रविवार, 14 फ़रवरी 2010

मैं और मेरा जीवन तीन

दादी
भायजी यानी पापा जब भी आते थे, तो मैं डर जाता था। क्योंकि घर में सबसे अधिक शरारती मैं ही था। दादी को हमेशा चिढ़ाता रहता था। वह यही धमकी देती रहती थी कि भायजी के आने के बाद तुम्हें पिटवाती हूं। दादी दिल की सच्ची थी। कभी भी मेरी शिकायत नहीं की। वह अनपढ़ थी, लेकिन रामायण और महाभारत के श्लोक रटे हुए थे। पूजा-पाठ खूब करती थी। कहानी भी सुनाती थी। मां कहती है कि जब वह आई थी, तो घर के सभी सामान दूसरे को दे देती थी। इस कारण बाबा से उन्हें डांट भी पड़ती रहती थी। कुछ पड़ोसी उनका फायदा भी उठाए। वह किसी को भी भूखा नहीं देख सकती थी। मेरे पिताजी तीन भाई थे। बंटवारे के समय दादा और दादी हमलोगों के साथ ही थे, लेकिन दादी खुद जिद पकड़कर उन दोनों चाचा के पास चली गई। मेरी मां जब भी चाय या विशेष खाना बनाती, तो उन्हें जरूर खिलाती थी। उस समय दोनों चाचा अमीर थे। पारिवारिक माहौल गांव के अन्य परिवारों से बढिय़ा था। अलग रहने के बावजूद दोनों चाचा कभी भी भायजी को जवाब नहीं देते थे। इसका प्रभाव यह पड़ा कि हमलोग चाचा या चाची को कभी भी जवाब नहीं दिए। यही कारण है कि अभी तक हमलोगों का आंगन और दरवाजा एक ही है। यह गांववाले के लिए कौतूहल और इष्र्या का विषय है।
धीमा
पांच किलोमीटर की दूरी पर शिव मंदिर था, जिसे हमलोग धीमा कहकर पुकारते हैं। अभी तक मुझे इसका अर्थ मालूम नहीं है, लेकिन इलाके के सभी लोग इससे परिचित हैं। उस समय सभी लोग पैदल ही वहां जाते थे। गांव की एक झुंड जाती थी। दादी भी हर रविवार को वहां जाती थी और हमलोगों के लिए बतासा लाती थी। बतासा एक प्रकार की मीठाई थी। बतासा के इंतजार में हमलोग दादी के आने का इंतजार घंटों करते रहते थे। इसके लिए बहुत दूर तक पैदल भी चल देते थे। उस समय को याद करता हूं, तो अभी भी काफी खुशी मिलती है। याद है मुझे कि उन्हें धीमा जाने के लिए पैसे नहीं रहते थे। काफी हल्ला करने के बाद उन्हें पैसे मिलते थे। उस समय आर्थिक स्थिति भी खराब थी। दादी के जाने के बाद मैं यही सोचता था कि इस बार मां उन्हें पैसा नहीं दी है, इस कारण हमें वह मीठाई नहीं देगी। लेकिन वह सभी के साथ एकसमान व्यवहार करती थी। न पढऩे-लिखने के बावजूद इस तरह का व्यवहार देखकर तो आश्चर्य होता है आजकल के औरत की व्यवहार पर। उस समय शायद पढ़ाई की अपेक्षा संस्कार प्रभावी था। इस कारण अच्छे कुल में शादी करने को वरीयता दी जाती थी। दादी घर आने के बाद हमलोगों को बता देती थी। उनके पास जितने भी पैसे रहते थे, सभी खाने और सामान लाने में खर्च कर देती थी। इसके विपरीत पड़ोसी पैसा बचाकर घर लाते थे। दादी को पैसे बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय तक अमीर-गरीब सभी पैदल ही जाते थे। अब तो हालात बदल गए हैं। आज भी सभी लोग जाते हैं, लेकिन पैदल कोई नहीं जाता है। एक दिन मैं भी गया था। मां भी साथ में थी। वहां पूजा करने के बाद गांव के सभी सदस्य बाजार से मंगाकर कुछ खा रहे थे। मां घर से चूड़ा और आलू की सब्जी बनाकर ले गई थी। मैं भी बाजार से कुछ मंगाने का जिद करने लगा। मां लाचार होकर घुघनी खरीदी थी। मात्रा कितनी थी, मुझे पता नहीं है, लेकिन मुझे उससे बढिय़ा अपनी सब्जी ही लगी थी और उस दिन से अभी तक चूड़ा और सब्जी का स्वाद जिंदा है। मौका पडऩे पर उसे अवश्य खाता हूं। उस समय मां के ये शब्द भी याद हैं कि घर का खाना बाजार के खाना से अच्छा और शुद्ध होता है। हो सकता हो कि मां किसी और प्रशेजन से बोली हो, लेकिन यह बात हमें दिमाग में बैठ गई, जिसका फायदा अभी तक मैं उठा रहा हूं।
बथुआ साग
साग के शौकीन हमारे परिवार में सभी थे। उस समय दादी के साथ हमलोग साग तोडऩे के लिए बहुत दूर चले जाते थे। साथ में गांव के बहुत सारे बच्चे रहते थे। सभी लोग दिन-चार घंटे तक साग तोड़ते थे और अपनी-अपनी दादी या बहन को देते थे। उस समय शर्म नहीं लगती थी। न ही यह सोच डेवलप था कि लोग क्या कहेंगे। हमारे उम्र के बच्चे तो आजकल दूसरे के घर जाने में भी शर्म महसूस करते हैं। जब दादी साथ नहीं रहती थी, तो गांव के लड़की और लड़के के साथ साग तोडऩे के लिए जाते थे। उसमें कुछ उम्र में काफी बड़े थे। जहां तक मुझे याद है कि हम सभी साग तोडऩे के बाद एक जगह इकट्टïा होते थे, और सभी अपनी झोली से कुछ न कुछ साग भगवान को चढ़ाते थे। इसके पीछे यह विश्वास था कि भगवान को साग चढ़ाने से अपने आप अधिक साग हो जाएगा। यह डर भी था कि जो इस साग को चुपके से घर ले जाएगा, भगवान उस पर क्रोधित होंगे। इस कारण मैंने कभी भी साग नहीं चुराया। अब यदि दिमाग पर जोर लगाता हूं, तो अंदाजा यह लग रहा है कि सभी साग हमलोगों में से जो बड़े थे, आपस में बांट लेते थे। इस मामले में हमलोग बेबकूफ ही बने रहते थे। घरवाले पढऩे के लिए जोर देते थे और मैं साग तोडऩे में अधिक दिलचस्पी ले रहा था। सभी तरह के खेल खेलते थे उस समय। खेलते देखकर लोग हमें आश्चर्य से देखते थे, लेकिन हमें कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा था। पैर खराब होने के बावजूद हमारी एक अलग स्टाइल थी खेलने की, जिस कारण सभी लोग अपनी टीम में रखना चाहते थे। अलग स्टाइल इसलिए बन जाती थी कि उस समय मुझे विकलांग होने का अहसास कम था और मैं औरों की तरह ही सभी में पूरी आत्मविश्वास के साथ भाग लेता था। इस तरह की फीलिंग बड़े होने तक बनी रही। कोई खेल हमने नहीं छोड़ा। अब सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। आम के बगीचे में आम भी चुनने के लिए दादी केसाथ जाता था। उस समय कोई भी आम नमक साथ आसानी से खा जाता था। दांत खट्टे नहीं होते थे, लेकिन अब खाने के नाम से ही सिहर जाता हूं। उस समय लोक लाज का भी ख्याल रखा जाता था। आजकल की तरह उस समय के लोग नहीं थे। तभी तो बाबा के मरने के बाद दादी छिपकर रो रही थी। मैं जब उनसे रोने का कारण पूछा, तो वह हंसने का बहाना करने लगी। क्या आजकल की पत्नी इस तरह कर सकती है?
भैया
बचपन से ही उन्हें भैया न समझकर कुछ और समझते थे। सही अर्थों में वे बड़े होने का सभी दायित्व निभाते थे। गांव वाले भी उन्हें आदर्श मानते थे। हम भाई-बहनों को भी खूब मानते थे। वे पढ़ते हुए भी घर की जिम्मेदारी से कभी नहीं मुंह मोड़े। उस समय हमारी बाहर की जरूरत वही पूरी करते थे। उन्हीं की बदौलत आज मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। पढ़े-लिखे थे, इस कारण हमेशा मेरे लिए बेहतर की तलाश में रहते थे। वे नहीं पढऩे के लिए कहते थे और नहीं मारते थे। इस कारण उनके साथ रहने में अच्छा लगता था। उस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे। किस स्ट्रीम में थे। मुझे पता नहीं था। एक दिन मां के साथ हम अपनी बहन के पास बनमनखी गए थे। जीजा जी यहीं सर्विस करते थे। कुछ दिन रहने के बाद भैया साइकिल से हमें घर ले जा रहे थे। रास्ते में कोसी नदी को नाव के सहारे पार करना पड़ता था। हमलोग नाव से उस पार हो गए। उसके बाद साइकिल से हमलोग जा रहे थे। लगभग दो किलोमीटर तक बालू ही बालू था। इस कारण उनकी सारी ऊर्जा और दिमाग साइकिल खींचने में में ही लग रहा था। जहां तक मुझे याद है कि मुझे जोर से नींद आने लगी। मैं नींद तोडऩे के लिए हर संभव कोशिश किया। लेकिन अंत में नींद की जीत हुई और मैं निश्चिंत होकर सो गया। उसके बाद मुझे कुछ भी पता नहीं है। जब नींद खुली, तो भैया हमें उठा रहे थे। मैं बालू पर गिर गया था और भैया को पता ही नहीं चला। उस समय साइकिल के पीछे की सीट पर बैठा था। भैया के अनुसार वे एक किलोमीटर आगे तक निकल चुके थे। अंत साइकिल हल्का देख जब वे पीछे मुड़े, तो उनके होश ठिकाने लग गए। निराश होकर वे पीछे की ओर तेजी से दौड़े जा रहे थे और मैं बालू पर चैन की नींद ले रहा था। अभी भी भैया को आश्चर्य हो रहा है कि मुझे थोड़ी भी चोट नहीं लगी थी। कहते हैं न कि जाको राखे साइयां, मार सके न कोय। वही बात मुझ पर लागू हो गई।
लाल भैया
उस समय इनके नाम से ही रूह कांप उठती थी। कारण यह था कि जिंदगी में सबसे अधिक मार उन्हीं से पड़ी है। वह पढ़ाकू थे और हम सभी भाई-बहनों को भी पढ़ाते रहते थे। स्कूल नहीं जाने पर बहुत पीटते थे। उस समय यह स्थिति थी कि यदि सर्प और लाल भैया दोनों दो जगह पर होते, तो मैं सर्प के पास जाना ज्यादा फायदेमंद समझता। यदि वह नहीं रहते तो शायद मैं बचपन में पढ़ भी नहीं पाता। यदि वह दो दिनों के लिए बाहर चले जाते, तो किताब छूने का नाम ही नहीं लेता। मैं उन्हें दुश्मन समझता था। इस तरह की सोच मैट्रिक तक बनी रही।
पेरेंट्स
क्या बताऊं इनके बारे में। पापा को भायजी कहता था। उनके बारे में क्या सोच थी। ठीक से हमें पता नहीं है। लेकिन होली के समय हमें रंग डालते थे और कभी कभी भांग भी खिलाते थे। उनके कंधे पर बैठकर गांव भी घूमा करते थे। उस समय वे कम ही मारते थे। दाय के जाने के बाद मां पर ही अवलंबित हो गया। बहुत प्यार करती थी और बदमाशी करने पर मारती भी थी। जो भी मांगता था, हर संभव देती थी। पैसे की काफी कमी थी, लेकिन फिर भी हमेशा खुश रहती थी। उस समय एक ही घर और एक ही रजाई था। उसी में हम सभी भाई-बहन सोते थे। घर कच्ची मिट्टी का बना था। बारिश के समय में छत के ऊपर से पानी टपकता रहता था। उस समय हमें यही डर सताता रहता था कि घर आंधी में गिर न जाए। दादा के समय का घर था। इस कारण काफी मजबूत था। अभाव के बावजूद उन्हें लोग काफी आदर करते थे। वे हम सभी भाई-बहनों को पढ़ाने के साथ ही संस्कृत के श्लोक सुनाती थी। उस समय मां से कोई शिकायत नहीं थी। जितने भी खेत थे, सभी दूसरे के पास गिरबी था। एक वेतन ही सहारा था। उस समय असुविधाओं के बावजूद हम सभी को पढ़ते देख लोग हंसते थे, लेकिन अभी हालात ये हैं कि वे लोग हम पांचों भाइयों को देखकर अपने बेटे को कोसते हैं।

