आज मंगलवार है। आज का दिन मैं प्लानिंग और रिलैक्स के लिए रखता हूं। आज का दिन ही सही अर्थों में मेरे लिए सबसे क्रिएटिव होता है। क्योंकि इस दिन मैं पढाई भी करता हूं और पढने से एक सप्ताह तक तरोताजा महसूस भी करता हूं। पढने के सिलसिले में कुछ बातें मानस पटल पर ऐसे बैठ जाती है कि निकलने का नाम नहीं लेता है। अहा जिंदगी में अपनी जडों से दूर न हों, पढने के बाद मैं खुद काफी परेशान और विचारशील हो गया हूं। सोचने लगा कि क्या खुद नौकरी करके पेट पालना ही आज के मनुष्य का ध्येय रह गया है। आदमी अपने कुटुम्ब को भूल रहा है। अहां जिंदगी में इस संबंध में एक सुंदर लेख पढा। यह लेख मुझे काफी प्रभावित किया है। इसमें कहा गया है कि मनुष्य अकेले कुछ भी नहीं कर सकता है। समूह में रहना और सामूहिकता का बोध ही एक ऐसी खासियत है , जिसके चलते इंसानों ने इतनी तरक्की की है। इंसानों के अलावा भी कई जीव है, जो समूह में रहते हैं, लेकिन उनका समूह अमूमन अपने बुजुर्ग और बीमार लोगों का साथ छोड देता है। इंसानों के मामले में ऐसा नहीं है। आजकल के लोग भी अपने मां बाप, भाई बहन व सगे संबंधियों को भूलने लगे हैं। लोग आपसी सहयोग की नींव पर टिकी इमारत को खालिस मुनाफे की नजर से देखने लगे हैं। मतलब जहां फायदा नहीं, वहां पल भर भी समय नहीं गंवाते हैं आज के पढे लिखे महत्वाकांक्षी लोग। वे भूल जाते हैं कि जिस दरख्त की वे शाख हैं, उसकी जडों में कोई ऐसा भी है, वह अभी जिंदा है और आपको उंचाई पर पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही है। उनके साथ रहने से फायदा यह है कि वे आपसे अधिक दुनिया देखी है, जो अपने अनुभवों से सही गलत का रास्ता आपको बता सकते हैं और आनेवाली खतरों से सावधान भी कर सकते हैं। संभव है कि वह यह न बता पाएं कि आज के जमाने में क्या है सही, क्योंकि उसका जमाना कुछ अलग था और अब की रवायतें अलग हैं, लेकिन यह सही है कि जब आप हार थक कर आएंगे, वहीं सहारा देनेवाले और हिम्मत बढानेवाले होंगे आपके पास। लोग अक्सर भूल जाते हैं कि आज जिन लोगों की उम्र ने उन्हें असहाय बना दिया है, एक जमाना वह भी रहा होगा, जब उन सूखे दरख्तों में हरियाली रही होगी, जिनकी छांव में न जाने कितने लोग सुकून महसूस करते होंगे। आज बूढे हैं, कल वे जवान थे और उन्होंने भी अपने परिवार और समाज के लिए काफी कुछ किया होगा। मनुष्य का बचपन अक्सर शुरुआती चरणों में माता पिता के साए में बीतता है, नौजवानी में एक भरोसा रहता है कि कोई तो है, जिसे जरूरत के वक्त में ताका जा सके। फिर जीवन का वह उम्र आता है, जब उम्र जवाब देने लगती है। उस आनेवाले जेनरेशन का यह कर्तव्य बनता है कि जीवन संध्या में रोशनी करने का काम वो करें, जिनकी भोर को उन्होंने सुनहरा बनाया था। मैं ये नहीं कह रहा हूं कि आप काम छोडकर घर बैठ जाएं। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि आप अवकाश में अपने घर जाएं, माता पिता और भाइयों के साथ कुछ समय बिताएं और संभव हो तो उनकी कुछ जरूरतों को पूरा करें। क्या आज हम कम उम्र में अच्छी नौकरी कर सकते हैं। बच्च्ो को अंग्रेजी स्कूल में पढा सकते हैं, लेकिन घर नहीं जा सकते। समय निकालेंगे, तो आप अवश्य जा सकते हैं। ऐसा करके न सिर्फ आप बीते कल को शुक्रिया कहेंगे, बल्कि आनेवाले कल की जिम्म्ेदार पीढी के मन में संस्कार के बीज बो सकेंगे।
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
शनिवार, 14 जनवरी 2012
दादी ने बताई मकर संक्रान्ति का महत्व
