गुरुवार, 29 जुलाई 2010
पागल बुढि़या कुछ भी बोलती रहती है
जून में कुछ दिनों के लिए घर गया था। काफी खुश था घर जाकर। पड़ोसी में एक बूढ़ी है। उम्र होगी करीब सत्तर वर्ष। वह काफी परेशान थी। कसम खाई थी कि अब किसी बच्चे को नहीं पढ़ने देगी। इस कारण उसे कुछ लोग पागल भी कह रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ यह सुनकर कि आजकल सभी शिक्षा को बढ़ावा दे रहे हैं और यह दादी शिक्षा की कब्र खोद रही है, जबकि वह पेशे से खुद टीचर थी। एक समय उनकी खूब चलती थी। मुझे याद है कि संस्कृत के श्लोक रटाने के लिए वह बहुत मारी थी। उसका बेटा महेश भी मेरे साथ पढ़ता था। उसे भी खूब मार पड़ी थी। अंत में मैं यह श्लोक सुना दिया और उसे याद नहीं हुआ। उसे इस कारण छोड़ दिया गया कि वह संस्कृत में कमजोर था, लेकिन मैथ में तेज था। उसकी मां गर्व से कहती थी कि संस्कृत में क्या रखा है। मैथ पढ़कर बेटा इंजीनियर बनेगा। हुआ वही, बेटा इंजीनियर बन गया, लेकिन अपनी मां को यहीं छोड़ गया है। मां इसलिए परेशान थी। मैं उन्हें मजाक के लहजे में कहा कि आप मुझे संस्कृत के श्लोक के लिए बहुत पीटी थीं आपको याद है? वह बोली कि मुझे वह घटना भी याद है और श्लोक भी। काश, उस समय मैं इसका महत्व समझती और उसे भी तुम्हारी तरह रटा देती तो आज यह दिन नहीं देखने पड़ते। मुझे हंसी आ गई और वह रोने लगी। अब आप सोच रहे होंगे कि श्लोक क्या था। साधारण है, आप सभी जानते हैं। उस समय तो मैं उसे रट लिया था और व्यावहारिक जीवन में कभी जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन उसके बाद मैं भी सोचने के लिए मजबूर हो गया। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि एक श्लोक का इतना महत्व हो सकता है। अंत में मैं लाचार होकर उनसे पूछा कि विद्या तो उसके पास है ही, फिर श्लोक का क्या महत्व? वह गंभीर होकर बोली कि जब हनुमान के दिल में ही सीता और राम थे, तो फिर राम-राम की रट क्यों लगाते थे। श्लोक है : विद्या ददाति विनयम, विनया ददाति पात्रत्रामपात्रत्वधनआप्नोति धनात धर्म: तत: सुखम। आधुनिक शिक्षा तो वह ग्रहण कर लिया लेकिन बुनियादी शिक्षा ही वह भूल गया। कुछ दिन पहले उसके पास गया तो मुझे वहां से इस कारण भेज दिया कि तुम यहां एडजस्ट नहीं कर सकती। बताओ, यदि सही विद्या होती, तो इस तरह की बातें वह करता? मैं निरुत्तर था और वह बार-बार यही प्रश्न कर रही थी। इसी बीच भतीजा आया और बोला कि चलिए यह पागल बुढि़या कुछ भी बोलती रहती है।
गृहस्थ या सन्यास
पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की। पति के बेवफाई से तंग आकर पत्नी ने तलाक ली। इस तरह की खबरें आजकल आम हो गए हैं। पहले ये खास लोगों में थी, तो खास खबर बनती थी। अब आम हो गई है। बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। उसमें यह था कि एक युवक गृहस्थ और सन्यास को लेकर दुविधा में था। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि कौन बेहतर है? काफी परेशान होने के बाद वह कबीर दास के पास पहुंचा और अपनी परेशानी बताई। कबीर उन्हें जंगल घास काटने के लिए ले गए। दो घंटे के बाद नब्बे वर्ष के बूढ़े संत के पास ले गए। कबीर ने उनसे पूछा कि बाबा आपका नाम क्या है और कितनी उम्र हो रही है? संत न बताया कि बेटा नाम आत्मा राम है और उम्र 90 वर्ष है। कबीर फिर उसी को दोहराए और संत उसी भाव से उत्तर दिए। इस तरह एक ही प्रश्न कबीर ने उस संत से लगभग पचास बार पूछा, लेकिन संत उसी भाव से सहज उत्तर देते रहे। युवक भी इस बात को सुन रहा था। वह पछता रहा था कि किस पागल के पास मैं आ गया हूं। बाद में कबीर दास ने युवक को अपना घर लाया। उस समय दिन के दो बज रहे थे। बीच आंगन में घास रखकर कबीर ने पत्नी से एक दीया जलाकर लाने को कहा। युवक अब अच्छी तरह समझ गया कि कबीर पागल है, क्योंकि उस समय धूप काफी खिली हुई थी। पत्नी कबीर के आदेशानुसार दीया जलाकर ले आई। अब कबीर ने युवक को बताया कि यदि तुम संत की तरह क्रोध मिटा सकते हो, तो संत बनो। इसके विपरीत यदि विश्वास है, तो गृहस्थ बनो। क्योंकि गृहस्थ जीवन विश्वास पर अवलंबित है। यदि अविश्वास होता तो पत्नी धूप में दीया लाने का प्रयोजन पूछ सकती थी, लेकिन नहीं पूछी। कारण साफ है। यह तो एक कहानी थी, लेकिन आजकल दोनों चीज गायब हैं। आजकल के हाइटेक बाबा काम और क्रोध में लिप्त हैं और अखबार की सुखियरें में रहते हैं, तो अविश्वास के कारण परिवार टूट रहे हैं। शक के कारण एक दूसरे की हत्या की जा रही है। अब मैं खुद परेशान हूं कि कबीर सही थे या हमलोग सही हैं। आखिर हमें भी तो जमाने के साथ कदम बढ़ाकर चलना है। नहीं चलेंगे, तो पीछे रह जाएंगे। चलेंगे तो कहीं के नहीं रहेंगे।
मन का सुख
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजीसे पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कमपड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय " हमें याद आतीहै ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंनेछात्रों से कहा कि वेआज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबलटेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समानेकी जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ...आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरुकिये h धीरे- धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समागये , फ़िरसे प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालनाशुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी परहँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अबतो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ॥ अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे सेचाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थितथोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान ,परिवार , बच्चे , मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं ,छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , औररेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस कीगेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहींभर पाते , रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछेपडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातोंके लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है येतुम्हें तय करना है । अपनेबच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ ,घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अपकरवाओ ... टेबल टेनिसगेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है ..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यहनहीं बतायाकि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच हीरहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिनअपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनीचाहिये ।
मंगलवार, 4 मई 2010
मैं और मेरा जीवन चार
पेरेंट्स
क्या बताऊं इनके बारे में। पहले पिताजी से काफी डरता था। मुझे लगता था कि वे मुझे प्यार नहीं करते हैं। लेकिन हॉस्टल आने के बाद पता चला कि वे भी मुझसे प्यार करते हैं, तभी तो हर सप्ताह मुझे देखने आते हैं और पैसे भी देते हैं। मां के बारे में कभी भी संदेह नहीं रहा। उन्हीं के ममता के बदौलत तो मैं बचपन की सभी कठिनाइयों से पार पाया। यदि वह नहीं होती तो॥मैं कुछ नहीं होता और यह लिखने की स्थिति में भी नहीं होता। वह बचपन से ही साहसी थीं और हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती थी। वह भी रविवार को मुझसे मिलने के लिए पैदल ही आ जाती थी। उनके पैर में चप्पल भी नहीं रहते थे। अब तो मुझे खुद आश्चर्य होता है कि पिताजी कमाते हुए भी एक धोती और कुर्ता तथा मां बिना चप्पल के कैसे चल लेती थीं।
पटना यात्रा
उस समय आठवीं कक्षा में पढ़ता था। भैया काफी मेहनत के बाद पटना कॉलेजियट स्कूल में एडमिशन करा दिए। घरवाले भी खुश थे कि अब यह बेहतर पढ़ाई करेगा। मैं भी अंदर से खुश था कि वहां जाकर खूब पढ़ूंगा। अनेक तरह के सपने भी देखने लगा था। कपड़े भी ढंग का था। भैया के साथ पटना बस से सफर कर रहा था। उसके पहले पूर्णियां भी नहीं गया था। रात की बस थी। सभी सो रहे थे और मैं आने जानेवाले सभी बसों और ट्रकों को देखता और रोमांचित भी हो उठता था। कभी-कभी भैया को भी देखने की सलाह दे देता था। भैया सिर्फ मुस्कुरा देते थे। पटना में अलग वातावरण था। उस समय उनके साथ लाल भैया रहते थे। जाते वक्त यही डर लग रहा था कि फिर लाल भैया पढ़ने के लिए मारेंगे। उनके सामने जाने से डरता था। जब अपने कमरे में पहुंचा, तो लाल भैया के बदले स्वभाव से हिम्मत बंधी। उस समय न हीं बोलने का तरीका मालूम था और न ही शिष्टाचार से वाकिफ था। भैया अपने दोस्तों से मिलाते और खुद ही मेरे बारे में बताते रहते थे। वे जिन्हें कहते, प्रणाम कर लेते अन्यथा सिर्फ वे लोग बातें करते थे और मैं सुनता रहता था।
हॉस्टल में प्रवेश
स्कूल में एडमिशन के बाद हॉस्टल में रहने लगा। एक कमरे में मुझे लगाकर पांच स्टूडेंट्स थे। जाने के साथ ही पढ़ाई शुरू कर दिया। रात को एकाएक रोने लगा। घर की याद खूब आ रही थी। भैया के कमरे में नहीं जाना चाहता था, क्योंकि वहां लाल भैया थे। कोई भी मुझसे मिलने आता, तो रोने लगता। इस तरह की स्थिति लगभग एक वर्ष तक रही। यहां तो इससे भी बदतर स्थिति थी। स्कूल बहुत अच्छा था। हॉस्टल में भी टॉप स्टूडेंट्स रहते थे, लेकिन मेरे कमरे में मैं ही तेज था। इस कारण पहले का डर खत्म हो गया। यहां भी पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस कारण फिर पढ़ाई से दूर हो गया। महीने में कभी भी यदि भैया के यहां जाता तो मैथ छोड़कर अन्य किताब ले जाता। यदि लाल भैया कहीं से किताब लेकर मैथ बनाने देते तो हाथ-पांव कांप उठते थे। नहीं बनाने पर मारने की कोशिश करते तो इतना रोने लगता कि लाचारी में भैया बचा लेते और उनसे न पढ़ाने को कहते। कुछ दिन लाल भैया प्रयास किए अंत में वे हार मान गए। इससे घाटा यह हुआ कि मैं कमजोर से कमजोर बनता गया। स्कूल में रिजल्ट से उन लोगों को कोई मतलब नहीं था। मैं किसी तरह पास करता गया और उन लोगों की डांट सुनकर और जिद्दी बनता गया। इस समय मुझे भैया के प्रति घृणा के रोगाणु लग चुके थे। न जाने क्यों, बचपन से ही मुझे झूठ से नफरत हो गई थी। भैया मेरे बारे में बहुत कुछ बिना देखे ही सभी को बोलते रहते थे। जैसे कि उस समय मुझे एडल्ट सिनेमा के बारे में जानकारी नहीं थी और मैं बाहर जाकर सिनेमा भी नहीं देखता था, लेकिन घर में सभी को बता दिए थे कि यह पढ़ाई छोड़कर इन्हीं सब बातों में लगा रहता है। हॉस्टल में महीने में एक बार वीडियो आता था और सभी स्टूडेंट्स इसके लिए चंदा देते थे। रात भर सिनेमा देखा जाता था। इससे कोई भी अलग नहीं हो सकता था। हमारी यह बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं रहता था और कहा जाता था कि ये तो रात भर सिनेमा देखता है। इन