बुधवार, 23 नवंबर 2011

यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी

 अमेरिका की दो नामी शिक्षण संस्थाओं से पढ़कर आए और नंदन निलेकनी के नेतृत्व में यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी से जुड़कर काम कर रहे तुषार वशिष्ठ और मैथ्यू चेरियन भारत में योजना आयोग द्वारा पेश की गई आधिकारिक परिभाषा से इतने (अ)प्रभावित हुए कि उन्होंने 32 रुपये रोजाना के खर्च में कुछ दिन गुजारने का फैसला कर लिया।

इस देश में सदियों से गरीबों पर प्रयोग होते रहे हैं, लेकिन हाल में ही गरीबी पर किया गया प्रयोग अपने आप में विशिष्ट और देश के राजनेताओं, नौकरशाहों के सामने एक नजीर पेश करने वाला है। अमेरिका की दो नामी शिक्षण संस्थाओं से पढ़कर आए और नंदन निलेकनी के नेतृत्व में यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी से जुड़कर काम कर रहे तुषार वशिष्ठ और मैथ्यू चेरियन भारत में योजना आयोग द्वारा पेश की गई आधिकारिक परिभाषा से इतने (अ)प्रभावित हुए कि उन्होंने 32 रुपये रोजाना के खर्च में कुछ दिन गुजारने का फैसला कर लिया। सरकार ने शहर में 32 और गांव में 26 रुपये वाली जो गरीबी रेखा निर्धारित की है उसके संदर्भ में देश की इन दो मेधावी शख्सियतों ने व्यावहारिक परीक्षण करके देखा कि 26 या 32 रुपये प्रतिदिन में क्या एक नागरिक अपनी गुजर-बसर कर भी सकता है? इनका यह अद्वितीय प्रयोग पांच हफ्तों तक चला। अपनी जरूरतों में कटौती करने के उपरांत पहले हफ्ते में ये इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शहर में डेढ़ सौ रुपये प्रतिदिन से कम में एक व्यक्ति जीवन गुजार ही नहीं कर सकता। फिर दो हफ्तों के लिए इन दोनों ने अपने खर्चो में और कटौती की तो भी खर्चा सौ रुपये प्रतिदिन रहा। इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सौ रुपये रोज पर जीवन गुजारना बहुत मजबूरी भरा काम है। इसके बाद अगले दो हफ्तों के लिए इन्होंने अपने सभी खर्चो में कटौती कर दी और 32 रुपयों में जिंदा रहकर दिखाया। निष्कर्ष यह निकला कि शहरों में 32 रुपये में सिर्फ जिंदा रहने के लिए ही जिया जा सकता है। पांच हफ्तों के प्रयोग में इन्होंने यह जानने की कोशिश भी की कि गरीब लोग इससे भी कम आमदनी में कैसे जिंदा रहते होंगे? इनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि इंसान घनघोर गरीबी में भी जैसे-तैसे जीवित रह लेता है, पर उसकी शारीरिक और मानसिक ताकत इतनी कम हो जाती है कि खुद या अपने परिवार को गरीबी से निजात दिलाने के बारे में वह सोच भी नहीं पाता। इन्होंने अपने अनुभव से बताया कि शहरों में गरीबी की रेखा 120 से 150 रुपये रोज की आय पर निर्धारित होनी चाहिए तो गांवों में 90 से 110 रुपये के बीच। सरकार इनकी यह सिफारिश तो मानने से रही, पर इन्होंने जो किया है वह सराहनीय है। काश, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी कोई ऐसा ही प्रयोग करके देखते तो शायद समझ पाते कि गरीबी है क्या? मैं तो यह कहता हूं कि व्यावहारिक यह होगा कि इस रिपोर्ट को बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 965 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के अध्यक्ष हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी इसी तरह व्यावहारिक रूप से एक बार शहर या गांव में इतने ही रुपयों में रहने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि रिपोर्ट बनाने और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। यह देश की विडंबना है कि इतने बड़े अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के होते हुए भी और इतनी चरम महंगाई को देखते हुए भी योजना आयोग द्वारा इस तरह कि रिपोर्ट बनाया गया। यह तो सरासर गरीब और गरीबों के साथ मजाक है । गरीबी पर किया गया यह प्रयोग आपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस प्रयोग को ऐसे दो लोगों ने किया जिन्होंने अपनी शिक्षा भी अमेरिका से प्राप्त की है। यह लोग काफी धनाड्य और साधन संपन्न भी हैं। यह उन लोगों के लिए एक नजीर है जो पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर गरीबों पर रिपोर्ट बनाते हैं और उसे सही ठहराने के लिए अपना तर्क भी देते हैं। गरीबी पर अध्ययन के लिए कई देशो की यात्राएं की जाती हैं और उन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। योजना आयोग ने महंगाई के बढ़ते बोझ से गरीबों की नई परिभाषा बनाई है। गांव में गरीब का घर रोजाना 26 रुपये में चलाने की बात करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का विदेश यात्राओं का रोजाना औसत खर्च है 11354 रुपये। योजना आयोग ने एक आरटीआइ के जवाब में यह बताया कि अहलूवालिया ने पांच साल में जुलाई 2006 से जुलाई 2011 तक सरकारी खर्च पर 35 बार विदेश यात्रा पर गए। इन यात्राओं में उन पर कुल 2 करोड 4 लाख 36 हजार 825 रुपये का खर्च आया। रोजाना औसतन विदेश यात्रा पर 11354 रुपये खर्च करने वाले योजना आयोग के हमारे उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया आखिर गरीबों का दर्द समझें भी कैसे जबकि उन्हें इसका कोई अनुभव ही नहीं है और न ही वह ऐसा प्रयोग ही चाहते हैं। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है। आज लगभग हर क्षेत्र में भारत अच्छी तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इतनी तरक्की होने के बावजूद भारत आज भी गरीब राष्ट्रों में गिना जाता है तो इसके लिए आखिर दोष किसका है? आर्थिक तरक्की से जहां देश का अमीर वर्ग और भी अमीर हुआ है तो गरीब वर्ग लगातार गरीब होता जा रहा है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है। इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है की गरीबी का पूर्ण उन्मूलन करने के लिए प्रयास किया जाए। आज जीडीपी के आंकड़े सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। असल में तो आज भी झुग्गी झोपडी में रहने वाले लोग 40 से 50 रुपये रोजाना कमाते हैं। उनका जीवन स्तर काफी निम्न है। उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाए। तमाम वैश्विक संस्थाएं जैसे विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करते हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंच पाता। इस कारण उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। गरीबी से निपटने के लिए सबसे पहले सरकार को भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा तभी सही मायने में गरीबी का उन्मूलन होगा। इसके लिए सरकार के साथ-साथ जनता का भी फर्ज बनता है कि अपनी कमाई का छोटा सा हिस्सा गरीबों को दें। तभी भारत सही मायने में विकसित देश बन सकेगा। हमारे देश में नेताओं और नौकरशाहों की संवेदनशीलता व जवाबदेही लगता है खत्म हो चुकी है नहीं तो इतनी शर्मनाक रिपोर्ट शायद ही आती जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। वास्तव में इस रिपोर्ट का असली मकसद सस्ते दर पर वितरित किए जाने वाले अनाज की मात्रा को कम करना है। जब योजना आयोग के ऐसे इरादे हों तो फिर किसी को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि जो खाद्य सुरक्षा विधेयक चर्चा में है, वह आम आदमी का भला करने वाला है।
शशांक द्विवेदी 