अभी तक मुझे यही मालूम था कि 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति मनाई जाती है। इस कारण सुबी नहा धोकर तैयार हो गया। पत्नी खाने में रोटी सब्जी दी तो आग बबूला हो गया और उनकी बातों को सुने बिना काफी कुछ कह दिया। बाद में पता चला कि आज नहीं कल मकर संक्रान्ति है। इस कारण वह स्पेशल खाना नहीं बनाई थी।मकर संक्रान्ति मैं काफी दिनों से मनाता हूं। जब बच्चा था, तो सुबह से ही लाई खाना शुरू कर देता था। खूब खाता था। खाने से अधकि काफी मजा लेता था। उस दिन घरवाले पढने के लिए नहीं कहते थे और इस तरह के खाने कभी कभी मिलते थे। उस समय यही सोचता था कि काश इस तरह के पर्व रोज हों, तो मजा आ जाएगा। अब नौकरी कर रहा हूं। शहर में रह रहा हूं। आजकल के बच्चे इस तरह के मजे नहीं ले रहे हैं। उनके माता पिता काफी पढे हैं और सेव को सेव कहने पर पीटते भी हैं। वे इसे एपल कहते हैं। वह गर्व से कहती है कि हमारे बच्चे को इसमें रुचि नहीं है। इस कारण मैं खिचडी नहीं बाती हूं। एक दिन मुझे सर्दी थी और डॉक्टर खिचडी खाने से मना किए थे, लेकिन दादी जबर्दस्ती मुझे खिलाई थी और इस पर्व का महत्व बताई थी। जबकि वह पढी लिखी नहीं थी। आजकल के बच्चे को शायद ही यह मालूम हो कि यह पर्व क्यों मनाया जाता है। दादी हमें बताई थी कि भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति आपसी मनमुटाव को तिलांजलि देकर प्रेम बढ़ाने हेतु मनाई जाती है। इस दिन की आने वाली धार्मिक कृतियों के कारण जीवों में प्रेमभाव बढ़ने में और नकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर जाने में सहायता मिलती है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। इसलिए संक्रांति मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन तिल,गुड़ के सेवन का साथ नए जनेऊ भी धारण करना चाहिए। सही या गलत, लेकिन उस दिन से अवश्य मनाता हूं। आपको भी मकर संक्रान्ति की शुभकामना।
मां ने अपनी ही बेटी के साथ रेप किया
एक मां ने अपनी ही बेटी के साथ रेप किया और इसका विडियो भी बनाया। इस आरोप में उसे चार साल की जेल की सजा सुनाई गई है। घटना ऑस्ट्रेलिया की है। चार बच्चों की 37 साल की मां ने अपनी सबसे छोटी 11 साल की बेटी के साथ ऐसा किया। दरअसल उसने सेक्स एजुकेशन के लिए ऐसा किया। कुछ सवालों के जवाब जानने के लिए उसने इसका एक्स्पेरिमेंट अपनी ही बच्ची पर कर डाला। उसने बच्ची के साथ कई सेक्शुअल ऐक्टिविटी कीं और उसे मोबाइल में फिल्माया भी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि महिला ने खुद के स्वार्थ के लिए अपनी ही बच्ची के साथ ऐसा किया। अपनी ही बच्ची के साथ मां के रेप करने की घटनाएं कम ही देखी जाती हैं, यह एक सीरियस ऑफेंस है। कोर्ट ने उसे चार साल की जेल की सजा सुनाई है।यही एक रिश्ता था, जो अभी तक बचा हुआ था। इस रिश्ते को कलंकित करनेवाली भी धतरी पर आने लगी। अभी तक माता के कुमाता होने की बात कहीं नहीं आ रही थी। यह क्यों हो रहा है। ऐसी बात नहीं है कि ये पढे लिखे लोग नहीं हैं। ये काफी पढे लिखे हैं। यदि पढे लिखे ऐसा कर रहे हैं, तो जहां अशिक्षा है, वहां तो और भयावह स्थिति होगी। लेकिन कभी कभी अशिक्षित शिक्षित से बेहतर होते हैं। यह मैं अपने गांव की चाची को देखकर कह रहा हूं। वे पढी लिखी नहीं है। उसके दो बेटे हैं। दोनों बेटे किसान हैं। संपत्ति काफी है, लेकिन वह रोज भूखी सोती है। गांव वाले कुछ दे देते हैं, तो खा लेती है। उसके नाम से दस बीघा जमीन भी है। समाज के लोग उनसे कह रहे हैं कि तुम इसे लेकर किसी को दे दो। वह तुम्हें अच्छी तरह खातिरदारी करेगा, लेकिन उसका कहना है कि हमारी संपत्ति पर बेटा का जन्मना अधिकार है। मैं उसका अधिकार किसी को नहीं दे सकती हूं। बेटा अपना कर्म कर रहा है। मैं अपना कर्म कर रहा हूं। शायद भगवान के घर में कुछ चूक हो गई थी। इस कारण इस तरह का कष्ट हो रहा है। वह अपनी बात के समर्थन में कहती है कि कौशल्या राम की माता थी, फिर भी उन्हें काफी कष्ट उठाना पडा था। यह विधि का विधान है। इसे कोई नहीं टाल सकता है। उस समय उसे हमलोग अशिक्षित कहकर मजाक उडाते थे, आज शिक्षित मां की यह करतूत मुझे हिलाकर रख दिया है। अप कह सकते हैं कि इस तरह की मां कम है, लेकिन सवाल तो जरूर खडा करती है
सवाल ये नहीं कि शीशा टूटा कि बच गया, सवाल यह है कि पत्थर आया किधर से।
सवाल ये नहीं कि शीशा टूटा कि बच गया, सवाल यह है कि पत्थर आया किधर से।
मंगलवार, 3 जनवरी 2012
अगर पत्थर बन जाता तो
