मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कुत्ता और आदमी का संवाद

आजकल, कुत्ते भी कई प्रकार के हो गये हैं! जर्मन, अमेरिकी और न जाने किस नस्ल और जाति के हो गये हैं! आदमी के कितने जात हैं, यह तो लगभग सबको याद हो ही गया है! इसमें नेतवा का बडा रोल हो गया है! आए दिन चुनाव में हर जाति का नया नेता बनकर आ रहा है और अपनी जाति के गरीबी का बखान कर रहा है! बिहार में ही देखिए न, मांझी कह रहा है कि हम डोम हैं, इसी कारण बिहार के सीएम से हटाया जा रहा है! उस ससुरा को आखिर में नीतिो न बैठाया था!नीतिा बोला तो हट जाता, लेकिन नहीं!समझ में नहीं आता है ई आदमी रूपी कुत्ता का कौन सा नस्ल है!लगता है बौरा गया है! अक्षय कुमार की फिल्म इंटरटेनमेंट में यही दिखाया था कि आदमी बेबफा हो सकता है, लेकिन कुत्ता हमेाा वफादार होता है! यह सही भी है! जो दो रोटी खिला देगा, उसी का हो जाता है! आदमी को देखो,उसे तो कुत्ता भी नहीं कहा जा सकता है! साला जिस थाली में खाता है, उसी में छेद करता है!आजकल के आदमी के व्यवहार से कुत्ता भी ’ारमा जाएगा कि इसे किस जाति में रखूं! किस जाति का है, यह तो अब याद हो गया है!  मैं उनकी बातों से आचर्य में पड गया कि आदमी भी कहीं कुत्ता होता है! लेकिन उसकी बातों से आवस्त हो गया कि यह सही कह रहा है! राजनीतिक समझ देखकर लगा कि ये बडे ज्ञानी हैं! इन्हीं समझ को देखकर किसी ने सही ही कहा था कि यूपी और बिहार में धर्म और राजनीति खून में बसा हुआ है!

