी ज्ञान है. यदि भूगोल का ज्ञान नहीं भी है, लेकिन रट कर आ रहे हैं, उन्हें भी टीवी पर फोटू सहित दिखाया जा रहा है. चूंकि भूगोल नेताओं का कभी भी पसंदीदा विषय नहीं रहा था, इस कारण कुछ प्रधानमंत्री मैटेरियल्स वाले नेता ही भूगोल के बारे में जानते हैं और वे भूगोल को अपने हिसाब से बदलने की क्षमता भी रखते हैं. लोकसभा चुनाव नजदीक है और जिस तरह के चुनावी सर्वे आ रहे हैं, उससे हर एक पार्टी के नेताओं को प्रधानमंत्री बनने का सपना आ रहा है. इस कारण सभी नेता न केवल भूगोल पढ़ रहे हैं, बल्कि भूगोल पढ़ कर टीवी पर एक्सपर्ट कमेंट भी दे रहे हैं, ताकि जनता को ये न लगे कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की क्वालिटी नहीं है. नेताओं के भूगोल पढ़ने का ही कमाल है कि सिर्फ भूगोल पढ़े ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि भूगोल बदले भी जा रहे हैं. जिसे भूगोल का जितना अधिक ज्ञान है, वे उसी तरह उनकी व्याख्या कर रहे हैं. वैसे भी आदर्श नेता वही होते हैं, जो भूगोल बदलने की क्षमता रखते हैं. पुराने जमाने में उन्हें बेहतर नेता माना जाता था, जो इतिहास बदलने की क्षमता रखते थे. बेचारा भूगोल सोशल साइंस का फेवरेट सब्जेक्ट होने के बावजूद दलित की तरह उपेक्षित ही बना रहा. वे सोशल साइंस का फेवरेट हिस्सेदार होने के बावजूद हमेशा इतिहास और राजनीतिशास्त्र से पिछड़ जाते थे. लेकिन देर ही सही, भूगोल ने अपनी एंट्री रितिक रोशन की कहो न प्यार है फिल्म की तरह जबरदस्त की है. कहो न प्यार है के बाद रितिक एकाएक तीनों खान का विकल्प बन गये थे और उनके बारे में बहुत सारे फिल्मी विशेषज्ञ उभर आये थे. एकाएक सभी टीवी चैनल्स के साथ ही नेताओं और इससे जुड़े लोगों के लिए हॉट विषय बन गया है भूगोल. खुद को इतनी महत्ता पा कर वह फूला नहीं समा रहा है. खुशी में वह अपना स्थान ही भूल गया है, जिसका लाभ आज के नेता लोग उठा रहे हैं. भूगोल को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि उसका स्थान कहां है. वे दल-बदलू की तरह अपनी सीट लगातार बदल रहे हैं और नेता लोग आपस में लड़ रहे हैं कि उन्होंने भूगोल बदला है. आप ही बताइये कि जब उन्हें पढ़ने तक का टाइम नहीं है, तो वह भूगोल कैसे बदल सकता है? वैसे भी कहा गया है कि जब तक आप नहीं बदलेंगे, आपको कोई नहीं बदल सकता है. भूगोल भी अपवाद नहीं है.
रविवार, 27 अक्टूबर 2013
आखिर गलती कहां हुई
यदि तुम नहीं बदलोगे, तो पीछे रह जाओगे. क्योंकि हर कोई उसी के साथ चलना चाहता है, जो खुद दौड़ना चाहता है. यह शब्द आचार्य जी के थे. वे पहले भी गांव में रहते थे और अब भी रह रहे हैं. स्कूल में हमलोंगों को गणित पढ़ाते थे. उन्हें दो बेटा और एक बेटी है. रिटायर्ड कर चुके हैं और अब उनके पास समय ही समय है बतियाने के लिए. इस बार घर गया था तो उनसे बात करने का अवसर मिला. मिलकर काफी खुश हुए. जब वे अपनी बारे में बताने लगो तो मेरा कलेजा मुंह को आ गया. मैं परेशान हो गया उनकी बातों पर. समझ में नहीं आ रहा था कि इतने प्रगतिशील और आधुनिक विचार रखनेवाले आचार्य जी की हाल भी ऐसी हो सकती है. सच कहूं तो इलाके भर में उनकी तूती बोलती है. उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई बच्चे को पढ़ाने में लगा दिये. बच्चे को पढ़ाने के लिये वे सभी से रिश्ता तोड़ लिये. वे हमेशा अपने बच्चे को यही शिक्षा देते थे कि तुम तीनों तभी एक साथ चल सकते हो, जब तीनो एक दूसरे को आगे बढ़ाने में सहयोग करोगे. उनकी इस बात को तीनों बच्चे गांठ बांध लिये और पढ़ाई में हमेशा अच्छा रहे. सामाजिक रिश्ता उनके लिये महत्वपूर्ण नहीं था. पढ़ाई ही महत्वपूर्ण थे. कहते हैं न कि खुदा देता है, तो छप्पड़ फाड़के देता है, वही आचार्य जी के साथ हुआ. उनका तीनों बच्च सेटल हो गया और दो बच्चा इंजीनियर और एक बेटी डॉक्टर बन गयी. समाज में आचार्य जी का रुतबा और हैसियत एकाएक बढ़ गया. अब उनके तीनों बच्चे विदेश में रह रहे हैं. रिटायर्ड के बाद वे भी बच्चे के साथ रहनेवाले थे. लेकिन एकाएक दो महीने में ही गांव आ गये और कभी भी विदेश नहीं जाने का मन भी बना लिये हैं. अब उन्हें पछतावा हो रहा है अपने किए पर. उन्हें यह दुख है कि वे अपने बच्चे के भविष्य के लिये सबको छोड़ दिये और उन्हें काबिल भी बनाया. लेकिन दुख है कि उनका बच्च उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. आचार्य जी बोले कि जब मैं अमेरिका अपने बेटा के पास गया तो वहां रहने लगा. वहां का लाइफस्टाइल अलग है और वहां लोग भी. मेरी पत्नी की तबियत खराब हो गयी. उसे डॉक्टर के पास दिखाना था. एक दिन वह डॉक्टर के पास ले गया. सुधार न होने पर मैं उसे किसी और डॉक्टर के पास दिखाने की सलाह दे डाली. इस पर वह काफी गुस्सा हो गया और बोला कि आप अपना केयर खुद करिये. आप लोगों को कोई उंगली पकड़कर नहीं चला सकता है. आपने ही कहा था कि यदि कोई साथ चल सकता है, तो चले अन्यथा उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही समझदारी है. आप हमारे साथ नहीं चल सकते हैं. इस कारण बेहतर होगा कि आप यहां से चले जाएं और मुङो आगे बढ़ने में सहयोग करें. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरा डॉयलॉग मेरे बच्चे मुझ पर इस तरह प्रयोग करेंगे. बच्चों को पढ़ाने के सिलसिले में मैं सभी रिश्ते तोड़ दिये. अब उन लोगों के साथ कोई संबध नहीं रहा. अब कोशिश कर रहा हूं तो वे लोग अवसरवादी कहकर संबंध तोड़ रहे हैं. वे अपनी जगह सही है, लेकिन मैं खुद को समझा नहीं पा रहा हूं कि मेरी गलती कहां हुई.