आज एक ऐसी घटना हुई, जिसे सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ। हुआ यूं कि एक जनवरी को कानपुर में बारिश हुई थी। इस कारण रात का माहौल काफी सर्द था। दो जनवरी के रात को सभी लोग सोए हुए थे। मैं भी सोया हुआ था। रात को लगभग एक बजे बाहर काफी हल्ला हो रही थी। बाहर निकला तो देखा कि सभी लोग घर से बाहर निकले हुए हैं और काफी भयभीत हैं। पूछने पर पता चला कि आज रात जो सोएगा, वह पत्थर बन जाएगा। मैं भी काफी परेशान हो गया। बाद में सोचा कि इस आधुनिक युग में भी ऐसा होता है। खैर मजेदार यह रही कि जब ऑफिस आया तो सभी के साथ इसी तरह की घटना हुई थी। कुछ लोग कह रहे थे कि यदि पत्थर बन जाता तो मैं अपनी पत्नी को सुला देता और जब वह पत्थर बन जाती तो लोगों के सामने गाना गाता कि पत्थर के सनम, तूझे हमने मुहब्बत का खुदा मा;;;;;;;;;;;;;; । तो कोई कह रही थी कि मैं अपने पति को सुला देती और जब वे पत्थर बन जाते तो गाती कि हुस्न हाजिर है, मुहब्बत की सजा पाने को :::::::::::::::::। एक बुजुर्ग कह रहे थे कि यह होकर रहेगा। क्योंकि अब सतयुग आनेवाला है। हो सकता है कि कलयुग में सभी पापी बनकर पत्थर बन जाए और राम अवतरित होने का कारण बने। भई जितनी मुंह, उतनी बात। मुझे तो लग रहा था कि यदि हम एक मिनट के लिए सोचें कि मेरी पत्नी पत्थर बन गई होती तो मैं क्या करता। मुझे हंसी आती है इस तरह के लोगों पर। क्या 2012 में भी हम इस तरह की सोच रखते हैं। नया वर्ष सभी के लएि पत्रि न बनकर मंगलमय हो, यही हमारी प्रार्थना है भगवान से।
बुधवार, 23 नवंबर 2011
यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी
अमेरिका
की दो नामी शिक्षण संस्थाओं से पढ़कर आए और नंदन निलेकनी के नेतृत्व में
यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी से जुड़कर काम कर रहे तुषार वशिष्ठ और मैथ्यू
चेरियन भारत में योजना आयोग द्वारा पेश की गई आधिकारिक परिभाषा से इतने
(अ)प्रभावित हुए कि उन्होंने 32 रुपये रोजाना के खर्च में कुछ दिन गुजारने
का फैसला कर लिया।
इस देश में सदियों से गरीबों पर प्रयोग होते रहे हैं, लेकिन हाल में ही गरीबी पर किया गया प्रयोग अपने आप में विशिष्ट और देश के राजनेताओं, नौकरशाहों के सामने एक नजीर पेश करने वाला है। अमेरिका की दो नामी शिक्षण संस्थाओं से पढ़कर आए और नंदन निलेकनी के नेतृत्व में यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी से जुड़कर काम कर रहे तुषार वशिष्ठ और मैथ्यू चेरियन भारत में योजना आयोग द्वारा पेश की गई आधिकारिक परिभाषा से इतने (अ)प्रभावित हुए कि उन्होंने 32 रुपये रोजाना के खर्च में कुछ दिन गुजारने का फैसला कर लिया। सरकार ने शहर में 32 और गांव में 26 रुपये वाली जो गरीबी रेखा निर्धारित की है उसके संदर्भ में देश की इन दो मेधावी शख्सियतों ने व्यावहारिक परीक्षण करके देखा कि 26 या 32 रुपये प्रतिदिन में क्या एक नागरिक अपनी गुजर-बसर कर भी सकता है? इनका यह अद्वितीय प्रयोग पांच हफ्तों तक चला। अपनी जरूरतों में कटौती करने के उपरांत पहले हफ्ते में ये इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शहर में डेढ़ सौ रुपये प्रतिदिन से कम में एक व्यक्ति जीवन गुजार ही नहीं कर सकता। फिर दो हफ्तों के लिए इन दोनों ने अपने खर्चो में और कटौती की तो भी खर्चा सौ रुपये प्रतिदिन रहा। इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सौ रुपये रोज पर जीवन गुजारना बहुत मजबूरी भरा काम है। इसके बाद अगले दो हफ्तों के लिए इन्होंने अपने सभी खर्चो में कटौती कर दी और 32 रुपयों में जिंदा रहकर दिखाया। निष्कर्ष यह निकला कि शहरों में 32 रुपये में सिर्फ जिंदा रहने के लिए ही जिया जा सकता है। पांच हफ्तों के प्रयोग में इन्होंने यह जानने की कोशिश भी की कि गरीब लोग इससे भी कम आमदनी में कैसे जिंदा रहते होंगे? इनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि इंसान घनघोर गरीबी में भी जैसे-तैसे जीवित रह लेता है, पर उसकी शारीरिक और मानसिक ताकत इतनी कम हो जाती है कि खुद या अपने परिवार को गरीबी से निजात दिलाने