कुछ दिनों पहले आफिस से घर जा रहा था,तो रास्ते में देखा कि एक कूडा फेंकनेवाला और कुत्ता आपस में लड रहा था! मैं यह वाकया दूर से देख रहा था! इस कारण इस घटना के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं हो पा रही थी! जिज्ञासाव मैं उस जगह पर पहुंचा तो देखकर सोच में पड गया! मैं सोचने लगा कि आखिर इन दोनों में लडाई क्यों हो रही है! दोनों लड रहे थे! मैं वहां से निकलना ही उचित समझा और अपने काम में मन लगाने लगा,लेकिन हमेवही वाकया सामने आ जाता था! इस कारण काफी परेाान रहने लगा! जब मैं दसवीं में था, तो भिक्षुक कविता चाट रहे हैं जूठी पत्तल, कभी सडक पर अडे हुए और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं खडे हुए, पढा था! मुझे लगा कि यही हालात यहां हैं, लेकिन उसमें तो कवि ने भिक्षुक का वर्णन किया था कि कुत्ते का जो हिस्सा था, वह भिक्षुक खा रहा था! इसी कारण कुत्ता लडाई कर रहा था! यहां कुडा वाला कुत्ता का अन्न फेंक रहा था! इस कारण लडाई चल रही थी! यही सोचते सोचते मैं कब सो गया,पता नहीं चला! एकाएक भगवान आ गये और हमसे पूछ बैठे कि बोलो तुम्हें क्या वरदान चाहिए! मैंने झट से मांग लिया कि मुझे कुत्ता का लैंग्वेज समझने का वरदान दो! वे एवमस्तु कहकर चले गये! मैं उसी कुत्ता को ढुंढने लगा जो कूडावाला से लडाई किया था! दो दिनों तक परेाान रहा, वह कुत्ता नहीं मिला! एक दिन उस कूडावाला से मुलाकात हो गयी! मुझे लगा कि वह बता देगा, उस कुत्ता के बारे में! लेकिन उसने कहा कि रोज इस तरह के घटना होते रहते हैं! कभी आदमी रूपी कुत्ते से तो स्वयं कुत्ता से मिलन होता ही रहता है!अगर इन सबका लिस्ट लिखने लगूं तो कभी सुबह नहीं हो पाएगा! वैसे, जिज्ञासावा उन्होंने यह पूछा कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम किस कुत्ते की बात कर रहे हो! भाई, आजकल, कुत्ते भी कई प्रकार के हो गये हैं! जर्मन, अमेरिकी और न जाने किस नस्ल और जाति के हो गये हैं! आदमी के कितने जात हैं, यह तो लगभग सबको याद हो ही गया है! इसमें नेतवा का बडा रोल हो गया है! आए दिन चुनाव में हर जाति का नया नेता बनकर आ रहा है और अपनी जाति के गरीबी का बखान कर रहा है! बिहार में ही देखिए न, मांझी कह रहा है कि हम डोम हैं, इसी कारण बिहार के सीएम से हटाया जा रहा है! उस ससुरा को आखिर में नीतिो न बैठाया था!नीतिा बोला तो हट जाता, लेकिन नहीं!समझ में नहीं आता है ई आदमी रूपी कुत्ता का कौन सा नस्ल है!लगता है बौरा गया है! अक्षय कुमार की फिल्म इंटरटेनमेंट में यही दिखाया था कि आदमी बेबफा हो सकता है, लेकिन कुत्ता हमेाा वफादार होता है! यह सही भी है! जो दो रोटी खिला देगा, उसी का हो जाता है! आदमी को देखो,उसे तो कुत्ता भी नहीं कहा जा सकता है! साला जिस थाली में खाता है, उसी में छेद करता है!आजकल के आदमी के व्यवहार से कुत्ता भी ’ारमा जाएगा कि इसे किस जाति में रखूं! किस जाति का है, यह तो अब याद हो गया है!  मैं उनकी बातों से आचर्य में पड गया कि आदमी भी कहीं कुत्ता होता है! लेकिन उसकी बातों से आवस्त हो गया कि यह सही कह रहा है! राजनीतिक समझ देखकर लगा कि ये बडे ज्ञानी हैं! इन्हीं समझ को देखकर किसी ने सही ही कहा था कि यूपी और बिहार में धर्म और राजनीति खून में बसा हुआ है! मैं पूछना ही चाह रहा था कि उसका रेडियो फिर से आन हो गया और आकाावाणी की तरह सामाचार वाचन करने लगा! क्या कहते हो साहब, हमारा बास कुत्ता से भी बदतर है! कुत्ता तो एक बार ही परेाान करता है और उसके बाद भूल जाता है! लेकिन आदमी रूपी कुत्ता आपको जिंदगी भर परेाान करता रहता है! आप ही बताइये न कि कूडा फेंकना कितना टफ काम है, उसपर यह बाWस हमेाा यह हिसाब लगाता है कि उसमें कितने बोदका के बोतल थे, कितने बिसलरी और कितने रम के! और कितने पाWलीथिन थे! आप ही बताइये कि दिनभर कूडा उठाने के बाद दो चार बोतल मिलता है, उस पर भी इस बाWस का नजर रहता है!साला अपना पाWलीथिन पीता है और लोगों से अपेक्षा रखता है कि वह बोदका पीए और उस बोतल को कूडा में फेंक दे! बताइये न आज का दारूबाज इतना बेबकूफ है क्या! वह पीता तो है, लेकिन बोतल उसकी बीवी संभालकर रख लेती है! सोचती है कि इससे कुछ पैसे मिल जाएंगे! महीने भर में वह दस से बीस रूपया तो कमा ही लेती है!
एक बार तो गजब हो गया सर जी! मेरे बाWस का भाई आर्मी में है! कुछ दिनों पहले वह अपने भाई का चार बोतल चूरा लिया और सबको बताने लगा कि मेरा स्टैंडर्ड बढ गया है, क्योंकि मैं पाWलीथिन नहीं पीता हूं! और एक दिन पीकर बोल रहा था कि अब हमें क्या दिक्कत है! घर में मेरी बीवी भी कमाती है! हमलोगों को भी उस दिन खूब पिलाया! हमने पूछा कि सर जी भाभी क्या करती है, तो बोला कि तुम्हें समझ में नहीं आएगा, क्योंकि वह स्वरोजगार करती है! स्वरोजगार पर पूरा डाWयलाWग दिया! सही में हमलोगों को कुछ समझ में नहीं आया! यही समझ में आया कि स्वरोजगार का मतलब खुद का रोजगार होता है! हमने पूछा कि उसकी बीवी कौन सी रोजगार करती है! भक, रोजगार का करेगी गंवारू की पत्नी!तापका से कूडावला मुझे झल्लाते हुए बोला!वही दो चार बोतल जो बेचकर पैसा कमायी थी, उसी को वह स्वरोजगार कह रहा था! इतना कमीना है कि उसका भी पैसा नहीं छोडा! पी गया साला! क्या आप इसे आदमी कहेंगे! मैं भी उसकी बातों में इतना मागूल हो गया कि भूल गया कि हमें उस कुत्ता को खोजना है! जब मैं फिर उस कुत्ता के बारे में पूछा तो बोला कि आप आधे हैं या आप भी लेते हैं! दो चार गंदी गाली मुझे दिया और चला गया! इतना ही सुन पाया कि बेकार का टाइम खा रहा है साला! अंत में हमने यही सोचा कि इससे मुंह लगाना बेहतर नहीं है! और मैं कुत्ता खोजने में व्यस्त हो गया! अपना पूरा अनुभव लगा दिया, तब कहीं कुत्ता से मुलाकात हो पायी! उनसे बातचीत का प्रमुख अंा है