परिवार के अन्य सदस्य
बिनोद भैया पढऩे में काफी तेज थे। यह हमें पता नहीं था, लेकिन घरवाले यही कह रहे थे। उन्हें सरकार की तरफ से छात्रवृत्ति मिली हुई थी। इस कारण वे रानीगंज स्कूल में पढ़ते थे। अच्छे थे। वे भी बहुत प्यार करते थे। उस समय उनसे जुड़ी एक घटना मुझे अभी तक याद है। हुआ यूं कि छात्रवृत्ति में पास होने के बाद बिनोद भैया को हॉस्टल भेजने की तैयारी होने लगी। हॉस्टल में एक चौकी भी जरूरी थी। घर में एक ही चौकी थी, जिस पर घर की इज्जत टिकी हुई थी। कहने का आशय यह कि जो भी गेस्ट आते थे, उन्हीं पर सोते थे। हमलोग उस समय नीचे में ही सोते थे। भयजी को घर से कोई मतलब नहीं था। मां ही सब कुछ थी। मां के पास कुछ तख्ता था। उसे लेकर वह लताम बाबा के पास गई और उसे बनाने के लिए कही। पेशे से वे मिस्त्री नहीं थे। घर में मिस्त्री को देने के लिए पैसे नहीं थे, इस कारण वे ही किसी तरह बना रहे थे। उनसे घर के संबंध अच्छे थे। जब वे दरवाजे पर बना रहे थे, तो मैं भी वहीं था। मेरे साथ और कौन-कौन थे, याद नहीं है। लेकिन इतना याद है कि जब उसे बस के ऊपर चढ़ाया जा रहा था, तो उसी समय उसके कुछ भाग टूट चुके थे। बाद में बिनोद भैया ने बताया कि उतारते वक्त वह पूरी तरह से टूट चुका था। रात को वे बेंच लगाकर हॉस्टल में सोते थे। प्रमोद भैया मेरे साथ ही रहते थे। जब हमलोग साथ रहते तो लड़ाई करते रहते थे और उनसे अलग रहने की कल्पना से ही रोने लगते थे। वे पढऩे में तेज थे। चुन्नू छोटी बहन थी। प्यारी थी। उसे हमेशा परेशान करता रहता था। बैसाखी टूटने के बाद उसी के कंधे को पकड़कर एक वर्ष तक चला। रास्ते में उसे खूब रुलाता था। याद है मुझे बचपन की वह घटना, जब रास्ते में स्कूल जाते वक्त शरारत करने को सूझी। उस समय चारो ओर पानी ही पानी था। मैं चुन्नू को डराया कि मैं यही डूब जाता हूं। वह मुझे रोक रही थी और मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अंत में वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी, तभी मैं रुका और प्रथम बार उसके प्यार का अहसास हुआ। उसके बाद से उसे इस मामले में कभी भी परेशान नहीं किया।