के बारे में वह सोच भी नहीं पाता। इन्होंने अपने अनुभव से बताया कि शहरों में गरीबी की रेखा 120 से 150 रुपये रोज की आय पर निर्धारित होनी चाहिए तो गांवों में 90 से 110 रुपये के बीच। सरकार इनकी यह सिफारिश तो मानने से रही, पर इन्होंने जो किया है वह सराहनीय है। काश, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी कोई ऐसा ही प्रयोग करके देखते तो शायद समझ पाते कि गरीबी है क्या? मैं तो यह कहता हूं कि व्यावहारिक यह होगा कि इस रिपोर्ट को बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 965 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के अध्यक्ष हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इसी तरह व्यावहारिक रूप से एक बार शहर या गांव में इतने ही रुपयों में रहने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि रिपोर्ट बनाने और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। यह देश की विडंबना है कि इतने बड़े अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के होते हुए भी और इतनी चरम महंगाई को देखते हुए भी योजना आयोग द्वारा इस तरह कि रिपोर्ट बनाया गया। यह तो सरासर गरीब और गरीबों के साथ मजाक है । गरीबी पर किया गया यह प्रयोग आपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस प्रयोग को ऐसे दो लोगों ने किया जिन्होंने अपनी शिक्षा भी अमेरिका से प्राप्त की है। यह लोग काफी धनाड्य और साधन संपन्न भी हैं। यह उन लोगों के लिए एक नजीर है जो पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर गरीबों पर रिपोर्ट बनाते हैं और उसे सही ठहराने के लिए अपना तर्क भी देते हैं। गरीबी पर अध्ययन के लिए कई देशो की यात्राएं की जाती हैं और उन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। योजना आयोग ने महंगाई के बढ़ते बोझ से गरीबों की नई परिभाषा बनाई है। गांव में गरीब का घर रोजाना 26 रुपये में चलाने की बात करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का विदेश यात्राओं का रोजाना औसत खर्च है 11354 रुपये। योजना आयोग ने एक आरटीआइ के जवाब में यह बताया कि अहलूवालिया ने पांच साल में जुलाई 2006 से जुलाई 2011 तक सरकारी खर्च पर 35 बार विदेश यात्रा पर गए। इन यात्राओं में उन पर कुल 2 करोड 4 लाख 36 हजार 825 रुपये का खर्च आया। रोजाना औसतन विदेश यात्रा पर 11354 रुपये खर्च करने वाले योजना आयोग के हमारे उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया आखिर गरीबों का दर्द समझें भी कैसे जबकि उन्हें इसका कोई अनुभव ही नहीं है और न ही वह ऐसा प्रयोग ही चाहते हैं। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है। आज लगभग हर क्षेत्र में भारत अच्छी तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इतनी तरक्की होने के बावजूद भारत आज भी गरीब राष्ट्रों में गिना जाता है तो इसके लिए आखिर दोष किसका है? आर्थिक तरक्की से जहां देश का अमीर वर्ग और भी अमीर हुआ है तो गरीब वर्ग लगातार गरीब होता जा रहा है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है। इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है की गरीबी का पूर्ण उन्मूलन करने के लिए प्रयास किया जाए। आज जीडीपी के आंकड़े सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। असल में तो आज भी झुग्गी झोपडी में रहने वाले लोग 40 से 50 रुपये रोजाना कमाते हैं। उनका जीवन स्तर काफी निम्न है। उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाए। तमाम वैश्विक संस्थाएं जैसे विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करते हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंच पाता। इस कारण उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। गरीबी से निपटने के लिए सबसे पहले सरकार को भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा तभी सही मायने में गरीबी का उन्मूलन होगा। इसके लिए सरकार के साथ-साथ जनता