झूठ से भैया के प्रति काफी घृणा हो गई थी। जब भी घर जाता, तो पिताजी से काफी डांट लगती और फिर ढाक के तीन पात वाली स्थिति रहती। घर की तरफ से सभी परेशान ही करते थे। उस समय तक घर में यही धारणा थी कि मैथ के बिना स्टूडेंट्स आगे नहीं बढ़ सकता है। मैं मैथ में कमजोर हो गया था। इस कारण हमारी क्लास खूब लगती थी। धीरे-धीरे घर आना भी छोड़ दिया और पढ़ाई तो कब से छोड़ दिया था। जब कभी पढ़ने की इच्छा होती भी थी, तो घरवालों के व्यवहार से नहीं पढ़ पाता था। वे लोग हमारी स्थिति को सुनने के लिए तैयार नहीं थे और मैं उनके अनुरूप नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे पिताजी को भी जवाब देने लगा। मेरे घर में बड़ों को जवाब देना घोर अपराध माना जाता था, लेकिन इसकी शुरुआत मैंने कर दी थी। अब पढ़ाई छोड़ मैं उन लोगों की बात का काट ढूंढने लगा और अपनीर थ्योरी विकसित करने लगा। इससे फायदा यह मिला कि मैं पढ़ाई के प्रति फिर से मुड़ गया और यह सिद्ध करने के लिए पढ़ने लगा कि मैथ न जानने के बावजूद भी सफल हुआ जा सकता है। इसमें जोखिम काफी था, लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन पटना में मेरी पढ़ाई न के बराबर हुई। कुछ टीचर और पिताजी यही मानते थे कि यह इंटेलिजेंट है। इस कारण पढ़ाई कर सकता है। दसवीं में सभी का रजिस्ट्रेशन फॉर्म भराया गया, मैं भी उनमें से एक था। पढ़ाई इस तरह की नहीं हुई थी कि मेरिट से बोर्ड परीक्षा पास कर सकें। लेकिन खुशी यह थी न जाने क्यों, दोस्तों के बीच मेरी गिनती अच्छे स्टूडेंट्स में होती थी और सभी यही कहते थे कि तुम प्रथम श्रेणी से अवश्य पास होगे। मैं यह सुनकर काफी खुशफहमी में रहता था। घर में जो मेरे क्लासमेट थे, उन्हें पटनिया स्टाइल में बेवकूफ बनाता रहता था और वे लोग भी काफी तेज समझते थे। एक बात घर में यह भी थी कि स्टूडेंट्स के समक्ष उसकी प्रशंसा करने से वह बिगड़ जाता है। इसके विपरीत उस समय मैं परिवार से अपने किए अच्छे कार्यो की प्रशंसा सुनना चाहता था ताकि फिर दोगुने हिम्मत से तैयारी में जुट सकूं। यहां से परिवार और मेरे विचार भिन्न होने लगे और मैं दृढ़ बनता गया, जो कि परिवारवालों को अच्छा नहीं लगता था।
आग में घी का काम
परिवार वाले मुझसे नाराज थे ही कि आग में घी का काम यह हुआ कि क्लास टीचर की गलती से मेरा रजिस्ट्रेशन फॉर्म बोर्ड में जमा नहीं हो पाया। इस कारण मैं बोर्ड परीक्षा नहीं दे सका। परिवार वाले पहले से ही खार खाए बैठे थे। यह सुनकर वे आग बबूला हो गए और भैया घर में यह प्रचारित कर दिए कि यह जानकर परीक्षा नहीं देना चाहता था। इस कारण ऐसा किया। मुझे काफी गुस्सा भी आया और आश्चर्य भी हुआ कि उनकी दलील पर सभी सहमत हो गए। उस समय भैया से घृणा हो चुकी थी। उनकी शक्ल भी देखना नहीं चाहता था। हालांकि रजिस्ट्रेशन फॉर्म लाने के लिए काफी कोशिश किए, लेकिन सफल नहीं हो पाए। डांटने के बावजूद मेरी परेशानी उन्हें ही उठानी पड़ती थी। इस कारण कभी-कभी दया भी आ जाती थी। लेकिन उनसे चिढ़ बनी रही।
घर में एक वर्ष
अंत में पटना छोड़कर घर आ गया और यहीं रहने लगा। इस एक वर्ष में सभी ने अपना भड़ास खूब निकाला। इस वक्त सुनने के सिवा कुछ विकल्प भी नहीं था, लेकिन निडर हो गया था। आलोचना सुनने की आदत पड़ गई थी। सभी लोग कुछ न कुछ अवश्य कहते थे। खासकर पिताजी और भैया पीछे पड़ गए थे। मैं उनकी बातों को अनसुना करना सीख लिया था। घर आने के बाद मुझे ये नहीं समझ में आ रहा था कि पढ़ाई कहां से शुरू करूं? मेरे क्लास में चचेरी बहन गुडि़या पढ़ती थी। वह भी उस समय मुझसे काफी तेज थी। गांव के स्कूल में राघवेंद्र फर्स्ट करता था। टुक्कू भी मेरे साथ था। मेरी ममेरी बहन भी उसी क्लास में पढ़ती थी। कहने का मतलब यह था कि बचपन के क्लासमेट के साथ मैं फिर आ गया। घर की तरफ से किसी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा था। प्रमोद भैया पूर्णियां में रहते थे। घर में मैं अकेला रहता था। सभी लड़कों के साथ दिन भर क्रिकेट खेलता रहता था। पिताजी के आने के बाद मार भी पड़ती थी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
जयशंकर मामा
इनकी नौकरी टीचर में हो चुकी थी। एमए तथा योग्य थे। उनकी नियुक्ति चार पांच महीने बाद होनी थी। पिताजी और मां मेरी पढ़ाई में अरुचि को देखकर उनको दो माह के लिए यहीं रख लिए। इनकी खासियत यह थी कि पढ़ाई करने पर प्रशंसा करते थे। इस कारण इनके साथ पढ़ने लगा और फिर से कुछ करने की इच्छा बलवती होने लगी। घरवाले भी मेरी पढ़ाई को देखकर खुश हो रहे थे। वे साइंस छोड़कर सभी पेपर पढ़ाते थे। इस कारण मैं भी पढ़ने लगा और काफी मेहनत करने लगा। उनके कारण इतिहास, अंग्रेजी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ बन गई थी। न जाने क्यों, वे भी मुझे काफी इंटेलिजेंट समझते थे। दो महीने के बाद मैं पूर्णियां प्रमोद भैया के साथ रहने लगा। वे इंजीनियरिंग की तैयारी करते थे। उनके साथ लगभग दस घंटा रोज पढ़ता था, लेकिन कुछ भी याद नहीं रहता था। वे मुझे कुछ होमवर्क करने के लिए देते थे, जिसे मैं चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता था। उनके साथ इस शर्त पर आया था कि यहां उनकी ही बातें मानूंगा। इस कारण वे जो कहते थे। चुपचाप सुनता रहता और कभी-कभी सभी के सामने मारते भी थे, लेकिन चुपचाप सहता रहता था। वहां की पढ़ाई पोजीटिव नहीं रही। अंत में फिर घर आ गया। अभी तक मैं सिर्फ मोहरा बना हुआ था। सभी लोग अपनी तरह से हमें यूज कर रहे थे। अंत में यह निर्णय लिया गया कि गांव के स्कूल में इसे पढ़ने दिया जाए, ताकि दिन भर खेल न सके।
स्कूल में आगमन
इस निर्णय का मैं इसलिए विरोध कर रहा था कि मुझे यह डर बना हुआ था कि मैं कुछ नहीं जानता हूं और वहां जाने के बाद मेरी रही सही इज्जत भी खत्म हो जाएगी। मेरा कुछ नहीं चला। अंत में लाचार होकर स्कूल जाने की तैयारी करने लगा। उस रात नींद नहीं आई। एक बार आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा, लेकिन न जाने क्यों इरादा बदल दिया और अंदर से कुछ करने की हिम्मत जागी। सुबह तैयार होकर स्कूल जाने लगा। वहां सभी बचपन के दोस्त थे। इस कारण अधिक समस्या नहीं आई। राघवेंद्र क्लास में फर्स्ट आता था, जिससे पहले से ही जान-पहचान थी। टुक्कू के अलावा चेचेरी और मेमेरी बहन भी पढ़ती थी। वे लोग भी पढ़ने में ठीक थे। सभी दोस्त मुझे चार क्लासवाले तेज ही समझते थे। इस कारण हमें पहली बेंच पर बैठाया गया। अंदर से काफी परेशान था। लेकिन उन लोगों को प्रभावित करने के लिए सर्वस्व झौंक दिया। घर पर आकर पढ़ाई करने लगा। इस समय यही स्ट्रेटेजी अपनाया कि कल जो पढ़ाया जाएगा, उसे आज ही पढ़कर जाना है। यह आइडिया काम कर गया और स्कूल में टीचर के प्रश्नों का उत्तर देने लगा। मेरे सभी भाई यहीं से पढ़े थे। इस कारण टीचर भी हमें तेज समझते थे और मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा भी उतर रहा था। अब मुझे पढ़ने में काफी मन लगने लगा, लेकिन पहले से पढ़ाई में इतना वीक था कि बहुत कुछ पढ़ने के लिए था। अंत में मैंने यही निश्चय किया कि मैथ सिर्फ पास करने के लिए पढ़ूंगा और शेष विषयों में जी जान लगा दूंगा। मेरी यह रणनीति किसी को पसंद नहीं आई, लेकिन मैं अपने निर्णय पर दृढ़ रहा। अंत में वे लोग हार गए और मैं पढ़ाई में लग गया। मुझे याद है कि मैं दिन को स्कूल और खेलने में लगाता और रात भर पढ़ता था। चार बजे से पहले मैंने कभी नहीं सोया। सभी भाई व्यंग्य करते थे कि दिन भर पत्ता चुनता है और रात को पढ़ता है, लेकिन उनकी बातों पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं अपनी धुन पर ही काम करता था। धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ गया। जब सब कुछ बढि़या चल रहा था, तो एक दिन उस स्कूल के हेडमास्टर फिजिक्स पढ़ाने आए। मैं पहले से तैयारी करके आया था। इस कारण संयोग से उनके पूछे गए सभी प्रश्नों का जवाब सिर्फ मैं ही दिया। इससे वे काफी प्रभावित हुए और दुखी भी हुए कि इस स्कूल का स्टूडेंट्स जवाब नहीं दिया। दूसरे दिन आकर बोले कि आप यहीं से परीक्षा दीजिए ताकि इस स्कूल से अच्छे रिजल्ट आ सकें। यह मेरे लिए असंभव था। क्योंकि पटना से पास करने का रोमांच ही अलग था। इस कारण मैं मना कर दिया, बदले में वे मुझे कल से स्कूल न आने का आदेश दे दिए। घर पर आकर बताया और स्कूल जाना छोड़ दिया। हीरो की तरह स्कूल छोड़ा था। इस कारण काफी खुश था और दोस्तों के बीच काफी क्रेज भी बन गया था। अब मैं अपनी पूरी रंगत में आ गया और जमकर पढ़ाई करने लगा। खेलता भी खूब था। घरवाले की बात न मानकर खुद अपनी ही मर्जी से चलता था। एक दिन सुबह से ही क्रिकेट खेल रहा था। पिताजी दो बार मना कर चुके थे, लेकिन फिर भी खेलता रहा। अंत में पिताजी बुलाए और पूछे कि तुम्हारी परीक्षा दो महीने के बाद हैं और तुम पढ़ाई नहीं कर रहे हो। इससे पढ़ाई से पास कर पाओगे? वह मारने के लिए तैयार हुए कि मैने उन्हें रोका और बोला कि यदि मैं प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास नहीं करूंगा, तो आप मुझे घर से बाहर कर देंगे। पिताजी नहीं मारे और बोले कि रिजल्ट के बाद तुम्हें पूछूंगा। मैं भी निश्चिंत होकर चला गया और काफी खुश था कि आज मार से बच गया। लेकिन रात भर यही चिंता सता रही थी कि यदि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण नहीं होऊंगा, मेरी खैर नहीं। उस दिन से मैं और पढ़ने लगा और पिताजी उस दिन से हमें पढ़ने के लिए कभी नहीं मारे। एक दिन तो वे मुझे रात भर पढ़ते देखकर हैरान हो गए। इससे मुझे और बल मिला और खूब मेहनत किया। अब मैं अपनी स्टाइल में पढ़ता था। भैया कहते भी तो उनकी बातों पर विशेष ध्यान नहीं देता। सेंटर में चोरी तो हो रही थी, लेकिन उसमें मेरा कोई दोस्त नहीं था, क्योंकि जब मैं पढ़ रहा था, तो वे लोग हमसे जूनियर थे। मैं एक भी किताब नहीं ले गया और जो जानता था, उसे लिख दिया। अच्छे मार्क्स की आशा तो नहीं थी, लेकिन विश्वास जरूर था कि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो जाऊंगा। घरवाले भी बदले-बदले नजर आए। मेरे साथ गांव के काफी स्टूडेंट्स थे। इस कारण थोड़ा तनाव में था। दो-तीन महीने पढ़ाई छोड़कर खूब घूमे। रात को कभी डर भी सताता था कि यदि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण नहीं हुआ तो पिताजी नहीं छोड़ेंगे। रिजल्ट आने से पहले मां के बक्सा में ही दो सौ रुपये अलग करके रख दिया था कि यदि प्रथम श्रेणी से पास नहीं करूंगा, तो घर से भाग जाऊंगा। यह आभास मां को हो चुका था। इस कारण वह हमें समझा रही थी कि पिताजी इस तरह की बातें सिर्फ पढ़ने के लिए कह रहे थे। कोई भी पिता अपने बेटे को इस तरह नहीं कर सकता, लेकिन मुझे उन पर विश्वास नहीं था। इस कारण पहले से तैयार था। खैर जो भी हो, रिजल्ट निकला और मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, लेकिन भाई लोग इस कारण नाराज थे कि अच्छे मार्क्स नहीं आए हैं। पिताजी के व्यवहार में गजब का परिवर्तन दिखा। वे काफी खुश थे कि मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ हूं। मामा पचास रुपये मुझे मिठाई के लिए दिए। सभी जगह मेरी इज्जत काफी बढ़ गई थी।