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

मैं और मेरा जीवन दो

जब डूबने लगा
घर के बगल में पोखर था। उसमें गांव के सभी बच्चे नहाते थे। मैं भी उनमें से एक था। जब मॉर्निंग स्कूल होता था, तो स्कूल से आने के बाद घर न जाकर पोखर में ही कूदते थे और खूब नहाते थे। उस समय लड़का-लड़की दोनों साथ-साथ नहाते थे। हमलोग नहाने में इतने मस्त हो जाते थे कि समय का ज्ञान ही नहीं रहता था। घर से सभी के मां-पिताजी आते थे, तभी हमलोग बाहर निकलते थे। हजार बार नहाने के लिए मना किया जाता था, लेकिन हमलोग कभी नहीं माने। उस समय बीमार भी नहीं पड़ते थे। अब तो बारिश में नहाने के बाद बुखार आ जाता है। समझ में नहीं आता कि इसी शरीर को अब क्या हो गया है? खैर, मुझे इस पचड़े में नहीं पडऩा है। जो तैरने जानते थे, वे खूब तैर रहे थे। जो नहीं जानते थे, वे सभी सीख रहे थे। हालांकि मुझे बताया गया कि तुम्हारे पैर खराब हैं, इस कारण तुम नहीं तैर सकते। लेकिन फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और तैरने की कोशिश करता रहा। इस सिलसिले में एक दिन नहाते वक्त डूब गया। बहुत पानी पी लिया था। उस समय डूबने का एक गजब का अनुभव हुआ। बल्कि यूं कहिए कि मौत को सामने देखकर जिंदा हुआ। मैं पानी के अंदर चिल्ला रहा था, लेकिन मेरी आवाज वहां नहानेवालों तक नहीं पहुंच रही थी। हारकर भगवान का नाम लेने लगा। उस समय यह पता था कि मरते वक्त भगवान का नाम लेने से स्वर्ग जाता था। भगवान का नाम ले ही रहा था कि एकाएक पप्पू से टकराया। उन्होंने मुझे बाहर निकाला और मेरी जान किसी तरह बची। अपने आप उल्टी होने लगी और फिर नहाने लगा। लेकिन उस दिन से एक डर समा गया। कहते हैं न कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, वही मेरे साथ हुआ। न जाने कब मैं तैरने के लिए सीख गया। खुद मुझे भी पता नहीं चला। नदी में दोस्तों के साथ खूब तैरने लगा। उस समय लगा कि अभ्यास से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। सभी लोग नंगे ही नहाते थे। स्कूल से आने के बाद सभी लोग कपड़े खोलते थे और नंगा नहाना शुरू कर देते थे। उस समय शर्म शब्द पता नहीं था। लड़का-लड़की में अंतर समझने लगा था, लेकिन सेक्स शब्द से अनजान था। उस समय मेरे पास चप्पल या जूता कुछ नहीं था। इसके बिना ही रोड पर चलते था। कभी इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी। वैसे भी उस समय चप्पल या जूते का प्रयोग हॉस्टल के लड़के ही करते थे। गांव में तकरीबन सभी का यही हाल था। इस समय पढऩे में काफी मन लगने लगा। स्कूल में अच्छे स्टूडेंट्स के रूप में गिनती होने लगी। लेकिन घरवाले की नजर में बेवकूफ ही था। इस कारण काफी दुखी रहता था। उस समय विद्यानंद यादव क्लास टीचर थे। सभी उन्हें विद्या बाबु कहते थे। बहुत बढिय़ा टीचर थे। मैथ पर उनकी पकड़ अच्छी थी। एक दिन मेरा भांजा मीठू मेरे साथ पढऩे गया। हम दोनों एक ही वर्ग में पढ़ते थे। वह बढिय़ा कपड़ा पहनता था और स्मार्ट भी बना रहता था। इस कारण स्वयं को उसके सामने हीन अनुभव करता था। विद्या बाबु ने एक प्रॉब्लम क्लास के सभी स्टूडेंट्स को बनाने के लिए कहा। संयोग से दो तीन मिनट पहले वह बनाकर दिखा दिया और मैं बना ही रहा था। समय को भांपते हुए विद्या बाबु बोले कि वाह भांजा तो तुम्हें हरा दिया। सभी लोग हंस पड़े। मैं भी उनमें से एक था। बात आई और गई हो गई। वह फिर घर चला गया। मैं जब चार बजे घर गया तो यह बात पूरी तरह फैल चुकी थी। उस समय बात को बतंगर बनाने पर मुझे बहुत गुस्सा आया, लेकिन लाचार था।
गार्जियन
बाबा मेरी नजर में अपने बाबा के बारे में अधिक याद नहीं है, लेकिन वे अच्छे थे और पढ़े-लिखे भी थे। नियमित पूजा करते थे। यदि कभी मेला लगता था, तो मीठाई खिलाते थे। एक दिन की बात है। मैं और प्रमोद भैया पांडे बाबा के यहां गए थे। वहां कोई उत्सव हो रहा था। क्या था, हमें ठीक से पता नहीं है। हमलोग आने के बाद बाबा के पास ही सोए थे। मैं, प्रमोद भैया और बहनें थीं। जहां तक मुझे याद है कि बाबा हमलोगों को शांत रहने के लिए कह रहे थे, और हमलोग गाना गा रहे थे। गाना का बोल था कि समधि ---ताल ठोकै दै, कियो नै लै छै मोल----। यह सिलसिला लगभग एक घंटा से चल रहा था। अंत में उनका धैर्य जवाब दे गया और वे गुस्सा से मारने के लिए उठे। सभी लोग भाग गए। मैं नहीं भाग सका और पकड़ लिए गए। सभी का गुस्सा मुझ पर ही उतारा गया और खूब मारे। वह मार अभी तक याद है और इसकी कसक अभी भी जिंदा है कि सबसे पहले भागने के बवाजूद पैर खराब होने की वजह से पीटा गया, अन्यथा औरों की तरह मैं भी भाग गया होता। इसके बाद उनके हाथ से मार नहीं खाया। मरते वक्त मैं वहीं था। उनके मरने से मुझे किसी तरह की फीलिंग नहीं हुई। वे बीमार थे, तो इस कारण खुश था कि इसी बहाने पढ़ाई नहीं करनी पड़ती थी। उस समय हमेशा पढ़ाई न करने का बहाना ढूंढा करता था।
पापा को हमलोग इसी नाम से पुकारते थे। उस समय तक उनके बारे में बहुत अधिक नहीं जानते थे। जब उन्हें वेतन मिलता था, तो बहुत सारे फल, बढिय़ा सब्जी और भात खाने को मिलता था। उस समय भात सबसे प्रिय था। मुझे याद है कि पंद्रह दिनों तक रोज रोटी ही खानी पड़ती थी। नुनु काका के यहां सप्ताह में एक दिन भात बन जाता था। जब भी भात बनता था, हमें जरूर मिलता था। यह काकी की महानता थी। सभी लोग उसे लड़ाकू कहते थे, लेकिन दिल की बूरी नहीं थी। वह भले ही भूखी रह जाए, लेकिन हमें जरूर देती थी। नुनू काका ट्विशन पढ़ाते थे। इस कारण उनके यहां लेट से खाना बनता था। वैसे तो जब भी भात बनता, मैं जगा रहता था। लेकिन एक रात सो गया। जब नींद खुली, तो सभी लोग खा चुके थे। स्वयं कोई विकल्प न देखकर राम-राम करने लगा, काकी और मां समझ गई। भात खाकर ही सोया। उस समय की घटना पर हंसी भी आ रही है और आश्चर्य भी। उस समय की घटना पर यही लगता है कि बचपन में किस तरह के दिमाग थे।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मैं और मेरा जीवन 1