ब्रेकिंग न्यूज है
दस वर्ष दिल्ली में नौकरी करने के बाद पटना नौकरी करने के लिए आया. संयोग से दुर्गा पूजा में दो दिनों के लिए छुट्टी मिली. सुबह से फैलिन का कहर जारी था. इस कारण बीवी का बीपी लो था. ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है कि उसका बीपी नॉर्मल हो. बहुत खुश था कि इस बार मेले में जो पैसा चूना लगना था, वह बच गया. अभी तक कमरा भी नहीं मिला है. साले के यहां सभी फैमिली एक महीने से डेरा जमाए हुए हैं. डर लग रहा है कि वे गेट पर यह बोर्ड न लगा दे कि अतिथि कब भागोगे. बगल में प्रोफेसर कॉलोनी हैं, जहां किसी न किसी बात पर हर दिन वाद-विवाद होता रहता है. सोचा कि वहां बात भी हो जायेगी और रूम भी मिल जाएगा. वे सभी रिटायर्ड कर चुके हैं. इस कारण करेंट न्यूज पर पकड़ हमसे ज्यादा उनको रहता है. अखबार का एक कोना भी वे पढ़ने से नहीं छोड़ते हैं. टीवी इसलिए नहीं देख पाते हैं कि बीवी और पतौहू सीरियल देखने के लिए कहती है तो पोता काटरून देखने की जिद करने लगता है. न्यूज सुनने की आदत किसी को नहीं है. वे उसे बकवास समझते हैं. इस कारण वे लोग अखबार पढ़ते हैं. संयोग से उस दिन मैं भी उनके पास पहुंच गया. वे लोग मजाक के मूड में थे. समझ सकते हें कि अगर रिटायर्ड प्रोफेसर मजाक मूड में हो, तो कितने घातक होते हैं. मुङो देखकर सभी काफी खुश हुए. मुङो लगा कि जैसे मां दुर्गा का चढ़ावा मैं ही हूं. मुङो अंदर से अहसास हो गया कि आज दुर्गा मां के लिए बलि मैं ही चढ़नेवाला हूं. आओ पत्रकार साब आओ. आपकी कमी थी. क्या हाल है तुम्हारे फैलिन का. ब्रेकिंग न्यूज तो उड़ीसा में आने की थी, कई रिपोर्टर दस दिन पहले से वहां भौंक रहे हैं. लेकिन बिहार में किसी का पता नहीं है. कम से कम उड़ीसा वाले तो दो दिन पहले ही दशहरा मना लिए. लेकिन हम बिहारवाले तो कहीं के नहीं रहे. न खुदा ही मिला और न बिसाले सनम. लगता है कि यहां आने की खबर तूफान ने नहीं दिया होगा. यह कहकर सभी ठहाका लगाने लगे. खराब लगा, गुस्सा भी आया लेकिन फिर अपने को ऑल इज वेल कहकर कंट्रोल किया. एक प्रोफेसर ने पूछा कि ये बताओ पत्रकार क्या है, उसका शाब्दिक अर्थ क्या है. मैं बोला कि ये क्या बेहूदा सवाल है. ये भी कोई बताने की बात है. यह तो गली मुहल्ला का कुत्ता भी जानता है. मैं तैश में आकर कहा. वे बोले कि गुस्सा मत होओ. तुमने सही कहा कि आधी रात को जब तुम आते हो, तो गली मुहल्ले के कुत्ते ही जगे रहते हैं. इस कारण वे तुम्हारे बारे में अच्छी तरह से जानते हैं. और तुमलोगों को मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई में यह बताया जाता है कि अगर कुत्ता आदमी को काट ले, तो कोई खबर नहीं है, लेकिन अगर आदमी कुत्ता को काट ले, तो बहुत बड़ी खबर होती है. सही कहा न पत्रकार साब. मैं उनकी बातों पर कुछ भी नहीं बोल सका. वे बोले कि हमलोग सिर्फ अपनी जानकारी बढ़ाना चाहते हैं. एक हिंदी के प्रोफेसर थे. वे बोले कि भाई हिंदी में इसका अर्थ तो कहीं से भी लिखने पढ़ने से नहीं लगता है. पत्रकार का यदि अर्थ निकालें तो पत्र का मतलब चिट्रठी है, जो अब टेलीग्राम के बाद इतिहास बननेवाला है. अब कोई भी लेटर वेटर नहीं लिखता है. एक समय था कि पत्र में प्रेमिका अपनी वह बात भी लिख देती थी, जो वह अपने प्रेमी के सामने नहीं बोल पाती थी. प्रेमी एक पत्र को प्रमाण मानकर आजीवन कुंवारा रह जाता था. अपना सबकुछ उसे दे देता था. लेकिन अब ईमेल का जमाना है, फेसबुक है. एक सेंकेंड में दोस्ती होती है और टूट भी जाती है. शक्ल भी नहीं देखा गया होता है. सरकारी कार्यालय में भी अब इंटरनेट से सब कुछ हो रहा है. आज यदि इंटरनेट नहीं होता तो प्रधानमंत्री पर जो कोयला घोटाले के स्टेटस रिपोर्ट पर छेड़छाड़ की बात सामने आई है, वो कभी नहीं आती. लेटर ही गुम कर दिए जाते. लेकिन अब कंप्यूटर पर दूसरी जगह भी सेव रहता है. पत्र के बाद आता है कार. कार भी नहीं है तुम्हारे पास. अगर तुम्हारे पास कार हो, तो आधा पत्रकार कहा जा सकता है. इसलिए भाई हम अपने किरायेदारों से सबसे पहले पूछते हैं कि तुम पत्रकार तो नहीं हो. यदि वह पत्रकार होता है, तो उसे मकान किराया पर नहीं देता हूं. एक तो निशाचर की तरह रात में काम करता है और दिन भर सोया रहता है. दस मिनट बात करने भी जाओ या कुछ काम हो, तो घर से जवाब मिलता है कि चार बजे रात को सोए हैं, उठेंगे तो बता दूंगी. अगर कहीं जाने की इच्छा भी होती है तो न उनके पास बहुत सारे पैसे होते हैं और नहीं कार होता है कि कहीं जा भी सकूं. ऐसे किरायादार रखने से क्या फायदा. तुम किस टाइप के पत्रकार हो भाई. यह सुनकार सभी जोर से हंसने लगे और मैं उनकी तरफ सिर्फ देखता रहा. सोचा कि रिटायरमेंट के बाद लोग ऐसे ही सठियाता है. इसके साथ ही यह भी समझ में आया कि पटना में पत्रकार को क्यों नहीं रूम दिया जाता है.