क्या बताऊं इनके बारे में। पहले पिताजी से काफी डरता था। मुझे लगता था कि वे मुझे प्यार नहीं करते हैं। लेकिन हॉस्टल आने के बाद पता चला कि वे भी मुझसे प्यार करते हैं, तभी तो हर सप्ताह मुझे देखने आते हैं और पैसे भी देते हैं। मां के बारे में कभी भी संदेह नहीं रहा। उन्हीं के ममता के बदौलत तो मैं बचपन की सभी कठिनाइयों से पार पाया। यदि वह नहीं होती तो॥मैं कुछ नहीं होता और यह लिखने की स्थिति में भी नहीं होता। वह बचपन से ही साहसी थीं और हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती थी। वह भी रविवार को मुझसे मिलने के लिए पैदल ही आ जाती थी। उनके पैर में चप्पल भी नहीं रहते थे। अब तो मुझे खुद आश्चर्य होता है कि पिताजी कमाते हुए भी एक धोती और कुर्ता तथा मां बिना चप्पल के कैसे चल लेती थीं।
पटना यात्रा
उस समय आठवीं कक्षा में पढ़ता था। भैया काफी मेहनत के बाद पटना कॉलेजियट स्कूल में एडमिशन करा दिए। घरवाले भी खुश थे कि अब यह बेहतर पढ़ाई करेगा। मैं भी अंदर से खुश था कि वहां जाकर खूब पढ़ूंगा। अनेक तरह के सपने भी देखने लगा था। कपड़े भी ढंग का था। भैया के साथ पटना बस से सफर कर रहा था। उसके पहले पूर्णियां भी नहीं गया था। रात की बस थी। सभी सो रहे थे और मैं आने जानेवाले सभी बसों और ट्रकों को देखता और रोमांचित भी हो उठता था। कभी-कभी भैया को भी देखने की सलाह दे देता था। भैया सिर्फ मुस्कुरा देते थे। पटना में अलग वातावरण था। उस समय उनके साथ लाल भैया रहते थे। जाते वक्त यही डर लग रहा था कि फिर लाल भैया पढ़ने के लिए मारेंगे। उनके सामने जाने से डरता था। जब अपने कमरे में पहुंचा, तो लाल भैया के बदले स्वभाव से हिम्मत बंधी। उस समय न हीं बोलने का तरीका मालूम था और न ही शिष्टाचार से वाकिफ था। भैया अपने दोस्तों से मिलाते और खुद ही मेरे बारे में बताते रहते थे। वे जिन्हें कहते, प्रणाम कर लेते अन्यथा सिर्फ वे लोग बातें करते थे और मैं सुनता रहता था।
हॉस्टल में प्रवेश
स्कूल में एडमिशन के बाद हॉस्टल में रहने लगा। एक कमरे में मुझे लगाकर पांच स्टूडेंट्स थे। जाने के साथ ही पढ़ाई शुरू कर दिया। रात को एकाएक रोने लगा। घर की याद खूब आ रही थी। भैया के कमरे में नहीं जाना चाहता था, क्योंकि वहां लाल भैया थे। कोई भी मुझसे मिलने आता, तो रोने लगता। इस तरह की स्थिति लगभग एक वर्ष तक रही। यहां तो इससे भी बदतर स्थिति थी। स्कूल बहुत अच्छा था। हॉस्टल में भी टॉप स्टूडेंट्स रहते थे, लेकिन मेरे कमरे में मैं ही तेज था। इस कारण पहले का डर खत्म हो गया। यहां भी पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस कारण फिर पढ़ाई से दूर हो गया। महीने में कभी भी यदि भैया के यहां जाता तो मैथ छोड़कर अन्य किताब ले जाता। यदि लाल भैया कहीं से किताब लेकर मैथ बनाने देते तो हाथ-पांव कांप उठते थे। नहीं बनाने पर मारने की कोशिश करते तो इतना रोने लगता कि लाचारी में भैया बचा लेते और उनसे न पढ़ाने को कहते। कुछ दिन लाल भैया प्रयास किए अंत में वे हार मान गए। इससे घाटा यह हुआ कि मैं कमजोर से कमजोर बनता गया। स्कूल में रिजल्ट से उन लोगों को कोई मतलब नहीं था। मैं किसी तरह पास करता गया और उन लोगों की डांट सुनकर और जिद्दी बनता गया। इस समय मुझे भैया के प्रति घृणा के रोगाणु लग चुके थे। न जाने क्यों, बचपन से ही मुझे झूठ से नफरत हो गई थी। भैया मेरे बारे में बहुत कुछ बिना देखे ही सभी को बोलते रहते थे। जैसे कि उस समय मुझे एडल्ट सिनेमा के बारे में जानकारी नहीं थी और मैं बाहर जाकर सिनेमा भी नहीं देखता था, लेकिन घर में सभी को बता दिए थे कि यह पढ़ाई छोड़कर इन्हीं सब बातों में लगा रहता है। हॉस्टल में महीने में एक बार वीडियो आता था और सभी स्टूडेंट्स इसके लिए चंदा देते थे। रात भर सिनेमा देखा जाता था। इससे कोई भी अलग नहीं हो सकता था। हमारी यह बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं रहता था और कहा जाता था कि ये तो रात भर सिनेमा देखता है। इन झूठ से भैया के प्रति काफी घृणा हो गई थी। जब भी घर जाता, तो पिताजी से काफी डांट लगती और फिर ढाक के तीन पात वाली स्थिति रहती। घर की तरफ से सभी परेशान ही करते थे। उस समय तक घर में यही धारणा थी कि मैथ के बिना स्टूडेंट्स आगे नहीं बढ़ सकता है। मैं मैथ में कमजोर हो गया था। इस कारण हमारी क्लास खूब लगती थी। धीरे-धीरे घर आना भी छोड़ दिया और पढ़ाई तो कब से छोड़ दिया था। जब कभी पढ़ने की इच्छा होती भी थी, तो घरवालों के व्यवहार से नहीं पढ़ पाता था। वे लोग हमारी स्थिति को सुनने के लिए तैयार नहीं थे और मैं उनके अनुरूप नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे पिताजी को भी जवाब देने लगा। मेरे घर में बड़ों को जवाब देना घोर अपराध माना जाता था, लेकिन इसकी शुरुआत मैंने कर दी थी। अब पढ़ाई छोड़ मैं उन लोगों की बात का काट ढूंढने लगा और अपनीर थ्योरी विकसित करने लगा। इससे फायदा यह मिला कि मैं पढ़ाई के प्रति फिर से मुड़ गया और यह सिद्ध करने के लिए पढ़ने लगा कि मैथ न जानने के बावजूद भी सफल हुआ जा सकता है। इसमें जोखिम काफी था, लेकिन इसके सिवा मेरे पास कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन पटना में मेरी पढ़ाई न के बराबर हुई। कुछ टीचर और पिताजी यही मानते थे कि यह इंटेलिजेंट है। इस कारण पढ़ाई कर सकता है। दसवीं में सभी का रजिस्ट्रेशन फॉर्म भराया गया, मैं भी उनमें से एक था। पढ़ाई इस तरह की नहीं हुई थी कि मेरिट से बोर्ड परीक्षा पास कर सकें। लेकिन खुशी यह थी न जाने क्यों, दोस्तों के बीच मेरी गिनती अच्छे स्टूडेंट्स में होती थी और सभी यही कहते थे कि तुम प्रथम श्रेणी से अवश्य पास होगे। मैं यह सुनकर काफी खुशफहमी में रहता था। घर में जो मेरे क्लासमेट थे, उन्हें पटनिया स्टाइल में बेवकूफ बनाता रहता था और वे लोग भी काफी तेज समझते थे। एक बात घर में यह भी थी कि स्टूडेंट्स के समक्ष उसकी प्रशंसा करने से वह बिगड़ जाता है। इसके विपरीत उस समय मैं परिवार से अपने किए अच्छे कार्यो की प्रशंसा सुनना चाहता था ताकि फिर दोगुने हिम्मत से तैयारी में जुट सकूं। यहां से परिवार और मेरे विचार भिन्न होने लगे और मैं दृढ़ बनता गया, जो कि परिवारवालों को अच्छा नहीं लगता था।
आग में घी का काम
परिवार वाले मुझसे नाराज थे ही कि आग में घी का काम यह हुआ कि क्लास टीचर की गलती से मेरा रजिस्ट्रेशन फॉर्म बोर्ड में जमा नहीं हो पाया। इस कारण मैं बोर्ड परीक्षा नहीं दे सका। परिवार वाले पहले से ही खार खाए बैठे थे। यह सुनकर वे आग बबूला हो गए और भैया घर में यह प्रचारित कर दिए कि यह जानकर परीक्षा नहीं देना चाहता था। इस कारण ऐसा किया। मुझे काफी गुस्सा भी आया और आश्चर्य भी हुआ कि उनकी दलील पर सभी सहमत हो गए। उस समय भैया से घृणा हो चुकी थी। उनकी शक्ल भी देखना नहीं चाहता था। हालांकि रजिस्ट्रेशन फॉर्म लाने के लिए काफी कोशिश किए, लेकिन सफल नहीं हो पाए। डांटने के बावजूद मेरी परेशानी उन्हें ही उठानी पड़ती थी। इस कारण कभी-कभी दया भी आ जाती थी। लेकिन उनसे चिढ़ बनी रही।
घर में एक वर्ष
अंत में पटना छोड़कर घर आ गया और यहीं रहने लगा। इस एक वर्ष में सभी ने अपना भड़ास खूब निकाला। इस वक्त सुनने के सिवा कुछ विकल्प भी नहीं था, लेकिन निडर हो गया था। आलोचना सुनने की आदत पड़ गई थी। सभी लोग कुछ न कुछ अवश्य कहते थे। खासकर पिताजी और भैया पीछे पड़ गए थे। मैं उनकी बातों को अनसुना करना सीख लिया था। घर आने के बाद मुझे ये नहीं समझ में आ रहा था कि पढ़ाई कहां से शुरू करूं? मेरे क्लास में चचेरी बहन गुडि़या पढ़ती थी। वह भी उस समय मुझसे काफी तेज थी। गांव के स्कूल में राघवेंद्र फर्स्ट करता था। टुक्कू भी मेरे साथ था। मेरी ममेरी बहन भी उसी क्लास में पढ़ती थी। कहने का मतलब यह था कि बचपन के क्लासमेट के साथ मैं फिर आ गया। घर की तरफ से किसी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा था। प्रमोद भैया पूर्णियां में रहते थे। घर में मैं अकेला रहता था। सभी लड़कों के साथ दिन भर क्रिकेट खेलता रहता था। पिताजी के आने के बाद मार भी पड़ती थी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
जयशंकर मामा
इनकी नौकरी टीचर में हो चुकी थी। एमए तथा योग्य थे। उनकी नियुक्ति चार पांच महीने बाद होनी थी। पिताजी और मां मेरी पढ़ाई में अरुचि को देखकर उनको दो माह के लिए यहीं रख लिए। इनकी खासियत यह थी कि पढ़ाई करने पर प्रशंसा करते थे। इस कारण इनके साथ पढ़ने लगा और फिर से कुछ करने की इच्छा बलवती होने लगी। घरवाले भी मेरी पढ़ाई को देखकर खुश हो रहे थे। वे साइंस छोड़कर सभी पेपर पढ़ाते थे। इस कारण मैं भी पढ़ने लगा और काफी मेहनत करने लगा। उनके कारण इतिहास, अंग्रेजी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ बन गई थी। न जाने क्यों, वे भी मुझे काफी इंटेलिजेंट समझते थे। दो महीने के बाद मैं पूर्णियां प्रमोद भैया के साथ रहने लगा। वे इंजीनियरिंग की तैयारी करते थे। उनके साथ लगभग दस घंटा रोज पढ़ता था, लेकिन कुछ भी याद नहीं रहता था। वे मुझे कुछ होमवर्क करने के लिए देते थे, जिसे मैं चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता था। उनके साथ इस शर्त पर आया था कि यहां उनकी ही बातें मानूंगा। इस कारण वे जो कहते थे। चुपचाप सुनता रहता और कभी-कभी सभी के सामने मारते भी थे, लेकिन चुपचाप सहता रहता था। वहां की पढ़ाई पोजीटिव नहीं रही। अंत में फिर घर आ गया। अभी तक मैं सिर्फ मोहरा बना हुआ था। सभी लोग अपनी तरह से हमें यूज कर रहे थे। अंत में यह निर्णय लिया गया कि गांव के स्कूल में इसे पढ़ने दिया जाए, ताकि दिन भर खेल न सके।
स्कूल में आगमन