जब तीसरे वर्ग में था
पहले की अपेक्षा काफी कुछ समझने लगा था। मेरा रोल नंबर 21 था। घर का माहौल ऐसा था कि रोज स्कूल जाने की आदत पड़ गई। किताब और बोरा लेकर नियमित आने लगा। उस समय स्कूल में नीचे में ही बैठना पड़ता था। इस कारण सभी लोग बैठने के लिए बोरा या पन्नी लाते थे। जो अमीर थे, वे पन्नी लाते थे और शेष बोरा लाते थे। उस समय अनुभव यह हुआ कि क्लास में बिना पढ़े प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण नहीं हुआ जा सकता है। यह बात मैं अच्छी तरह समझ लिया था। लेकिन न जाने चाहकर भी पढ़ाई में मन नहीं लगता था। स्कूल से रोज यही सोचकर निकलता कि कल से खूब पढ़ूंगा, लेकिन घर जाते ही स्कूल की बातें भूल जाता था। आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से कपड़े भी ढंग के नहीं थे। पहनने के लिए एक पेंट और एक शर्ट था। उस समय गंजी भी नहीं था। स्कूल और घर में उसी को पहनता रहता था। इस कारण वह काफी गंदा हो जाता था। नंगा ही नहाता था उस समय। शर्म शब्द पता नहीं था और न ही इसकी अनुभूति ही हो रही थी। शारीरिक रूप से अक्षम आग में घी का काम कर रहा था। नाक से नेटा और मुंह से लार टपकना रोज की आदत बन गई थी। इन सब विशेषताओं के कारण मेरे पास कोई भी स्टूडेंट्स नहीं बैठता था। मैं भी स्वयं को उससे अलग समझ अकेला ही बैठता था। साथ में मेरे गांव के दो स्टूडेंट्स संतोष और पप्पू थे। वे लोग कभी मेरे पास तो कभी उन लोगों के पास बैठते थे। यही दोनों वास्तव में मेरे स्कूल और घर के दोस्त थे। घर में पप्पू का छोटा भाई पिंटू भी मिल जाता था। पढऩे में कोई भी तेज नहीं था। पारिवारिक माहौल की वजह से मैं ही इनमें से बीस था। लेकिन इस तरह का अनुभव उस समय नहीं हुआ था। पप्पू उम्र में काफी बड़ा था। इस कारण वह हम दोनों को बेवकूफ बनाता रहता था और हमलोग अनजाने में बनते रहते थे। उस समय किताब की कुंजी रखना घर में जरूरी नहीं समझा जाता था। इस कारण मेरे पास किताब ही थे। उस किताब की हालत आज के फुटपाथ बच्चे की कपड़े से की जा सकती है। कहने का आशय यह है कि दो महीने में में ही किताब के एक-एक पन्ने गायब हो रहे थे और शुरू और अंत के दो तीन अध्याय नहीं रहते थे। कुछ तो अपनी लापरवाही और कुछ शुरू से पुरानी किताब मिलने की वजह से यह स्थिति हो जाती थी। उस समय हमसे जो सीनियर स्टूडेंट्स थे, वे अपनी किताब आधी दाम में बेचते थे और हमलोग खरीदते थे। यदि संयोग से नई किताब मिल जाती थी, तो उसका पन्ना अधिक रहता था। लेकिन जब पापा पढ़ाते थे और बीच से पेज गायब रहता था, तो मार भी खानी पड़ती थी। पुरानी किताब पर तो बहाना चल जाता था, लेकिन नई किताब में बचने का कोई विकल्प नहीं रहता था।
दाय की विदाई
उस समय मां को बहुत अधिक नहीं जानता था और उनसे प्रेम भी कम ही करता था। कारण यह था कि मैं हमेशा अपनी बड़ी बहन यानी कि दाय के पास ही सोता, उठता और बैठता था। मैं उस पर पूरा अधिकार रखता था। यदि वह बिना कहे कहीं चली जाती थी, तो उनके बगैर खूब रोता था। यही कारण था कि हम दोनों हमेशा साथ-साथ रहते थे। कब से उनके साथ मैं रह रहा था, यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन मां बोल रही थी कि बेहतर केयर की वजह से बचपन से ही मैं उनके साथ रह रहा था। मां के अनुसार दाय को काम में मन नहीं लगने की वजह से हमें सौंप दिया गया था। लेकिन अनजाने में ही हम दोनों का प्रेम इतना बढ़ गया कि एक दूसरे के बिना एक पल भी रहना मुश्किल हो रहा था। उस समय दाय को छोड़कर मैं किसी के साथ नहीं रहना चाहता था। वह हमेशा ही मेरा केयर करती रहती थी। मैं उन्हें काफी परेशान करता था, लेकिन वह हमें कभी-कभी मारती थी। उनके साथ गांव घूमता रहता था। उस समय तक मैं पति और पत्नी का मतलब नहीं जानता था। यही कारण था कि जब दाय के पति यानी आचार्य जी आते थे, तो मैं उनके साथ ही सोने की जिद करता और घरवाले उनसे अलग सोने के लिए दबाव डालते थे। इस मामले में हमेशा मेरी ही जीत होती थी। उस समय मैं काफी जिद्दी था। यह मुझे आभास हो गया था। इस कारण बाद में इसका काफी फायदा उठाया। घरवाले लाचार होकर मेरी बात मानते गए और मैं जिद्दी बनता गया। इससे मेरा दुस्साहस बढ़ता गया और घर में जो चाहता था, वही करता था। यदि कभी मेरा पहला औजार काम नहीं करता था, तो दूसरा औजार यानी कि भूख हड़ताल पर उतर जाता था। सभी को दया आ जाती थी और मेरी बात मान ली जाती थी। स्वयं को विजयी देखकर इस मामले में और भी दृढ़ होता गया। मेरी हिम्मत बढ़ती गई और घरवाले की परेशानी भी।
जब मैं बेहोश हो गया
मुझे ठीक तरह से याद नहीं है कि मैं क्यों घरवाले से खफा था। लेकिन यह याद जरूर है कि मैं दो दिनों तक घरवाले के लाख समझाने के बावजूद खाना नहीं खाया था। उस समय पास में पैसे भी नहीं रहते थे। मॉर्निंग स्कूल था। इस कारण सुबह उठकर स्कूल चला गया। सोचा कि ग्यारह बजे तक तो भूखा रह ही जाऊंगा। आठ बजे के लगभग एकाएक जोरों से नींद आने लगी। धीरे-धीरे आंख को बंद करने लगा और भूख से बेहोश हो गया। कब हम घर आए, पता नहीं चला। जब मेरी आंखें खुली, तो मां के गोद में था और मां कुछ खिला रही थी। उस समय यह जाना कि बिना खाना खाए बेहोश भी हुआ जा सकता है। उस दिन से रूठा तो बहुत, लेकिन न खाने की वजह से बेहोश नहीं हुआ।
दाय रात को अंधेरे में रो रही है। इस तरह की घटना दो चार दिनों से रोज देखता था। घर में काफी चहल-पहल थी। मां दाय को विदाई करने के लिए व्यवस्था कर रही थी। परसों दाय का द्विरागमन यानी कि गौना था। इस कारण वह रो रही थी। मुझे कोई भी कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं था। अंत में मुझे पता चला कि दाय परसों के बाद यहां नहीं रहेगी। यह सुनते ही मैं परेशान हो गया और रोने लगा। अंत में घरवाले दाय के साथ मुझे उनके ससुराल भेज दिए। वहां मैं एक महीने रहा और खूब मजे किया। आते वक्त दाय रो रही थी और मैं काफी खुश था। खुशी का कारण यह था कि मुझे नया कपड़ा मिलनेवाला था। कपड़े की खुशी में मैं दाय को भूल गया। वैसे भी एक महीने रहने के बाद मुझे उनसे दूरी बढ़ती गई और मैं पहले की अपेक्षा अधिक परिपक्व हो गया था। अपने घर आया और जहां तक मुझे याद है कि मैं उनके लिए कभी नहीं रोया। यह कैसे हुआ। अभी तक इसका उत्तर नहीं मिल पाया है। अभी भी यह मेरे लिए पहेली बनी हुई है।