 आप कहां चले गये थे! मैं आपको चार दिनों से ढूंढ रहा हूं!

 आपको हम जैसे आम कुत्तों की कैसे याद आ गयी एकाएक!बिना काम के तो आप किसी को पहचानते नहीं है और न ही बिना स्वार्थ के किसी को अपने घर में रखते हैं! पहले अपना काम बताइये कि आप मुझसे क्या चाहते हैं!भाई आजकल आप लोगों का नेचर इस तरह बदल रहा है कि नेचर को भी समझ में नहीं आता है कि माजरा क्या है!हमारे दादा बताते थे कि व्यक्ति का नेचर और सिग्नेचर कभी नहीं बदलता है! लेकिन आजकल दोनों बदल रहा है! डिजिटल सिग्नेचर के बावजूद रोज एक दूसरे के नाम पर घपले हो रहे हैं! जिसका सही में सिग्नेचर है,उसे भगा दिया जाता है और जो फर्जी है, उसे उसका हक मारने के लिए सबकुछ दे दिया जाता है! नेचर के बारे में कुछ कहना ही बैमानी है! अब तो अमीर घर की लडकी सुंदर कुत्ते पर भी डोरे डालने लगी है! धन्य है भारत और धन्य है भारत के लोग! जहां तक मेरा सवाल है, तो मैं चार दिनों के लिए बाहर चला गया था! इस कारण आपसे मुलाकात नहीं हो पाई! बताइये क्या काम था आपको मुझ जैसे आम कुत्ते से! वैसे यदि आप आम कुत्ता पार्टी बनाना चाहते हैं, तो मैं आपको इस मामले में काफी सहयोग कर सकता हूं! लेकिन पद और पैसे मिलेंगे, तभी यह वर्क कर पाउंगा! वैसे यह आपको आवस्त करना चाहता हूं कि यदि मैं आपके साथ जुट गया तो गली मुहल्ले के सभी कुत्ते आपके साथ हो जाएंगे!भ्ज्ञले ही सभी कुत्ते वोट न दे पाए, लेकिन रोड ’ाो में इतनी भीड रहेगी कि टीवी पर सिर्फ आप और आपकी भीड ही दिखेगी और हो सकता है कि कुछ बाजारू सर्वे आपको जीतते हुए भी बोल दे!!   

 आप आम आदमी को ओवरस्टीमेट तो नहीं कर रहे हैं
  सर जी हमलोग भी खास आदमी के पास रहते हैं! वहां आम आदमी के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है, वह रोज देखता हूं!कभी कभी तो सोच में पड जाता हूं कि आम आदमी के दिल पर क्या गुजरता होगा,जब उसे आदमी की तरह सलूक न किया जाता है! हाल ही में दिल्ली चुनाव में आम आदमी के साथ जिस तरह का सलूक किया गया, उसे देखकर तो दंग रह गया हूं! आपने देखा कि हमारे पीएम उन्हें क्या नहीं कह गए और कई केसों में फंसाने लगे! भला हो केजरीवाल का कि वह आम आदमी नहीं था! अगर वह आम आदमी होता तो न जाने कब का इतिहास बन जाता! वैसे भी हममें और आप लोगों में कोई अंतर नहीं रह गया है! सभी जगह फूट डालो और राज करो की नीति ही चल रहा है! यदि ऐसा नहीं होता तो आदमी के कहने पर कहीं एक कुत्ता दूसरे कुत्ता को काटता और भौंकता है! वही हाल आम आदमी का है! जो नेता बोलता है, वही आदमी करता है! फिर भी हम कहते हैं कि ज्ञानी मानव हैं!