सोने से सोना मिलता है
जब से शोभन सरकार को सोने का सपना आया है, उस दिन से हम काफी परेशान चल रहे हैं. कई सपने देख रहे हैं लेकिन सोने का सपना नहीं देख रहे हैं. दस साल की नौकरी करने के बाद भी एक किलो सोना तक नहीं खरीद पाया हूं. बचपन से एमए तक अमीर बनने के लिए कई किताबें पढ़ीं, लेकिन कमबख्त एक किताब में भी ऐसी तरकीब नही थी, जिससे अमीर बन सकें. जब किताब पढ़कर सो जाते थे, तो रात को सपने में कई बार अमीर बने लेकिन नींद खुलते ही मार पड़ने लगती थी. उस समय पटना कॅलेजिएट के हॉस्टल में रहता था. हॉस्टल का वार्डन काफी खरूस था, वे हमेशा पढ़ने के लिए कहते थे. सोए हुए स्टूडेंट्स का शिकार करना उनकी आदत में शुमार था. वे हमेशा कहा करते थे कि सोने से कोई फायदा नहीं है. मूर्ख लोग सोते हैं और विद्वान लोग पढाई करते हैं. मैं उनकी बातों में आ गया और सोना छोड़कर पढाई करने लगा. सोचा कि सोने के लिए तो जिंदगी है. एक बार सफल आदमी बन जाउं, जिंदगी भर सोता रहूंगा. जब से शोभन सरकार के बारे में सुना हूं, तब से वार्डन के साथ ही उन लोगों पर गुस्सा आ रहा है, जिन्होंने हमें सोने नहीं दिया. गलती से पत्रकार बन गया हूं, जिसे रात को सोना नसीब नहीं है और दिन को इतना उजाला रहता है कि ठीक से सो नहीं पाता हूं. आखिर सोने में भी तो डिवोशन चाहिए, तभी सोना मिलेगा न. यानी कि सौ फीसदी प्रदर्शन के बल पर ही कामयाब बन सकते हैं. वैसे भी पत्रकार का काम सपना देखना नहीं, सपना बेचना होता है. लोगों का डेली कैरियर बनाता हूं, लेकिन अपना नहीं. हर एग्जाम की तैयारी के बारे में जानकारी है. लेकिन एक भी परीक्षा पास नहीं कर पाया हूं. अंत में गृहस्थी की परीक्षा भी पास नहीं कर पा रहा हूं. किसी तरह घर की जमीन बेचकर बेटे को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रहा हूं. जो कुछ भी पढ़ाई के दौरान हमने नहीं पढ़ी, वे सभी बुक हमने बच्चे को पढ़ा दिया है. इतने कष्ट के बाद भी संतोष इसलिए कर रहा था कि वृक्ष कभी नहीं फल खाता है, नदी नहीं पानी पीती है और साधु कभी भी अपनी भलाई नहीं सोचता है. लेकिन जब से आशाराम बापू और निर्मल बाबा, बाबा रामदेव की संपत्ति के बारे में पता चला है, तब से बैचेन हो गया और पटना में एक साधु के पास पहुंच गया. वे काफी बिजी चल रहे थे. हालांकि आज से दस वर्ष पहले जब मैं पटना आया था, तो वे मक्खी मारते थे. अब उनका पेशा बदल गया है, अब वे कई तरह के शिकार समय समय पर करने लगे हैं. उन्होंने बताया कि आज वही आगे रह सकता है, जो साम, दाम, दंड, भेद अपनाता है. अपनी सफलता के बारे में वे बोले कि मैं कभी आंखों से शिकार करता हूं, तो कभी बातों से, कभी लातों से. साधु और संत को जब तक देश में पूजनीय माना जाएगा, तब तक आशाराम बापू और निर्मल बाबा धरती पर आते रहेंगे और सभी युवक- युवतियों पर कृपा करते रहेंगे. भले ही मीडिया इसे यौन शोषण कहे लेकिन बीजेपी की शाइनिंग इंडिया की तरह यह शोषण शब्द भी भविष्य में इतिहास बन जाएगा. ऐसा हम साधु का श्रप है. वैसे भी आजकल बाबा को बदनाम मीडिया कर रहा है, जबकि खुद वह बेइमान है. हाल ही में जी मीडिया के संपादक के बारे में सुना था, उसका कैरियर खत्म हो गया है, लेकिन वह मालिक का आदमी था. इस कारण फिर से नौकरी कर रहा है. नाम अलग से कमाया है. आज मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें सब रखना चाहता है. लेकिन तुम जैसे पत्रकार को आईबीएन 7 ने एक साथ निकाल दिया. सभी खुद को अपडेट नहीं कर पाए. उन्हें इससे भी कम वेतन पर किसी तरह नौकरी मिली है. अगर वे कुछ काम नहीं करके सिर्फ सोते तो हो सकता था कि जो सपना शोभन सरकार को सोने का आया, वह उन्हें भी आता. मैने टोकते हुए कहा कि सभी को सोना का सपना कैसे आ सकता है? बाबा गुस्सा गए और बोले कि तुम्हें भारतीय इतिहास की जानकारी नहीं है, नहीं तो तुम ऐसी बातें नहीं बोलते. अरे तुमने नहीं सुना है कि प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. अब ग्लोबल वार्मिग के कारण चिड़िया तो खत्म हो गए हैं, लेकिन उनकी अस्थी जमीन के अंदर सोना उगल रहा है. इस कारण भारत भर में सोने की खान मौजूद है. वैसे भी अंग्रेजी में कहावत है कि पैसा से पैसा बनता है, उसी तरह उसी तरह अब हिंदी कहावत बनेगी कि सोने से सोना मिलता है. जिस तरह अभी सुन रहे हैं कि आसाराम बापू का भविष्य खत्म हो गया, लालू का राजनीतिक जीवन खत्म हो गया, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होनेवाला है. ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि उन्होंने खुद को जमाने के अनुरूप ढाला है और लोगों के पैसे से अपना पैसा स्विस बैंक में जमा किया है. उसके पास इतने पैसे हैं कि उसका सात खानदान बैठकर खाएगा. भारत में यह प्राचीन काल से चला आ रहा है कि एक की कुर्बानी से उसका परिवार ऐश करता है. यदि ऐसा नहीं होता तो गांधी परिवार अभी तक राज नहीं करता. अगर आसाराम बापू को जेल हो ही गया तो वे कृष्ण की तरह अमर हो जाएंगे. अंतर सिर्फ यह होगा कि कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था और आसाराम बापू अब जेल गए हैं. कृष्ण भगवान खुद को अपडेट नहीं कर पाए लेकिन उनका नेक्स्ट जेनरेशन आसाराम उनसे आगे निकला और उसका बेटा उससे भी आगे यानी देश से बाहर. तुम्हें भी सही में पत्रकार बनना है, तो जी मीडिया वाले पत्रकार की तरह सोचो. अगर यह नहीं कर सकते तो सिर्फ सोओ. हो सकता है कि सपने में सोना आ जाए.शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013
ऐ दिल मांग ले तू भी मुराद कोई
टूटे हुए तारे को देख कर मैं ने कहा
ऐ दिल मांग ले तू भी मुराद कोई
फिर दिल से आवाज़ आई की,जो खुद टूट रहा हो
कैसे पूरी करेगा वोह फरयाद कोई
उसे पता था मुझे दर्द मे मुस्कुराने की आदत है
इस लिए वो रोज नया गम देता है मेरी खुशी
के लिए
इक खाब सुहाना टूट गया, एक ज़ख्म अभी तक
बाकी है,
जो अरमा थे सब ख़ाक हुए, बस राख अभी तक बाकी है
फूलो का हश्र वो समझ न सका " फराज "
मुझे तोड़ के कहता है की सम्भाल कर रखूंगा |
ना जाया करो कही भी कश्ती लेकर
तुम्हारे नसीब में कोइ किनारा नही
ना मांग मुजसे और ज्यादा
तनहाइआ को में एकलोता वारिश हुं
तनहाइआ को में एकलोता वारिश हुं
मसला जब भी चला है खूबसूरती का,
फैसला सिर्फ आपके चहेरेने कियां है.
मसला जब भी चला है गुलाबो का,
फैसला सिर्फ आपके होठोने किया है.
मसला जब भी चला है नशेके तोड का,
फैसला सिर्फ आपकी आंखोने कियां है.
मसला जब भी चला है रोशनाय जहां का,
फैसला सिर्फ आपके चहेरेकी रोशनीने कियां है.
मसला जब भी चला है कालि घटा का,
फैसला सिर्फ आपके उडते बालोने कियां है
मसला जब भी चला है एक पनाह्गाह का,
फैसला सिर्फ आपकी नर्म बाहोने कियां है.
मसला जब भी चला है दिवानगीक़ी हद का,
फैसला सिर्फ हमारी दिवानगीने किया है
फैसला सिर्फ आपके चहेरेने कियां है.
मसला जब भी चला है गुलाबो का,
फैसला सिर्फ आपके होठोने किया है.
मसला जब भी चला है नशेके तोड का,
फैसला सिर्फ आपकी आंखोने कियां है.
मसला जब भी चला है रोशनाय जहां का,
फैसला सिर्फ आपके चहेरेकी रोशनीने कियां है.
मसला जब भी चला है कालि घटा का,
फैसला सिर्फ आपके उडते बालोने कियां है
मसला जब भी चला है एक पनाह्गाह का,
फैसला सिर्फ आपकी नर्म बाहोने कियां है.
मसला जब भी चला है दिवानगीक़ी हद का,
फैसला सिर्फ हमारी दिवानगीने किया है
ग़ालिब :
शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर ...
या वो जगह बता जहाँ पर खुदा नहीं ...!!
इकबाल :
मस्जिद खुदा का घर है पीने की जगह नहीं ...
काफ़िर के दिल में जा वहां खुदा नहीं .....!!
फैज़ :
काफ़िर के दिल से आया हूँ ये देख कर ...
खुदा वहां मौजूद है लेकिन उसे पता नहीं ..!!
शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर ...
या वो जगह बता जहाँ पर खुदा नहीं ...!!
इकबाल :
मस्जिद खुदा का घर है पीने की जगह नहीं ...
काफ़िर के दिल में जा वहां खुदा नहीं .....!!
फैज़ :
काफ़िर के दिल से आया हूँ ये देख कर ...
खुदा वहां मौजूद है लेकिन उसे पता नहीं ..!!
सोच को बदलो सितारे बदल जायेंगे !
नज़र को बदलो नज़ारे बदल जायेंगे !!
नज़र को बदलो नज़ारे बदल जायेंगे !!
कश्तियाँ बदलने की जरुरत नहीं !