शनिवार, 19 नवंबर 2011

मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....

मर्यादा जीवन भर पूजी, बदले मे वनवास मिला...
बड़ी सती थी जिसको कहते जग का तब उपहास मिला...
शिव का आधा अंग बनी, पर बदले मे थी आग मिली...
सत्यमूर्ति बन भटक रहा था, बुझी पुत्र की साँस मिली...

इंद्रिय सारी जीत चुका था, उसको पुत्र वियोग मिला...
विष प्याला उपहार मिला था कृष्ण भक्ति का जोग लिया...
दानवीर, आदर्श सखा, पर छल से था वो वधा गया...
ज्ञान मूर्ति इक संत का शव भी, था शैय्या पर पड़ा रहा...

धर्म हेतु उपदेश दिया पर पूरा वंश विनाश मिला...
हरि के थे जो मात पिता उनको क्यूँ कारावास मिला...
मात पिता का बड़ा भक्त था, बाणों का आघात हुआ...
ऐसे ही ना जाने कितने अच्छे जन का ह्रास हुआ....

थे ऐसे भी जो पाप कर्म की परिभाषा का अर्थ बने...
जो अच्छाई को धूल चटाते, धर्म अंत का गर्त बने...
जो अत्याचार मचाते थे, दूजो की पत्नी लाते थे...
वो ईश के हाथों मरते थे, फिर परम गति को पाते थे...