मोसेरा भाई क्या होता है

मोसेरा भाई क्या होता है

अस्मित गांव में रहता था! उसके पापा टीचर थे!इस कारण उसकी परवरिा अच्छी तरीके से हुई! इकलौता बेटा होने के कारण उसकी पढाई के लिए काफी पैसे खर्च किए गए! उसकी मां भी इकलौती थी!  अस्मित जब पांच साल का था, तभी उसका एडमिान बोर्डिंग स्कूल में कर दिया गया और वह हास्टल में ही रहने लगा! होनहार की तरह वह बचपन से ही मेधावी था और मां व पिताजी का सपना साकार करने के लिए तैयार रहता था! अस्मित को पढने में डिस्टर्बेंस न हो, इसके लिए वे दोनों सभी से रिलेान तोड चुके थे!कुछ साल बाद स्कूल में पढाई अच्छी तरीके से नहीं हो रही थी! इस कारण अस्मित के पापा उन्हें घर पर ही रखने लगे और वे सारी सुविधाएं उन्हें दिए, जो उस समय उन्हें मिलनी चाहिए! एक दिन वह अपनी मां से यह पूछ बैठा कि मम्मी, मोसेरा भाई क्या होता है! उसकी मां उन्हें बताई कि मां की बहन का जो बेटा होता है, उसे ही मेासेरा भाई कहा जाता है!उत्सुकतावा बालक ने पूछा कि आपकी बहन क्यों नहीं है! मम्मी हंसने लगी और बोली कि यह सवाल नाना से पूछो!बात आई और गयी हो गई!उस दिन के बाद से अस्मित कभी भी इस तरह का प्रन अपनी मम्मी से नहीं किया! लेकिन उसकी मम्मी उस दिन से काफी परेाान रहने लगी और सोचने लगी कि यदि इसी तरह की व्यवस्था रही तो सौ साल बाद मोसेरा भाई खोजने पर भी नहीं मिलेगा! मोसेरा भाई किताब की ’ाोभा ही बढाएगा और उसे बताने वाले भी किताब पढकर बताएंगे! जैसे इस समय इंटरनेट आने से लेटर लिखना भूल गया है! 

संबंधों का मकडजाल

संबंधों का मकडजाल भी कितना भयानक होता है! अगर आप अपने रिलेटिव से बिना पैसे के प्यार से मिलते हैं, तो वे आपको इग्नोर करते हैं! इसके उलट अगर आप पैसे के साथ मिलते हैं, तो अहसास ही दूसरा होता है! इग्नोर का अहसास रूह से महसूस होता है, जबकि दूसरा अहसास बडा आदमी होने का दंभ भरता है! दोनों के अपने तर्क हैं! कोई भी गलत नहीं है और कोई सही भी नहीं है! चाल्र्स मैके का सैम्पेथी ऐसे लोग के लिए बेकार है! जिसे खाने और इलाज करने के लिए पैसे नहीं हैं, उन्हें सिर्फ पैसा चाहिए, सैम्पेथी नहीं!~ इसलिए जो लोग उन्हें पैसा देते हैं, उन्हें वे सर पर बैठाते हैं! उस समय वे उनके लिए भगवान की तरह होते हैं! इस अहसास को पाने के लिए व्यक्ति कठिन मेहनत करता है और रात दिन पैसे कमाने के लिए वह सबकुछ करता है, जो उन्हें नहीं करना चाहिए! पैसे के लिए संबंधों का बलिदान भी उनके लिए संभव है! आचर्य तब होता है, जब आदमी पैसा कमाने के लिए अपने मां बाप को भी छोड देता है और जब काफी पैसे हो जाते हैं, उन्हें उनका बेटा छोड देता है! क्या बिना संबंध तोडे यह संभव नहीं है! आधुनिकता के इस युग में ’ाायद संभव नहीं है! यदि ऐसा होता तो बडे लोग इस तरह की हरकतें नहीं करते! जबकि एक रिटायर्ड अधिकारी को, जिनके सभी बच्चे विदेा में हैं और उन्हें उनके बच्चे अपनी हाल पर मरने के लिए छोड दिए हैं, उन्हें पैसा नहीं, सैम्पेथी चाहिए! एक पैसे के लिए परेाान हैं, तो दूसरा सैम्पेथी के लिए! दोनों यहीं हैं, लेकिन जरूरतमंद लोगों से दूर! कुछ ऐसे खुानसीब हैं, जिसे दोनों मिलता है, लेकिन उनकी उम बहुत कम होती है! इसी मकडजाल में न जाने कब जिंदगी की ’ााम हो जाए, पता नहीं चलता है.........