दिशाओं को बदलो किनारे बदल जायेंगे !!
"ठिकाना कब्र है तेरा , इबादत कुछ तो कर गाफिल ,
दस्तूर है के खाली हाथ किसी के घर नहीं जाते !"
"ना रखना हक किसी का मार कर अपने खजानो में ,
यह कर्जे वो हैं जो दोजखों में भी चुकाए नहीं चुकते !"
राहे वफ़ा है ,इसमें न यूँ मुंह बना के चल
काँटों को रोंद रोंद के मुस्करा के चल |
है किस्से बड़े मशहूर तेरी अय्यारियोँ के
अपनी भी हकीकत तुझसे जुदा नही है |
अगर हमें मोहब्बत तेरे जिस्म से होती तो
दुनिया
से छीन लेते
हमें इश्क तेरी रूह से है इसलिए तुझे खुदा से
मांगते है
वो क्यों खुद पे इतना गुरुर न करती "फरेज"
मैंने उस को चाहा जिसके चाहने वाले हजारों थे
मैंने उस को चाहा जिसके चाहने वाले हजारों थे
वो लिखते हैं हमारा नाम मिटटी में , और मिटा देते हैं ,
उनके लिए तो ये खेल होगा मगर ,हमें तो वो मिटटी में मिला देते हैं !!
उनके लिए तो ये खेल होगा मगर ,हमें तो वो मिटटी में मिला देते हैं !!
जिंदगी गुजरने के दो ही रस्ते है
"ग़ालिब" ..
एक तुजे नहीं आता एक मुझे नहीं आता..
एक तुजे नहीं आता एक मुझे नहीं आता..
वो आये सहरे खामोशां में बड़े नाज़ से , कब्र देखि मेरी तो
कहने लगे ;
चलो इतनी तरक्की तो इसकी , एक बेघर ने अच्छा सा घर ले लिया
ना कर कोई वादा फिर से नया
पहले वादे पुराने निभा तो सही
पहले वादे पुराने निभा तो सही
आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिये
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी
दर्द से होगई है दोस्ती कुछ इस क़दर
के अब दर्द सा होता है दर्द ना मिलने पर ...
..
कुछ जियादा ही गहरी बातें करने लगा हूँ मैं..
के उसने समजना ही छोड़ दिया डूबने के डर से..
कही छत थी दीवार ओ दर थे कही
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से
मगर जो दिया वो दिया देर से
अब से पहले के जो क़ातिल थे बहुत अच्छे थे
कत्ल से पहले वो पानी तो पिला देते थे
कत्ल से पहले वो पानी तो पिला देते थे
शनिवार, 30 मार्च 2013
हमने जिंदगी गुजारी है किराये के मकानों में।'
परिंदे
भी नहीं रहते पराये आशियानों में,
हमने जिंदगी गुजारी है किराये के
मकानों में।'
जीना भी एक बहुत बडा जुर्म है आखिर
शायद इसी लिये हर
शख्स को स़जाए मौत मिलती है|
ना तुझको ख़बर हुई ना ज़माना समझ सका..
हम तुझ पर चुपके
चुपके कई बार मर गये !!
हमने तेरे बाद न रखी किसी से मोहब्बत की आस;
एक शक्स ही बहुत था
जो सब कुछ सिखा गया!
तकदीरें बदल जाती है, जब ज़िन्दगी का कोई मकसद हो;
तकदीरें बदल जाती है, जब ज़िन्दगी का कोई मकसद हो;
वरना ज़िन्दगी तो कट
ही जाती है, तकदीर को
इल्जाम देते देते!
मुझको थकने नहीं देता , ये ज़रुरत का पहाड़.
मेरे बच्चे मुझे बूढा होने नहीं देते......
मेरे बच्चे मुझे बूढा होने नहीं देते......
भगवान शंकर ने यतिनाथ अवतार
भगवान शंकर ने
यतिनाथ अवतार लेकर अतिथि के महत्व का प्रतिपादन किया है। उन्होंने इस अवतार में
अतिथि बनकर भील दम्पत्ति की परीक्षा ली थी जिसके कारण भील दम्पत्ति को अपने प्राण
गवाने पड़े। हमारे धर्म शास्त्रों में भी यही लिखा है कि यदि आपके घर कोई अतिथि आ
जाए तो यथासंभव उसका सम्मान करना चाहिए क्योंकि अतिथि देवता के समान होता है। ऐसा
करने से भगवान शंकर उसी प्रकार प्रसन्न होते हैं जिस तरह भील दम्पत्ति पर हुए थे।
यह अवतार वर्तमान परिदृश्य में अतिथि की भूमिका का एक श्रेष्ठ उदाहरण है।
जब भील दम्पत्ति के अतिथि बने शिव
अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक- आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। घर में स्थान की न्यूनता के कारण भील संकोच में पड़ गया। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक का मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
जब भील दम्पत्ति के अतिथि बने शिव
अर्बुदाचल पर्वत के समीप शिवभक्त आहुक- आहुका भील दम्पत्ति रहते थे। एक बार भगवान शंकर यतिनाथ के वेष में उनके घर आए। उन्होंने भील दम्पत्ति के घर रात व्यतीत करने की इच्छा प्रकट की। घर में स्थान की न्यूनता के कारण भील संकोच में पड़ गया। आहुका ने अपने पति को गृहस्थ की मर्यादा का स्मरण कराते हुए स्वयं धनुषबाण लेकर बाहर रात बिताने और यति को घर में विश्राम करने देने का प्रस्ताव रखा। इस तरह आहुक धनुषबाण लेकर बाहर चला गया। प्रात:काल आहुका और यति ने देखा कि वन्य प्राणियों ने आहुक का मार डाला है। इस पर यतिनाथ बहुत दु:खी हुए। तब आहुका ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि आप शोक न करें। अतिथि सेवा में प्राण विसर्जन धर्म है और उसका पालन कर हम धन्य हुए हैं। जब आहुका अपने पति की चिताग्नि में जलने लगी तो शिवजी ने उसे दर्शन देकर अगले जन्म में पुन: अपने पति से मिलने का वरदान दिया।
बुधवार, 20 मार्च 2013
प्यार और पराजय
प्यार
और पराजय
मैं भाग्यशाली था कि जीवन में मुझे जो कुछ करना
था, उसकी जानकारी
मुझे काफी पहले मिल गई थी. वोज और मैंने एप्पल को अपने माता-पिता के गैराज में
शुरू किया था और तब मैं 20 वर्ष का था.