इस निर्णय का मैं इसलिए विरोध कर रहा था कि मुझे यह डर बना हुआ था कि मैं कुछ नहीं जानता हूं और वहां जाने के बाद मेरी रही सही इज्जत भी खत्म हो जाएगी। मेरा कुछ नहीं चला। अंत में लाचार होकर स्कूल जाने की तैयारी करने लगा। उस रात नींद नहीं आई। एक बार आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा, लेकिन न जाने क्यों इरादा बदल दिया और अंदर से कुछ करने की हिम्मत जागी। सुबह तैयार होकर स्कूल जाने लगा। वहां सभी बचपन के दोस्त थे। इस कारण अधिक समस्या नहीं आई। राघवेंद्र क्लास में फर्स्ट आता था, जिससे पहले से ही जान-पहचान थी। टुक्कू के अलावा चेचेरी और मेमेरी बहन भी पढ़ती थी। वे लोग भी पढ़ने में ठीक थे। सभी दोस्त मुझे चार क्लासवाले तेज ही समझते थे। इस कारण हमें पहली बेंच पर बैठाया गया। अंदर से काफी परेशान था। लेकिन उन लोगों को प्रभावित करने के लिए सर्वस्व झौंक दिया। घर पर आकर पढ़ाई करने लगा। इस समय यही स्ट्रेटेजी अपनाया कि कल जो पढ़ाया जाएगा, उसे आज ही पढ़कर जाना है। यह आइडिया काम कर गया और स्कूल में टीचर के प्रश्नों का उत्तर देने लगा। मेरे सभी भाई यहीं से पढ़े थे। इस कारण टीचर भी हमें तेज समझते थे और मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा भी उतर रहा था। अब मुझे पढ़ने में काफी मन लगने लगा, लेकिन पहले से पढ़ाई में इतना वीक था कि बहुत कुछ पढ़ने के लिए था। अंत में मैंने यही निश्चय किया कि मैथ सिर्फ पास करने के लिए पढ़ूंगा और शेष विषयों में जी जान लगा दूंगा। मेरी यह रणनीति किसी को पसंद नहीं आई, लेकिन मैं अपने निर्णय पर दृढ़ रहा। अंत में वे लोग हार गए और मैं पढ़ाई में लग गया। मुझे याद है कि मैं दिन को स्कूल और खेलने में लगाता और रात भर पढ़ता था। चार बजे से पहले मैंने कभी नहीं सोया। सभी भाई व्यंग्य करते थे कि दिन भर पत्ता चुनता है और रात को पढ़ता है, लेकिन उनकी बातों पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैं अपनी धुन पर ही काम करता था। धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ गया। जब सब कुछ बढि़या चल रहा था, तो एक दिन उस स्कूल के हेडमास्टर फिजिक्स पढ़ाने आए। मैं पहले से तैयारी करके आया था। इस कारण संयोग से उनके पूछे गए सभी प्रश्नों का जवाब सिर्फ मैं ही दिया। इससे वे काफी प्रभावित हुए और दुखी भी हुए कि इस स्कूल का स्टूडेंट्स जवाब नहीं दिया। दूसरे दिन आकर बोले कि आप यहीं से परीक्षा दीजिए ताकि इस स्कूल से अच्छे रिजल्ट आ सकें। यह मेरे लिए असंभव था। क्योंकि पटना से पास करने का रोमांच ही अलग था। इस कारण मैं मना कर दिया, बदले में वे मुझे कल से स्कूल न आने का आदेश दे दिए। घर पर आकर बताया और स्कूल जाना छोड़ दिया। हीरो की तरह स्कूल छोड़ा था। इस कारण काफी खुश था और दोस्तों के बीच काफी क्रेज भी बन गया था। अब मैं अपनी पूरी रंगत में आ गया और जमकर पढ़ाई करने लगा। खेलता भी खूब था। घरवाले की बात न मानकर खुद अपनी ही मर्जी से चलता था। एक दिन सुबह से ही क्रिकेट खेल रहा था। पिताजी दो बार मना कर चुके थे, लेकिन फिर भी खेलता रहा। अंत में पिताजी बुलाए और पूछे कि तुम्हारी परीक्षा दो महीने के बाद हैं और तुम पढ़ाई नहीं कर रहे हो। इससे पढ़ाई से पास कर पाओगे? वह मारने के लिए तैयार हुए कि मैने उन्हें रोका और बोला कि यदि मैं प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास नहीं करूंगा, तो आप मुझे घर से बाहर कर देंगे। पिताजी नहीं मारे और बोले कि रिजल्ट के बाद तुम्हें पूछूंगा। मैं भी निश्चिंत होकर चला गया और काफी खुश था कि आज मार से बच गया। लेकिन रात भर यही चिंता सता रही थी कि यदि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण नहीं होऊंगा, मेरी खैर नहीं। उस दिन से मैं और पढ़ने लगा और पिताजी उस दिन से हमें पढ़ने के लिए कभी नहीं मारे। एक दिन तो वे मुझे रात भर पढ़ते देखकर हैरान हो गए। इससे मुझे और बल मिला और खूब मेहनत किया। अब मैं अपनी स्टाइल में पढ़ता था। भैया कहते भी तो उनकी बातों पर विशेष ध्यान नहीं देता। सेंटर में चोरी तो हो रही थी, लेकिन उसमें मेरा कोई दोस्त नहीं था, क्योंकि जब मैं पढ़ रहा था, तो वे लोग हमसे जूनियर थे। मैं एक भी किताब नहीं ले गया और जो जानता था, उसे लिख दिया। अच्छे मार्क्स की आशा तो नहीं थी, लेकिन विश्वास जरूर था कि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो जाऊंगा। घरवाले भी बदले-बदले नजर आए। मेरे साथ गांव के काफी स्टूडेंट्स थे। इस कारण थोड़ा तनाव में था। दो-तीन महीने पढ़ाई छोड़कर खूब घूमे। रात को कभी डर भी सताता था कि यदि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण नहीं हुआ तो पिताजी नहीं छोड़ेंगे। रिजल्ट आने से पहले मां के बक्सा में ही दो सौ रुपये अलग करके रख दिया था कि यदि प्रथम श्रेणी से पास नहीं करूंगा, तो घर से भाग जाऊंगा। यह आभास मां को हो चुका था। इस कारण वह हमें समझा रही थी कि पिताजी इस तरह की बातें सिर्फ पढ़ने के लिए कह रहे थे। कोई भी पिता अपने बेटे को इस तरह नहीं कर सकता, लेकिन मुझे उन पर विश्वास नहीं था। इस कारण पहले से तैयार था। खैर जो भी हो, रिजल्ट निकला और मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो गया। मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, लेकिन भाई लोग इस कारण नाराज थे कि अच्छे मार्क्स नहीं आए हैं। पिताजी के व्यवहार में गजब का परिवर्तन दिखा। वे काफी खुश थे कि मैं प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ हूं। मामा पचास रुपये मुझे मिठाई के लिए दिए। सभी जगह मेरी इज्जत काफी बढ़ गई थी।
रविवार, 25 अप्रैल 2010
मम्मी और मां
कल पार्क में बहुत दिनों के बाद घूमने गया था। स्टूडेंट़स लाइफ में पार्क में घंटों बैठकर भिवष्य की योजना बनाते रहते थे। लेकिन अब फ़ुर्सत नहीं मिलती है सोचने के लिए। वहां कुछ देर बाद बच्चा को रोते हुए देखा। पहले तो अनसुना कर िदया, लेकिन जब इधर उधर दौडने लगा, तो वहां जाना मुनािसब समझा। उसे देखकर कुछ लोग आहें, तो कुछ लोग हंस रहे थे। हंस रहे थे आधुनिक मम्मी पर और चिंतित थे बच्चा को लेकर। चिंतित थे इस कारण कि बच्चा उम्र में काफी छोटा था। सभी लोग उसे समझा रहे थे, लेकिन उसे सिर्फ मम्मी चाहिए थी। इस कारण सिर्फ रोता रहता था। बच्चा भी अजीब था वह शक्ल से पिता को पहचानता था, लेकिन पूरा नाम नहीं जानता था कि कोई भी उसे अपने घर पर छोड सके। घर को पहचानता था लेिकन घर का पता नहीं जानता था। इस कारण मम्मी को ढूंढ रहा था ताकि घर और पापा के पास पहुंच सके। चर्चा में मम्मी और बच्चा ही थाकुछ लोग मम्मी ढूंढ रहे थे, तो कुछ लोग मम्मी को कोस रहे थे। आज की मम्मी करियर देखती है, बच्चे की देखभाल दूसरी प्राथमिकता है। इसलिए बच्चे को छोड़कर गुम हो जाती है। केकेयी भी कुमाता बनी बच्चों के लिए मम्मी कुमाता बन रही है अपना करियर के लिए। दोनों में समय का फर्क है। कर्त्तव्य जाननेवाली मां कहलाई अधिकार जाननेवाली मम्मी। मां और मम्मी में यही तो फर्क है शायद। एक बुजुर्ग बच्च्े को लेकर इस तरह की बातें बोलता जा रहा था। सभी परेशान थे कि बच्चे को कैसेट उसके घर पहुंचाया जाए। अंत में लाचार होकर उसे पुलिस थाने में रख दिया गया। मैं भी सोचने लगा और मम्मी और मां में फर्क करने लगा, तो एक घंटे लग गए। अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मां दिल की सच्ची थी। इसिलए हमेशा बच्चे में खोई रहती थी। वह करियर नहीं जानती थी इसलिए गांव में रहती थी। जहां बच्चे गुम होने का कोई अंदेशा नहीं। आज की मम्मी शहर में रहती हैत्र जींस पहनती है, टॉपलेस हो जाती है करियर के लिए। कुछ घरों में रौब जमाती है अपने पति पर। और जब बात नहीं बन पाती हैतो गुम हो जाती है बच्चे को छोड़कर। क्योंकि मम्मी खुद की पहचान चाहती है और भीड़ से अलग भी दिखना चाहती है। नहीं करनी है उन्हें बच्चों की देखभालयह तो नौकर भी कर सकता है। शायद यही सोचकर गुम हो जाती है। बच्चे तो फिर आ सकते हैं, दूसरी शादी भी की जा सकती है लेकिन करियर नहीं बनाया जा सकता समय बीतने के बाद। लेकिन बच्चे नादान हैं, उसे नहीं चाहिए अपनी पहचान। वह मम्मी के साथ रहना चाहता है। नहीं चाहिए आईसक्रीम और खिलौने, उसे पापा भी नहीं चाहिएसिर्फ मम्मी के पास रहना चाहता है वह। लेकिन आज के बच्चे को यह भी नसीब नहीं, जिन्हें मम्मी मिली भी, तो कुछ वर्षो के बाद गुम हो गई।आधे से अधिक बच्चे को यह ीाी नसीब नहीं। करियर की आपाधापी में नहीं रहा वह मां का प्यार, जो बच्चे के लिए सर्वस्व लूटा देती थी। अब प्यार की जगह करियर महत्वपूर्ण है। इसलिए बड़े होने पर मम्मी रोती है बच्चे के लिए और बच्चे मशगूल रहते हैं करियर के लिए।
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
मैं और मेरा जीवन चार
जब बहन का पेंट पहना
टीचर ने छात्रवृत्ति की तैयारी के लिए मेरा भी नाम सेलेक्ट किया। उस समय इसके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। खुशी इस कारण थी कि चार स्टूडेंट्स में मेरा भी नाम शामिल था। यह बात जब घर में बताया, तो लाल भैया डांटने लगे और बोले कि तुम इस परीक्षा में पास नहीं कर पाओगे। इस कारण तुम पर पैसा खर्च करना व्यर्थ है। मां हमेशा से हमारी बात सुनती थी। इस संबंध में मेरा कहना था कि जब टीचर हमें सेलेक्ट किए हैं, तो कुछ खासियत अवश्य देखे होंगे। इस कारण मैं जाऊंगा। अंत में बात मेरी रही और मां की सहमति मिल गई। काफी खुश हुआ मां के निर्णय पर। उसके बाद से स्कूल में हमलोगों के लिए विशेष व्यवस्था थी। वहां हमलोग पढ़ाई कम, गप्पें ज्यादा लड़ाते थे। कुछ दिनों के बाद परीक्षा तिथि घोषित हुई और हम सभी बनमनखी जाने के लिए तैयारी करने लगे। मेरे साथ में टीचर भी थे। उस समय कितने पैसे देने पड़े थे, मुझे याद नहीं है। जब मैं बनमनखी जाने के लिए तैयार हुआ, तो जाने के लिए मेरे पास हाफ पेंट नहीं था। एक जो था, वह काफी गंदा और फटा हुआ था। खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अंत में लाचार होकर मां ने छोटी बहन की एक नई पेंट को मोडिफाई करके दी। लड़का और लड़की के पेंट में अंतर यह रहता था कि लड़के के पेंट में नीचे रबड़ नहीं होते थे, जबकि उसमें होते थे। खैर, उसे पहनकर एग्जाम दिया और बाद में पहनकर स्कूल भी जाने लगा। कुछ दोस्तों ने इस पर कमेंट भी किया, लेकिन मैं कुछ भी जवाब नहीं दिया। परीक्षा अच्छी गई थी, रिजल्ट भी निकला और मैं पास हो गया था। अब फाइनल एग्जाम की तैयारी में लग गया। इसी बीच मेरा एडमिशन बनमनखी के आदिवासी आवासीय उच्च विद्यालय में हो गया। उसमें 6 क्लास से ही पढ़ाई शुरू थी, इस कारण पांचवीं की पढ़ाई किए बिना ही छठी में पढ़ने लगा।
बर्बादियों का साल
इस एक वर्ष ने मुझे अर्श से लेकर फर्श पर ढकेल दिया। इस बीच मैं पांचवीं और छठी के द्वंद्व में फंसा रहा और पढ़ाई नहीं की। स्कूल सितंबर में गया, इस कारण घर पर ही रहने लगा और वहीं पढ़ाई करने लगा। कहने को तो लाल भैया और प्रमोद भैया घर पर ही थे, लेकिन वे लोग सिर्फ डांटने और दुत्कारने के सिवा कुछ नहीं करते थे। स्थिति यह हो गई कि मैं पढ़ाई से भागने लगा और निडर बनता गया। आलोचना रोज की घटना थी, जिससे मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ता था। पिताजी और लाल भैया पढ़ाई न करने पर मारते भी थे, लेकिन पढ़ाई न के बराबर करता था। अंत में लाचार होकर उसी स्कूल में पांचवीं क्लास में पढ़ने लगा। दलील यह दी गई कि स्कूल में पांचवीं क्लास का पढ़ो और घर पर छठी कक्षा का पढ़ो। उस समय तो यह दलील बढि़या लगा, लेकिन अंदर से मैं पढ़ाई में इतना कमजोर हो गया कि आगे सपना देखना ही छोड़ दिया। खुद को अंदर से कमजोर समझने लगा। अब सिर्फ समय व्यतीत करता था। इस तरह की स्थिति अगस्त तक बनी रही। इस एक वर्ष ने मुझे काफी कमजोर बना दिया। परिणाम यह हुआ कि गणित देखकर भागने लगा। यह स्थिति अभी तक बनी हुई है। आज भी सपने में गणित को देखकर परेशान हो जाता हूं। आश्चर्य तो तब होता है कि मुझसे बड़े चारों भाई गणित में बहुत अच्छे-बहुत अच्छे और बहुत अच्छे हैं। उस समय घर में गणित न जानना अपराध माना जाता था, लेकिन ताज्जुब होता है कि सभी ने गणित पढ़ाने के लिए जोर तो दिए, कमजोरी के कारण को कोई नहीं समझे। यह बात मुझे अब पता चल रहा है।
