रविवार, 13 मार्च 2011

मेरे सब्र की इन्तहा


मत पुछ मेरे सब्र की इन्तहा कहाँ तक है, तू सितम करले तेरी ताकत जहाँ तक है,

वफ़ा की उमीद जिन्हें होंगी उन्हें होंगी, हमें तो देखना है की तू जालिम कहाँ तक है ।


जब आसमान गरजता होगा, तो मौसम भी अपना रंग बदलता होगा,

जब उठती होगी आप की निगाहें, तो खुदा भी गिर गिर कर संभालता होगा ।

सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनने की आदत है हमेंकितना भी ज़ख्म दे हमें कोई, उतना ही मुस्कराने की आदत है हमें ।

नाराज़ होकर जिंदगी से नाता नही तोड़ते, मुश्किल हो राह फ़िर भी मंजिल नही छोड़ते,

तनहा ना समझना खुदको कभी, हम उनमे से नही है, जो कभी साथ नही छोड़ ते ।

यकीं दिलाओ न मुझको कि तुम पराये नहीं

मुझे तो ज़ख्म लगे तुमने ज़ख्म खाए नहीं
मकाँ ख़मोश अगर है तो दोष किसका है

करे भी क्या जो कोई उसको घर बनाये नहीं

समझा के थक गए तो स्वयं मौन हो गएकहने लगे बच्चे कि पापा सुधर गए

ठोकरों से सरक सकता है हिमालयजो अपाहिज हैं ये उनकी कल्पना है

सोच समझकर बात करो अब राहों में भिखमंगों सेवरना तुम को समझा देगा वो भी इज्ज़त वाला है

बदली न जा सके कोई आदत नहीं होतीकमज़ोर दीवारों पर कोई छत नहीं होती


मुनव्वर’! माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना जहाँ बुनियाद हो इतनी नमीं अच्छी नहीं होती

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है ।
सुबह का चावल नहीं है, रात का आटा नहीं किसने ऐसा वक़्त मेरे गाँव में काटा नहीं क़र्ज़ की हम भी इधर खाते हैं पीते हैं 'असद 'नूर, अंबानी नहीं, बिड़ला नहीं, टाटा नहीं
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ ! वृक्ष हो भले खड़े हों, घने, हों बड़े, एक पत्र छांह भी मांग मत, मांग मत, मांग मत ! तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी तू न मुड़ेगा कभी। कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ। यह महान दृश्य है-चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ। अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !
उस पार न जाने क्या होगा
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरालहरा यह शाखाएँ कुछ शोक भुला देती मन का, कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो, बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का, तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो, उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है, जीवन की झिलमिलसी झाँकी नयनों के आगे आती है, स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे, मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है; ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये, ये साधन भी छिन जाएँगे; तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
प्याला है पर पी पाएँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको, इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थबना कितना हमको, कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा, करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?कह तो सकते हैं, कहकर ही कुछ दिल हलका कर लेते हैं, उस पार अभागे मानव का अधिकार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
कुछ भी न किया था जब उसका, उसने पथ में काँटे बोये, वे भार दिए धर कंधों पर, जो रो-रोकर हमने ढोए; महलों के सपनों के भीतर जर्जर खँडहर का सत्य भरा, उर में ऐसी हलचल भर दी, दो रात न हम सुख से सोए; अब तो हम अपने जीवन भर उस क्रूर कठिन को कोस चुके; उस पार नियति का मानव से व्यवहार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
संसृति के जीवन में, सुभगे ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी, जब दिनकर की तमहर किरणे तम के अन्दर छिप जाएँगी, जब निज प्रियतम का शव, रजनी तम की चादर से ढक देगी, तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी कितने दिन खैर मनाएगी! जब इस लंबे-चौड़े जग का अस्तित्व न रहने पाएगा, तब हम दोनो का नन्हा-सा संसार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
ऐसा चिर पतझड़ आएगा कोयल न कुहुक फिर पाएगी, बुलबुल न अंधेरे में गागा जीवन की ज्योति जगाएगी, अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर ‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे, अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन करने के हेतु न आएगी, जब इतनी रसमय ध्वनियों का अवसान, प्रिये, हो जाएगा, तब शुष्क हमारे कंठों का उद्गार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन निर्झरिणी भूलेगी नर्तन, निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,सरिता अपना ‘कलकल’ गायन, वह गायक-नायक सिन्धु कहीं, चुप हो छिप जाना चाहेगा, मुँह खोल खड़े रह जाएँगे गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण; संगीत सजीव हुआ जिनमें, जब मौन वही हो जाएँगे, तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का जड़ तार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
उतरे इन आखों के आगे जो हार चमेली ने पहने, वह छीन रहा, देखो, माली, सुकुमार लताओं के गहने, दो दिन में खींची जाएगी ऊषा की साड़ी सिन्दूरी, पट इन्द्रधनुष का सतरंगा पाएगा कितने दिन रहने; जब मूर्तिमती सत्ताओं की शोभा-सुषमा लुट जाएगी, तब कवि के कल्पित स्वप्नों का श्रृंगार न जाने क्या होगा! इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
दृग देख जहाँ तक पाते हैं, तम का सागर लहराता है, फिर भी उस पार खड़ा कोई हम सब को खींच बुलाता है; मैं आज चला तुम आओगी कल, परसों सब संगीसाथी, दुनिया रोती-धोती रहती, जिसको जाना है, जाता है; मेरा तो होता मन डगडग, तट पर ही के हलकोरों से! जब मैं एकाकी पहुँचूँगा मँझधार, न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