कड़ी मेहनत से दस वर्षों में एप्पल मात्र दो लोगों की कंपनी से 2 अरब डॉलर की 4 हजार कर्मचारियों से अधिक की कंपनी बन गई. तब हमने अपना सबसे अच्छा उत्पाद 'मैकिंतोश' जारी किया था. उस समय एक वर्ष पहले मैंने 30वीं सालगिरह मनाई थी. और इसके बाद ही मुझे कंपनी से निकाल दिया गया.
जब कंपनी आपने ही शुरू की हो तो कैसे आपको इससे निकाला जा सकता है. जैसे-जैसे एप्पल बढ़ती गई, मैंने अपने से ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति को कंपनी चलाने के लिए रखा. एक साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन बाद में भविष्य की योजनाओं को लेकर मतभेद होते गए और अंत में झगड़ा हो गया.
हमारे झगड़े के बाद बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने उसका पक्ष लिया और तीस वर्ष की आयु में कंपनी से बाहर हो गया. अपने वयस्क जीवन में मैंने जिस पर अपना सब कुछ लगा दिया था, वह जा चुका था और यह बहुत निराशाजनक बात थी. इसके बाद कुछे महीनों तक तो मुझे नहीं सूझा कि क्या करूँ. मुझे लगा कि मैंने पहली पीढ़ी के उद्यमियों को निराश किया और जब बैटन मेरे हाथ में आने वाला था, तब मैंने इसे गिरा दिया.
मैं डेविड पैकर्ड और बॉब नॉयस से मिला और उनसे अपने व्यवहार के लिए माफी माँगने का प्रयास किया और इस समय मैंने कैलिफोर्निया से ही भागने का मन बनाया लेकिन धीरे-धीरे कुछ बात मेरी समझ में आने लगी और मुझे वही सब कुछ अच्छा लगने लगा था, जो कि कभी अच्छा नहीं लगता था. हालाँकि इस बीच एप्पल में थोड़ा बहुत भी बदलाव नहीं आया था, इसलिए मैंने सब कुछ नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया. उस समय यह बात मेरी समझ में नहीं आई लेकिन बाद में लगा कि एप्पल से हटा दिया जाना, ऐसी सबसे अच्छी बात थी जो कि मेरे लिए कभी हो सकती थी. सफल होने का बोझ फिर से खाली होने के भाव से भर गया और मैंने जीवन के सबसे अधिक रचनात्मक दौर में प्रवेश किया.
अगले पाँच वर्षों के दौरान मैंने कंपनी नेक्सट और पिक्सर शुरू की और मुझे एक सुंदर महिला से प्यार हुआ जो कि मेरी पत्नी बनी. पिक्सर ने दुनिया की सबसे पहली कम्प्यूटर एनीमेटेड फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनाई और अब यह दुनिया का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है.
एक असाधारण घटना के तहत एप्पल ने नेक्सट को खरीद लिया और मैं फिर एप्पल में वापस आ गया. हमने नेक्सट में जो तकनीक विकसित की, वह एप्पल के वर्तमान पुनर्जीवन की आधारशिला है. इसी के साथ ही लॉरीन और मेरा परिवार भी बढ़ा.
यह बात मैं सुनिश्चित तौर पर मानता हूँ कि अगर मुझे एप्पल से हटाया नहीं जाता तो ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा होता. यह एक स्वाद में बुरी दवा थी लेकिन मरीज को इसकी सख्त जरूरत थी. कभी-कभी आपको जीवन में ठोकरें भी खानी पड़ती हैं लेकिन हिम्मत ना हारें.
मुझे विश्वास है कि जिस चीज ने मुझे लगातार क्रियाशील बनाए रखा था, वह अपने काम के प्रति मेरा प्यार था. आपको जीवन में यह पता लगाना होता है कि आप किस काम से प्यार करते हैं. यह बात काम को लेकर भी उतनी ही सच है, जितनी कि जीवन में प्रेमी-प्रेमिकाओं को लेकर होती है.
कड़ी मेहनत से दस वर्षों में एप्पल मात्र दो लोगों की कंपनी से 2 अरब डॉलर की 4 हजार कर्मचारियों से अधिक की कंपनी बन गई. तब हमने अपना सबसे अच्छा उत्पाद 'मैकिंतोश' जारी किया था. उस समय एक वर्ष पहले मैंने 30वीं सालगिरह मनाई थी. और इसके बाद ही मुझे कंपनी से निकाल दिया गया.
जब कंपनी आपने ही शुरू की हो तो कैसे आपको इससे निकाला जा सकता है. जैसे-जैसे एप्पल बढ़ती गई, मैंने अपने से ज्यादा प्रतिभाशाली व्यक्ति को कंपनी चलाने के लिए रखा. एक साल तक सब कुछ ठीक चलता रहा लेकिन बाद में भविष्य की योजनाओं को लेकर मतभेद होते गए और अंत में झगड़ा हो गया.
हमारे झगड़े के बाद बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने उसका पक्ष लिया और तीस वर्ष की आयु में कंपनी से बाहर हो गया. अपने वयस्क जीवन में मैंने जिस पर अपना सब कुछ लगा दिया था, वह जा चुका था और यह बहुत निराशाजनक बात थी. इसके बाद कुछे महीनों तक तो मुझे नहीं सूझा कि क्या करूँ. मुझे लगा कि मैंने पहली पीढ़ी के उद्यमियों को निराश किया और जब बैटन मेरे हाथ में आने वाला था, तब मैंने इसे गिरा दिया.