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

सुपरमैन वैभव

आजकल के बच्चे इतने इंटेलिजेंट होते हैं कि अगर उन्हें सही ’िाक्षा दी जाए तो सुपरमैन बन सकता है...

वैभव टीवी देख रहा था! कभी डोरे माम तो कभी कार्टून चैनल ही देखता था! अगर कोई पूछता कि तुम क्या बनना चाहते हो, तो तपाक से बोलता कि मैं सुपरमैन बनना चाहता हूं! उसके घर में सभी लोग काफी खु’ा हो जाते और दादा जी को समझ में नहीं आता कि इस बच्चे को कैसे आगे बढाया जाए! दरअसल,वे पुराने खयालात के आदमी थे! उनके समय में टीवी का प्रचलन नहीं था! रेडियो भी सभी के घरों में नहीं रहता था! जिसके घर में रेडियो रहता था, उसे अमीर और रसूखदार माना जाता था! जब किसी लडके की ’ाादी के बात होती थी, दहेज में रेडियो अव’य मांगा जाता था!
दादा जी कहते हैं कि उस समय इस तरह 24 घंटा न्यूज सुनने को नहीं मिलते थे, फिर भी हमलोगों को यह याद रहता था कि किस राज्य में किस दल की सरकार है और कौन इसका मुखिया है! वे कहते हैं कि आज का वातारण और सुविधा हमलोगों से भिन्न है, फिर आज का बच्चा उतना तेज नहीं हैं, जितना हमलोग हुआ करते थे! दादा जी अपने जमाने में बहुत तेज स्टूडेंट थे! उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और उनकी पढाई खेती पर निर्भर थी! कहते हैं कि उस समय कोई स्कूल का कपडा नहीं होता था! लोगों को पहनने के लिए कपडे तक नहीं होते थे और किसी तरह स्कूल जाते थे! आज का जमाना तो पूरी तरह बदल गया है! हमलोगों के समय में अंगzेजी स्कूल भी नहीं होता था, फिर भी अंगzेजी अच्छी थी और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज का बच्चा मुझसे बेहतर अंगzेजी न लिख सकता है और न ही बोल सकता है! खैर वह जमाना दूसरा था! फिर वह वैभव को समझाने लगे कि वैभव सुपर मैन कोई नहीं होता है, जो तुम बनना चाहते हो! बनना हो, तो आईएएस बनो, इंजीनियर बनो या डाWक्टर! मुझे इनमें से कुछ नहीं बनना है! बनना है तो सिर्फ सुपर मैन! समझे आप... सुपर मैन बनकर आपको आका’ा में लेकर उड जाउंगा और भगवान की पूजा आप रोज करते हैं, तो भगवान के पास पहुंचा दूंगा और फिर मम्मी को बहुत सारा सामान बाजार से खरीद दूंगा! दादा जी सीरियस हो गये और सोचने लगे कि सुपर मैन का यही अर्थ होता है ? यस दादा जी, सुपर मैन का मतलब ही यही होता है कि कोई भी काम उसके लिए असंभव नहीं हो! दादाजी अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए बोले कि यस सुपरमैन का मतलब यही होता है! इस कारण तुम पढकर आईएएस बन जाओ! इस पर तापाक से वैभव बोला कि हमारी उमz नहीं है अभी दादा जी आईएएस बनने का! उमz तो खेलने का है! दादी ने हमें यही बताई!उसका उत्तर सुनकर दादा और दादी दोनों खु’ा हो गये और एक साथ बोले कि मेरा पोता है सुपरमैन!

रविवार, 25 जनवरी 2015

एक संन्यासी को इस तरह के सम्मान से बचना चाहिए



आज न्यूज में देखा कि रजत ’ार्मा को भी सम्मान मिल गया! मुझे लगा कि मोदी साहब कुछ अलग करेंगे, लेकिन माफ करिएगा कि मुझे खराब लग रहा है! क्योंकि रजत ’ार्मा खुलेआम जेटली को दोस्त कबूल चुके हैं और इसका नजारा आप लोग भी इंडिया टीवी में देखे होंगे! फिर कल सुना कि बाबा रामदेव को सम्मान दिया गया, लेकिन वे लौटा दिए! सम्मान लौटाने के बाद मैं बाबा का मुरीद हो गया! यदि वे सम्मान ले लेते, तो उन्हें वो नहीं मिलता, जो उन्हें अब मिलेगा! सही कहा उसने कि एक संन्यासी को इस तरह के सम्मान से बचना चाहिए! सम्मान तो जनता का प्यार है, जो उसे मिल रहा है! काा रजत ’ार्मा भी एक उदाहरण पेा करते......