हॉस्टल यात्रा
बनमनखी हॉस्टल में अगस्त से रहने लगा। मुझे छोड़ने के लिए मां और प्रमोद भैया आए थे। काफी मशक्कत के बाद हॉस्टल में रहने के लिए आया। यहां आने के बाद पहली बार मां से अलग हुआ था। इस कारण काफी रोया। उम्र उस समय लगभग ग्यारह या बारह वर्ष के हुए होंगे। यहां आने के बाद पता चला कि मैं सबसे तेज स्टूडेंट हूं। कारण यहां सभी आदिवासी और विकलांग ही पढ़ते थे, जिसे पढ़ने में कम और इधर-उधर घूमने में अधिक मन लगता था। मैं यह संकल्प लेकर यहां आया था कि आने के साथ खूब पढू़ंगा, लेकिन पढ़ाई के बदले मैं उन्हीं के साथ घूमने लगा। मैं अपना लक्ष्य भूल चुका था और अब परिवार का डर भी नहीं था। क्योंकि कभी-कभी घर जाता था और बातों में उलझाकर ठग लेता था। खाने का उत्तम प्रबंध था। इस कारण मौज-मस्ती करने लगा। पारिवारिक संस्कार की वजह से कम पढ़ाई के बावजूद भी क्लास में प्रथम आता था। इस कारण घरवाले भी अधिक परेशान नहीं करते थे। इस बीच यह हुआ कि गणित को बहुत कम बनाता था। घर आने पर जो पढ़ाया जाता था, उसे कॉपी में नोट कर यहां प्रैक्टिस करता और किसी तरह गणित में पास होता रहता था। इसकी भरपाई अन्य विषयों से करता था। इसी तरह आठ क्लास में पहुंच गया।
हॉस्टल रुटीन
जहां हमलोग रहते थे, वहां कोई टीचर नहीं थे। इस कारण स्वयं ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। सीनियर भी उतने तेज नहीं थे कि कुछ बता सके। इस कारण जो जानते थे, उसी को पढ़ते रहते थे। सुबह 6 बजे उठते थे और मुंह हाथ धोकर नाश्ता के लिए बैठ जाते थे। स्कूल की तरफ से चना और गुड़ मिलता था। मुझे घर से मुरही या लाई खरीदकर हर सप्ताह दिया जाता था। दोनों को मिलाकर नाश्ता करते थे। यदि इच्छा हुई, तो पढ़ने के लिए बैठ गए अन्यथा सोते या गप्प लड़ाते रहते थे। नौ बजे नहा धोकर खाना खाते थे और फिर इच्छा होती थी, तो स्कूल जाते अन्यथा सो जाते थे। उसके बाद शाम को घूमने के लिए निकलते और लगभग दो घंटे तक वाकिंग करते रहते थे। शाम को जब खाने के लिए सब्जी काटा जाता तो सप्ताह में कम से कम दो दिन किसी तरह एक प्याज चुराते और उसमें नमक मिर्च डालकर स्वादिष्ट खाना का आनंद उठाते। उन लोगों में सबसे अधिक मैं ही पढ़ता था। सभी मुझे तेज स्टूडेंट कहते थे। इस कारण पास करने के लिए नहीं, लेकिन अपनी इज्जत बचाने के लिए सप्ताह में तीन-चार दिन पढ़ लिया करते थे और दो-तीन दिन स्कूल भी चला जाता था। वहां हमारी उम्र भी उनलोगों की अपेक्षा काफी कम थी, इस कारण वे लोग हमेशा मारते रहते थे।
जब परमानंद बाहर हुए
परमानंद हम विकलांगों में सबसे उम्र दराज और दुष्ट स्टूडेंट था। वह एक गुट बनाया था और जो भी खाना आता था, तो पहले अपनी थाली भरकर तभी औरों को देता था। विरोध करने पर पीटता भी था। उसकी एक तरह से तानाशाही चलती थी। मुझे सभी टीचर्स बहुत प्यार करते थे। हेड मास्टर की सख्त हिदायत थी कि उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। एक दिन मुझे सब्जी कम दिया गया, विरोध करने पर काफी मारा। खाना छोड़कर मैं सीधे हेड मास्टर के कमरे में घुस गया। उसके बाद उन्हें काफी पीटा गया और सख्त चेतावनी दी गई कि दोबारा करने पर उसे स्कूल से बाहर निकाल दिया जाएगा। मार खाने के बाद उसने सभी को अपनी तरफ मिला लिया और मुझे अलग कर दिया। इससे हमें फायदा यह मिला कि मैं कुछ पढ़ने लगा और स्कूल भी जाने लगा। छोटा बच्चा था। इस कारण चाभी गुम हो जाती थी। मां से कितनी बार डांट पड़ चुकी थी इस संबंध में। इस कारण कुछ नहीं बताता था। रात को सोते वक्त वह मेरा चाभी लेकर सभी नाश्ता खा जाता था और चाभी भी गुम कर देता था। एक-दो बार मां को बताया, लेकिन डांट के डर से उन्हें भी बताना छोड़ दिया। इसका वह काफी फायदा उठाया। स्कूल छोड़ने के बाद पता चला कि उसे स्कूल से बाहर कर दिया गया है।
अमरेंद्र बाबु
ये हमारे गुरु थे और अंग्रेजी पढ़ाते थे। ये हमारे पड़ोसी थे। इस कारण उन पर अधिकार समझता था। शुरुआत में आदिवासी को देखकर मुझे खाना नहीं खाया जाता था, जब उन्हें इस बारे में बताया तो वे खुद खाना खाकर मुझे खाने के लिए प्रेरित किए। मैं उन्हें ब्राह्मण समझ रहा था, बाद में पता चला कि वे बनिया थे। उन्होंने काफी सहायता की और साहस भी प्रदान किए। यदि वे नहीं रहते तो शायद मैं कब का स्कूल छोड़ दिया होता।
फिल्मी चक्कर
वहां मुझे छोड़कर सभी सिनेमा देखने जाते थे। मैं ही अकेला था कि सिनेमा नहीं जाता था। पापा शनिवार को साइकिल से आते थे और पैसा देकर चले जाते थे। सभी ने कहा कि पापा तो शनिवार को ही आएंगे। इस कारण सिनेमा दिखाने के लिए जिद करने लगे। मैं भी सुरक्षित आइडिया देखकर तैयार हो गया और नौ से बारह सिनेमा देखने चला गया। पिक्चर का नाम मुझे याद नहीं है, लेकिन सिनेमा हॉल में खूब सोया था, यह मुझे याद है। हॉस्टल आने पर पता चला कि पापा आए थे। मेरी जो हालत थी, वह मैं बता नहीं सकता। दूसरे दिन सफाई देने के लिए घर गया और फिर हॉस्टल आ गया। वहां जो डांट लगनी थी, वह लग चुकी थी। उसके बाद जिस दिन स्कूल छोड़कर पटना के लिए रवाना हुआ, उस समय गंगा यमुना सरस्वती देखने गया। बढि़या लगा और हॉस्टल आया तो पता चला कि अभी-अभी पापा आए थे। काफी दुख हुआ और आश्चर्य भी हुआ कि पापा को इसकी भनक कैसे लग जाती है। वहां दो सिनेमा ही देखा और दोनों बार पकड़ा गया। घरवाले यही समझते थे कि यह सभी सिनेमा देखता है। सिवा सुनने के कुछ कर भी नहीं सकता था।
एक सिकका
इस सिक्का का काफी महत्व था उस समय। बनमनखी से घर आने के लिए एक रुपया किराया देना पड़ता था। एक ही बस था। इस कारण काफी भीड़ रहती थी। उसमें किसी तरह चढ़ पा रहा था। यदि एक रुपया दे देता था, तो सीट मिल जाती थी। अन्यथा सीट से उठा दिया जाता था। एक-दो बार हिम्मत करके बिना पैसे ही बैठ गया किंतु जबर्दस्ती उठाने के बाद हिम्मत जवाब दे गई और उसके बाद पहले आने के बाद भी बस में तभी घुसता था, जब सीट भर जाते थे और उनकी नजरों से बचकर भीड़ में कहीं खड़ा हो जाता था। घर से आते वक्त तो पैसे रहते थे, लेकिन जाते वक्त हमेशा यही स्थिति रहती थी। सभी को मुझ पर दया आ जाती थी और वे पैसे नहीं मांगते थे। उस समय एक रुपया का सिक्का एक सोने के सिक्के के बराबर लगता था। अब जब कहीं भी उस सिक्के को देखता हूं, तो हंसी आती है और अपने आप पर दुख भी। आज तो एक बच्चा भी 50 से कम नहीं लेता है।
टीचर ने छात्रवृत्ति की तैयारी के लिए मेरा भी नाम सेलेक्ट किया। उस समय इसके बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। खुशी इस कारण थी कि चार स्टूडेंट्स में मेरा भी नाम शामिल था। यह बात जब घर में बताया, तो लाल भैया डांटने लगे और बोले कि तुम इस परीक्षा में पास नहीं कर पाओगे। इस कारण तुम पर पैसा खर्च करना व्यर्थ है। मां हमेशा से हमारी बात सुनती थी। इस संबंध में मेरा कहना था कि जब टीचर हमें सेलेक्ट किए हैं, तो कुछ खासियत अवश्य देखे होंगे। इस कारण मैं जाऊंगा। अंत में बात मेरी रही और मां की सहमति मिल गई। काफी खुश हुआ मां के निर्णय पर। उसके बाद से स्कूल में हमलोगों के लिए विशेष व्यवस्था थी। वहां हमलोग पढ़ाई कम, गप्पें ज्यादा लड़ाते थे। कुछ दिनों के बाद परीक्षा तिथि घोषित हुई और हम सभी बनमनखी जाने के लिए तैयारी करने लगे। मेरे साथ में टीचर भी थे। उस समय कितने पैसे देने पड़े थे, मुझे याद नहीं है। जब मैं बनमनखी जाने के लिए तैयार हुआ, तो जाने के लिए मेरे पास हाफ पेंट नहीं था। एक जो था, वह काफी गंदा और फटा हुआ था। खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अंत में लाचार होकर मां ने छोटी बहन की एक नई पेंट को मोडिफाई करके दी। लड़का और लड़की के पेंट में अंतर यह रहता था कि लड़के के पेंट में नीचे रबड़ नहीं होते थे, जबकि उसमें होते थे। खैर, उसे पहनकर एग्जाम दिया और बाद में पहनकर स्कूल भी जाने लगा। कुछ दोस्तों ने इस पर कमेंट भी किया, लेकिन मैं कुछ भी जवाब नहीं दिया। परीक्षा अच्छी गई थी, रिजल्ट भी निकला और मैं पास हो गया था। अब फाइनल एग्जाम की तैयारी में लग गया। इसी बीच मेरा एडमिशन बनमनखी के आदिवासी आवासीय उच्च विद्यालय में हो गया। उसमें 6 क्लास से ही पढ़ाई शुरू थी, इस कारण पांचवीं की पढ़ाई किए बिना ही छठी में पढ़ने लगा।
बर्बादियों का साल
इस एक वर्ष ने मुझे अर्श से लेकर फर्श पर ढकेल दिया। इस बीच मैं पांचवीं और छठी के द्वंद्व में फंसा रहा और पढ़ाई नहीं की। स्कूल सितंबर में गया, इस कारण घर पर ही रहने लगा और वहीं पढ़ाई करने लगा। कहने को तो लाल भैया और प्रमोद भैया घर पर ही थे, लेकिन वे लोग सिर्फ डांटने और दुत्कारने के सिवा कुछ नहीं करते थे। स्थिति यह हो गई कि मैं पढ़ाई से भागने लगा और निडर बनता गया। आलोचना रोज की घटना थी, जिससे मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ता था। पिताजी और लाल भैया पढ़ाई न करने पर मारते भी थे, लेकिन पढ़ाई न के बराबर करता था। अंत में लाचार होकर उसी स्कूल में पांचवीं क्लास में पढ़ने लगा। दलील यह दी गई कि स्कूल में पांचवीं क्लास का पढ़ो और घर पर छठी कक्षा का पढ़ो। उस समय तो यह दलील बढि़या लगा, लेकिन अंदर से मैं पढ़ाई में इतना कमजोर हो गया कि आगे सपना देखना ही छोड़ दिया। खुद को अंदर से कमजोर समझने लगा। अब सिर्फ समय व्यतीत करता था। इस तरह की स्थिति अगस्त तक बनी रही। इस एक वर्ष ने मुझे काफी कमजोर बना दिया। परिणाम यह हुआ कि गणित देखकर भागने लगा। यह स्थिति अभी तक बनी हुई है। आज भी सपने में गणित को देखकर परेशान हो जाता हूं। आश्चर्य तो तब होता है कि मुझसे बड़े चारों भाई गणित में बहुत अच्छे-बहुत अच्छे और बहुत अच्छे हैं। उस समय घर में गणित न जानना अपराध माना जाता था, लेकिन ताज्जुब होता है कि सभी ने गणित पढ़ाने के लिए जोर तो दिए, कमजोरी के कारण को कोई नहीं समझे। यह बात मुझे अब पता चल रहा है।
हॉस्टल यात्रा
बनमनखी हॉस्टल में अगस्त से रहने लगा। मुझे छोड़ने के लिए मां और प्रमोद भैया आए थे। काफी मशक्कत के बाद हॉस्टल में रहने के लिए आया। यहां आने के बाद पहली बार मां से अलग हुआ था। इस कारण काफी रोया। उम्र उस समय लगभग ग्यारह या बारह वर्ष के हुए होंगे। यहां आने के बाद पता चला कि मैं सबसे तेज स्टूडेंट हूं। कारण यहां सभी आदिवासी और विकलांग ही पढ़ते थे, जिसे पढ़ने में कम और इधर-उधर घूमने में अधिक मन लगता था। मैं यह संकल्प लेकर यहां आया था कि आने के साथ खूब पढू़ंगा, लेकिन पढ़ाई के बदले मैं उन्हीं के साथ घूमने लगा। मैं अपना लक्ष्य भूल चुका था और अब परिवार का डर भी नहीं था। क्योंकि कभी-कभी घर जाता था और बातों में उलझाकर ठग लेता था। खाने का उत्तम प्रबंध था। इस कारण मौज-मस्ती करने लगा। पारिवारिक संस्कार की वजह से कम पढ़ाई के बावजूद भी क्लास में प्रथम आता था। इस कारण घरवाले भी अधिक परेशान नहीं करते थे। इस बीच यह हुआ कि गणित को बहुत कम बनाता था। घर आने पर जो पढ़ाया जाता था, उसे कॉपी में नोट कर यहां प्रैक्टिस करता और किसी तरह गणित में पास होता रहता था। इसकी भरपाई अन्य विषयों से करता था। इसी तरह आठ क्लास में पहुंच गया।
हॉस्टल रुटीन