जब मैं बन गया शाकाहारी
यह घटना भी इन्हीं वर्षों के दौरान घटी। घर में नुनू काका के अलावा बिनोद भैया ही वैष्णव थे। उस समय वैष्णव का कुछ अर्थ भी नहीं जानता था। पहले मैं रोज मछली खाता था। ऐसा मां कहती है। दिमाग पर जोर देने के बाद मुझे भी याद पड़ रहा है कि यदि गांव में कहीं भी मछली या मांस देख लेता, तो उसे खाने के बाद ही दम लेता था। कभी-कभी मां करछूल में मछली तलकर खिलाती थी। उस समय मछली के अलावा किसी और व्यंजन में स्वाद का दीवाना नहीं था। रात के आठ बजे आंगन में सोए हुए थे और नुनू काका रामायण पढ़ रहे थे। रामायण सुनाते हुए बोले कि जो मांस-मछली खाएगा, उसे चौसठ जन्मों तक गिद्ध ही रहना पड़ेगा। उस समय जीवन के प्रति सकारात्मक सोच था। मरने के नाम से ही परेशान हो जाता था। याद है मुझे कि सोते वक्त मैं और मेरी छोटी बहन यह कल्पना कर रहे थे कि यदि भगवान आते हैं और एक वरदान मांगने के लिए कहते हैं, तो क्या मांगोगी? उसका उत्तर तो याद नहीं है, लेकिन मुझे यह अच्छी तरह से पता है कि मैंने भगवान से यह मांगा था कि मैं जिंदगी भर अमर रहूं। भले ही अब इस बात पर हंसी आती है, लेकिन हकीकत यही थी। गिद्ध वाली बात मेरे मन में बैठ गई और निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसी समय निश्चय किया कि आज से मांस नहीं खाऊंगा। बचपन से ही वचन के प्रति ईमानदार था और जो वचन के पक्के थे, उन्हें काफी आदर भी करता था। यह अभी तक जारी है। यही कारण है कि इसमें ढिलाई बरतनेवाले लोगों से मैं काफी दूर रहता हूं। चाहे वह सगा-संबंधी ही क्यों न हो। एक बार वैष्णव बनने के बाद कभी भी मांस-मछली नहीं खाया। घरवाले काफी दबाव दिए, लेकिन निर्णय पर अडिग रहा। जब मछली देखकर खाने की हुईएक दिन घर में मछली बना था। देखने के साथ ही लार टपकने लगा। निश्चय किया कि रात को चुराकर अवश्य खाऊंगा। आधी रात को उठकर जैसे ही खाने की कोशिश करने लगा कि रात के अंधेरे में दिल से आवाज आई कि तुम अपने मां-बाप से छिपकर खा सकते हो, लेकिन भगवान देख रहा है। मैंने मछली जहां से उठाया, वहीं रख दिया। उस दिन से कभी भी प्रयास नहीं किया। धीरे-धीरे स्वाद भी भूल गया हूं। अब जब बड़ा हुआ हूं, तो उसे देखकर दया आती है। इस कारण खाने की इच्छा नहीं हो रही है। लाचारी बनी ताकत
दरवाजे पर सोया हुआ था। दोपहर का समय था। एकाएक मां मुझे डांट रही थी और मैं जागकर कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। बात समझने में देर नहीं लगी। हुआ यूं कि जब मैं सोया था, तो छोटा काका मेरी बैसाखी लेकर उसे काट दिए। यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उन्होंने जानकर नहीं काटा। खैर मेरी एक बैसाखी के दो टुकड़े हो गए। किसी तरह उससे चल रहा था। अंत में वह भी टूट गई। घर में इतने पैसे नहीं थे कि तुरंत बैसाखी खरीदा जाए। इस कारण एक बैसाखी से ही चलने की कोशिश करने लगा। स्कूल जाते समय एक छोर से छोटी बहन का हाथ पकड़ लेता था और दूसरी तरफ बैसाखी रहती थी। यह सिलसिला लगभग एक वर्ष तक चला। बाद में ऐसा हुआ कि दो बैसाखी रहने के बावजूद मैं एक ही बैसाखी पर चलने लगा और आज तक जारी है। परोक्ष रूप से चाचा ने मेरा उपकार ही किया। यदि वे इस तरह की नादानी नहीं करते,तो आज मैं यह सब लिखने के काबिल नहीं होता। एक बैसाखी से मुझे यह फायदा हुआ कि मैं औरों की तरह किताब और कॉपी लेकर चल सकता था। पहले पीठ पर किताब लेने पड़ते थे। क्योंकि दोनों हाथ में बैसाखी था। जिस तरह दशरथ राम को वनवास भेजकर राम को भगवान बना दिए, उसी तरह मेरे चाचा ने बैसाखी काटकर अनजाने में ही मेरा बहुत बड़ा उपकार कर गए। उसी समय मुझे यह भी विश्वास हुआ कि अभ्यास से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। यदि दो बैसाीखी से चलता, तो... इस कल्पना से ही रूह कांप उठती है।
बदला नजारा, बदली हवा
उस समय मैं हीन भावना से ग्रस्त हो गया था और यह समझ बैठा था कि जिंदगी की गाड़ी इसी तरह से चलती रहेगी। चुनापुर के संतोष झा क्लास में फस्र्ट करता था। उस समय उससे आंख मिलाने की ताकत मुझमें नहीं थी। वह आया और मुझे समझाया कि तुम मेरी तरह बन सकते हो, मैंने हंसते हुए कहा कि यह संभव नहीं है। यदि तुम साफ-सुथरे कपड़े और पढ़ाई में बेहतर करते हो, तो तुम्हारे पास भी लोग बैठने लगेंगे। एक ही कपड़ा होने की वजह से साफ-सुथरा कपड़ा तो नहीं, लेकिन उस दिन से पढऩे में एक गजब का जुनून सवार हो गया। मैं खूब मेहनत करने लगा। जब परीक्षा के दिन आए, तो काफी परेशान थे। मुझे खुद पर विश्वास नहीं था। इस कारण परीक्षा हॉल में गांव के संतोष, पप्पू और मैं एक साथ बैठा। पप्पू उम्र में हमलोगों से बड़ा था। इस कारण वह हमें एक कुंजिका दिया और बोला कि इसे छिपाकर रख दो। मैंने वैसा ही किया। प्रश्नपत्र देने से पहले टीचर ने सभी स्टूडेंट्स को धमकाया कि यदि किसी के पास कुछ भी है, तो दे दो, वरना पकड़े जाने पर परीक्षा हॉल से बाहर निकाल दिए जाओगे। कभी भी परीक्षा में नकल नहीं किया था। इस कारण काफी डर गया और उसकी किताब निकालकर टीचर को दे दिया। संतोष भी कुछ रखा था, लेकिन वह नहीं दिया। गुस्से से वे दोनों हमारे पास से अलग बैठ गए और हमें अपनी हाल पर छोड़ दिया। मैं अंदर ही अंदर काफी डर गया। अंत में किसी तरह की सहायता मिलते न देखकर स्वयं को विश्वास में लिया और परीक्षा में लिखने लगा। एक भी नकल नहीं किया और मेरे रोल नंबर छलांग लगाते हुए तीन पर आ गया। यह आपको फिल्म की तरह लग रहा हो, लेकिन हकीकत यही था। इससे मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और मैं भी आगे में सभी दोस्तों के साथ बैठने लगा। मेरे न चाहते हुए भी आगे की सीट पर मेरे सिवा किसी की हिम्मत नहीं होती थी बैठने की।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मैं और मेरा जीवन