स्टीफन हाकिंस



 स्टीफन हाकिंस को ले सकते हैं, उन्हें किससे प्रेरणा मिलती है और उनका कौन मार्गदर्ाक बनता है ?उत्तर होगा कोई नहीं! क्योंकि स्टीफन हाकिंस जो भी कर रहे हैं, वे अपनी आत्मबल और खुद का अस्तित्व बचाने के लिए कर रहे हैं!मैं भी जब छोटा था, तो तालाब में नहाने के लिए दोस्तों के साथ जाते थे! पापा घर में डांटते थे कि तुम इसमें मत नहाओ! तुम्हें डूबने की आांका अधिक है, क्योंकि तुम ’ारीर से विकलांग हो! ल्ेकिन उस समय मुझे लग रहा था कि मैं भले ही ’ारीर से विकलांग दिखूं, लेकिन मैं वह सभी कर सकता हंू जो मेरे दोस्त कर रहे हैं! कहीं से मुझे कोई प्रेरणा देनेवाला नहीं था, कोई आगे बढानेवाला नहीं था और न ही रास्ता दिखानेवाला था!

 कल मैं टीवी पर एक न्यूज देख रहा था, उसमें यह दिखाया जा रहा था कि धनबाद की एक टीचर है, जिनके दोनों हाथ नहीं है! लेकिन अपनी जीवटता और उत्साह से टीचर हैं! वह पैरों से लिख रही है! देखकर आचर्य लगा और यह सोचने के लिए मजबूर हो गया कि इस तरह के लोग भी हैं, जमाने में जो आत्मबल के कारण आगे बढ रहे हैं! सोच रहा था कि आखिर यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें किससे प्रेरणा मिली होगी और उसे किस तरह का सपोर्ट मिला होगा? मैं अनुभव से यह कह सकता हूं कि इस तरह के लोगों को कोई सपोर्ट नहीं करता है! ये खुद ही सर्पोटर होते हैं और खुद ही संरक्षक भी! इन्हें भगवान से ऐसी ’ाक्ति मिली हुई होती है कि इन्हें किसी से प्रेरणा लेने की जरूरत नहीं पडती है, क्योंकि इस तरह का कारनामा करनेवाला वह पहला होता है और उसके पास इस तरह का कोई अनुभव नहीं होता है! उदाहरण के लिए स्टीफन हाकिंस को ले सकते हैं, उन्हें किससे प्रेरणा मिलती है और उनका कौन मार्गदर्ाक बनता है ?उत्तर होगा कोई नहीं! क्योंकि स्टीफन हाWकिंस जो भी कर रहे हैं, वे अपनी आत्मबल और खुद का अस्तित्व बचाने के लिए कर रहे हैं!मैं भी जब छोटा था, तो तालाब में नहाने के लिए दोस्तों के साथ जाते थे! पापा घर में डांटते थे कि तुम इसमें मत नहाओ! तुम्हें डूबने की आांका अधिक है, क्योंकि तुम ’ारीर से विकलांग हो! ल्ेकिन उस समय मुझे लग रहा था कि मैं भले ही ’ारीर से विकलांग दिखूं, लेकिन मैं वह सभी कर सकता हंू जो मेरे दोस्त कर रहे हैं! कहीं से मुझे कोई प्रेरणा देनेवाला नहीं था, कोई आगे बढानेवाला नहीं था और न ही रास्ता दिखानेवाला था! खुद ही संरक्षक था और खुद ही मार्गदर्ाक! इसका मतलब यह नहीं कि परिवार वाले मेरे सपोर्टर नहीं थे और मेरी अच्छी देखभाल नहीं हो रही थी! बल्कि मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मुझे अन्य भाई बहनों से अधिक प्यार मिलता था और अच्छी सुविधा भी, जिसका मैंने काफी उपयोग किया! परिवार का सपोर्ट ही था कि मुझे पंदzह साल तक यह पता नहीं चला कि मैं विकलांग हूं और यह काम नहीं कर सकता हूं! जब मुझे इसका अहसास हुआ, तो उसके बाद हमेाा मेरे लिए स्पीड बzेकर का काम किया! बचपन में अनजाने में ही हमने वे कारनामे कर दिए, जो अब सोचता हूं,तो असंभव लगता है!