जहां हमलोग रहते थे, वहां कोई टीचर नहीं थे। इस कारण स्वयं ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। सीनियर भी उतने तेज नहीं थे कि कुछ बता सके। इस कारण जो जानते थे, उसी को पढ़ते रहते थे। सुबह 6 बजे उठते थे और मुंह हाथ धोकर नाश्ता के लिए बैठ जाते थे। स्कूल की तरफ से चना और गुड़ मिलता था। मुझे घर से मुरही या लाई खरीदकर हर सप्ताह दिया जाता था। दोनों को मिलाकर नाश्ता करते थे। यदि इच्छा हुई, तो पढ़ने के लिए बैठ गए अन्यथा सोते या गप्प लड़ाते रहते थे। नौ बजे नहा धोकर खाना खाते थे और फिर इच्छा होती थी, तो स्कूल जाते अन्यथा सो जाते थे। उसके बाद शाम को घूमने के लिए निकलते और लगभग दो घंटे तक वाकिंग करते रहते थे। शाम को जब खाने के लिए सब्जी काटा जाता तो सप्ताह में कम से कम दो दिन किसी तरह एक प्याज चुराते और उसमें नमक मिर्च डालकर स्वादिष्ट खाना का आनंद उठाते। उन लोगों में सबसे अधिक मैं ही पढ़ता था। सभी मुझे तेज स्टूडेंट कहते थे। इस कारण पास करने के लिए नहीं, लेकिन अपनी इज्जत बचाने के लिए सप्ताह में तीन-चार दिन पढ़ लिया करते थे और दो-तीन दिन स्कूल भी चला जाता था। वहां हमारी उम्र भी उनलोगों की अपेक्षा काफी कम थी, इस कारण वे लोग हमेशा मारते रहते थे।
जब परमानंद बाहर हुए
परमानंद हम विकलांगों में सबसे उम्र दराज और दुष्ट स्टूडेंट था। वह एक गुट बनाया था और जो भी खाना आता था, तो पहले अपनी थाली भरकर तभी औरों को देता था। विरोध करने पर पीटता भी था। उसकी एक तरह से तानाशाही चलती थी। मुझे सभी टीचर्स बहुत प्यार करते थे। हेड मास्टर की सख्त हिदायत थी कि उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। एक दिन मुझे सब्जी कम दिया गया, विरोध करने पर काफी मारा। खाना छोड़कर मैं सीधे हेड मास्टर के कमरे में घुस गया। उसके बाद उन्हें काफी पीटा गया और सख्त चेतावनी दी गई कि दोबारा करने पर उसे स्कूल से बाहर निकाल दिया जाएगा। मार खाने के बाद उसने सभी को अपनी तरफ मिला लिया और मुझे अलग कर दिया। इससे हमें फायदा यह मिला कि मैं कुछ पढ़ने लगा और स्कूल भी जाने लगा। छोटा बच्चा था। इस कारण चाभी गुम हो जाती थी। मां से कितनी बार डांट पड़ चुकी थी इस संबंध में। इस कारण कुछ नहीं बताता था। रात को सोते वक्त वह मेरा चाभी लेकर सभी नाश्ता खा जाता था और चाभी भी गुम कर देता था। एक-दो बार मां को बताया, लेकिन डांट के डर से उन्हें भी बताना छोड़ दिया। इसका वह काफी फायदा उठाया। स्कूल छोड़ने के बाद पता चला कि उसे स्कूल से बाहर कर दिया गया है।
अमरेंद्र बाबु
ये हमारे गुरु थे और अंग्रेजी पढ़ाते थे। ये हमारे पड़ोसी थे। इस कारण उन पर अधिकार समझता था। शुरुआत में आदिवासी को देखकर मुझे खाना नहीं खाया जाता था, जब उन्हें इस बारे में बताया तो वे खुद खाना खाकर मुझे खाने के लिए प्रेरित किए। मैं उन्हें ब्राह्मण समझ रहा था, बाद में पता चला कि वे बनिया थे। उन्होंने काफी सहायता की और साहस भी प्रदान किए। यदि वे नहीं रहते तो शायद मैं कब का स्कूल छोड़ दिया होता।
फिल्मी चक्कर
वहां मुझे छोड़कर सभी सिनेमा देखने जाते थे। मैं ही अकेला था कि सिनेमा नहीं जाता था। पापा शनिवार को साइकिल से आते थे और पैसा देकर चले जाते थे। सभी ने कहा कि पापा तो शनिवार को ही आएंगे। इस कारण सिनेमा दिखाने के लिए जिद करने लगे। मैं भी सुरक्षित आइडिया देखकर तैयार हो गया और नौ से बारह सिनेमा देखने चला गया। पिक्चर का नाम मुझे याद नहीं है, लेकिन सिनेमा हॉल में खूब सोया था, यह मुझे याद है। हॉस्टल आने पर पता चला कि पापा आए थे। मेरी जो हालत थी, वह मैं बता नहीं सकता। दूसरे दिन सफाई देने के लिए घर गया और फिर हॉस्टल आ गया। वहां जो डांट लगनी थी, वह लग चुकी थी। उसके बाद जिस दिन स्कूल छोड़कर पटना के लिए रवाना हुआ, उस समय गंगा यमुना सरस्वती देखने गया। बढि़या लगा और हॉस्टल आया तो पता चला कि अभी-अभी पापा आए थे। काफी दुख हुआ और आश्चर्य भी हुआ कि पापा को इसकी भनक कैसे लग जाती है। वहां दो सिनेमा ही देखा और दोनों बार पकड़ा गया। घरवाले यही समझते थे कि यह सभी सिनेमा देखता है। सिवा सुनने के कुछ कर भी नहीं सकता था।
एक सिकका
इस सिक्का का काफी महत्व था उस समय। बनमनखी से घर आने के लिए एक रुपया किराया देना पड़ता था। एक ही बस था। इस कारण काफी भीड़ रहती थी। उसमें किसी तरह चढ़ पा रहा था। यदि एक रुपया दे देता था, तो सीट मिल जाती थी। अन्यथा सीट से उठा दिया जाता था। एक-दो बार हिम्मत करके बिना पैसे ही बैठ गया किंतु जबर्दस्ती उठाने के बाद हिम्मत जवाब दे गई और उसके बाद पहले आने के बाद भी बस में तभी घुसता था, जब सीट भर जाते थे और उनकी नजरों से बचकर भीड़ में कहीं खड़ा हो जाता था। घर से आते वक्त तो पैसे रहते थे, लेकिन जाते वक्त हमेशा यही स्थिति रहती थी। सभी को मुझ पर दया आ जाती थी और वे पैसे नहीं मांगते थे। उस समय एक रुपया का सिक्का एक सोने के सिक्के के बराबर लगता था। अब जब कहीं भी उस सिक्के को देखता हूं, तो हंसी आती है और अपने आप पर दुख भी। आज तो एक बच्चा भी 50 से कम नहीं लेता है।
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
मैं और मेरा जीवन तीन
दादी
भायजी यानी पापा जब भी आते थे, तो मैं डर जाता था। क्योंकि घर में सबसे अधिक शरारती मैं ही था। दादी को हमेशा चिढ़ाता रहता था। वह यही धमकी देती रहती थी कि भायजी के आने के बाद तुम्हें पिटवाती हूं। दादी दिल की सच्ची थी। कभी भी मेरी शिकायत नहीं की। वह अनपढ़ थी, लेकिन रामायण और महाभारत के श्लोक रटे हुए थे। पूजा-पाठ खूब करती थी। कहानी भी सुनाती थी। मां कहती है कि जब वह आई थी, तो घर के सभी सामान दूसरे को दे देती थी। इस कारण बाबा से उन्हें डांट भी पड़ती रहती थी। कुछ पड़ोसी उनका फायदा भी उठाए। वह किसी को भी भूखा नहीं देख सकती थी। मेरे पिताजी तीन भाई थे। बंटवारे के समय दादा और दादी हमलोगों के साथ ही थे, लेकिन दादी खुद जिद पकड़कर उन दोनों चाचा के पास चली गई। मेरी मां जब भी चाय या विशेष खाना बनाती, तो उन्हें जरूर खिलाती थी। उस समय दोनों चाचा अमीर थे। पारिवारिक माहौल गांव के अन्य परिवारों से बढिय़ा था। अलग रहने के बावजूद दोनों चाचा कभी भी भायजी को जवाब नहीं देते थे। इसका प्रभाव यह पड़ा कि हमलोग चाचा या चाची को कभी भी जवाब नहीं दिए। यही कारण है कि अभी तक हमलोगों का आंगन और दरवाजा एक ही है। यह गांववाले के लिए कौतूहल और इष्र्या का विषय है।
धीमा
पांच किलोमीटर की दूरी पर शिव मंदिर था, जिसे हमलोग धीमा कहकर पुकारते हैं। अभी तक मुझे इसका अर्थ मालूम नहीं है, लेकिन इलाके के सभी लोग इससे परिचित हैं। उस समय सभी लोग पैदल ही वहां जाते थे। गांव की एक झुंड जाती थी। दादी भी हर रविवार को वहां जाती थी और हमलोगों के लिए बतासा लाती थी। बतासा एक प्रकार की मीठाई थी। बतासा के इंतजार में हमलोग दादी के आने का इंतजार घंटों करते रहते थे। इसके लिए बहुत दूर तक पैदल भी चल देते थे। उस समय को याद करता हूं, तो अभी भी काफी खुशी मिलती है। याद है मुझे कि उन्हें धीमा जाने के लिए पैसे नहीं रहते थे। काफी हल्ला करने के बाद उन्हें पैसे मिलते थे। उस समय आर्थिक स्थिति भी खराब थी। दादी के जाने के बाद मैं यही सोचता था कि इस बार मां उन्हें पैसा नहीं दी है, इस कारण हमें वह मीठाई नहीं देगी। लेकिन वह सभी के साथ एकसमान व्यवहार करती थी। न पढऩे-लिखने के बावजूद इस तरह का व्यवहार देखकर तो आश्चर्य होता है आजकल के औरत की व्यवहार पर। उस समय शायद पढ़ाई की अपेक्षा संस्कार प्रभावी था। इस कारण अच्छे कुल में शादी करने को वरीयता दी जाती थी। दादी घर आने के बाद हमलोगों को बता देती थी। उनके पास जितने भी पैसे रहते थे, सभी खाने और सामान लाने में खर्च कर देती थी। इसके विपरीत पड़ोसी पैसा बचाकर घर लाते थे। दादी को पैसे बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय तक अमीर-गरीब सभी पैदल ही जाते थे। अब तो हालात बदल गए हैं। आज भी सभी लोग जाते हैं, लेकिन पैदल कोई नहीं जाता है। एक दिन मैं भी गया था। मां भी साथ में थी। वहां पूजा करने के बाद गांव के सभी सदस्य बाजार से मंगाकर कुछ खा रहे थे। मां घर से चूड़ा और आलू की सब्जी बनाकर ले गई थी। मैं भी बाजार से कुछ मंगाने का जिद करने लगा। मां लाचार होकर घुघनी खरीदी थी। मात्रा कितनी थी, मुझे पता नहीं है, लेकिन मुझे उससे बढिय़ा अपनी सब्जी ही लगी थी और उस दिन से अभी तक चूड़ा और सब्जी का स्वाद जिंदा है। मौका पडऩे पर उसे अवश्य खाता हूं। उस समय मां के ये शब्द भी याद हैं कि घर का खाना बाजार के खाना से अच्छा और शुद्ध होता है। हो सकता हो कि मां किसी और प्रशेजन से बोली हो, लेकिन यह बात हमें दिमाग में बैठ गई, जिसका फायदा अभी तक मैं उठा रहा हूं।
बथुआ साग
साग के शौकीन हमारे परिवार में सभी थे। उस समय दादी के साथ हमलोग साग तोडऩे के लिए बहुत दूर चले जाते थे। साथ में गांव के बहुत सारे बच्चे रहते थे। सभी लोग दिन-चार घंटे तक साग तोड़ते थे और अपनी-अपनी दादी या बहन को देते थे। उस समय शर्म नहीं लगती थी। न ही यह सोच डेवलप था कि लोग क्या कहेंगे। हमारे उम्र के बच्चे तो आजकल दूसरे के घर जाने में भी शर्म महसूस करते हैं। जब दादी साथ नहीं रहती थी, तो गांव के लड़की और लड़के के साथ साग तोडऩे के लिए जाते थे। उसमें कुछ उम्र में काफी बड़े थे। जहां तक मुझे याद है कि हम सभी साग तोडऩे के बाद एक जगह इकट्टïा होते थे, और सभी अपनी झोली से कुछ न कुछ साग भगवान को चढ़ाते थे। इसके पीछे यह विश्वास था कि भगवान को साग चढ़ाने से अपने आप अधिक साग हो जाएगा। यह डर भी था कि जो इस साग को चुपके से घर ले जाएगा, भगवान उस पर क्रोधित होंगे। इस कारण मैंने कभी भी साग नहीं चुराया। अब यदि दिमाग पर जोर लगाता हूं, तो अंदाजा यह लग रहा है कि सभी साग हमलोगों में से जो बड़े थे, आपस में बांट लेते थे। इस मामले में हमलोग बेबकूफ ही बने रहते थे। घरवाले पढऩे के लिए जोर देते थे और मैं साग तोडऩे में अधिक दिलचस्पी ले रहा था। सभी तरह के खेल खेलते थे उस समय। खेलते देखकर लोग हमें आश्चर्य से देखते थे, लेकिन हमें कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा था। पैर खराब होने के बावजूद हमारी एक अलग स्टाइल थी खेलने की, जिस कारण सभी लोग अपनी टीम में रखना चाहते थे। अलग स्टाइल इसलिए बन जाती थी कि उस समय मुझे विकलांग होने का अहसास कम था और मैं औरों की तरह ही सभी में पूरी आत्मविश्वास के साथ भाग लेता था। इस तरह की फीलिंग बड़े होने तक बनी रही। कोई खेल हमने नहीं छोड़ा। अब सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। आम के बगीचे में आम भी चुनने के लिए दादी केसाथ जाता था। उस समय कोई भी आम नमक साथ आसानी से खा जाता था। दांत खट्टे नहीं होते थे, लेकिन अब खाने के नाम से ही सिहर जाता हूं। उस समय लोक लाज का भी ख्याल रखा जाता था। आजकल की तरह उस समय के लोग नहीं थे। तभी तो बाबा के मरने के बाद दादी छिपकर रो रही थी। मैं जब उनसे रोने का कारण पूछा, तो वह हंसने का बहाना करने लगी। क्या आजकल की पत्नी इस तरह कर सकती है?