मैं डेविड पैकर्ड और बॉब नॉयस से मिला और उनसे अपने व्यवहार के लिए माफी माँगने का प्रयास किया और इस समय मैंने कैलिफोर्निया से ही भागने का मन बनाया लेकिन धीरे-धीरे कुछ बात मेरी समझ में आने लगी और मुझे वही सब कुछ अच्छा लगने लगा था, जो कि कभी अच्छा नहीं लगता था. हालाँकि इस बीच एप्पल में थोड़ा बहुत भी बदलाव नहीं आया था, इसलिए मैंने सब कुछ नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया. उस समय यह बात मेरी समझ में नहीं आई लेकिन बाद में लगा कि एप्पल से हटा दिया जाना, ऐसी सबसे अच्छी बात थी जो कि मेरे लिए कभी हो सकती थी. सफल होने का बोझ फिर से खाली होने के भाव से भर गया और मैंने जीवन के सबसे अधिक रचनात्मक दौर में प्रवेश किया.
अगले पाँच वर्षों के दौरान मैंने कंपनी नेक्सट और पिक्सर शुरू की और मुझे एक सुंदर महिला से प्यार हुआ जो कि मेरी पत्नी बनी. पिक्सर ने दुनिया की सबसे पहली कम्प्यूटर एनीमेटेड फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनाई और अब यह दुनिया का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है.
एक असाधारण घटना के तहत एप्पल ने नेक्सट को खरीद लिया और मैं फिर एप्पल में वापस आ गया. हमने नेक्सट में जो तकनीक विकसित की, वह एप्पल के वर्तमान पुनर्जीवन की आधारशिला है. इसी के साथ ही लॉरीन और मेरा परिवार भी बढ़ा.
यह बात मैं सुनिश्चित तौर पर मानता हूँ कि अगर मुझे एप्पल से हटाया नहीं जाता तो ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा होता. यह एक स्वाद में बुरी दवा थी लेकिन मरीज को इसकी सख्त जरूरत थी. कभी-कभी आपको जीवन में ठोकरें भी खानी पड़ती हैं लेकिन हिम्मत ना हारें.
मुझे विश्वास है कि जिस चीज ने मुझे लगातार क्रियाशील बनाए रखा था, वह अपने काम के प्रति मेरा प्यार था. आपको जीवन में यह पता लगाना होता है कि आप किस काम से प्यार करते हैं. यह बात काम को लेकर भी उतनी ही सच है, जितनी कि जीवन में प्रेमी-प्रेमिकाओं को लेकर होती है.
आपका काम एक ऐसी चीज है जो कि
आपके जीवन के एक बड़े खाली हिस्से को भरता है. महान काम करने की एकमात्र शर्त यही
है कि आप अपने काम से प्यार करें. अगर आपको इसका पता नहीं है तो पता लगाते रहिए.
दिल के सारे मामलों में आपको पता लगेगा कि यह आपको कब मिलेगा. जैसे-जैसे समय
निकलता जाता है इसके साथ आपका रिश्ता बेहतर होता चला जाता है, इसलिए रुकें नहीं इसकी खोज
करते रहें.
तीसरी कहानी मौत के बारे
तीसरी कहानी मौत के बारे
जब मैं सत्रह वर्ष का था, तब मैंने एक कथन पढ़ा था जो
कुछ इस प्रकार था- 'अगर आप
अपने जीवन के प्रत्येक दिन को अंतिम दिन मानकर जीते हैं तो किसी दिन आप निश्चित
तौर पर सही सिद्ध होंगे.' इसका मुझ पर असर पड़ा और जीवन के पिछले 33 वर्षों में मैंने प्रत्येक
दिन शीशे में अपने आप को देखा और अपने आप से पूछा कि 'अगर यह जीवन का आखिरी दिन हो, क्या मैं वह सब करूँगा जो कि
मुझे आज करना है. और जब कई दिनों तक इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक रहा तो मुझे पता
लगा कि मुझे कुछ बदलने की जरूरत है.'
मैंने अपने जीवन के सबसे बड़े फैसलों को करते समय, मैंने अपनी मौत के विचार को सबसे महत्वपूर्ण औजार बनाया क्योंकि मौत के सामने सभी बाहरी प्रत्याशाएं, सारा घमंड, असफलता या व्याकुलता का डर समाप्त हो जाता है और जो कुछ वास्तविक रूप से महत्वपूर्ण है, बचा रह जाता है. मैं सोचता हूँ कि जब आप याद रखते हैं कि आप मरने वाले हैं तो आपका सारा भय समाप्त हो जाता है कि आप कुछ खोने वाले हैं. जब पहले से ही आपके पास कुछ नहीं है तो क्यों ना अपने दिल की बात मानें.
करीब एक वर्ष पहले मेरा कैंसर का इलाज हुआ. सुबह साढ़े सात बजे स्कैन किया गया और इसमें स्पष्ट रूप से पता लगा कि मेरे पैंक्रीएस में एक ट्यूमर है. मुझे पता नहीं था कि पैंक्रीएस कैसा होता है. डॉक्टरों ने मुझे बताया कि यह एक प्रकार का कैंसर है, जो कि असाध्य है और मैं तीन से छह माह तक ही जीवित रहूँगा. मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं अपने अधूरे कामकाज निपटाऊँ. डॉक्टर ने कहा कि अपने बच्चों को जो आप दस साल में बताने वाले हैं, उन बातों को कुछेक महीनों में बताएँ. इसका अर्थ है कि पहले से तैयार हो जाएँ ताकि आपके परिवार के लिए सभी कुछ सहज रहे. इसका अर्थ है कि आप अंतिम विदा लेने की तैयारी कर लें. पर डॉक्टरों ने अपने परीक्षणों में पाया कि मैं ऐसे कैंसर से पीड़ित हूँ जो कि ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है. मेरा ऑपरेशन किया गया और अब मैं पूरी तरह से ठीक हूँ. यह मौत के सबसे करीब होने का अनुभव था और मैं उम्मीद करता हूँ कि इस अनुभव के बाद मैं कुछेक दशक तक और जी सकता हूँ. मैं आपसे कह सकता हूँ कि जब मौत उपयोगी हो, तब इसके करीब होने का विचार पूरी तरह से एक बौद्धिक विचार है. मरना कोई नहीं चाहता. जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, वे भी मरना नहीं चाहते लेकिन यह ऐसा गंतव्य है, जहाँ हम सबको पहुँचना ही है. कोई भी इससे नहीं बचा है और इसे जीवन की सबसे अच्छी खोज होना चाहिए. जीवन बदलाव का कारक है और पुराने के स्थान पर नया स्थान लेता है. आप लोग भी बूढ़े होंगे और इसके बाद की स्थिति से भी गुजरेंगे.