मैं दोस्तों के साथ कबडडी खेलता था और किसी से भी कम नहीं था! हुआ यूं कि एक दिन मैं भी बोला कि कबडडी खेलूंगा! खेलने के दौरान मेरी टीम हार गयी और हार का ठीकरा मुझ पर डाला गया कि इन्होंने कुछ नहीं किया! लेकिन मेरा आत्मविवास सातवें आसमान पर था और मैं कहीं से भी यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि मैं इनलोगों से किसी भी तरह का ककमजोर हूं! हमने फिर से मैंच खेला और जीतकर ही दम लिया! सबसे बेहतर परपफाWरमेंस मेरा रहा! मुझे अपनी उपयोगिता और काबिलियत दिखानी थी! उस समय मेरा कोई मार्गदर्ाक नहीं था और कोई बनाया हुआ सीधा रास्ता भी नहीं था! खुद रास्ता बनाना था औार खुद ही उसे पार भी करना था!इसे पार करने में हमें किसी प्रकार की परेाानी भी नहीं हो रही थी, क्योंकि यह मेरा फैसला था!उसी समय मुझे यह अहसास हुआ कि अगर आप खुद कोई फैसला लेते हैं, तो सफलता के चांसेज कई गुना अधिक बढ जाते हैं! इस तरह के अनुभव का अभी तक उपयोग कर रहा हूं और आगे भी बढ रहा हूं! कबडउी खेलने के दौरान मुझे लगा कि मैं खडा नहीं हो सकता हूं, लेकिन आसउट कर सकता हूं! मैं घुटने के बल पर चलता था और इतनी स्पीड थी कि विरोधी टीम हमें छू भी नहीं पाता था और जो मुझे टारगेट करके पकडने आते थे, तो उसके टांग पर हमारी नजर रहती थी और हमेाा उसका टांग पकडने की कोिाा करता था और हमेाा सफल रहता था! वह गिर जाता था और हमारे टीम के सभी सदस्य उसे पकडकर आउट कर देते थे! यह एक अलग तरह का अनुभव था और इस खासियत की वजह से हमें सभी टीम में जगह मिल जाता था!                
जब मैं तैराक बन गया
घर से मनाही के बावजूद नहाने जाता था और जैसे सभी दोस्त तैरने के लिए मेहनत करते थे, मैं भी करता था! इसका सकारात्मक प्रभाव यह पडा कि मैं भी उन्हीं की तरह तैराक बन गया और कभी वह जीतता था, तो कभी मैं! सभी को आचर्य लगता था कि यह लडका कैसे तैर रहा है और मैं काफी खुा होता था कि लोग मुझे देख रहे हैं! यह एक अलग तरह का अनुभव था! इसके अलावा मुझे जब कोई देखते थे, तो मैं हमेाा बचने की कोिाा करता था, क्योंकि वे हमेाा हमें हीन या दया की भाव से ही देखते थे! ल्ेकिन नदी में तैरते हुए देखते थे, तो काफी खुा होता था! मैं बैटिंग भी करता था और अपनी टीम में बाWलिंग और फील्डिंग भी करता था! एक रनर रखता था, जो मेरे लिए दौडता था! उसके रन आउट के चांस अधिक होते थे, इस कारण हम रन लेने का जोखिम कम लेते थे और टीम का स्कोर बढाने के लिए चौका और छक्का पर ध्यान देते थे! इसका लाभ यह मिला कि जब तक मैं कzीज पर रहता था, तो तेंदुलकर की तरह जीत पक्की रहती थी और इसमें कई बार सफल भी रहा! लेग साइड इतना मजबूत था कि अगर गलती से बाWल लेग साइड आता था, तो वो बाWल चार या सिक्स के लिए जरूर जाता था! इसी तरह के कई अनुभवों के माध्यम से मैंे यह कह सकता हूं कि इस तरह के लोग खुद से आगे बढते हैं! उन्हें कोई सहारा नहीं होता है, जो टूट जाते हैं, वे पिछड जाते हैं!   