रविवार, 20 फ़रवरी 2011




कश्ती का जिम्मेदार फक़त नाखुदा (मल्लाह) नहीं,
कश्ती में बैठने का सलीका भी होना चाहिये।
तूफान से लड़ने का सलीका है जरूरी
हम डूबने वालों की हिमायत नहीं करते।

कल रात एक अनहोनी बात हो गईमैं तो जागता रहा खुद रात सो गई

हैआंसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें

"चलो अच्छा हुआ, जो तुम मेरे दर पे नहीं आए
तुम झुकते नहीं, और मैं चौखटें ऊंची कर नही पाता !"


बच्चो के सच्चे जेहनो में झूठी बातें मत डालो ,
कांटो कि सोहबत में रह कर फूल नुकीला हो जाता है ..

घर के हालात तो चेहरे से बयान होते हैं.......फिर क्यों कमरे को करीने से सजा रखा है??..................
तुम पूछो और मैं ना बताऊँ ऐसे तो हालात नहींएक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं


आसमां से उतारा गयाजिंदगी दे के मारा गयामौत से भी न जो मर सकाउसको नजरों से मारा गया

नादान जवानी का जमाना गुजर गयाअब आ गया बुढ़ापा सुधर जाना चाहियेआवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेनाबहुत हैं फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती हैकिसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता


तुमने मेरे घर न आने की क़सम खाई तो हैआंसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें

मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हमने खैरात भी मांगी है तो खुद्दारी से

हमारे फन की बदौलत हमें तलाश करे
मजा तो जब है कि शोहरत हमें तलाश करे

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो


कभी दिमाग, कभी दिल, कभी जिगर में रहो
ये सब तुम्हारे ही घर हैं, किसी भी घर में रहो


मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले
मिट्टी को किसी ताजमहल में नहीं रखा
मिल रहा था भीख में, सिक्का मुझे सम्मान का
मैं नहीं तैयार था, झुक कर उठाने के लिए

आज हम दोनों को फुरसत है, चलो इश्क करें
इश्क दोनों की जरूरत है, चलो इश्क करें
इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है
ये मुनाफ़े की तिजारत है, चलो इश्क करें
आप हिन्दू, मैं मुसलमाँ, ये ईसाई, वो सिख
यार छोड़ो ये सियासत है, चलो इश्क करें

अंगुलियां यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो
जिन्दगी क्या है, खुद ही समझ जाओगे
बारिशों में पतंगें उड़ाया करो
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर
नीम की पत्तियाँ चबाया करो
चाँद-सूरज कहाँ, अपनी मंजिल कहाँ
ऐसे वैसों को, मुँह न लगाया करो
बीमार को मरज की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ, पिला देनी चाहिए

जुल्फ घटा बनके लहराए, आँख कँवल हो जाए
शायर तुझको पल भर सोचे और ग़ज़ल हो जाए

मैं उसकी आँखों से छलकी शराब पीता हूँ
गरीब होकर भी महँगी शराब पीता हूँ
जब सायादार थे, जमाने के काम आए
जब सूखने लगे, जलाने के काम आए
कितने खुदगर्ज हैं ऊँचे मकानों के मकीं
अहले फुटपाथ का सूरज भी छुपा लेते हैं
इस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर
ये पेड़ सिर्फ बीच में आने से कट गया
उदास रहने को अच्छा नहीं बताता है
कोई भी जहर को मीठा नहीं बताता है
कल अपने आप को देखा था माँ की आँखों में
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है
ये देख कर पतंगें भी हैरान हो गईं
अब तो छतें भी हिन्दू-मुसलमान हो गईं