भैया
बचपन से ही उन्हें भैया न समझकर कुछ और समझते थे। सही अर्थों में वे बड़े होने का सभी दायित्व निभाते थे। गांव वाले भी उन्हें आदर्श मानते थे। हम भाई-बहनों को भी खूब मानते थे। वे पढ़ते हुए भी घर की जिम्मेदारी से कभी नहीं मुंह मोड़े। उस समय हमारी बाहर की जरूरत वही पूरी करते थे। उन्हीं की बदौलत आज मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। पढ़े-लिखे थे, इस कारण हमेशा मेरे लिए बेहतर की तलाश में रहते थे। वे नहीं पढऩे के लिए कहते थे और नहीं मारते थे। इस कारण उनके साथ रहने में अच्छा लगता था। उस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे। किस स्ट्रीम में थे। मुझे पता नहीं था। एक दिन मां के साथ हम अपनी बहन के पास बनमनखी गए थे। जीजा जी यहीं सर्विस करते थे। कुछ दिन रहने के बाद भैया साइकिल से हमें घर ले जा रहे थे। रास्ते में कोसी नदी को नाव के सहारे पार करना पड़ता था। हमलोग नाव से उस पार हो गए। उसके बाद साइकिल से हमलोग जा रहे थे। लगभग दो किलोमीटर तक बालू ही बालू था। इस कारण उनकी सारी ऊर्जा और दिमाग साइकिल खींचने में में ही लग रहा था। जहां तक मुझे याद है कि मुझे जोर से नींद आने लगी। मैं नींद तोडऩे के लिए हर संभव कोशिश किया। लेकिन अंत में नींद की जीत हुई और मैं निश्चिंत होकर सो गया। उसके बाद मुझे कुछ भी पता नहीं है। जब नींद खुली, तो भैया हमें उठा रहे थे। मैं बालू पर गिर गया था और भैया को पता ही नहीं चला। उस समय साइकिल के पीछे की सीट पर बैठा था। भैया के अनुसार वे एक किलोमीटर आगे तक निकल चुके थे। अंत साइकिल हल्का देख जब वे पीछे मुड़े, तो उनके होश ठिकाने लग गए। निराश होकर वे पीछे की ओर तेजी से दौड़े जा रहे थे और मैं बालू पर चैन की नींद ले रहा था। अभी भी भैया को आश्चर्य हो रहा है कि मुझे थोड़ी भी चोट नहीं लगी थी। कहते हैं न कि जाको राखे साइयां, मार सके न कोय। वही बात मुझ पर लागू हो गई।
लाल भैया
उस समय इनके नाम से ही रूह कांप उठती थी। कारण यह था कि जिंदगी में सबसे अधिक मार उन्हीं से पड़ी है। वह पढ़ाकू थे और हम सभी भाई-बहनों को भी पढ़ाते रहते थे। स्कूल नहीं जाने पर बहुत पीटते थे। उस समय यह स्थिति थी कि यदि सर्प और लाल भैया दोनों दो जगह पर होते, तो मैं सर्प के पास जाना ज्यादा फायदेमंद समझता। यदि वह नहीं रहते तो शायद मैं बचपन में पढ़ भी नहीं पाता। यदि वह दो दिनों के लिए बाहर चले जाते, तो किताब छूने का नाम ही नहीं लेता। मैं उन्हें दुश्मन समझता था। इस तरह की सोच मैट्रिक तक बनी रही।
पेरेंट्स
क्या बताऊं इनके बारे में। पापा को भायजी कहता था। उनके बारे में क्या सोच थी। ठीक से हमें पता नहीं है। लेकिन होली के समय हमें रंग डालते थे और कभी कभी भांग भी खिलाते थे। उनके कंधे पर बैठकर गांव भी घूमा करते थे। उस समय वे कम ही मारते थे। दाय के जाने के बाद मां पर ही अवलंबित हो गया। बहुत प्यार करती थी और बदमाशी करने पर मारती भी थी। जो भी मांगता था, हर संभव देती थी। पैसे की काफी कमी थी, लेकिन फिर भी हमेशा खुश रहती थी। उस समय एक ही घर और एक ही रजाई था। उसी में हम सभी भाई-बहन सोते थे। घर कच्ची मिट्टी का बना था। बारिश के समय में छत के ऊपर से पानी टपकता रहता था। उस समय हमें यही डर सताता रहता था कि घर आंधी में गिर न जाए। दादा के समय का घर था। इस कारण काफी मजबूत था। अभाव के बावजूद उन्हें लोग काफी आदर करते थे। वे हम सभी भाई-बहनों को पढ़ाने के साथ ही संस्कृत के श्लोक सुनाती थी। उस समय मां से कोई शिकायत नहीं थी। जितने भी खेत थे, सभी दूसरे के पास गिरबी था। एक वेतन ही सहारा था। उस समय असुविधाओं के बावजूद हम सभी को पढ़ते देख लोग हंसते थे, लेकिन अभी हालात ये हैं कि वे लोग हम पांचों भाइयों को देखकर अपने बेटे को कोसते हैं।
परिवार के अन्य सदस्य
बिनोद भैया पढऩे में काफी तेज थे। यह हमें पता नहीं था, लेकिन घरवाले यही कह रहे थे। उन्हें सरकार की तरफ से छात्रवृत्ति मिली हुई थी। इस कारण वे रानीगंज स्कूल में पढ़ते थे। अच्छे थे। वे भी बहुत प्यार करते थे। उस समय उनसे जुड़ी एक घटना मुझे अभी तक याद है। हुआ यूं कि छात्रवृत्ति में पास होने के बाद बिनोद भैया को हॉस्टल भेजने की तैयारी होने लगी। हॉस्टल में एक चौकी भी जरूरी थी। घर में एक ही चौकी थी, जिस पर घर की इज्जत टिकी हुई थी। कहने का आशय यह कि जो भी गेस्ट आते थे, उन्हीं पर सोते थे। हमलोग उस समय नीचे में ही सोते थे। भयजी को घर से कोई मतलब नहीं था। मां ही सब कुछ थी। मां के पास कुछ तख्ता था। उसे लेकर वह लताम बाबा के पास गई और उसे बनाने के लिए कही। पेशे से वे मिस्त्री नहीं थे। घर में मिस्त्री को देने के लिए पैसे नहीं थे, इस कारण वे ही किसी तरह बना रहे थे। उनसे घर के संबंध अच्छे थे। जब वे दरवाजे पर बना रहे थे, तो मैं भी वहीं था। मेरे साथ और कौन-कौन थे, याद नहीं है। लेकिन इतना याद है कि जब उसे बस के ऊपर चढ़ाया जा रहा था, तो उसी समय उसके कुछ भाग टूट चुके थे। बाद में बिनोद भैया ने बताया कि उतारते वक्त वह पूरी तरह से टूट चुका था। रात को वे बेंच लगाकर हॉस्टल में सोते थे। प्रमोद भैया मेरे साथ ही रहते थे। जब हमलोग साथ रहते तो लड़ाई करते रहते थे और उनसे अलग रहने की कल्पना से ही रोने लगते थे। वे पढऩे में तेज थे। चुन्नू छोटी बहन थी। प्यारी थी। उसे हमेशा परेशान करता रहता था। बैसाखी टूटने के बाद उसी के कंधे को पकड़कर एक वर्ष तक चला। रास्ते में उसे खूब रुलाता था। याद है मुझे बचपन की वह घटना, जब रास्ते में स्कूल जाते वक्त शरारत करने को सूझी। उस समय चारो ओर पानी ही पानी था। मैं चुन्नू को डराया कि मैं यही डूब जाता हूं। वह मुझे रोक रही थी और मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अंत में वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी, तभी मैं रुका और प्रथम बार उसके प्यार का अहसास हुआ। उसके बाद से उसे इस मामले में कभी भी परेशान नहीं किया।
भायजी यानी पापा जब भी आते थे, तो मैं डर जाता था। क्योंकि घर में सबसे अधिक शरारती मैं ही था। दादी को हमेशा चिढ़ाता रहता था। वह यही धमकी देती रहती थी कि भायजी के आने के बाद तुम्हें पिटवाती हूं। दादी दिल की सच्ची थी। कभी भी मेरी शिकायत नहीं की। वह अनपढ़ थी, लेकिन रामायण और महाभारत के श्लोक रटे हुए थे। पूजा-पाठ खूब करती थी। कहानी भी सुनाती थी। मां कहती है कि जब वह आई थी, तो घर के सभी सामान दूसरे को दे देती थी। इस कारण बाबा से उन्हें डांट भी पड़ती रहती थी। कुछ पड़ोसी उनका फायदा भी उठाए। वह किसी को भी भूखा नहीं देख सकती थी। मेरे पिताजी तीन भाई थे। बंटवारे के समय दादा और दादी हमलोगों के साथ ही थे, लेकिन दादी खुद जिद पकड़कर उन दोनों चाचा के पास चली गई। मेरी मां जब भी चाय या विशेष खाना बनाती, तो उन्हें जरूर खिलाती थी। उस समय दोनों चाचा अमीर थे। पारिवारिक माहौल गांव के अन्य परिवारों से बढिय़ा था। अलग रहने के बावजूद दोनों चाचा कभी भी भायजी को जवाब नहीं देते थे। इसका प्रभाव यह पड़ा कि हमलोग चाचा या चाची को कभी भी जवाब नहीं दिए। यही कारण है कि अभी तक हमलोगों का आंगन और दरवाजा एक ही है। यह गांववाले के लिए कौतूहल और इष्र्या का विषय है।
धीमा
पांच किलोमीटर की दूरी पर शिव मंदिर था, जिसे हमलोग धीमा कहकर पुकारते हैं। अभी तक मुझे इसका अर्थ मालूम नहीं है, लेकिन इलाके के सभी लोग इससे परिचित हैं। उस समय सभी लोग पैदल ही वहां जाते थे। गांव की एक झुंड जाती थी। दादी भी हर रविवार को वहां जाती थी और हमलोगों के लिए बतासा लाती थी। बतासा एक प्रकार की मीठाई थी। बतासा के इंतजार में हमलोग दादी के आने का इंतजार घंटों करते रहते थे। इसके लिए बहुत दूर तक पैदल भी चल देते थे। उस समय को याद करता हूं, तो अभी भी काफी खुशी मिलती है। याद है मुझे कि उन्हें धीमा जाने के लिए पैसे नहीं रहते थे। काफी हल्ला करने के बाद उन्हें पैसे मिलते थे। उस समय आर्थिक स्थिति भी खराब थी। दादी के जाने के बाद मैं यही सोचता था कि इस बार मां उन्हें पैसा नहीं दी है, इस कारण हमें वह मीठाई नहीं देगी। लेकिन वह सभी के साथ एकसमान व्यवहार करती थी। न पढऩे-लिखने के बावजूद इस तरह का व्यवहार देखकर तो आश्चर्य होता है आजकल के औरत की व्यवहार पर। उस समय शायद पढ़ाई की अपेक्षा संस्कार प्रभावी था। इस कारण अच्छे कुल में शादी करने को वरीयता दी जाती थी। दादी घर आने के बाद हमलोगों को बता देती थी। उनके पास जितने भी पैसे रहते थे, सभी खाने और सामान लाने में खर्च कर देती थी। इसके विपरीत पड़ोसी पैसा बचाकर घर लाते थे। दादी को पैसे बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय तक अमीर-गरीब सभी पैदल ही जाते थे। अब तो हालात बदल गए हैं। आज भी सभी लोग जाते हैं, लेकिन पैदल कोई नहीं जाता है। एक दिन मैं भी गया था। मां भी साथ में थी। वहां पूजा करने के बाद गांव के सभी सदस्य बाजार से मंगाकर कुछ खा रहे थे। मां घर से चूड़ा और आलू की सब्जी बनाकर ले गई थी। मैं भी बाजार से कुछ मंगाने का जिद करने लगा। मां लाचार होकर घुघनी खरीदी थी। मात्रा कितनी थी, मुझे पता नहीं है, लेकिन मुझे उससे बढिय़ा अपनी सब्जी ही लगी थी और उस दिन से अभी तक चूड़ा और सब्जी का स्वाद जिंदा है। मौका पडऩे पर उसे अवश्य खाता हूं। उस समय मां के ये शब्द भी याद हैं कि घर का खाना बाजार के खाना से अच्छा और शुद्ध होता है। हो सकता हो कि मां किसी और प्रशेजन से बोली हो, लेकिन यह बात हमें दिमाग में बैठ गई, जिसका फायदा अभी तक मैं उठा रहा हूं।