शनिवार, 24 जनवरी 2015

भारत में एक ही सरदार रहेंगे


हमें मेक इन इंडिया को भी गौर से देखना चाहिए और ठोक बजाकर अमेरका से सौदा करना चाहिए! तभी मोदी सच्चे अर्थों में बनिया कहलाएंगे और सन W सरदार कहलाने के भागी बनेंगे अन्यथा भारत में एक ही सरदार रहेंगे और उन्हें अमर रखने के लिए स्टेच्यू पर सभी पैसे खर्च करने पडेंगे! और सभी लोग सन W सरदार बनकर मेड इन स्टेच्यू W सरदार ही बनने में ही मस्त रहेंगे! मेक इन इंडिया जय जवान जय किसान की तरह नारा बनकर ही रह जाएगा और निर्मल गंगा लगातार स्वच्छता अभियान मेें निर्बल ही बनती जाएगी और बेचारा लोग मरने के बाद भी गंगा में पानी के अभाव में zेन से मलबे के रूप में फेंके जाएंगे! क्योंकि यह तो तय है कि जिंदा लोग भले ही zंगा नहाने वहां नहीं जाएं, लेकिन मरने के बाद लोगों को स्नेह दिखाने के लिए वे अपने पैरेंटस को गंगा में डुबकी जरूर लगाएंगे! यह मानव स्वभाव है कि आदमी जिंदा रहते भले ही अपनी परंपरा की खिल्ली उडाए, लेकिन अंत में वह उसी परंपरा का पक्षपाती हो जाता है, जिसे वह उमz भर नकराता रहता है! यदि ऐसा नहीं होता तो कफन में प्रेमचंद यह कहते हुए नहीं मिलते कि समाज जिंदा व्यक्ति को तो नंगा देख सकता है, लेकिन मरने के वक्त उसे कफन मिले, यह उसे बर्दास्त नहीं है! प्रेमचंद के स्टाइल में यदि कहें, तो भले ही जिंदा लोग गंगा का पानी पीने से खुद को परहेज करे, लेकिन भगवान को पिलाने और मरने वक्त पानी में गंगा का जल ही मांगेगे, यह तय है! और उसके बेटे उन्हें गंगा में डुबकी जरूर लगवाएंगे, क्योंकि वे भी जिंदा में उन्हें भूख से अपनी हाल पर मरने के लिए छोड दिए थे और मरने के बाद लोगों को खु करने के लिए वे सभी करेंगे, जो उन्हें जिंदा रहने पर नसीब नहीं हुआ था, कुछ आंसू भी बहाएंगे और अपनी गलतियों पर परदा भी डालेंगे, तभी समाज उन्हें माफ कर सकेगा! और उनकी व्यवस्था को देखकर समाज के लोग उनका जयजयकार करेंगे और वे फूले नहंीं समाएंगे! अगर किसी कारणव गंगा में उनकाारीर प्रवाह नहीं कर पाएंगे, तो उनका अस्थि गंगा में जरूर प्रवाहित करेंगे, यह तय है! इस तरह की धार्मिक भावना और लोगों की धारणा को समझते हुए उमा भारती पहले ही मास्टरी दिखाते हुए कह चुकी हैं किाव को गंगा में प्रवाहित किया जाए या नहीं, यह संत तय करेंगे! उन्हें पता है कि संत की संतगिरी पुरानी परंंपरा को जीवित रखने में ही है! इस कारण वे इस तरह के जोखिम नहीं ले सकते कि गंगा में प्रवाहित किया जाए! इससे गंगा की महत्ता कम हो जाएगी और संत के गंगा स्नान की महत्ता भी!इससे गंगा स्नान पर सवालिया निाान भी लग जाएगा और गंगा में प्रवाहित होने के बाद मोक्ष की प्राप्ति भी संदेह के घेरे में जाएगी और मोदी साहब का सरकासरी तोता यानी कि सीबीआई को यह पता लगाने के लिए कह दिया जाए कि गंगा स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है कि नहीं ? इनके दोनों हाथों में लडडू होंगे! अगर मोक्ष की प्राप्ति होती होगी, तो मोदी को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि देखिए, नेहरू कितने चालाक थे, तभी तो वे अपना अस्थि गंगा में विसर्जित करके खेतों में विसर्जित करने के लिए कह रहे थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि गंगा से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है! इसके उलट अगर सही निकला तो गंगा सिर्फ हिंदुओं के लिए सुरक्षित हो जाएगा, क्योंकि मोक्ष हिंदू के लिए अनिवार्य हो जाएगा और गंगा का पानी उसे ही नसीब हो पाएगा, जो हिंदू बनेंगे! इससे हिंदू राज्य बनने में सहयोग मिलेगा, जो उनका हिडन एजेंडा है!