जब मारा पहली बॉल पर छक्का
मुझे पढ़ाई में कभी भी मन नहीं लगता था। हमेशा खेलने और प्रमोद भैया से लडऩे में ही समय जाया हो जाता था। जिंदगी मजे में चल रही थी कि एक दिन परीक्षा सिर आ गई। क्लास कभी नहीं गया था। एकाएक परीक्षा देने पहुंच गया। चलने में लाचार था। इस कारण लाल भैया अपने कंधे पर मुझे स्कूल ले गए और परीक्षा हॉल में बैठा दिए। उस समय जहां तक मुझे याद है कि प्रश्न में क्या लिखा था, मुझे कुछ भी पता नहीं है। लेकिन टीचर सभी को एक दोहा लिखने के लिए कह रहे थे। मुझे अपने क्लास के सभी दोहे याद थे, लेकिन लिखने का अभ्यास नहीं था। इस कारण मैं रोने लगा। टीचर हमें कुछ भी लिखने के लिए कह रहे थे। अपना नाम और वर्ग किसी तरह लिख ही रहा था कि रोशनाई कॉपी पर गिर गई। मेरे भैया बाहर से देख रहे थे। उसे टीचर भगा रहे थे और वे किसी तरह वहां खड़े थे। बाद में उन्होंने काफी मेहनत के बाद अंदर मुझे लेने के लिए दाखिल हुए और पंद्रह मिनट में कॉपी भर दिए। उस समय तक मुझे कुछ भी पता नहीं था। जब एक महीने के बाद भैया स्कूल से आए, तो सभी लोग मुझे शाबासी दे रहे थे। क्योंकि मैं अपने वर्ग में प्रथम आया था। याद है मुझे उस समय की घटना, जब हम और भी पढ़ाई नहीं करने लगे। मुझे यह विश्वास हो गया था कि फिर मैं ही प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होऊंगा। उस समय न चल पाने के बावजूद मेरे पैर आसमान में थे। सच कहिए, तो उसी समय से मुझे सहारे की अहमियत मालूम हुई और मुझे लगने लगा कि अपने परिवार की बदौलत आसमान में उड़ा जा सकता है। लेकिन यह अधिक दिनों तक नहीं रही।
सेकेंड बॉल पर बोल्ड
जब सेकेंड क्लास में गया, तो पता चला कि मुझे कुछ भी नहीं आता है, जो कि सही आकलन था। आत्मविश्वास इतना गिर गया कि मैंने पढऩा ही छोड़ दिया। घर में दबाव की वजह से जो कुछ पढ़ता था, बस वही था। इस बार की परीक्षा में भैया नहीं थे। इस कारण हमें ही लिखना पड़ा। जो कुछ भी जानता था, उसे लिख दिया। रिजल्ट के पीछे यह धारणा अभी भी बनी हुई थी कि फस्र्ट नहीं, तो सेकेंड अवश्य आऊंगा। उस समय रिजल्ट निकलने से पहले स्कूल में बांस और झाड़ू देना पड़ता था। इससे अधिक माक्र्स मिलते थे। पहली बार इस उत्साह से अपने बांस बाड़ी गया स्वयं बांस काटने। मुझसे नहीं कटी बांस। मुझे यह सीख मिली कि जो देखने में बड़ा होता है, उसे काटना उतना ही मुश्किल होता है। खैर बांस और झाड़ू स्कूल मेेें पहुंचाया। रिजल्ट के दिन सभी स्टूडेंट्स को बुलाया गया। सभी क्लास से उन तीन नामों को बताया गया, जो प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी से उत्तीर्ण थे। मेरा नाम किसी में नहीं था। काफी दुख हुआ मुझे उस समय। प्रमोद भैया का नाम सुनकर मुझे और भी दुख हुआ। क्योंकि हमें यही डर था कि घर जाने पर वे सभी को बताएंगे और अपनी शेखी बघारेंगे। दुखी होकर मैं टीचर के पास गया और पूछा कि मास्टर साहब हम पास नहीं कर पाए हैं। उस समय रिजल्ट का अहमियत मालूम हुआ और उसका दबाव भी पता चला। टीचर भावुक होकर सभी के सामने बोले कि विजय झा भी पास कर गया है। उस समय का बालमन इतना भी समझ नहीं पाया कि वे हमें उत्साह बढ़ाने के लिए झूठ बोल रहे हैं। एकाएक मेरा दिमाग बदल गया और अपने दो साथियों का नाम न सुनकर उन्हें पढऩे के लिए नसीहत देने लगा। प्रमोद भैया हमें डांटते हुए बोले कि तुम भी तो पास नहीं हुए हो। मैं तपाक से बोला कि आपकी तरह मेरा भी नाम पुकारा गया है। हम दोनों में इस तरह की बहस एक दिन में तीन चार बार अवश्य हो जाया करती थी। छोटे होने का हम हमेशा फायदा उठाते और वे गलती न रहने के बावजूद हमेशा पीटते रहते। जब अनजाने में नाटक सीखाएक रात हम दोनों भाई पढ़ रहे थे। हम दोनों को पढऩे में मन नहीं लग रहा था। पढ़ाई छोड़कर उनके सामने रोने का एक्टिंग कर रहा था। रोने की एक्टिंग में ऐसा खो गया कि रोने की आवाज घर से बाहर पहुंच गई और लाल भैया दौड़ते हुए हमलोगों को देखने के लिए आ ही रहे थे कि मैं उन्हें देखकर सही में रोने लगा। संयोग से आंसू भी टपकने लगे। भैया ने जब रोने का करण पूछा, तो मैं प्रमोद भाई का नाम लगा दिया और बोला कि वे हमें मार रहे थे। वे हतप्रभ थे। उस समय वे कुछ भी उत्तर नहीं दे पा रहे थे। लाल भैया उन्हें मार रहे थे और बेचारा बिना मारे ही मार खा रहा था। उस समय पहली बार उन पर तरस आया और अपने आप में यह विश्वास जागा कि परिस्थितियां आने पर इस तरह के नाटक से बचा जा सकता है। बाद में इसका काफी उपयोग किया।
केले की रोटी
घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पापा टीचर थे। हम पांच भाई और बहन थे। पापा के सिवा कोई कमानेवाला नहीं था। तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। परिवार काफी बड़ा था। सिर्फ दो बड़ी बहने और बड़े भैया घर में नहीं थे। घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था। मां किसी तरह सभी भाई-बहनों को बहला रही थी। दो दिनों से खाना में उबला हुआ आलू ही खा रहे थे। भाई-बहनों में मैं सबसे ज्यादा शरारती था। जहां तक मुझे याद है कि उस समय मुझे यही पता चला कि घर में खाने के लिए आलू के सिवा कुछ भी नहीं है, बस मैं रोना शुरू कर दिया कि मुझे रोटी चाहिए। मां परेशान हो गई, लेकिन कुछ कर भी नहीं सकती थी। पापा महीने में एक बार घर आते थे और दूसरे दिन विदा हो जाते थे। उस समय इतने कर्ज थे कि मुश्किल से खाने के लिए पैसा बचता था। खाना मिलते न देख मैं रोने लगा। अंत में मां ने रोटी बनाई और हमें खिलाई। तब जाकर शांत हुआ। उस समय किसकी रोटी बनाई गई थी, मुझे पता नहीं था। जब बड़ा हुआ, तो मां बताई कि घर में कुछ न देखकर कच्चा केला को उबालकर उसी की रोटी बनाई और तुम्हें शांत किया। उस दिन जब भी उबला हुआ आलू और केला देखता हूं, तो पुरानी यादें ताजा हो जाती है।
आज के परिप्रेक्ष्य में
जब पुरानी घटना को आज के परिप्रेक्ष्य में देखता हूं, तो लगता है कि पिताजी कितने महान थे कि अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़कर नौकरी करते थे और अपनी जिंदगी अपने बच्चे में बिता दिए। आज के मां-बाप इस तरह कर सकते हैं? यदि मां-बाप अपने बच्चे के लिए इस तरह के कार्य कर भी लें, तो औरत अपने बच्चे के लिए इतना त्याग कर सकती है। हम खुशनसीब हैं कि हमें इस तरह के पैरेंट्स नसीब हुए हैं। फिर स्वयं को देखता हूं, तो और भी परेशान हो जाता हूं। अपने बचपन के व्यवहार को देखकर मैं यह कह सकता हूं कि इस तरह के शरारती बच्चे को कम से कम मैं नहीं झेल सकता। मुझे यह भी सीख मिली कि सहारे की डोर पकड़कर आप जीवन की सफर तय नहीं कर सकते हैं। इस तरह के सहारे जीवन में कभी-कभी मिलते हैं। जो इन सहारा का सदुपयोग करते हैं, उन्हें कभी भी कठिनाइयां नहीं आती है। इस अनुभव का मैंने बाद में उपयोग किया और आज अनुभव का फायदा उठाकर इस मामले में खुश हूं। फिर सोचता हूं कि क्या आज के बच्चे को इस तरह ठगा जा सकता है?