आपका समय सीमित है, इसलिए इसे ऐसे नहीं जिएं जैसे कि किसी और का जीवन जी रहे हों. दूसरे लोगों की सोच के परिणामों से प्रभावित न हों और दूसरों के विचारों के बजाए अपने विचारों को महत्व दें. और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप अपने दिल की बात सुनें. आपके दिलो दिमाग को पहले से ही अच्छी तरह पता है कि आप वास्तव में क्या बनना चाहते हैं.
जब मैं युवा था तब एक आश्चर्यजनक प्रकाशन 'द होल अर्थ कैटलॉग' बिकता था, जो कि मेरी पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण किताब थी. इसे मेनलो पार्क में रहने वाले व्यक्ति स्टुअर्ट ब्रांड ने प्रकाशित किया था. यह साठ के दशक के अंतिम वर्षों की बात थी और तब पर्सनल कम्प्यूटर और डेस्कटॉप प्रकाशन नहीं थे लेकिन तब भी यह गूगल का पैपरबैक संस्करण था. स्टुअर्ट और उसकी टीम ने इस किताब के कई संस्करण निकाले और जब इसका समय पूरा हो गया तो इसने अंतिम संस्करण निकाला. सत्तर के दशक के मध्य में यह अंक निकाला गया था और तब मैं आपकी आयु का था. इस पुस्तक के अंतिम पन्ने पर सुबह की एक तस्वीर थी, जिसमें ग्रामीण इलाका दर्शाया गया था. इस तस्वीर के नीचे शब्द लिखे थे 'स्टे हंग्री, स्टे फुलिश.'
मैंने अपने जीवन के सबसे बड़े फैसलों को करते समय, मैंने अपनी मौत के विचार को सबसे महत्वपूर्ण औजार बनाया क्योंकि मौत के सामने सभी बाहरी प्रत्याशाएं, सारा घमंड, असफलता या व्याकुलता का डर समाप्त हो जाता है और जो कुछ वास्तविक रूप से महत्वपूर्ण है, बचा रह जाता है. मैं सोचता हूँ कि जब आप याद रखते हैं कि आप मरने वाले हैं तो आपका सारा भय समाप्त हो जाता है कि आप कुछ खोने वाले हैं. जब पहले से ही आपके पास कुछ नहीं है तो क्यों ना अपने दिल की बात मानें.
करीब एक वर्ष पहले मेरा कैंसर का इलाज हुआ. सुबह साढ़े सात बजे स्कैन किया गया और इसमें स्पष्ट रूप से पता लगा कि मेरे पैंक्रीएस में एक ट्यूमर है. मुझे पता नहीं था कि पैंक्रीएस कैसा होता है. डॉक्टरों ने मुझे बताया कि यह एक प्रकार का कैंसर है, जो कि असाध्य है और मैं तीन से छह माह तक ही जीवित रहूँगा. मेरे डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं अपने अधूरे कामकाज निपटाऊँ. डॉक्टर ने कहा कि अपने बच्चों को जो आप दस साल में बताने वाले हैं, उन बातों को कुछेक महीनों में बताएँ. इसका अर्थ है कि पहले से तैयार हो जाएँ ताकि आपके परिवार के लिए सभी कुछ सहज रहे. इसका अर्थ है कि आप अंतिम विदा लेने की तैयारी कर लें. पर डॉक्टरों ने अपने परीक्षणों में पाया कि मैं ऐसे कैंसर से पीड़ित हूँ जो कि ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है. मेरा ऑपरेशन किया गया और अब मैं पूरी तरह से ठीक हूँ. यह मौत के सबसे करीब होने का अनुभव था और मैं उम्मीद करता हूँ कि इस अनुभव के बाद मैं कुछेक दशक तक और जी सकता हूँ. मैं आपसे कह सकता हूँ कि जब मौत उपयोगी हो, तब इसके करीब होने का विचार पूरी तरह से एक बौद्धिक विचार है. मरना कोई नहीं चाहता. जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं, वे भी मरना नहीं चाहते लेकिन यह ऐसा गंतव्य है, जहाँ हम सबको पहुँचना ही है. कोई भी इससे नहीं बचा है और इसे जीवन की सबसे अच्छी खोज होना चाहिए. जीवन बदलाव का कारक है और पुराने के स्थान पर नया स्थान लेता है. आप लोग भी बूढ़े होंगे और इसके बाद की स्थिति से भी गुजरेंगे.
आपका समय सीमित है, इसलिए इसे ऐसे नहीं जिएं जैसे कि किसी और का जीवन जी रहे हों. दूसरे लोगों की सोच के परिणामों से प्रभावित न हों और दूसरों के विचारों के बजाए अपने विचारों को महत्व दें. और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप अपने दिल की बात सुनें. आपके दिलो दिमाग को पहले से ही अच्छी तरह पता है कि आप वास्तव में क्या बनना चाहते हैं.
जब मैं युवा था तब एक आश्चर्यजनक प्रकाशन 'द होल अर्थ कैटलॉग' बिकता था, जो कि मेरी पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण किताब थी. इसे मेनलो पार्क में रहने वाले व्यक्ति स्टुअर्ट ब्रांड ने प्रकाशित किया था. यह साठ के दशक के अंतिम वर्षों की बात थी और तब पर्सनल कम्प्यूटर और डेस्कटॉप प्रकाशन नहीं थे लेकिन तब भी यह गूगल का पैपरबैक संस्करण था. स्टुअर्ट और उसकी टीम ने इस किताब के कई संस्करण निकाले और जब इसका समय पूरा हो गया तो इसने अंतिम संस्करण निकाला. सत्तर के दशक के मध्य में यह अंक निकाला गया था और तब मैं आपकी आयु का था. इस पुस्तक के अंतिम पन्ने पर सुबह की एक तस्वीर थी, जिसमें ग्रामीण इलाका दर्शाया गया था. इस तस्वीर के नीचे शब्द लिखे थे 'स्टे हंग्री, स्टे फुलिश.'
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