बथुआ साग
साग के शौकीन हमारे परिवार में सभी थे। उस समय दादी के साथ हमलोग साग तोडऩे के लिए बहुत दूर चले जाते थे। साथ में गांव के बहुत सारे बच्चे रहते थे। सभी लोग दिन-चार घंटे तक साग तोड़ते थे और अपनी-अपनी दादी या बहन को देते थे। उस समय शर्म नहीं लगती थी। न ही यह सोच डेवलप था कि लोग क्या कहेंगे। हमारे उम्र के बच्चे तो आजकल दूसरे के घर जाने में भी शर्म महसूस करते हैं। जब दादी साथ नहीं रहती थी, तो गांव के लड़की और लड़के के साथ साग तोडऩे के लिए जाते थे। उसमें कुछ उम्र में काफी बड़े थे। जहां तक मुझे याद है कि हम सभी साग तोडऩे के बाद एक जगह इकट्टïा होते थे, और सभी अपनी झोली से कुछ न कुछ साग भगवान को चढ़ाते थे। इसके पीछे यह विश्वास था कि भगवान को साग चढ़ाने से अपने आप अधिक साग हो जाएगा। यह डर भी था कि जो इस साग को चुपके से घर ले जाएगा, भगवान उस पर क्रोधित होंगे। इस कारण मैंने कभी भी साग नहीं चुराया। अब यदि दिमाग पर जोर लगाता हूं, तो अंदाजा यह लग रहा है कि सभी साग हमलोगों में से जो बड़े थे, आपस में बांट लेते थे। इस मामले में हमलोग बेबकूफ ही बने रहते थे। घरवाले पढऩे के लिए जोर देते थे और मैं साग तोडऩे में अधिक दिलचस्पी ले रहा था। सभी तरह के खेल खेलते थे उस समय। खेलते देखकर लोग हमें आश्चर्य से देखते थे, लेकिन हमें कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा था। पैर खराब होने के बावजूद हमारी एक अलग स्टाइल थी खेलने की, जिस कारण सभी लोग अपनी टीम में रखना चाहते थे। अलग स्टाइल इसलिए बन जाती थी कि उस समय मुझे विकलांग होने का अहसास कम था और मैं औरों की तरह ही सभी में पूरी आत्मविश्वास के साथ भाग लेता था। इस तरह की फीलिंग बड़े होने तक बनी रही। कोई खेल हमने नहीं छोड़ा। अब सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। आम के बगीचे में आम भी चुनने के लिए दादी केसाथ जाता था। उस समय कोई भी आम नमक साथ आसानी से खा जाता था। दांत खट्टे नहीं होते थे, लेकिन अब खाने के नाम से ही सिहर जाता हूं। उस समय लोक लाज का भी ख्याल रखा जाता था। आजकल की तरह उस समय के लोग नहीं थे। तभी तो बाबा के मरने के बाद दादी छिपकर रो रही थी। मैं जब उनसे रोने का कारण पूछा, तो वह हंसने का बहाना करने लगी। क्या आजकल की पत्नी इस तरह कर सकती है?
भैया
बचपन से ही उन्हें भैया न समझकर कुछ और समझते थे। सही अर्थों में वे बड़े होने का सभी दायित्व निभाते थे। गांव वाले भी उन्हें आदर्श मानते थे। हम भाई-बहनों को भी खूब मानते थे। वे पढ़ते हुए भी घर की जिम्मेदारी से कभी नहीं मुंह मोड़े। उस समय हमारी बाहर की जरूरत वही पूरी करते थे। उन्हीं की बदौलत आज मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। पढ़े-लिखे थे, इस कारण हमेशा मेरे लिए बेहतर की तलाश में रहते थे। वे नहीं पढऩे के लिए कहते थे और नहीं मारते थे। इस कारण उनके साथ रहने में अच्छा लगता था। उस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे। किस स्ट्रीम में थे। मुझे पता नहीं था। एक दिन मां के साथ हम अपनी बहन के पास बनमनखी गए थे। जीजा जी यहीं सर्विस करते थे। कुछ दिन रहने के बाद भैया साइकिल से हमें घर ले जा रहे थे। रास्ते में कोसी नदी को नाव के सहारे पार करना पड़ता था। हमलोग नाव से उस पार हो गए। उसके बाद साइकिल से हमलोग जा रहे थे। लगभग दो किलोमीटर तक बालू ही बालू था। इस कारण उनकी सारी ऊर्जा और दिमाग साइकिल खींचने में में ही लग रहा था। जहां तक मुझे याद है कि मुझे जोर से नींद आने लगी। मैं नींद तोडऩे के लिए हर संभव कोशिश किया। लेकिन अंत में नींद की जीत हुई और मैं निश्चिंत होकर सो गया। उसके बाद मुझे कुछ भी पता नहीं है। जब नींद खुली, तो भैया हमें उठा रहे थे। मैं बालू पर गिर गया था और भैया को पता ही नहीं चला। उस समय साइकिल के पीछे की सीट पर बैठा था। भैया के अनुसार वे एक किलोमीटर आगे तक निकल चुके थे। अंत साइकिल हल्का देख जब वे पीछे मुड़े, तो उनके होश ठिकाने लग गए। निराश होकर वे पीछे की ओर तेजी से दौड़े जा रहे थे और मैं बालू पर चैन की नींद ले रहा था। अभी भी भैया को आश्चर्य हो रहा है कि मुझे थोड़ी भी चोट नहीं लगी थी। कहते हैं न कि जाको राखे साइयां, मार सके न कोय। वही बात मुझ पर लागू हो गई।
लाल भैया
उस समय इनके नाम से ही रूह कांप उठती थी। कारण यह था कि जिंदगी में सबसे अधिक मार उन्हीं से पड़ी है। वह पढ़ाकू थे और हम सभी भाई-बहनों को भी पढ़ाते रहते थे। स्कूल नहीं जाने पर बहुत पीटते थे। उस समय यह स्थिति थी कि यदि सर्प और लाल भैया दोनों दो जगह पर होते, तो मैं सर्प के पास जाना ज्यादा फायदेमंद समझता। यदि वह नहीं रहते तो शायद मैं बचपन में पढ़ भी नहीं पाता। यदि वह दो दिनों के लिए बाहर चले जाते, तो किताब छूने का नाम ही नहीं लेता। मैं उन्हें दुश्मन समझता था। इस तरह की सोच मैट्रिक तक बनी रही।
पेरेंट्स
क्या बताऊं इनके बारे में। पापा को भायजी कहता था। उनके बारे में क्या सोच थी। ठीक से हमें पता नहीं है। लेकिन होली के समय हमें रंग डालते थे और कभी कभी भांग भी खिलाते थे। उनके कंधे पर बैठकर गांव भी घूमा करते थे। उस समय वे कम ही मारते थे। दाय के जाने के बाद मां पर ही अवलंबित हो गया। बहुत प्यार करती थी और बदमाशी करने पर मारती भी थी। जो भी मांगता था, हर संभव देती थी। पैसे की काफी कमी थी, लेकिन फिर भी हमेशा खुश रहती थी। उस समय एक ही घर और एक ही रजाई था। उसी में हम सभी भाई-बहन सोते थे। घर कच्ची मिट्टी का बना था। बारिश के समय में छत के ऊपर से पानी टपकता रहता था। उस समय हमें यही डर सताता रहता था कि घर आंधी में गिर न जाए। दादा के समय का घर था। इस कारण काफी मजबूत था। अभाव के बावजूद उन्हें लोग काफी आदर करते थे। वे हम सभी भाई-बहनों को पढ़ाने के साथ ही संस्कृत के श्लोक सुनाती थी। उस समय मां से कोई शिकायत नहीं थी। जितने भी खेत थे, सभी दूसरे के पास गिरबी था। एक वेतन ही सहारा था। उस समय असुविधाओं के बावजूद हम सभी को पढ़ते देख लोग हंसते थे, लेकिन अभी हालात ये हैं कि वे लोग हम पांचों भाइयों को देखकर अपने बेटे को कोसते हैं।
परिवार के अन्य सदस्य
बिनोद भैया पढऩे में काफी तेज थे। यह हमें पता नहीं था, लेकिन घरवाले यही कह रहे थे। उन्हें सरकार की तरफ से छात्रवृत्ति मिली हुई थी। इस कारण वे रानीगंज स्कूल में पढ़ते थे। अच्छे थे। वे भी बहुत प्यार करते थे। उस समय उनसे जुड़ी एक घटना मुझे अभी तक याद है। हुआ यूं कि छात्रवृत्ति में पास होने के बाद बिनोद भैया को हॉस्टल भेजने की तैयारी होने लगी। हॉस्टल में एक चौकी भी जरूरी थी। घर में एक ही चौकी थी, जिस पर घर की इज्जत टिकी हुई थी। कहने का आशय यह कि जो भी गेस्ट आते थे, उन्हीं पर सोते थे। हमलोग उस समय नीचे में ही सोते थे। भयजी को घर से कोई मतलब नहीं था। मां ही सब कुछ थी। मां के पास कुछ तख्ता था। उसे लेकर वह लताम बाबा के पास गई और उसे बनाने के लिए कही। पेशे से वे मिस्त्री नहीं थे। घर में मिस्त्री को देने के लिए पैसे नहीं थे, इस कारण वे ही किसी तरह बना रहे थे। उनसे घर के संबंध अच्छे थे। जब वे दरवाजे पर बना रहे थे, तो मैं भी वहीं था। मेरे साथ और कौन-कौन थे, याद नहीं है। लेकिन इतना याद है कि जब उसे बस के ऊपर चढ़ाया जा रहा था, तो उसी समय उसके कुछ भाग टूट चुके थे। बाद में बिनोद भैया ने बताया कि उतारते वक्त वह पूरी तरह से टूट चुका था। रात को वे बेंच लगाकर हॉस्टल में सोते थे। प्रमोद भैया मेरे साथ ही रहते थे। जब हमलोग साथ रहते तो लड़ाई करते रहते थे और उनसे अलग रहने की कल्पना से ही रोने लगते थे। वे पढऩे में तेज थे। चुन्नू छोटी बहन थी। प्यारी थी। उसे हमेशा परेशान करता रहता था। बैसाखी टूटने के बाद उसी के कंधे को पकड़कर एक वर्ष तक चला। रास्ते में उसे खूब रुलाता था। याद है मुझे बचपन की वह घटना, जब रास्ते में स्कूल जाते वक्त शरारत करने को सूझी। उस समय चारो ओर पानी ही पानी था। मैं चुन्नू को डराया कि मैं यही डूब जाता हूं। वह मुझे रोक रही थी और मैं आगे बढ़ता जा रहा था। अंत में वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी, तभी मैं रुका और प्रथम बार उसके प्यार का अहसास हुआ। उसके बाद से उसे इस मामले में कभी भी परेशान नहीं किया।
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