सोमवार, 25 जनवरी 2010

बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया

लोग हमें कामयाब समझकर खुश हो रहे थे और मेरी तरह बनने के लिए कह रहे थे, तो मैं कामयाबी का अर्थ समझ रहा था और बर्बादियों का जश्न मनाने में मशगूल था।
उस समय अक्सर मैं भ्रम में रहता था कि आदमी खुशी और कामयाबी में से किसे वरीयता दे? जब बच्चा था, तो पापा यही बताए थे कि यदि तुम अपने उद्देश्यों में कामयाब हो जाओ, तो खुशियां अपने आप आ जाएगीं। पापा ही नहीं, टीचर और अन्य सभी लोग भी यही कहते थे। इस कारण उस समय संदेह की गुंजाइश ही नहीं थी। उस समय कामयाबी एक सपना था, तो खुशी हकीकत। मुझे याद है कि उस समय मैं छोटी-छोटी चीज मिलने पर भी काफी खुश हो जाता था। उस समय मुझे यह पता नहीं था कि यही स्वर्णिम समय है खुशी पाने का। कामयाब व्यक्ति को देखकर अनेक तरह की कल्पना करता रहता था उस समय। कामयाब बनने के लिए दिनरात लग गया अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में। मेहनत का नतीजा या किस्मत कहिए कि लगभग पच्चीस की उम्र में देश के प्रतिष्ठित अखबार में नौकरी भी मिल गई। उस दिन काफी खुश था इसे पाकर। मुझे लगा कि अब हमें खुशियां ही खुशियां मिलेगी। याद है मुझे कि जब नौकरी मिली थी, तो गांव के सभी लोग काफी खुश थे। मैं भी उन लोगों के बदले व्यवहार से खुश था। मुझे लगा कि मंजिल मिल गई। अब सिर्फ परमानेेंट खुशियां आनी हंै।
सपना हो न सका अपना
नौकरी के दूसरे दिन से ही सपना देखना शुरू कर दिया। हर रोज वही ऑफिस और बॉस का मनहूस चेहरा। ऑफिस में उनका चेहरा देखना लाचारी था, लेकिन कमबख्त रात के अंधेरे में भी वही ऑफिस और बॉस सपने में दिखाई दे रहा था। एक बार लाइट जलाकर सो गया, तो नींद में सपने देखने लगा। मुझे लगा कि शायद लाइट का फायदा उठाकर वे हमारे कमरे में घुस गए हों। इस कारण उस दिन से लाइट बंद करके सोता हूं। लेकिन सपना आना बंद नहीं हुआ। लोग हमें देखकर काफी खुश थे और परिवार वाले की अपेक्षा मुझ पर बढ़ गई थी। लेकिन उस समय मेरी हालत न भागा जाए है हमसे और न ठहरा जाए है हमसे जैसी थी। यदि मैं नौकरी छोड़ता तो लोगों की नजरों में नाकामयाब कहलाने का डर था। इसकी संभावना मात्र से ही रूह कांप उठती थी। इसके विपरीत नौकरी में रहकर अंदर से और कमजोर हो रहा था। उस समय मुझे यह अहसास दिलाया गया कि मुझे कुछ भी नहीं आता है। इससे काफी परेशान हो गया। एक सीनियर ने हमें बताया कि इस तरह की स्थिति हर नए लोगों के साथ होती है। तुम अपवाद नहीं हो। विश्वास तो नहीं हुआ, लेकिन दिलासा के लिए न मानने के सिवा कोई और विकल्प नहीं था। उस समय खुशी शब्द ही भूल गया। स्वयं को एक लाश के समान समझता था। दुनिया हमें खुशनसीब और कामयाब समझ रही थी। और हम कामयाबी का मतलब धीरे-धीरे समझ रहे थे। वक्त का एक-एक लम्हा काटना मुश्किल हो रहा था। इस आशा से काम करता जा रहा था कि सब कुछ सीखने के बाद खुशियां ही खुशियां आएंगी। उसी समय सही अर्थों में कामयाब कहलाऊंगा। लेकिन अब पता चला कि आदमी कभी भी पूर्ण नहीं होता है, उसे हर दिन सीखने पड़ते हैं। स्वयं को दिलासा देने के लिए उन सभी लोगों से मिला, जिन्हें मेरे साथ सभी लोग कामयाब कहते हैं। उनसे संबंध बढ़ाया और दिल की बात जानने की कोशिश की। लेकिन कहीं भी कामयाब व्यक्ति को अपनी जिंदगी से खुश नहीं देखा। इसके विपरीत वे हमसे ज्यादा तनाव में थे। जब सत्यम के सीईओ को जेल जाने की खबर पढ़ी, तो पक्का विश्वास हो गया कि कामयाबी और खुशी एक साथ कभी नहीं मिल सकती है।
यदि आप कामयाब हो रहे हैं, तो कुछ पलों के लिए खुशियां अवश्य आएंगी और फिर विलुप्त हो जाएगी। खुशी पाने के लिए फिर से कामयाब होना पड़ेगा। यह जिंदगी में अनवरत जारी रहेगी। अब मैं यह समझ रहा हूं कि कामयाबी का कोई अंत नहीं है। खुशियां भी इन्हीं पीछे-पीछे चलती है। यदि आपको सही में खुश रहना है, तो संतुष्टï होना पड़ेगा। यदि आप संतुष्टï हैं, तो जिंदगी की गाड़ी के पहिए भले ही लोगों की नजर में पंक्चर है, लेकिन यह तय है कि उसी गाड़ी से आप जिंदगी का नैया पार लगा लेंगे। जबसे मुझे इस बात का अहसास हुआ है, तब से काफी खुश हूं। भले ही आप मुझे कायर समझिए, अब कामयाबी के लिए मैं नहीं दौड़ सकता।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