का भी फर्ज बनता है कि अपनी कमाई का छोटा सा हिस्सा गरीबों को दें। तभी भारत सही मायने में विकसित देश बन सकेगा। हमारे देश में नेताओं और नौकरशाहों की संवेदनशीलता व जवाबदेही लगता है खत्म हो चुकी है नहीं तो इतनी शर्मनाक रिपोर्ट शायद ही आती जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। वास्तव में इस रिपोर्ट का असली मकसद सस्ते दर पर वितरित किए जाने वाले अनाज की मात्रा को कम करना है। जब योजना आयोग के ऐसे इरादे हों तो फिर किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जो खाद्य सुरक्षा विधेयक चर्चा में है, वह आम आदमी का भला करने वाला है।
शशांक द्विवेदी
इस देश में सदियों से गरीबों पर प्रयोग होते रहे हैं, लेकिन हाल में ही गरीबी पर किया गया प्रयोग अपने आप में विशिष्ट और देश के राजनेताओं, नौकरशाहों के सामने एक नजीर पेश करने वाला है। अमेरिका की दो नामी शिक्षण संस्थाओं से पढ़कर आए और नंदन निलेकनी के नेतृत्व में यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी से जुड़कर काम कर रहे तुषार वशिष्ठ और मैथ्यू चेरियन भारत में योजना आयोग द्वारा पेश की गई आधिकारिक परिभाषा से इतने (अ)प्रभावित हुए कि उन्होंने 32 रुपये रोजाना के खर्च में कुछ दिन गुजारने का फैसला कर लिया। सरकार ने शहर में 32 और गांव में 26 रुपये वाली जो गरीबी रेखा निर्धारित की है उसके संदर्भ में देश की इन दो मेधावी शख्सियतों ने व्यावहारिक परीक्षण करके देखा कि 26 या 32 रुपये प्रतिदिन में क्या एक नागरिक अपनी गुजर-बसर कर भी सकता है? इनका यह अद्वितीय प्रयोग पांच हफ्तों तक चला। अपनी जरूरतों में कटौती करने के उपरांत पहले हफ्ते में ये इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शहर में डेढ़ सौ रुपये प्रतिदिन से कम में एक व्यक्ति जीवन गुजार ही नहीं कर सकता। फिर दो हफ्तों के लिए इन दोनों ने अपने खर्चो में और कटौती की तो भी खर्चा सौ रुपये प्रतिदिन रहा। इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सौ रुपये रोज पर जीवन गुजारना बहुत मजबूरी भरा काम है। इसके बाद अगले दो हफ्तों के लिए इन्होंने अपने सभी खर्चो में कटौती कर दी और 32 रुपयों में जिंदा रहकर दिखाया। निष्कर्ष यह निकला कि शहरों में 32 रुपये में सिर्फ जिंदा रहने के लिए ही जिया जा सकता है। पांच हफ्तों के प्रयोग में इन्होंने यह जानने की कोशिश भी की कि गरीब लोग इससे भी कम आमदनी में कैसे जिंदा रहते होंगे? इनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि इंसान घनघोर गरीबी में भी जैसे-तैसे जीवित रह लेता है, पर उसकी शारीरिक और मानसिक ताकत इतनी कम हो जाती है कि खुद या अपने परिवार को गरीबी से निजात दिलाने के बारे में वह सोच भी नहीं पाता। इन्होंने अपने अनुभव से बताया कि शहरों में गरीबी की रेखा 120 से 150 रुपये रोज की आय पर निर्धारित होनी चाहिए तो गांवों में 90 से 110 रुपये के बीच। सरकार इनकी यह सिफारिश तो मानने से रही, पर इन्होंने जो किया है वह सराहनीय है। काश, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी कोई ऐसा ही प्रयोग करके देखते तो शायद समझ पाते कि गरीबी है क्या? मैं तो यह कहता हूं कि व्यावहारिक यह होगा कि इस रिपोर्ट को बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 965 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के अध्यक्ष हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इसी तरह व्यावहारिक रूप से एक बार शहर या गांव में इतने ही रुपयों में रहने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि रिपोर्ट बनाने और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। यह देश की विडंबना है कि इतने बड़े अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के होते हुए भी और इतनी चरम महंगाई को देखते हुए भी योजना आयोग द्वारा इस तरह कि रिपोर्ट बनाया गया। यह तो सरासर गरीब और गरीबों के साथ मजाक है । गरीबी पर किया गया यह प्रयोग आपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस प्रयोग को ऐसे दो लोगों ने किया जिन्होंने अपनी शिक्षा भी अमेरिका से प्राप्त की है। यह लोग काफी धनाड्य और साधन संपन्न भी हैं। यह उन लोगों के लिए एक नजीर है जो पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर गरीबों पर रिपोर्ट बनाते हैं और उसे सही ठहराने के लिए अपना तर्क भी देते हैं। गरीबी पर अध्ययन के लिए कई देशो की यात्राएं की जाती हैं और उन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। योजना आयोग ने महंगाई के बढ़ते बोझ से गरीबों की नई परिभाषा बनाई है। गांव में गरीब का घर रोजाना 26 रुपये में चलाने की बात करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का विदेश यात्राओं का रोजाना औसत खर्च है 11354 रुपये। योजना आयोग ने एक आरटीआइ के जवाब में यह बताया कि अहलूवालिया ने पांच साल में जुलाई 2006 से जुलाई 2011 तक सरकारी खर्च पर 35 बार विदेश यात्रा पर गए। इन यात्राओं में उन पर कुल 2 करोड 4 लाख 36 हजार 825 रुपये का खर्च आया। रोजाना औसतन विदेश यात्रा पर 11354 रुपये खर्च करने वाले योजना आयोग के हमारे उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया आखिर गरीबों का दर्द समझें भी कैसे जबकि उन्हें इसका कोई अनुभव ही नहीं है और न ही वह ऐसा प्रयोग ही चाहते हैं। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है। आज लगभग हर क्षेत्र में भारत अच्छी तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इतनी तरक्की होने के बावजूद भारत आज भी गरीब राष्ट्रों में गिना जाता है तो इसके लिए आखिर दोष किसका है? आर्थिक तरक्की से जहां देश का अमीर वर्ग और भी अमीर हुआ है तो गरीब वर्ग लगातार गरीब होता जा रहा है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है। इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है की गरीबी का पूर्ण उन्मूलन करने के लिए प्रयास किया जाए। आज जीडीपी के आंकड़े सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। असल में तो आज भी झुग्गी झोपडी में रहने वाले लोग 40 से 50 रुपये रोजाना कमाते हैं। उनका जीवन स्तर काफी निम्न है। उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाए। तमाम वैश्विक संस्थाएं जैसे विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करते हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंच पाता। इस कारण उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। गरीबी से निपटने के लिए सबसे पहले सरकार को भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा तभी सही मायने में गरीबी का उन्मूलन होगा। इसके लिए सरकार के साथ-साथ जनता का भी फर्ज बनता है कि अपनी कमाई का छोटा सा हिस्सा गरीबों को दें। तभी भारत सही मायने में विकसित देश बन सकेगा। हमारे देश में नेताओं और नौकरशाहों की संवेदनशीलता व जवाबदेही लगता है खत्म हो चुकी है नहीं तो इतनी शर्मनाक रिपोर्ट शायद ही आती जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। वास्तव में इस रिपोर्ट का असली मकसद सस्ते दर पर वितरित किए जाने वाले अनाज की मात्रा को कम करना है। जब योजना आयोग के ऐसे इरादे हों तो फिर किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जो खाद्य सुरक्षा विधेयक चर्चा में है, वह आम आदमी का भला करने वाला है।
शशांक द्विवेदी
शनिवार, 19 नवंबर 2011
मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....
मर्यादा जीवन भर
पूजी, बदले मे वनवास मिला...
बड़ी सती थी
जिसको कहते जग का तब उपहास मिला...
शिव का आधा अंग
बनी, पर बदले मे थी आग मिली...
सत्यमूर्ति बन
भटक रहा था, बुझी पुत्र की साँस मिली...
इंद्रिय सारी
जीत चुका था, उसको पुत्र वियोग मिला...
विष प्याला
उपहार मिला था कृष्ण भक्ति का जोग लिया...
दानवीर, आदर्श
सखा, पर छल से था वो वधा गया...
ज्ञान मूर्ति इक
संत का शव भी, था शैय्या पर पड़ा रहा...
धर्म हेतु उपदेश
दिया पर पूरा वंश विनाश मिला...