अब ये बतलाओ सत्य बोल मैं कौन सा सुख पा जाऊँगा...
मैं धर्म राह पे चला अगर,दुख कष्ट सदा ही पाऊँगा...
नाम अमरता नही चाहिए, चयन सुखों का करता हूँ...
मैं अच्छा कैसे बन जाऊं, मैं अच्छाई से डरता हूँ....

धर्म गुरुओं का लीप लॉक

  चुंबन से आत्‍मिक प्रेम बढेगा और धर्मगुरु एक दूसरे धर्म के बारे में गलत बातें कम फैलाएंगे। इसमें उन्‍हें कि‍सी  प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी, क्‍योंक‍ि पुरुष धर्मगुरु दूसरे पुरुष के होठ चुसेंगे। लेकि‍न डर लगता है क‍ि यद‍ि बाबा रामदेव कि‍सी का होठ चुसेंगे, तो उन पर क्‍या गुजरेगी।  

आजकल सभी फि‍ल्‍मों में लीप लॉक अनि‍वार्य सा हो गया है। कोई भी फि‍ल्‍म इसके बि‍ना हि‍ट नहीं होती है। यह बात हमारे धर्म गुरु को भी अच्‍छी लगी। इस समय हालात ये हैं क‍ि उन्‍हें कोई भाव नहीं दे रहा है। अपनी चर्चा के लिए उन्‍होंने लीप लॉक का हि‍ट फि‍ल्‍मी फार्मूला अपनाया। यह सीन काफी हि‍ट रहा और  यूरोपीय देशों में एक इतालवी कंपनी के ' अनहेट ' सीरीज के विज्ञापन इधर कुछ ज्यादा ही चर्चा में हैं। इनमें एक - दूसरे से तीखी घृणा के लिए पहचाने जाने वाले लोगों को - जो प्राय : पुरुष ही हैं - फोटोशॉप के जरिये तैयार की गई नकली तस्वीरों में एक - दूसरे को होंठों पर चूमते दिखाया गया है। कुछेक पश्चिमी और कुछ अरबी समाजों में मुलाकात के वक्त गाल से गाल सटाने की परंपरा है। जब - तब भावातिरेक में लोग एक - दूसरे को गाल पर चूम लेते हैं , लेकिन होठों पर चुंबन का वहां एक स्पष्ट सांस्कृतिक संदर्भ है। ईसाई परंपरा में पति अपनी नवविवाहिता पत्नी को सार्वजनिक रूप से सिर्फ एक बार होंठों पर चूमता है। बाकी सभी संदर्भों में होठों पर चुंबन निजी दायरे की चीज समझी जाता है और इसे यौन संसर्ग के एक हिस्से की तरह देखा जाता है। स्वाभाविक था कि यूरोप में इस पूरी सीरीज पर , और खासकर इसकी उस तस्वीर पर तीखी प्रतिक्रिया देखी गई , जिसमें मौजूदा पोप को मिस्र के एक कट्टरपंथी मौलवी के साथ होंठ से होंठ मिलाए दिखाया गया था। लोगों के विरोध से विज्ञापन जारी करने वाली कंपनी बुरी तरह डर गई और उसने अनहेट सीरीज से इस तस्वीर को हटा देने का फैसला कर लिया। लेकिन इस सीरीज के बाकी सारे हिस्से आज भी ज्यों के त्यों हैं। विज्ञापन की नई थ्योरी में चर्चित होना ही सब कुछ समझा जाता है , भले ही चर्चा की वजह सही हो या गलत। लेकिन विज्ञापन बनाने वालों में सबसे ज्यादा शातिर लोग अपनी चर्चा के फॉर्म्युले में कोई फिलॉसफिकल एंगल भी जोड़ना चाहते हैं , ताकि उनके प्रॉडक्ट के बारे में होने वाली बात ज्यादा दीर्घजीवी हो सके। मसलन , अनड्रेस ( निर्वस्त्र होने ) की तर्ज पर बनाए गए शब्द अनहेट को इसके साथ छपने वाली तस्वीरों से जोड़कर देखें तो एकबारगी ऐसी गफलत हो सकती है कि इसमें लोगों से एक - दूसरे के प्रति जाति , नस्ल , धर्म आदि पर आधारित घृणा को छोड़कर विश्वशांति की तरफ बढ़ने की अपील की गई है। कहना कठिन है कि शांति के ऐसे चाकलेटी फॉर्म्युले लोगों को करीब लाते हैं , या उन्हें खिझाकर एक - दूसरे से और ज्यादा दूर धकेल देते हैं।मुझे तो लगता है क‍ि इससे लोग काफी करीब आएंगे। क्‍योंकि चुंबन से आत्‍मिक प्रेम बढेगा और धर्मगुरु एक दूसरे धर्म के बारे में गलत बातें कम फैलाएंगे। इसमें उन्‍हें कि‍सी  प्रकार की परेशानी भी नहीं होगी, क्‍योंक‍ि पुरुष धर्मगुरु दूसरे पुरुष के होठ चुसेंगे। लेकि‍न डर लगता है क‍ि यद‍ि बाबा रामदेव कि‍सी का होठ चुसेंगे, तो उन पर क्‍या गुजरेगी। 