जब मुझे प्रेमचंद पर गुस्सा आया

बचपन में हमलोग लताम (अमरूद) बहुत ही चुराते थे। इसके चलते कितनी ही बार डांट और मार पड़ चुकी थी। गांव में लताम बाबा के यहां बहुत लताम था। इस कारण उसे लताम बाबा कहते थे। एक दिन गलती से मैं उनके चंगुल में फंस गया और वे काफी पीटे थे। यह बात मैं घर में इस कारण नहीं बताया कि भैया और भी मारते। उस दिन कसम खाई थी कि बड़ा होने पर इसका बदला अवश्य लूंगा। लेकिन यह क्या जब मौका मिला, तो मैं उन्हें देखकर रोने लगा।
हुआ यूं कि रोड पर शाम को पांच दोस्त बातें कर रहे थे। अंधेरा था। उन पांचों में से एक मैं भी था। उस समय लगभग सात बज रहे होंगे। ठंड भी ज्यादा थी। सभी लोग घर में थे। रोड पर हमलोगों के अलावा अंधेरा और कभी-कभी गाडिय़ां चल रही थीं। देहात में शाम सात बजे बस भी नहीं चलती है। हमलोग बात कर ही रहे थे कि किसी के गिरने की आवाज आई। आवाज से हमलोग चौंके और दौड़े। वहां जाने के बाद पता चला कि लताम बाबा दूध लेकर आ रहे थे, और अंधेरे में गिर पड़े। देखते ही मुझे बचपन की यादें तरोताजा हो गई लेकिन उनकी हालत देखकर कलेजा मुंह को आ गया। बदला लेने की भावनाएं भी मर गई। उन्हें कहा कि क्या जरूरत है आपको इस उम्र में भी दूध लाने की। यदि अंधेरे में गए ही थे, तो टॉर्च तो साथ में ले लिए होते। इस पर वह कुछ नहीं बोले और चलते बने। चोट उन्हें जोर से लगी थी। मुझे लगा कि कल वे डॉक्टर से दिखा लेंगे।
दूसरे दिन जब उनके घर गया, तो उनकी पतोहू उन्हें गालियां दे रही थी। सुनने में यहां तक आया कि वह मारती भी है। उस समय चेतावनी दे रही थी कि इस बार गलती होने पर आपका खाना ही बंद कर दिया जाएगा। लताम बाबा हमें देख रहे थे और मैं कल रात की घटना याद कर रहा था। मुझे लगा कि शायद उन्हें कल वाली घटना न बताई गई हो। उन्हें बताने ही जा रहा था कि उनका पोता बोला कि देखिए इस बूढ़े के चक्कर में मां आज ब्राह्मण को नहीं खिला पाई। बाबा रात को दूध ही गिरा दिए। इसलिए मां गुस्सा कर रही है। इस पर अपने बच्चे की हां में हां मिलाते हुए वह बोली कि हे भगवान, मेरा न खिलाने का सभी पाप इन्हें ही लग जाना। मैं यही सोचने लगा कि यह कौन सा धर्म है। फि‍र दरिद्रनारायण की कहानी याद आ गई, जिसमें भगवान को खुश करने के लिए दूर दूर से लोग आ रहे है। चढावे में पैसे के साथ ही बहुमूल्‍य उपहार भी दे रहे हैं। लेकिन फि‍र भी उन्‍हें भगवान का आशीर्वाद नहीं मिल रहा है, क्‍योंकि वे लोग जिसे भीखारी सझकर लात मार रहे थे, असल में भगवान वहीं दरिद्रनारयण का रूप लेकर थे। उस रात नहीं सोया और जब अपनी मां से इस संबंध में बात की, तो वह बोली कि बेचारे की यही हालत हर दिन होती है। सिर्फ एक पापी पेट पालने के लिए उन्हें यह करना पड़ता है। जबकि एक समय उनकी तूती बोलती थी और गांव वाले काफी इज्जत करते थे। कुछ वर्षों के बाद घर गया तो मां बोली कि आज भोज है, क्योंकि लताम बाबा मर गए हैं। मुझे उस समय प्रेमचंद की कफन कहानी याद आ गई। यह कहानी प्रेमचंद कब लिखे थे, हमें पता नहीं है, लेकिन आज हालात वही है, लेकिन पात्र और तरीका बदल गया है। आज के पढ़े-लिखे बुजुर्ग के पास पैसे हैं, तो उन्हें प्यार करने वाला और देखने वाला कोई नहीं है। कफन कहानी में दारू की भट्टी पर खाते हुए बाप-बेटा यह कह रहा था कि वह मरी भी तो खूब खिला-पि‍लाकर। आज गांव वाले भी परोक्ष रूप से यही कह रहे होंगे। क्योंकि खाना बहुत ही स्वादिष्ट बना था। फिर जब पता चला कि उसकी पतौहू पढ़ी-लिखी है, तो प्रेमचंद पर काफी गुस्सा आया कि शायद कफन से ही वह इस तरह के कार्य करने के लिए प्रेरित हुई होगी। मुझसे रहा नहीं गया और उनसे इस बारे में पूछा, तो वह बताई कि
कफन पढऩे के बाद मैं बहुत रोई थी। बेचारी औरत भूखे और प्यासे मर गई। उसके ससुर और पति मौज कर रहे थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। कोई भी औरत इस तरह की हालत बर्दास्त नहीं कर सकती है। वहां सुनने वाले उन्हें शाबाशी दे रहे थे, तो हमारी आत्मा यह कह रही थी कि तुम्हारा भी तो तरीका बेहतर नहीं था। प्रेमचंद के कहानी लिखने का तो उद्देश्य यह नहीं था। वह तो समाज को सीख देना चाहते थे, न कि किसी और से बदला लेने के लिए। सच कहिए तो लताम बाबा की दुर्दशा और पतोहू के व्यवहार को देखकर हमें प्रेमचंद पर काफी गुस्सा आ रहा है।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

तिल खाने से तेल हो जाएगा

कल मकर संक्रान्ति थी। सभी लोग काफी खुश थे। मैं भी उनमें से एक था। अखबार में नौकरी करता हूं। इस कारण ऑफिस में छुट्टïी नहीं थी। घर से निकलने में दुख भी नहीं हो रहा था। क्योंकि मैडम यहां नहीं हैं। रास्ते में आते वक्त सोचने लगा कि एक औरत के रहने से जिंदगी कैसे बदल जाती है। क्योंकि उसी समय याद आ गई वह पुरानी घटना, जिस समय मेरी पत्नी काफी दुखी होकर हमें ऑफिस के लिए विदा कर रही थी। उस दिन दशहरा था। इस कारण हमें छुट्टïी नहीं थी। उस दिन हमें भी आने में काफी दुख हुआ था और आज उसके न होने से ही हालात बदल गए हैं। क्या उसके न होने का इतना बड़ा फर्क पड़ता है? अब हमारी खुशी उसी पर अवलंबित हो गई है? यह सोच ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी और रौब से बोली कि कल आप किसी के यहां तिल तो नहीं खा लिए थे? मैं प्रश्न से हैरान था। फिर भी बात बढ़ाते हुए पूछा कि खाने से तिलचट्टïा बन जाऊंगा। नहीं, लेकिन नहीं खाना चाहिए। क्योंकि आज के दिन जिस किसी का तिल खाएंगे, उसी के हो जाएंगे। आइडिया मजेदार लगा। लेकिन दुख यह था कि हमें कोई भी तिल खाने के लिए नहीं बुलाया। लेकिन यह प्रश्न अभी भी हास्यास्पद लग रहा है कि ऐसा होता है? यदि ऐसा होता तो बचपन में उसकी मां के तिल तो खूब चुराके खाया था, लेकिन नहीं वह हमारी बन पाई और न ही उसकी मां की टेढ़ी नजर सीधी हुई। काश तिल में ऐसी शक्ति होती तो आजतक उसकी भक्ति में लगा रहता और और...। फिर सोचने लगा कि तिल खिलाकर बॉस को अपने पाले में कर लेता, बहुत सारी संपत्ति अपने नाम कर लेता और और बहुत कुछ कर लेता। फिर दादी की बात याद आई कि वह भी हमलोगों को तिल खिलाती थी और हमें यह वचन देना पड़ता था कि हम आपके बने रहेंगे। लेकिन वे पहले हमें धोखा दीं और इस संसार से चल बसीं। वैसे भी जिंदा रहती तो दुखी ही रहती। क्योंकि हमारे पड़ोसी की मां भी अपने बच्चे को तिल खिलाकर यही वचन कह रही थी और वे भी निभाने का वादा कर रहे थे। अभी हालात ये हैं कि वह भूखी मर रही है और बेटे को देखने के लिए टाइम नहीं है। इस संबंध में मां से जब पूछा तो मां ने बताई कि वह आज ही तिल खिलाने के लिए आई थी और वही वचन दोहरा रही थी। क्या विश्वास इतना सख्त होता है कि हालात भी उन्हें नहीं डिगा सकता? तभी तो देश के अंदर ही इंडियाऔर भारत है। एक तरफ सर्दी में खास तरह की व्यवस्था की जाती है और लोग कड़ाके की सर्दी आने का इंतजार करते हैं, ताकि जिंदगी का लुत्फ उठाया जा सके। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें खाना तो दूर, पहनने के लिए एक कपड़े तक नहीं हैं। यदि रोड या पुल के किनारे वे अपना बसेरा बनाए भी हैं, तो सरकार की टेढ़ी नजर है और सौंदर्य के नाम पर उन्हें घर से बेघर करके मरने के लिए छोड़ दिया गया है। लेकिन फिर भी वे आपका तिल नहीं खाएंगे। भले ही उन्हें भूख है। आप इस पर हंसिए या आश्चर्य व्यक्त किजिए। हमारे भारत में हकीकत यही है। तभी तो भारत को विविधता का देश कहा जाता है।