हरि के थे जो
मात पिता उनको क्यूँ कारावास मिला...
मात पिता का
बड़ा भक्त था, बाणों का आघात हुआ...
ऐसे ही ना जाने
कितने अच्छे जन का ह्रास हुआ....
थे ऐसे भी जो
पाप कर्म की परिभाषा का अर्थ बने...
जो अच्छाई को
धूल चटाते, धर्म अंत का गर्त बने...
जो अत्याचार
मचाते थे, दूजो की पत्नी लाते थे...
वो ईश के हाथों
मरते थे, फिर परम गति को पाते थे...
अब ये बतलाओ
सत्य बोल मैं कौन सा सुख पा जाऊँगा...
मैं धर्म राह पे
चला अगर,दुख कष्ट सदा ही पाऊँगा...
नाम अमरता नही
चाहिए, चयन सुखों का करता हूँ...
मैं अच्छा कैसे
बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....
धर्म गुरुओं का लीप लॉक
चुंबन से आत्मिक प्रेम बढेगा और धर्मगुरु एक दूसरे धर्म के बारे में गलत
बातें कम फैलाएंगे। इसमें उन्हें किसी प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी,
क्योंकि पुरुष धर्मगुरु दूसरे पुरुष के होठ चुसेंगे। लेकिन डर लगता है
कि यदि बाबा रामदेव किसी का होठ चुसेंगे, तो उन पर क्या गुजरेगी।
आजकल सभी फिल्मों में लीप लॉक अनिवार्य सा हो गया है। कोई भी फिल्म इसके बिना हिट नहीं होती है। यह बात हमारे धर्म गुरु को भी अच्छी लगी। इस समय हालात ये हैं कि उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा है। अपनी चर्चा के लिए उन्होंने लीप लॉक का हिट फिल्मी फार्मूला अपनाया। यह सीन काफी हिट रहा और यूरोपीय देशों में एक इतालवी कंपनी के ' अनहेट ' सीरीज के विज्ञापन इधर कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं। इनमें एक - दूसरे से तीखी घृणा के लिए पहचाने जाने वाले लोगों को - जो प्राय : पुरुष ही हैं - फोटोशॉप के जरिये तैयार की गई नकली तस्वीरों में एक - दूसरे को होंठों पर चूमते दिखाया गया है। कुछेक पश्चिमी और कुछ अरबी समाजों में मुलाकात के वक्त गाल से गाल सटाने की परंपरा है। जब - तब भावातिरेक में लोग एक - दूसरे को गाल पर चूम लेते हैं , लेकिन होठों पर चुंबन का वहां एक स्पष्ट सांस्कृतिक संदर्भ है। ईसाई परंपरा में पति अपनी नवविवाहिता पत्नी को सार्वजनिक रूप से सिर्फ एक बार होंठों पर चूमता है। बाकी सभी संदर्भों में होठों पर चुंबन निजी दायरे की चीज समझी जाता है और इसे यौन संसर्ग के एक हिस्से की तरह देखा जाता है। स्वाभाविक था कि यूरोप में इस पूरी सीरीज पर , और खासकर इसकी उस तस्वीर पर तीखी प्रतिक्रिया देखी गई , जिसमें मौजूदा पोप को मिस्र के एक कट्टरपंथी मौलवी के साथ होंठ से होंठ मिलाए दिखाया गया था। लोगों के विरोध से विज्ञापन जारी करने वाली कंपनी बुरी तरह डर गई और उसने अनहेट सीरीज से इस तस्वीर को हटा देने का फैसला कर लिया। लेकिन इस सीरीज के बाकी सारे हिस्से आज भी ज्यों के त्यों हैं। विज्ञापन की नई थ्योरी में चर्चित होना ही सब कुछ समझा जाता है , भले ही चर्चा की वजह सही हो या गलत। लेकिन विज्ञापन बनाने वालों में सबसे ज्यादा शातिर लोग अपनी चर्चा के फॉर्म्युले में कोई फिलॉसफिकल एंगल भी जोड़ना चाहते हैं , ताकि उनके प्रॉडक्ट के बारे में होने वाली बात ज्यादा दीर्घजीवी हो सके। मसलन , अनड्रेस ( निर्वस्त्र होने ) की तर्ज पर बनाए गए शब्द अनहेट को इसके साथ छपने वाली तस्वीरों से जोड़कर देखें तो एकबारगी ऐसी गफलत हो सकती है कि इसमें लोगों से एक - दूसरे के प्रति जाति , नस्ल , धर्म आदि पर आधारित घृणा को छोड़कर विश्वशांति की तरफ बढ़ने की अपील की गई है। कहना कठिन है कि शांति के ऐसे चाकलेटी फॉर्म्युले लोगों को करीब लाते हैं , या उन्हें खिझाकर एक - दूसरे से और ज्यादा दूर धकेल देते हैं।मुझे तो लगता है कि इससे लोग काफी करीब आएंगे। क्योंकि चुंबन से आत्मिक प्रेम बढेगा और धर्मगुरु एक दूसरे धर्म के बारे में गलत बातें कम फैलाएंगे। इसमें उन्हें किसी प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी, क्योंकि पुरुष धर्मगुरु दूसरे पुरुष के होठ चुसेंगे। लेकिन डर लगता है कि यदि बाबा रामदेव किसी का होठ चुसेंगे, तो उन पर क्या गुजरेगी।