बुधवार, 16 नवंबर 2011

इंटरनेट पापा

  इंटरनेट के आविर्भाव ने सम्पूर्ण विश्व में एक नई क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। आज हम अपने घर में बैठकर ही अनेकों आवश्यक कार्यों को इंटरनेट की सहायता से निबटा सकते हैं। इंटरनेट ने “वसुधैव कुटुंबकम्” की धारणा को सत्य में परिणित कर दिखाया है। आप किसी भी समय किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति से सम्पर्क कर सकते हैं। ईमेल अथवा एसएमएस के द्वारा कहीं पर भी तत्काल संदेश भेजा जा सकता है। यह बात हमारे सहयोगी मनोज जी को काफी अच्‍छी लगी और उन्‍होंने घर पर इंटरनेट ले ल‍िया। उस समय उनके बच्‍चे काफी खुश हुए क‍ि अब फेसबुक और मेल से दोस्‍तों से खूब बातें करूंगा, लेकि‍न उन्‍हें क्‍या पता था क‍ि पापा अब पापा नहीं रह जाएंगे, वे इंटरनेट पापा बन जाएंगे। अभी तक यही होता था क‍ि उनके बच्‍च्‍ो स्‍कूल में अच्‍छे मार्क्‍स ले आते थे, और मार्क्‍स देखकर वे काफी खुश हो जाते थे क‍ि बच्‍चे की पढाई अच्‍छी चल रही है। इंटरनेट आने से उनका ज्ञान दायरा बढा और वे इंटरनेट की तरह फास्‍ट सोचने लगे। वे पुराने खयालात के आदमी हैं। इस कारण इंटरनेट पर अश्‍लील फोटो देखना या फेसबुक पर चैटिंग करना अच्‍छा नहीं लगता था। वे सोचने लगे क‍ि आखिर कि‍स तरह इंटरनेट का सदुपयोग हो। उन्‍होंने सोचा क‍ि इंटरनेट के माध्‍यम से बच्‍चों की पढाई जांची जाए। इसमें फायदा यह है क‍ि सही उत्‍तर के ल‍िए उन्‍हें द‍िमाग भी नहीं खंपाना पडेगा और बच्‍चों की पढाई के बारे में भी सही जानकारी मि‍ल जाएगी। इसके पहले बच्‍चे उन्‍हें इंटरनेट के बारे में काफी कुछ बताया करते थे। बात के स‍िलसिले में ऑनलाइन टेस्‍ट की बात भी कह दी। बच्‍चे तो बच्‍चे होते हैं, बोलने के बाद उन्‍हें कुछ भी याद नहीं रहती है। आजकल के बच्‍चे इतने मॉडर्न हो गए हैं क‍ि उनके गर्लफ्रेंड की संख्‍या कि‍तनी है, वे भी याद नहीं रहते हैं। याद रहते हैं, तो  स‍िर्फ नई फ्रेंड, नए मोबाइल, बाइक या नई कार। आजकल वे इतने ओवर कॉनफि‍डेंस होने लगे हैं क‍ि अपने माता पि‍ता को हमेशा बेबकूफ बनाना चाहते हैं। पैरेंट़स समझते हुए भी प्‍यार के वशीभूत खुद को अज्ञानी समझना ही बेहतर समझते हैं।  बच्‍चे यह नहीं समझते क‍ि वे उनके बाप हैं। अगर वे मॉडर्न हो जाएं तो बच्‍चे बच्‍चे ही रह जाएंगे। आज तेंदुलकर और अमि‍ताभ से बढिया उदाहरण क्‍या हो सकता है। वे दोनों  क‍िसी भी आनेवाली पीढी से आगे चलते हैं। मनोज जी इंटरनेट लेने के बाद बच्‍चों को ऑनलाइन टेस्‍ट लेना शुरू कर दि‍ए। बच्‍चे कभी सोचे  भी नहीं थे क‍ि पापा इस तरह के टेस्‍ट ले सकते हैं। अब वे काफी परेशान हैं और इस इंटरनेट पापा से परेशान भी । उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा है क‍ि वे क्‍या करें।       ‍