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

किसी को किसी से शिकायत का क्‍या हक

किसी को किसी से शिकायत का क्‍या हक
न मासूम रूपम थीं और न बेदाग केसरी साहब थे।
यदि रामायण की बात करें, तो सीता भी मिथिला की थीं, लेकिन हमलोग गर्व से उसका नाम लेते हैं। आप कहेंगी कि उसमें देवी शक्‍ति थी। इस कारण इज्‍जत बचाने में सफल रही। सही है, लेकिन यहां तो दूसरी बात है
किसी को किसी से शिकायत का क्‍या हक
न मासूम रूपम थीं और न बेदाग केसरी साहब थे। दोनों अपनी स्‍वार्थ सिद़ध में लगे थे। हां यह अफसोसजनक बात है कि विधायक जी को हर जवान युवतियों पर, फिर वह चाहे बेटी के तुल्‍य क्‍यों न हो, दिल आ जाता है, और आज की मॉडर्न और देश की शासन चलानेवाली औरतों का दिमाग अपनी महत्‍वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इज्‍ज्‍त को अपना बहुमूल्‍य और सटीक मानकर न्‍यौछावर करने की डिमांड बढ रही है। तभी तो निन्त्‍यानंद बाबा जैसे लोग सेक्‍स बाबा बन रहे हैं। मुझे लगता है कि यदि कोई एक सही हो, तो इस तरह की स्‍िथति नहीं आ सकती। वैसे मैं भी पूर्णयां का हूं और दैनिक जागरण में काम करते हुए भी इन दोनों के बारे में कुछ नहीं जानता। हमें दुख है कि औरत अपनी महत्‍वाकांक्षा की पूर्ति के लिए केसरी जैसे विधायक से संपर्क करना चाह रही है और जहां तक पुरुष की बात है, तो जब मुन्‍नी अपनी बदनामी का डंका चारों तरफ फैला रही है और शीला अपनी जवानी दिखाकर ही नहीं गाकर रिझा रही है, तो पुरुष की मानसिकता पहले से अिधक खराब होना लाजिमी है। जब सीता जैसी बदन ढकाउ औरत पर रावण का दिल आ सकता है, तो आज के पुरुष शीला और मुन्‍नी जैसी लडकी का क्‍या करे।

हमें लगता है कि समाज तभी नष्‍ट होने से बच सकता है, जब औरत अपनी महत्‍वाकांक्षा कम करेंगी एवं मुन्‍नी और शीला बनने से बचेगी। क्‍योंकि यदि पुरुष के भरोसे समाज को सुधारने का दायित्‍व दिया जाए, तो स्‍वामी दयानंद, विवेकानंद जैसे कुछ लोग ही मिलेंगे। लेकिन यदि औरत मुन्‍नी और शीला बनने से इनकार कर दे, तो आज देशभर की मुन्‍नी और शीला को सिर नहीं छिपाना पडता। और दबंगई पर उतरे पुरुषों को कुचला जा सकता है। आज रावण से हमें दुश्‍मनी तो इसिलए है कि वे सीता जैसी नारी को अपने घर ले गया और सीता की कोई महत्‍वाकांक्षा नहीं थी। इस कारण रावण मरने पर सभी को सुख मिला। रावण के पाप की महत्‍ता इसलिए और बढ गई कि सीता सही थी। कल्‍पना किजिए कि यदि सीता में कुछ खामी रहती तो क्‍या उसे सिर्फ अग्‍िन्‍परीक्षा से ही गुजरना पडता। नहीं न। औरत ही क्‍यों त्‍याग करे, यह इसलिए कि वह जननी है। बचाने के लिए किसी को तो आगे आना ही पडेगा। आप इस गलतफहमी में न रहिए कि पुरुष भी आगे आ सकता है। उसे इनमें दिलचस्‍पी कम रहती है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