आजकल सभी फिल्मों में लीप लॉक अनिवार्य सा हो गया है। कोई भी फिल्म इसके बिना हिट नहीं होती है। यह बात हमारे धर्म गुरु को भी अच्छी लगी। इस समय हालात ये हैं कि उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा है। अपनी चर्चा के लिए उन्होंने लीप लॉक का हिट फिल्मी फार्मूला अपनाया। यह सीन काफी हिट रहा और यूरोपीय देशों में एक इतालवी कंपनी के ' अनहेट ' सीरीज के विज्ञापन इधर कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं। इनमें एक - दूसरे से तीखी घृणा के लिए पहचाने जाने वाले लोगों को - जो प्राय : पुरुष ही हैं - फोटोशॉप के जरिये तैयार की गई नकली तस्वीरों में एक - दूसरे को होंठों पर चूमते दिखाया गया है। कुछेक पश्चिमी और कुछ अरबी समाजों में मुलाकात के वक्त गाल से गाल सटाने की परंपरा है। जब - तब भावातिरेक में लोग एक - दूसरे को गाल पर चूम लेते हैं , लेकिन होठों पर चुंबन का वहां एक स्पष्ट सांस्कृतिक संदर्भ है। ईसाई परंपरा में पति अपनी नवविवाहिता पत्नी को सार्वजनिक रूप से सिर्फ एक बार होंठों पर चूमता है। बाकी सभी संदर्भों में होठों पर चुंबन निजी दायरे की चीज समझी जाता है और इसे यौन संसर्ग के एक हिस्से की तरह देखा जाता है। स्वाभाविक था कि यूरोप में इस पूरी सीरीज पर , और खासकर इसकी उस तस्वीर पर तीखी प्रतिक्रिया देखी गई , जिसमें मौजूदा पोप को मिस्र के एक कट्टरपंथी मौलवी के साथ होंठ से होंठ मिलाए दिखाया गया था। लोगों के विरोध से विज्ञापन जारी करने वाली कंपनी बुरी तरह डर गई और उसने अनहेट सीरीज से इस तस्वीर को हटा देने का फैसला कर लिया। लेकिन इस सीरीज के बाकी सारे हिस्से आज भी ज्यों के त्यों हैं। विज्ञापन की नई थ्योरी में चर्चित होना ही सब कुछ समझा जाता है , भले ही चर्चा की वजह सही हो या गलत। लेकिन विज्ञापन बनाने वालों में सबसे ज्यादा शातिर लोग अपनी चर्चा के फॉर्म्युले में कोई फिलॉसफिकल एंगल भी जोड़ना चाहते हैं , ताकि उनके प्रॉडक्ट के बारे में होने वाली बात ज्यादा दीर्घजीवी हो सके। मसलन , अनड्रेस ( निर्वस्त्र होने ) की तर्ज पर बनाए गए शब्द अनहेट को इसके साथ छपने वाली तस्वीरों से जोड़कर देखें तो एकबारगी ऐसी गफलत हो सकती है कि इसमें लोगों से एक - दूसरे के प्रति जाति , नस्ल , धर्म आदि पर आधारित घृणा को छोड़कर विश्वशांति की तरफ बढ़ने की अपील की गई है। कहना कठिन है कि शांति के ऐसे चाकलेटी फॉर्म्युले लोगों को करीब लाते हैं , या उन्हें खिझाकर एक - दूसरे से और ज्यादा दूर धकेल देते हैं।मुझे तो लगता है कि इससे लोग काफी करीब आएंगे। क्योंकि चुंबन से आत्मिक प्रेम बढेगा और धर्मगुरु एक दूसरे धर्म के बारे में गलत बातें कम फैलाएंगे। इसमें उन्हें किसी प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी, क्योंकि पुरुष धर्मगुरु दूसरे पुरुष के होठ चुसेंगे। लेकिन डर लगता है कि यदि बाबा रामदेव किसी का होठ चुसेंगे, तो उन पर क्या गुजरेगी।
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