सुख की यह संभावना हमारे हाथ में है

पिछले काफी महीनों से इसी उधेडबुन में हूं कि खुश्‍ाी कहां से लाएं। अब तो यह वर्ष भी खत्‍म होनेवाला है। लोग नए वर्ष में बहुत तरह के रिजोल्‍यूशन लेते हैं खुशी पाने के लिए। लेकिन फिर दुखी हो जाते हैं। वे खुद को कोसने लगते हैं। वास्‍तिवकता यह है कि जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन इस जीवन को सुंदर बनाना हमारे हाथ में है और जब सुख की यह संभावना हमारे हाथ में है तो फिर यह दुख कैसा ? यह शिकायत कैसी ? हम क्यों भाग्य को कोसें और दूसरे को दोष दें ? जब सपने हमारे हैं तो कोशिशें भी हमारी होनी चाहिए। जब पहुंचना हमें है तो यात्रा भी हमारी ही होनी चाहिए। पर सच तो यह है जीवन की यह यात्रा सीधी और सरल नहीं है इसमें दुख हैं, तकलीफें हैं, संघर्ष और परीक्षाएं भी हैं। ऐसे में स्वयं को हर स्थिति-परिस्थिति में, माहौल-हालात में सजग एवं संतुलित रखना वास्तव में एक कला है। इंसान सीधे-सीधे क्यों नहीं मर जाता, इतने उतार चढ़ाव इतने कष्ट क्यों ? इंसान सरलता से क्यों नहीं मर जाता, इतनी परीक्षाएं क्यों ? कहते हैं सब कुछ पहले से ही तय है कि कौन क्या करेगा, कब करेगा, कितना और कैसा जिएगा ? यह सब पहले से ही निर्धारित है। इंसान बस उसको भोगता है, उससे गुजरता है। जब सब कुछ पहले से ही तय है तो फिर कर्म और भाग्य क्यों ? गीता कहती है ‘यहां हमारा कुछ नहीं, हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे।’ यदि यह सत्य है तो इंसान के हाथ इतने भर क्यों जाते हैं कहां से जुटा लेता आदमी इतना कुछ ? आज समाज में पढे लिखे लोग सबसे अधिक पैसा कमा रहे हैं।
सुनकर, सोचकर लगता है कि यह ‘जीवन’ कितना उलझा हुआ है, यह दो-दो बातें करता है। न हमें ठीक से जलने देता है न ही बुझने देता है। हमें बांटकर, कशमकश में छोड़ देता है। सोचने की बात यह है कि यह जीवन उलझा हुआ है या हम उलझे हुए हैं ? उलझने हैं या पैदा करते हैं ? कमी जीवन में है या इसमें ? हमें जीवन समझ में नहीं आता या हम स्वयं को समझ नहीं पाते ? यह जन्म जीवन को समझने के लिए मिला है या खुद को समझने के लिए ? यह सवाल सोचने जैसे हैं। कितने लोग हैं जो इस जीवन से खुश हैं ? कितने लोग हैं जो स्वयं अपने आप से खुश हैं ? किसी को अपने आप से शिकायत है तो किसी को जीवन से। सवाल उठता है कि आदमी को जीवन में आकर दुख मिलता है या फिर वह अपनी वजह से जीवन को दुखी बना लेता है ? यदि जीवन में दुख होता तो सबके लिए होता, और हमेशा होता। मगर यही जीवन किसी को सुख भी देता है। जीवन सुख-दुख देता है या फिर आदमी सुख-दुख बना लेता है ? यह दोहरा खेल जीवन खेलता है या आदमी ? यह सब सोचने जैसे है। देखा जाए तो जीवन यह खेल नहीं खेल सकता, क्योंकि जीवन कुछ नहीं देता। हां जीवन में, जीवन के पास सब कुछ है। वह देता कुछ नहीं है, उससे इंसान को लेना पड़ता है। यदि देने का या इस खेल का जिम्मा जीवन का होता तो या तो सभी सुखी होता या सभी दुखी होते या फिर जिस एक बात पर एक आदमी दुखी होता है सभी उसी से दुखी होते तथा सब एक ही बात से सुखी होते, मगर ऐसा नहीं होता। तो इसका अर्थ तो यह हुआ कि यह खेल आदमी खेलता है। आदमी जीवन को सुख-दुख में बांट लेता है। यदि यह सही है तो इसका क्या मतलब लिया जाए, कि आदमी होना गलत है ? यानी इस जीवन में आना, जन्म लेना गलत है ? अब क्या करें ? कैसे बचें इस जीवन के खेल से ? क्या है हमारे हाथ में ? एक बात तो तय है आदमी होने से नहीं बचा जा सकता, लेकिन उसको तो ढूंढ़ा जा सकता है जो आदमी में छिपा है और जिम्मेदार है इस खेल का। पर कौन है आदमी में इतना चालाक, चंचल, संभावना की गुंजाइश है तो हमें जीवन को नहीं मन को समझना है क्योंकि यदि हमने मन को संभाल लिया तो समझो जीवन को संभाल लिया। सभी रास्ते मन के हैं, सभी परिणाम मन के हैं, वरना इस जन्म में, इस जीवन में रत्ती भर कोई कमी या खराबी नहीं। अपने अंदर की कमी को, मन की दोहरी चाल को समझ लेना और साध लेना ही एक कला है, एक मात्र उपाय है। इसलिए इस जीवन को कैसे जिएं कि इस जीवन में आना हमें बोझ या सिरदर्दी नहीं, बल्कि एक उपहार या पुरस्कार लगे। इस सोच के साथ ही इस व्‍ार्ष हमने जीने की तमन्‍ना पाल रखी है।